कुमार विक्रम की रचनाएँ

इतिहास के पन्ने पुनः पलटते हुए 

मैं धम्म से कुर्सी से गिर पड़ा
ज़मीन पर लेटे-लेटे
लगा सोचने
कि यह व्यक्ति जो मेरे सामने है खड़ा
जिसे मैं जानता हूँ सदियों से
एक पल को क्यों लगा
कि यह खून में सराबोर है?

हालाँकि, घंटों से हम दोनों थे बैठे साथ
चाय पी, गप्पें हाँकी
इधर-उधर की कही, सुनाई
हँसे भी साथ-साथ
बालकनी पर की चहलक़दमियाँ
लेकिन फिर जैसे ही वह लाने को पानी बढ़ा
मुझे लगा जैसे खून से हो वह सना
और मैं गिर गया धम्म से

आश्चर्य है जब इसकी बनाई चाय
पी थी मैंने, मुझे कुछ अजीब-सी
बदबू आयी थी ज़रूर और जिस कुर्सी पर
वह बैठा था उसका रंग था लाल-गुलाबी-सा
लेकिन जान-पहचान के संग
अनजानी बातें कोई कब सोचता है
नहीं दिखता कोई बदरंग

मैंने हमेशा माना था उसे बड़ा भाई
(वह खुद भी यही जानता था)
मुझे नहीं मालूम
उसकी मुस्कान खून से नहाई होती थी
उसकी जीन्स के पॉकेट में
सोचा था मैंने है कोई बेशकीमती मोबाइल
कहाँ था मालूम मुझे
उसमें तो छिपा रखा था उसने
स्वर्ण-जड़ित रक्त-रंजित तलवार
और उसकी टी-शर्ट पर की पेंटिंग
नज़दीक से जा देखने पर
दरअसल थी एक नक़्क़ाशी
खून के छींटों से बनी

मुझे नहीं था मालूम
अपनी सोच की नग्नता
उसने ढक रखी थी खूनी किस्सों से
जिसके पात्र होते थे मैं और मेरे पूर्वज ही

और मैं धम्म से कुर्सी से गिर पड़ा

साक्षी भारत’, २००६

एक सच यह भी

बस अभी-अभी मैंने विषपान किया
यह विष अब मेरी धमनियों में उतर
मेरे खून का हिस्सा होकर
सारे शरीर में गिलहरियों की तरह
दौड़ेगा, कूदेगा, बैठेगा, सोएगा

लेकिन मेरे चेहरे की कांति
उस पर बिखरी-फैली आभा पर
कोई असर नहीं दिखेगा

क्योंकि अधपढ़ शहरी की भांति
सबके बीचों-बीच
रेलवे प्लेटफॉर्म पर बैठ
अपना थैला खोल
सबके सामने मैं पानी की बोतल
नहीं निकालता हूँ
मेरे गंदे शर्ट, मेरी पीली पैंट
मेरा पुराना लाल तौलिया
मटमैली चप्पल
यह सब मैं दिखने नहीं देता हूँ

क्योंकि मेरे पास है क्रेडिट कार्ड
और मैं करता हूँ सफर
बड़े हल्के होकर…
मेरे धमनियों का विष ही है काफी
मेरे सफर की ज़रूरतों के लिए
सफ़र के बोझ के लिए
चेहरे की कांति बनाए रखने के लिए

साक्षी भारत’, २००६

सोने की तैयारी में कुछ संभावनाएँ

वे सोने की तैयारियाँ कर रहे हैं
उबासियाँ लेते-लेते
और बिस्तरे बिछाते-बिछाते
वो ऊंघ रहे हैं
आधी नींद में खुद के खर्राटे से भयभीत हो
वो हड़बड़ा उठ जा रहे हैं…
हमारे नृत्य अब उन्हें रास नहीं आ रहे हैं
वो अब परेशान होते हैं हमारे दिलासों से
अब हमारे सारे प्रयत्न भाग-दौड़ थक गए हैं
उनके संयम के बाँध टूटने की आवाज़ आ रही है
वह बाँध जिसकी नींव हमने ही डाली थी
और उमंगता से की थी जिसकी घोषणा …
वह सब अब बिखर रहे हैं
और हम इस अंधकारमय रात के मध्य
उठ रहे हैं उनकी प्याली में कुछ ऐसी सोच उड़ेलने हेतु
जिससे उनकी नींद को फुसला कर रख पाए द्वारपाल
उलझा कर रखे उसे किसी दिशाविहीन बहस में …

आह! रात प्रति रात
दिन प्रति दिन, पल प्रतिपल
उन्हें नींद आना
और हमारा उन्हें बहलाना
कहना समझाना मारना बहाना पुचकारना
“सुनो ऐ प्रेयसी, बस हम आ ही गए तुम्हारे पास
सारे समंदर लाँघ कर.”

साक्षी भारत’, २००६

समय से पहले

कुछ अजीब सी स्थिति हो गयी पैदा
समय से पूर्व ही मैं पहुँच गया…

रंगमंच अभी सज-धज ही रहा था
कुर्सियाँ सजाते फटेहाल अवस्था में
दो मज़दूर वातावरण पर अभी चादर डाल ही रहे थे
अभिनेतागणों की अठखेलियां
उनकी शिकायतें, उनकी शरारतों की आवाज़
नेपथ्य से (जो खुद अभी बन ही रहा था)
साफ़ तौर से आ रही थी
कुछ उनमे से दौड़ते-भागते रंगमंच पर आ
सीटियाँ बजा वापस चले जाते थे
कुछ अभिनेत्रियाँ भीनी-भीनी रोशनी में
चेहरा दिखा स्टेज पर बाएँ-दाएँ कर रही थीं
किसी भव्य महल का दृश्य तैयार हो रहा था
आदमकद शीशे कमरे के कोने में सजाए जा रहे थे
बल्ब की रौशनी जला-बुझा कर टेस्ट की जा रही थी
माइक पर ‘टेस्टिंग-टेस्टिंग’ की गूँज
अभिनय की दुनिया के परे पहुँच रही थी
मेरे आगमन से अनजान …

लेकिन मैं भी समय से पहले पहुँचा
विचार की भांति
ढीठ बन खड़ा रहा
और सच मानो
पीछे से समय दौड़ता, हाँफ़ता, काँपता
मेरे पास पहुँचा
और मेरे बैठने का इंतज़ाम करने लगा
कोलाहल-सा मच गया
भागमभागी, अफ़रातफरी, उठका-पटकी में
उस हाँफते, काँपते हुए-से परछाई को देख
मैं मंद-मंद मुस्कुरा रहा था
अजीब ही विडंबना थी उसकी
जिसकी आदत रही है सबसे पहले प्रस्फुटित होने की
जिसने जाना नहीं
स्वागत कैसे किया जाता है
आगंतुकों का…

साक्षी भारत’, २००६

प्राईवेट जोक

किसी से उसके दुख के बारे में न पूछना
एक तरकीब अच्छी है
उसके दुख में शामिल होने की

घाव से मवाद निकालने की कला
बेहतर है
माहिर डॉक्टर या नर्स के लिए
छोड़ दी जाए
क्यों तुम अपनी ईजाद की हुई दवा
मरहम-पट्टी चाक़ू छुरी लेकर
उसके दुख को कुरेदना चाहते हो

अस्पताल के वार्ड बॉए रिसेपशनिस्ट
पोछा लगाती कामवाली को देखो
जो दुख के आसपास घूमते हीं रहते हैं
दुख से पूर्णत: विमुख
बिजली का मिस्त्री
मरीज़ के कमरे के पंखों को
ठीक करने आया हुआ है
और मरीज़ का हाल पूछे बग़ैर
उसके द्वारा चलाए पंखे की हवा ही
एक सुखद संपर्क सूत्र है
उसके और मरीज़ के बीच

मरीज़ से मिलो तो ज़रूर
पर उस वार्ड बॉए की तरह
जो मरीज़ को मशगूल रखता है
बीती शाम को हुई
बेमौसम बारिश की बातचीत में
या राजनीतिक उठापटक की
चीरफाड़ करने में
या फिर बारहवीं पास किए बच्चे के
किसी कोर्स में एडमिशन की चर्चाओं में

किसी से उसके दुख में न पूछना
एक तरकीब अच्छी है
उसके दुख में शामिल होने की
क्योंकि दुख तो उसका आँगन है
जहाँ हम-तुम चहलक़दमी करते
अच्छे नहीं दिखते

उसके दरवाज़े के बाहर
बरामदे में ही बैठकर
दूर से धीरे-धीरे
चाय की चुस्की लेते हुए
हमारा-तुम्हारा बार बार लौटना
उसके दुख की टीस को
कुछ कम कर सकता है

‘नया ज्ञानोदय’, 2008

नुस्खा 

आओ, हम दुःख-दुःख खेलें
तुम अपना दुःख लेकर आओ
मैं अपना दुःख ले आ गया
आओ एक-दुसरे का दुःख बाँटें

ये रहा मेरा दुःख
ये रहा तुम्हारा दुःख
दोनों को पहले जोड़ें
अरे, ये क्या?
यह तो बन गया महादुःख!

चलो अच्छा है
चलो अब दोनों को शेक करें,
दोनों को मिक्स करें
अब पता नहीं किसका दुःख किसके हिस्से

चलो यह भी अच्छा है
अब बाँटें यह महा दुःख
अरे यह क्या? शेक किया, मिक्स किया
फिर भी रह गया
मेरे पास मेरा दुःख
तुम्हारे पास तुम्हारा दुःख

चलो, यह मन का सच्चा है
शातिर है, पहचानता है
अपना घर, अपना मन
चलो फिर से खेलें!

आओ, दुःख-दुःख खेलें
तुम अपना दुःख लेकर आओ
मैं अपना दुःख ले आ गया
आओ अपना-अपना दुःख चाटें!

नया ज्ञानोदय’, 2008

पिता जी का गुस्सा

दादी बताती है कि बचपन में भी पिता इसी तरह
हो जाते थे गुस्सा और लगते थे काँपते
कई बार बीच दोपहर में निकल जाते
पेड़ की शाखाओं पर रूठ बैठ जाते
बिना सीढ़ियों की छत पर पाए जाते
और कई बार सडकों, गलियों, बाज़ारों के चक्कर काट
चुपचाप पीछे के दरवाज़े से वापस लौट
आँगन के एक कोने में पानी पीते दिखते

अपने विवाह के एक शाम पहले भी
वे कुछ इसी तरह काँपते
फिर कभी वापस न लौटने की धमकी देते हुए
खो गए थे धुंधलाती शाम में
किसी ने उन्हें उस शाम अमरुद खरीदते देखा था
हालाँकि चौक पर अपने एक स्कूली मित्र से टकराकर
उसके साथ बातचीत करते
वे लौट गए थे चुपचाप

दादी के किस्सों को मेरी माँ
मेरी पीठ पर मरहम लगाते हुए आगे बढ़ाती थी
कि कैसे एक शाम खेलकर
देर से आने पर पिता ने भैया की पिटाई
बेंत से की थी
कुछ उसी तरह जिस तरह उस रात
उन्होंने ने मेरी की थी

दादा जब जीवित थे और अरसे बाद पिता को
ज़ोरों से सबके सामने डांटने लगे थे
जिसके चलते दोनों की अनबन कई महीनो तक
घर मैं तैरती रही
जो दीवारों से टकराकर हमारे स्कूल की किताबों में
समा जाती थी

अब भी पिता कुछ इसी तरह हैं
फिर भी हम सबको पसंद हैं पिता
जिनको पसंद है अपना गुस्सा

नया ज्ञानोदय’, 2008

पिता की मृत्यु से एक संवाद

1
पिता
मुझे तुम्हारी मृत्यु
अब बोर करने लगी है

जब थी यह नयी नवीली
तब नम व अश्रुपूर्ण आँखों से ही सही
हमने किया इसका स्वागत बड़ी गर्मजोशी से
साज-श्रृंगार, मान-सम्मान, आवभगत किया दिल खोलकर
दौड़-दौड़कर हमने इसके सारे नखरे उठाए
सर-आंखों पर बिठाया
पर अब धीरे-धीरे यह हो रहा है आभास
तुम्हारी मृत्यु को तुमसे नहीं है कोई सरोकार
हमने समझा जैसे हम तुम्हारे हैं
वैसे ही तुम्हारी मृत्यु भी तुम्हारी है
और हमारा उससे सीधा गहरा रिश्ता है
पर मृत्यु तो शाम में स्कूल में बजने वाली घंटी है
वहाँ के दिनभर की शिक्षा-दीक्षा, खेल-कूद
भविष्य के लिए बनाए गए सारे सपने
उसके लिए बेमायने हैं
मानो शरीर का कोई ऐसा अंग
जो शरीर से बाहर है, विमुख है
एक ऐसा हिस्सा जो शरीर के विलीन होने के बाद
अपना वजूद जताने आता हो,

एक सूदखोर साहूकार की तरह बही-खाता लेकर
यह खड़ी हो गई है मेरे सामने
मांगती है पल-पल का हिसाब

2

पिता
तुम्हारी मृत्यु
आश्चर्य है
तुम्हें जानती-पहचानती नहीं!

उसे क्या पता कि
तुमने मुझे खुला छोड़ दिया था
खुद मुझे घोड़े पर बिठाकर जंगल की अनिश्चितताओं में
और तुम्हारी अदृश्य जोरदार तालिया पार्श्व से ही
मुझे और मेरे घोड़े का मार्गदर्शन करती रही
उत्साहित करती रहीं ?
ये सब बातें तुम्हारी मृत्यु को पता नहीं
वो तो कहती है जिस घोड़े पर बैठे हो
वो तुम्हारे पिता ने कर्ज लेकर खरीदा था
उसका हिसाब दो !
उनकी जिन तालियों पर इतना फ़ख्र करते हो
उन्हीं हथेलियों से खून की लपटें निकलती थीं
आखिरकार काँटों के चप्पल पहनकर
तालियाँ बजाना कोई खेल तो नहीं
उन लपटों का मूल्य चुकाओ !

मैं अचंभित हूँ
कि कैसे तुम्हारी मत्यु को
तुम्हारी शांत प्रवृत्ति तुम्हारे आचार-विचार
तुम्हारे जीवन जीने की निष्काम प्रवृत्ति आदि की
कोई जानकारी नहीं
उसे तो पता ही नहीं कि जब घर में सैलाब आया था
और उसके साथ बहकर आए
कीड़े-मकौड़े, साँप-बिच्छु
जो तुम्हारे शरीर से चिपक गए थे
और तुम्हारा खून पी रहे थे
तब भी बिना किसी वैमनस्य के
तुम उन्हें वापस उनके घर पहुँचाने के रास्ते
ढूँढते रहे, मुस्कुराकर कहते रहे कि
ये अपने घर का रास्ता भूल गए हैं
इन्हें इनके दु:ख से मुक्त करना है

लेकिन मृत्यु खड़ी हो जाती है मेरे सामने
किसी रंगदार की तरह
जिसे हम सब डायन के रूप में जानते रहे
कमर पर एक हाथ रख
दूसरा हाथ मेरे सामने रखती है, कहती है
उन कीड़े-मकौड़ों, साँप-बिच्छुओं को
उनके घर वापिस पहुँचाने के लिए निकले तुम्हारे पिता
रास्ते भर कई रंगदारों को हफ्ता देते निकले थे –
वो पड़ोसियों-करीबियों के उलाहने
सगे-संबंधियों के ताने
अपने गिरते-पड़ते, टूटते बिखरते आदर्शों का शालीन बोझ
कई ऐसे लोग जिनके लिए वो अब अछूत थे
क्योंकि अब तुम्हारे पिता के बदन पर रेंगते थे कीट-पतंग
उन लोगों का पान की दुकान पर
अपनी बातचीत में मशगूल हो मुँह मोड़ना आदि
जैसे पलों की कीमत चुकाओ!

3

पिता
मैं ठिठकता हूँ, रूकता हूँ
सोचता हूँ
तुम्हारी मृत्यु तुमसे कितनी जुदा है
बचपन में पाई-पाई का हिसाब माँगने वाली दाई
माँ से लड़कर-झगड़कर
दो बार पोंछा लगाने
चार बार कटोरी-गिलास धोने
महीना में एक बार उनकी बदन की मालिश करने की
उलाहना देते हुए दस रुपया, बीस रुपया, पैंतीस रुपया
लेकर गली में बड़बड़ाते हुए जाने वाली
मकान खरीदते वक्त पिता के साथ घूमने वाला प्रॉपर्टी डीलर
अपने कमीशन के लिए खिचखिच करने वाला
जैसे कई चेहरे घूमते हैं मेरे सामने
याद आते हैं अमीर घरानों के गरीब रिश्तेदार
सुसंकृत, शिक्षित, संभ्रांत, यशस्वी पिताओं के
अनपढ़, क्रूर, बेवकूफ व दिग्भ्रमित संतान
बिजलीघरों की चमचमाती रोशनी के पीछे
अंधकार में डूबा हुआ, सोया हुआ गाँव
गंगनचुबी इमारतों के पाँवों पर रेंगती झोपड़पट्टियाँ
एक स्लार्इड शो की तरह मेरी जेहन में उभरते हैं
मैं सोचता हूँ
शायद कमीशनखोर परछाईं-सी
पिता की मृत्यु
इतनी गरीब, भीखमंगी, क्रूर, बीमार और अंधकार में डूबी हुई-सी
इसलिए दिखती है
क्योंकि पिता के जीवन की संघर्षों की दिलेर गाथाएँ
मूँछे ताने ताल ठोकते हुए
दिव्यदीप्तिमान से दमकते हुए खड़े दिखते हैं

4

पिता
मैं हतप्रभ हूँ
और धीरे-धीरे समझ पा रहा हूँ
बोरियत की परते कुछ हटाते हुए कि
तुम्हारी मृत्यु
मेरे और तुम्हारे बीच
आकर खड़ी हो जाने वाली कोई बिचौलिया नहीं
और न ही मृत्यु है कोई आखिरी पड़ाव
या फिर जीवन के कई पड़ावों में एक पड़ाव
बल्कि एक पूर्ण जीवन की अपूर्ण लेकिन अभिन्न शर्त है
जो कदम-कदम पर, पल-पल पर घुली-मिली रहती है जीवन में
ठीक उसी तरह
जिस तरह जीवन की आकाँक्षाएँ पसरी रहती हैं
मृत्युरूपी, मृतप्राय, मरणासन्न परिस्थितियों में
जैसे बीमार के साथ-साथ अस्पतालों में घूमता उसका स्वस्थ भाई
घर पर पड़े अपंग पिता का
रेस की मैदान में तेज-तेज कदमों से दौड़ती हुई उसकी धाविका पुत्री

पिता
मैं तुम्हारी मृत्यु के दावों को
अब सहसा सुनने लगा हूँ कुछ ध्यान से
जिसका एक अंश एक भाव एक रूप
खून-चूसते बिच्छुओं के रूप में
साथ-साथ रहा बसा तुम्हारे जीवन के पलों में
खिलखिलाती धूप में अचानक आए बादलों के अंधकार की तरह
उन संतानों की तरह
जिन्हें नदी की तरह पाल-पोसकर
मुहाने तक ला खड़े करने के बाद
जब समुद्र में कूदने को कहा गया
तब घबराकर उन्होंने वापस मुख कर लिया
और माँ-बाप के साथ डूबने-उभरने की ऊहापोह में कैद हो गये

सचमुच समझने लगा हूँ कि
हर रंगदार के बनने के पीछे
होती है एक लंबी दर्दनाक अनकही-अनसुनी कहानी
और अब मैं तैयार हो चुका हूँ
तुम्हारी असहाय रंगदार मृत्यु के सारे उलाहनों को समझने को
यह कहते हुए कि घोड़े आदि का कर्ज तत्काल चुकाता हूँ

लेकिन घोड़े से उतरना नागवार है
क्योंकि इससे उतरना
पिता के मन से उतरना होगा
जो शायद उनकी असल मृत्यु होगी

दोआबा, 2012

एक वैश्विक गंवार के सपने

गाँव के मध्य में अवस्थित
हे बरगद के वृक्ष!
रहना तुम यूँ हीं खड़े पत्थर की भाँती
ताकि मैं जब लौटूँ गाँव वापिस
पहचान सकूँ गाँव को उसके केन्द्र से
हे बरगद के वृक्ष तब्दील न हो जाना
छोटे-मोटे दो, पाँच अथवा दस वृक्षों में!
गाँव की औरतें!
तुम यूँ ही रहना सिसकते
ताकि जब मैं लौटूँ
तुम्हारे जीवन पर लिख सकूँ
कुछ रिपोर्ताज, कुछ संस्मरण
कुछ कवितायें, कुछ कहानियाँ
खीच सकूँ कुछ रंग-बिरंगे चित्र
गाँव की झोपड़ियाँ
तुम रहना यूँ ही टूटी फूटी
ताकि जब मैं लौटूँ
तो अपलोड कर सकूँ तुम्हारे कुछ फोटोज़
अपने फेसबुक पर, ब्लॉग पर
शेयर कर सकूँ बचपन की
उन चिलचिलाती दोपहरियों को
जो बिताये थे मैंने तुम्हारी
रौशनी भरी छाया में
गाँव के बच्चे
तुम यूँ ही खेलते रहना
साइकिल की फटी हुयी टायरों के साथ
ताकि जब मैं लौटूँ
अपने बच्चों को दौड़ा सकूँ
तुम्हारी उन टायरों के साथ
और तालियाँ बजा-बजाकर
इश्वर को दे सकूँ धन्यवाद
जीवन के सारे सपने पूरे करने के लिए
गाँव तुम गाँव ही रहना
ताकि मेरे लौटने की सम्भावना बनी रहे
गाँव तुम गाँव ही रहना
शहर में तब्दील नहीं हो जाना
क्यूंकि वहाँ तो बसते हैं कई षडयंत्रकारी
संस्कृत्यों और स्मृतियों के दलाल व व्यापारी
तुम्हारे रक्तरंजित जलमग्न
शरीर के कंधों पर हो सवार
तुम्हारे लिए एक वैश्विक सपनों को बुनते हुए
बेचते हुए

दोआबा, 2012

विदेशी बहुएँ 

विदेशी बहुओं के विषय में
मैं अपना कोई भी मत
तैयार नहीं कर पाया अब तक
क्योंकि मर्द-देश में
बहुएँ शायद विदेशी ही होती हैं
और वो भी सार्क देशों
अथवा अफ्रीका के किसी देश से आई हुई
या फिर फिलिस्तीन अथवा अफ़ग़ानिस्तान से
क्योंकि अमेरिका यूरोप ऑस्ट्रेलिया इज़राईल आदि
देशों से आये विदेशियों को तो
हम बहू नहीं दामाद बनाते हैं
सर-आँखों पर बिठाते हैं
दौड़-दौड़ कर
उनकी सारी फरमाइशें पूरी करते हैं
सारे ऊँच नीच का ख्याल रखते हैं
आश्चर्य नहीं गर बहुओं के देश में
जाने की मारा-मारी नहीं होती
वहाँ के बीमार की तबियत
पूछने की बीमारी नहीं होती
वह कोई दामाद का देश नहीं
जहाँ की सर्दी-जुक़ाम भी
हम तक बड़ी दुर्घटना की तरह पहुँचती है
जैसे अमेरिकी स्कूल में
एक बच्चे का गोली लगने से घायल होना
फिलिस्तीन में हज़ारों बच्चों का
बमबारी में मरने से बड़ी घटना होती है

बहुओं के देश के सारे स्त्री और मर्द
निरीह और सुसंस्कृत औरत की तरह होते हैं
वैसे ही जैसे गरीब देश के गरीब और अमीर
दोनों ही एक विकट ग़ुरबत से बंधे हुए होते हैं
और शायद इसीलिए
गरीब देश का अमीर भी
अमीर देश के गरीब से
इज़्ज़त से पेश आता है
ठीक उसी तरह
जैसे दामादों के घर के
छोटे बच्चों से भी
स्त्री-प्रदेश के के बड़े
कुछ संभल कर ही बातें करते हैं
जैसे वो रिश्तेदार कम
दूर देश से आये दूत हों
अत्यधिक मिलनसार और मृदुभाषी
मानो किसी निर्बल देश का राजदूत
अमीर देशों के साथ मंत्रणा कर रहा हो
अपने देश की भलाई
वाकपटुता से सुनिश्चित कर रहा हो

ऐसा नहीं कि बहुओं के देश में जाने की रवायत नहीं
दामादों से कुछ अधिक पिस जाने पर
खुद के पुरुषार्थ पर शक़ होने लगे
तो अपने शौर्य, अहंकार और वैभव के लिए
स्त्री-प्रदेशों में जाना
पारसमणि की तरह काम करता है
तो जब किसी बड़े देश के राष्ट्रनेता को
अपने से छोटे और निर्बल किसी देश में
अपने देश की लम्बी-चौड़ी बखान करते हुए पाओ
आवभगत और सोने चांदी के उपहार से लबरेज़ पाओ
तो बस यही समझ लेना
कोई मर्द-देश से सताया हुया
बस अपनी मर्दानगी के बारे में आश्वस्त हो रहा है
और दामादों के नाज-नखरे उठाने की बस तैयारी रहा है.

‘पब्लिक एजेंडा’, 2014

एक कविता के दो ड्राफ्ट्स और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

ड्राफ्ट १

मैं प्रार्थना करता हूँ
मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
और भी अमीर हो जाये
मैं चाहता हूँ
मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए
मेरी दिली ख्वाहिश है
शहर की सबसे नामी तवायफ़
और भी नामी हो जाए
मेरी तमन्ना है
मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
और भी बड़ा दलाल बन जाए
मैं उस दिन को देखने के लिए मरा जा रहा हूँ
जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
और भी बड़ा शोषक बन जाएगा
जब से मुझे यह इल्म हुआ है
कि जब मेरे शहर के सबसे बड़े
अमीर, गैंगस्टर, तवायफ, दलाल और शोषक
हो जाएँगे पहले से भी
और अधिक नीच, कमीने
घिनौने, सस्ते और दरिंदे
तब मेरा शहर और शहर के बाशिंदे
अन्य सभी शहरों पर
और उनके शहरियों पर
चला पाएँगे डंडे।

ड्राफ्ट २

मैं प्रार्थना करता हूँ
मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
और भी अमीर हो जाये
ताकि इस शहर की गरीबी जाए
मैं चाहता हूँ
मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए
ताकि शहर सुसंस्कृत हो जाए
मेरी दिली ख्वाहिश है
शहर की सबसे नामी तवायफ़
और भी नामी हो जाए
ताकि शहर की महिलाएँ सभ्य रह पाएँ
मेरी तमन्ना है
मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
और भी बड़ा दलाल बन जाए
ताकि शहर से हेरा-फेरी ख़त्म हो जाए
मैं उस दिन के लिए मरा जा रहा हूँ
जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
और भी बड़ा शोषक बन जाए
ताकि शोषितों को मुक्ति मिल जाए
फिलहाल मैं कब्र में आराम फ़रमा रहा हूँ
और जीने की फरमाइशें कर रहा हूँ।

दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

मेरे शहर का अमीर और भी अमीर हुआ जा रहा है
और मैं उससे आती अमीरियत की खुशबु सूंघने को बेताब हुआ जा रहा हूँ
मेरे शहर का गैंगस्टर खून की रंगीन होली खेल रहा है
और मैं उसमे रंगने को मरा जा रहा हूँ
मेरे शहर की तवायफ़ के साक्षात्कार मुखपृष्ठों पर आ रहे हैं
और मैं उसके संग फोटो खिंचवाने को भीड़ में लथ-पथ हुआ जा रहा हूँ
मेरे शहर का दलाल शहर बेचने की कवायद कर रहा है
और मैं उसके साथ बिकने को बेचैन हो रहा हूँ
मेरे शहर का शोषक खून चूसने के नए तरकीबें ईज़ाद कर रहा है
और मैं दौर दौर कर अपने खून की बोतलें उस तक पहुँचा रहा हूँ
मैं फिलहाल जीने की फरमाइशें पूरी कर रहा हूँ
और समयाभाव में साथ साथ अपनी कब्र भी खोद रहा हूँ

सितंबर २०१४ में ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित

घर के पुरुष का आगंतुक के लिए ट्रे में चाय लेकर आना

शायद ज़रुरत से ज़्यादा ही आश्वस्त
शायद झेंप जैसी किसी भावना को
आधुनिक परिधानों
जैसे बरमूडा और टी -शर्ट से ढंकते हुए
या ध्यान अपनी ओर से
हटाने की कोशिश करते हुए
जैसे की हाथों में ट्रे हो ही ना
इधर-उधर की बातचीत करते हुए
आगंतुक को घर ढूँढ़ने में
कोई परेशानी तो नहीं हुई
यह जानकारी लेते हुए
शायद परंपरा के विरूद्ध
एक ही हाथ में ट्रे पकड़े हुए
वह हिम्मत कर प्रवेश करता है
एक ऐसी दुनिया में
जहाँ माँ, बहन, पत्नी, बेटी
अथवा नौकरानी के सिवा
कोई और दाखिल नहीं हुआ है
और यकायक कई सवालों से
अपने-आप को घिरा पाता है
जो ज़रूरी नहीं पूछे ही जाएँ
लेकिन वातावरण में
उनकी अकाट्य उपस्थिति होती है
‘शायद पत्नी बीमार होगी
माँ कुछ ज़्यादा ही उम्रदराज़ होंगी
बहनों की शादी हो गयी होगी
अभी बेटी बहुत छोटी होगी
इकलौता होगा
नौकरानी रखने की हैसियत नहीं होगी
उसे भी लगता है
मानो किसी पहाड़ी की चढ़ाई उसने की है
और ‘अतिथि देवो भव
अपने पत्नी अथवा माँ
अथवा बहन अथवा बेटी
अथवा किसी नौकरानी के कंधो पर
सदियों सवार होकर नहीं
खुद एक बार गहरी सांस लेते हुए
चरितार्थ करने की कोशिश की है.

‘उद्भावना’ 2015

नदियाँ

कहते हैं सभ्यताएँ नदियों के किनारे बसती हैं
लेकिन मुझे तलाश है एक नदी की
जो सभ्यताओं के सहारे टिकी हो
मेरा नदियों से ख़ास कोई रिश्ता नहीं रहा है
न तैराक बन पाया, न ही प्रकृति प्रेमी
किताबों से, आस-पास से एकत्रित जानकारियों से
यह समझता हूँ कि मेरी प्यास बुझाने को
कहीं न कहीं किसी न किसी नदी का जल ही
मुझतक चलकर पहुँचता है
और यह इल्म कि नदियों की मेहनत को
बस यूँ ही गौण मानकर चलना
न जाने कितनी सभ्यताओं के
प्यास से छटपटा कर
ग़ुम हो जाने का कारण बनता रहा है
मुझे सालता रहता है

क्यूंकि नदियाँ पहाड़ नहीं हैं
जो बस अपनी जगह टिके रहते हैं
अपनी ऊंचाई से ही अभिभूत
जिनसे मिलने और संवाद के लिए
उनके घर चलकर जाना होता है
जबकि नदियाँ
पहाड़ो के सामाजिक दायित्वों को निभाने
दर-दर, शहर-शहर, गाँव- गाँव
पहुँचती रहती हैं

नदियाँ सूरज भी नहीं
अपने तेज और दूरी से ही
खुद में यूँ खोया हुआ
मानो रौशनी बिखेरना
कोई दफ्तरी धर्म हो
जिसे बिना किसी राग और द्वेष के
समान भाव से पूर्ण करने का स्वांग
करना होता है
जबकि अंधकार का साम्राज्य
दिन-प्रति-दिन, रात-प्रति-रात
उसके नाकों तले सशक्त होता रहता है

नदियाँ हवा भी नहीं हैं
निराकार, निर्विकार और
स्पर्श की अनुभूति से ही
अपनी सरूपता दर्शाती हुई
जिसके बगैर
जीवन की कल्पना असंभव तो है
मगर जिससे कोई
उतना ही निरपेक्ष रहता है
जितना कोई अपने आनुवांशिक तत्व से होता है
और जिसकी अनुपस्थिति का अनुभव
संग्रह करना सर्वथा असंभव होता है

शायद सभी प्राकृतिक उपहारों में
नदियों को ही सबसे मानुषिक,
अतः सबसे दुरूह कार्य सौंपा गया है
जिन्हें अर्धनिर्मित मानवों के
गुणों और अवगुणों से निबटना होता है
उनके नैसर्गिक प्यास के साथ-साथ
उनके छल-कपट, विष, मल
आदि भी ढोना होता है
और इस तरह नदियों को बनना होता है
मध्य की एक कड़ी
अर्ध-मानव, अर्ध-प्राकृतिक
कुछ-कुछ उन स्त्रियों की तरह
जिनके नाम उन्हें दिए गए हैं
जिनके लिए माँ, मैया जैसे सम्बोधनों को
गढ़ना बड़ा आसान है
पर जिनके एक तरफा मातृक स्नेह
के बोझ को समझने के लिए
जल के उन बूँद बूँद में भीगना है
जिनसे हमारे शरीर की,
पाँव तले ज़मीन की
बुनावट है।

‘उद्भावना‘ 2015

मेरे पास कहने को कुछ ख़ास नहीं है 

मेरे पास कहने को कुछ खास नहीं हैं
बस आडम्बरी शब्दों का एक ढेर है
जिन पर बैठ मैं उनके तरह तरह के पर्यायवाची रूप
ढूँढता, गढ़ता, बोलता, लिखता रहता हूँ
कुछ वैसे ही
जैसे कोई बड़ा नेता
हर तरह के लिबास, टोपी, रंग पहन पहन कर
खुद को बहरूपिया-सा पेश करने का स्वांग रचता रहता है
दरअसल शब्दकोशो, समान्तरकोशों, विश्वकोशों के बगैर
मेरी अनुभूति, अभिवयक्ति, अनुभव
उस कुबेर की तिजोरी के सामान हैं
जिनसे अगर काला धन का एक एक कतरा निकाल दिया जाए
तो अंततः गाढ़ी पसीने की ख़ुशबू से सुगन्धित
एक पैसा भी ना मिले
आश्चर्य नहीं कि दिन प्रति दिन
सरल शब्दों को और भी विकट, दुरूह, और समझ से परे
बनाने-गढ़ने की अंतहीन परंपराओं को
सुढृढ करने की हर प्रयास में
मैं हमेशा तत्परता से शामिल रहता हूँ
ठीक उसी तरह जैसे
सरल, मीठी, सादा, सुलभ नदियाँ
दौड़ दौड़ कर तत्परता से
खारे, रहस्यमय, घाघ समुद्र में कूदती जाती हैं.

‘उद्भावना ‘ 2015

मेरी हिंदी के बारे में कुछ मत बोलना बवाल हो जाएगा

मेरी हिंदी के बारे में कुछ मत बोलना
बवाल हो जाएगा
अभी से ही कह देता हूँ
भ्रूण हत्याएँ, कन्या दर्मन
और पुत्र-प्राप्ति के सारे यज्ञों के बाद
बची-खुची कन्याओं का कंजक पूजन
ही तो मेरी हिंदी है
मैं उसे नमन करता हूँ
एक देवी के रूप में
अथवा गमलों में लगे तुलसी के पेड़ के रूप में
तुम होगे ग़ुलाम अंग्रेजी के
अब तो मेरी हिंदी
यूनिकोड में अंग्रेजी से भी तेज लिखी जाती है
ज़रा अपने औपनिवेशिक मानसिकता से उबरो
देखो अब एयरटेल-वोडाफ़ोन वाले भी
रोमन लिपि में हिंदी ही लिखते हैं
देखो वो रईसों के रंगरलियों के किस्से
मॉडल्स की नुमाइशें
इंटरनेट पर पसरी अनगिनत अश्लील तस्वीरें
शेयरों के सूचकांक
अपने ज़मीन से निकाले गए किसानो
के बारे में सरकारी परिपत्रक
आखिर मेरी हिंदी में अब क्या नहीं संभव है?
यह हिंदी-पट्टी ही तो है
जहाँ नाबालिगों को उल्टा टांग देते हैं हम
पेड़ों पर, बिजली के खम्बों पर, पँखों पर,
हिम्मत है अगर तो कोई अंग्रेज़ियत का ग़ुलाम
ऐसा कर दिखा दे,
उसकी टांग अगर न तोड़ दूँ
तो मैं अपनी भाषा वाला नहीं
कहाँ हैं वो अंग्रेजी में टिपिर-टिपिर करने वाले
कहाँ हैं वो छुरी-काँटा से खाने वाले
कहाँ हैं वो साहित्य-संस्कृति के ठेकेदार
कहाँ हैं वो अपने आप को
हिन्द के पहरेदार मानने वाले
कहाँ हैं कहाँ हैं कहाँ हैं
देखो गर्व से देखो मुझे

मैं तुम्हारा ही तो हूँ
वर्षों से बन रहा
(और अशुद्धि लिस्ट
के साथ अब प्रकाशित)
निज भाषा हिंदी संस्करण

‘उद्भावना ‘ 2015

लुप्त होती भाषाएँ 

कहते हैं
हज़ारों भाषाएँ लुप्त हुई जा रही हैं
वे अब उन पुराने बंद मकानो की तरह हैं
जिनमे कोई रहने नहीं आता
मकान से गिरती टूटी-फूटी कुछ ईंटें
बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए
घर के मंदिर में बेढंग शब्दों जैसे
सहेज कर रख ली गयी हैं
जैसे बीती रात के कुछ सपने
दिन के उजाले में
आधे याद से और आधे धुंधले से
हमारा पीछा करते रहते हैं
लुप्त होती भाषाओं के नाम
अजीबो-ग़रीब से लगते हैं
साथ ही यह सूचना भी
कि उन्हें जानने-बोलने वालों की संख्या
कुछ दहाई अथवा सैकड़ों में ही रह गए हैं
कैसा वीभत्स-सा यह समय लग रहा है
जब प्यार की भाषा
अजनबियों के सरोकार जानने की भाषा
बीमार पड़े कमज़ोर वयक्तियों की
जुबान समझने की कला
या फिर उसका भाषा-विज्ञान
जानने-समझने-बोलने वालों की संख्या
दिन पर दिन घटती जा रही है.

‘उद्भावना ‘2015

पेड़ से लटक कर एक प्रेमी युगल का आत्महत्या करना

तुम दोनों इसी लायक थे शायद
जब हमारे धमनियों मे विष पिरोया जा रहा था
तब तुम प्रेम की कोई कहानी गढ़ रहे थे
तुम दोनों का मारा जाना तय था
बस कब और कहाँ और किस तरह
इतने का ही सवाल रह गया था
तुम्हारे लिए न जाने कितने महत्त्वपूर्ण काम पड़े थे
अपने परिवार कुल और गोत्र
उप-जाति और जाति
अपने धर्म के बारे में
शेखियाँ बघारनी थी
अपने यहाँ बनने वाली सब्ज़ियों की खुशबू
अपने त्योहारों के रस्मो-रिवाज़
अपने कपड़े पहनने के रंग ढंग
अपनी भाषा-बोली के एक-एक लफ्ज़ को
एकमात्र सत्य की तरह पीना था
कई अंतहीन बेड़ियों से खुद को बांधकर
और मन ही मन कई तरह की गाँठों में बँधकर
अपने और अपनों को सर्वश्रेष्ठ मान जीवन जीना था
अपने और अपनों से दीगर
हर-एक शक्श को दोयम मान कर सड़ना था
धिक्कार है तुम्हे!
जो तुम इन महान आदर्शों
सदियों से चले आ रहे
पारिवारिक, सामाजिक मूल्यों को छोड़कर
प्रेम जैसी फ़ाज़िल बातों में फँस गए

निश्चित ही तुम दोनों का मारा जाना तय था

‘उद्भावना ‘ 2015

बीमार की अलामतें 

वो मेरा हाल-चाल पूछ्ना चाहते हैं
और इंतज़ार है उन्हें मेरे बीमार होने का
मेरी सेहत मानो हो कोई दीवार
मेरे और उनके बीच के संवाद का
कोई तो पूछे उनसे
बीमार वक्त में सेहत है ठीक किसका?
जो मै बैठा हूँ इंतज़ार में
कोई आये और पूछे क्या हाल है जनाब का
और नहीं ख़ुद पूछ्ना चाह रहा हाल-चाल
हाल-चाल पूछ्ने वालों का

क्या यह अलामत काफ़ी नहीं मेरे बीमार होने की?

‘उद्भावना ‘ 2015

मेरा शैतान, तेरा शैतान

माँ-बाप बनाने तो निकले थे बच्चे को इंसान
पर रास्ता काट गए मुल्ला और पंडित
बच्चे बन गए हिन्दू या मुसलमान
उल्टे अब आलम यह कि कुछ तो देखा-देखी में
और कुछ यारी अथवा ऐयारी में
अच्छे खासे इंसान वापिस बन गए हैं
फिर से हिन्दू और मुसलमान
और मानो इतनी मासूमियत कम नहीं थी
जो वे मानते थे
कि उनके अलग अलग हैं
खुदा और भगवान
जो अब वे यह समझ बैठे हैं
उनके हैं अलग अलग शैतान

‘उद्भावना ‘ 2015

इरोम शर्मिला के नाम एक भारतीय ओलिंपियन का पत्र 

इरोम शर्मिला!
बहुत जल्द तुमसे भी मांगेंगे वो हिसाब
तुम्हारे १६ वर्षों के
तप-उपवास-संघर्ष-पीड़ा-समर्पण-यातना का प्रतिफल
क्या तुम्हे ओलिंपिक में स्वर्ण मिला?
क्या आफ्स्पा हटा?
क्या दमन घटा?
क्या किसी नए सूरज, नयी रौशनी के साथ
कोई नई पौ फटी?
या फिर तुम भी हमारी ही तरह
देश दुनिया के अखबारों में, टीवी चैनलों में
अपने फोटो छपवाने में ही व्यस्त रही
जबकि देश के करदाता
हर पल हर दिन तुम्हारी सफलता के लिए
प्रयत्नरत रहे, लगभग, त्रस्त रहे?

इरोम शर्मिला!
हो सकता है
तुम्हे भी मेरी ही तरह
कुछ बहाने बनाने पड़े
कैसे जहाँ जल्द से जल्द
रातो-रात सारे ऐशो-आराम पा लेने का जुनून हो
कर देकर ही अपने सारे दायित्त्वों से
मुक्त हो जाने का क़ानून हो
वहाँ मैंने लक्ष्य रखा
सबसे लम्बे रास्ते पर चलने का
जैसे तुमने अपने शरीर को स्थिर कर
मन को अडिग रखा
और लाइकोट पहाड़ियों का लघुरूप बन गयी
शायद शरीर को कुछ और गति प्रदान कर
मेरे अंदर भी अनवरत बरसों से
कुछ वैसी ही अडिगता रही
शायद दोनों ही लाँघना चाहते थे सीमायें
शरीर की और मन की संकीर्णताओं की

इरोम शर्मिला!
किसे दिलचस्पी है
मानवीय संघर्षों की बारीकियों में
खून और पसीने की बदबुओं में
तिल-तिल कर गुमनाम गलियों में
अपने आँखों की चमक को
सहेज कर रखने वालों के जद्दोजहद में
एक थोड़ी-सी अच्छी
थोड़े से गैर-मामूली सपनो के सफल करने के
अनगिनत असफल प्रयासों में
खेल के मैदान से हो कर गुजरने वाले
खूससूरत और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में
हम तो दरअसल उन तमाशों की तरह हैं
जिसके अंत में मनुष्य मरे या सांड
दोनों ही स्थितियों में मनोरंजन भरपूर होता है.

दोआबा, 2016

(9 अगस्त 2016 को मणिपुर की मानवाधिकार नेता इरोम शर्मिला ने आफ्स्पा के खिलाफ अपने 16 वर्षो से अनवरत चले आ रहे अनशन को तोड़ने का निर्णय लिया और उसी दिन एक सोशलाइट लेखिका ने भारत के रियो ओलंपिक्स में निराशाजनक प्रदर्शन के लिए खिलाड़ियों को दोषी ठहराते हुए उनपर सिर्फ मौज-मस्ती के लिए इन स्पर्धाओं में भाग लेने का आरोप लगाया)

पानी और पैसा

पानी की तरह पैसा बहाना
कोई उन्हें समझाए
कि सिर्फ एक मुहावरा ही है
उन दिनों ईजाद किया हुआ
जब पानी सब तरफ लबालब था
और पैसा अभी देवता नहीं बना था
कोई उन्हें समझाए
पैसे से पानी पर काबू पाना
मानो ऊँगली को आँखों पर रख
सूरज को ढक लेने का
भ्रम पालने जैसा है
कोई उन्हें यह भी समझाए
कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के कारण होगा
कोई मुहावरा नहीं है
बस कुछ मसखरों द्वारा
प्रलय से पहले
उसकी खिल्ली उड़ाने का जत्न करने जैसा है

‘बहुवचन’ 2017

हत्या-बलात् का स्वर्ण युग 

ऐसा नहीं है कि उस स्वर्ण युग में
पल प्रति पल सुबह-शाम दिन प्रति दिन
हत्याएँ व बलात्कार ही होते रहते थे
कई कई दिन यूँ ही बिना किसी घटना के भी निकल जाते थे
पर इस युग की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती
कोर्ट कचहरी घरों में टीवी अख़बारों में
सड़क शासन प्रशासन लेखकों कवियों
आकाश पताल में
अच्छी हत्या व ब्लात् कैसे हो
इसपर निरंतर बहस
तर्क वितर्क लेख प्रतिलेख
का संगीत हमारे सामने बजता रहना था
नैतिकता और वाक् पटुता के नए आयाम बनाती हुई
बिलकुल एक नई संस्कृति
जिससे कोर्ट पूछता है
‘इस हत्या को कैसे अंजाम दिया जाएगा?’
और पूरी गंभीरता से उत्तर दिया जाता था
‘ हमारे पास कई उपाय हैं
ट्रक से कुचल कर या फिर गोलियाँ बरसाकर
या फिर चाय में ज़हर देकर
बस कुछ मोहलत मिल जाए
बलात् के हमारे अपने मोडुल्य हैं
पड़ोसियों के घरों से खींचकर लाई जाएँगी
सात आठ नौ दस जितनी की भी ज़रूरत हो
बस कुछ मोहलत मिल जाए’
और सब को हत्या और बलात् के
मुकर्रर दिन का रहता है इंतज़ार
पर ऐसा कुछ होता नहीं है
बल्कि ऐसा ही आभास होता है
क्योंकि हत्या-बलात् के उस स्वर्ण युग की
सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी
कि सब अच्छी हत्या-बलात् कैसे हो
इसपर ही चिंतन-मनन हो

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