कुमार विजय गुप्त की रचनाएँ

एक अकेला अंगूठा

एक अकेले अंगूठे ने
वसीयत कर दी सारी अंगूठियां
उंगलियों के नाम

रोका, गालों पे लुढ़कते हुए
आंसू की असंख्य बूंदों को

एक अकेले अंगूठे ने
उंगलियों के गासे में भरा हुनर
तलहथ्थियों को दी बित्ता भर लंबाई
हथेलियों को भर मुट्ठी क्षमता

आकाश के ललाट पर बढ़कर लगाया
विजयी भव का सूर्य-तिलक

अंगूठे को पिस्टन बनाकर
हमने भी कई बार उगलवाया
डबडबाए हुए नल के हलक से पानी

शरारती हुए तो काटी चिकोटी
मस्ती में आए तो बजाई चुटकी

अफसोस!
इसी अंगूठे से लिया गया
कोरे कागज पर काला टिप्पा
रची गई हर बार
जीने के हक से बेदखल करने की साजिश

अंगूठे का दर्द वो ही जानें
जिन्होंने जमीन में धंसाया अंगूठा
हल के फाल की तरह
और खांच दी चाहतों की क्यारियां

एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा
दर्द के संबोधन-चिन्ह की तरह
एक बार जरूर खड़ा हुआ होगा
द्रोण के समक्ष भी

इधर अंगूठे ने भी बदले तेवर
दाएं-बाएं डोलकर सिर्फ दिखाता नहीं ठेंगा
बल्कि सफलीभूत होने पर तनकर कहता- डन

ज्यों नाचता लट्टू लोहे के गुने पर
घूमती रहेगी पृथ्वी
अकेले अंगूठे के टेक पर।

घोड़े दौड़ रहे 

दौड़ाये राजे रजवाड़ों ने
दौड़ाये सामन्तों सुल्तानों ने
दौड़ाये साहुकारों जमींदारों ने
और अभी भी दौड़ाये जा रहे घोड़े

हरेक ऋतुओं में दौड़ रहे घोड़े
हरेक दिशाओं में दौड़ रहे घोड़े
कि उनके थूथनों पे लगा है जिंदा लहू
उनके खुरों में फंसी मासूम चीखें

रौंद रहे खेत-खलिहान
उजाड़ रहे बाग-बगीचे
झुग्गी झोपड़ियों तक को नहीं बख्श रहे
बेलगाम दौड़ रहे घोड़े

आकाश में देवतागण
छतों पे बुद्धिजीवीवृन्द
नाले के किनारे भीड़ भेंड़ दीन-हीन
हाथभर की दूरी से गुजर रहे घोड़े

सर्द और निस्तब्ध रात
नालों टापों के उन्माद का सही वक्त
घोड़ों ने झोंक दी है सारी शक्ति

इधर घोडे़ दौड़ रहे
उधर खुश हैं घुड़सवार
कि जहॉं तक दौड़ जायेंगे घोड़े
वे सारे होंगे उनके अपने
गोया यह घरती, धरती नहीं
उनका रेस ग्राउंड हो !

मैं नहीं वह दीवार 

मैं नहीं वह दीवार
जो फूटती आग लावे की तरह
और आंगन के बीचोंबीच बन उठती
दो मृतात्माओं की एक कब्र

मैं नहीं वह दीवार
जिसके एकाध ईंच ईधर या उधर से
टूट जाये दो दिलों के बीच का तार

मैं नहीं वह दीवार
जिसके एक तरफ खुफिया कान
और दूसरे तरफ चुगलखोर मुंह

मैं नहीं शून्य की दीवार
मैं नहीं शीशे की दीवार
मैं नहीं काठ की दीवार
मैं नहीं लोहे की दीवार
न ही सोने चॉंदी की दीवार मैं

मैं वह दीवार हॅूं
जो उगती है धरती के सीने से
आशा आस्था की ईंटों से बनी
स्नेह सौहार्द्र के गारे से जुड़ी
साहुल लेवल के अनुशासन में बंधी
जेा उठती है हाथ की तरह
और थाम लेती आकाश छत

बर्लिन की ढाह दी गयी दीवार मैं नहीं
मैं हो सकती हूँ चीन की दीवार
जिसपे दौड़ती कोई सड़क सरपट
जिसमें आसन जमाये कोई चौकस चौकीदार

मैं वह दीवार हॅू
जिसमें ऑंख जैसी खिड़की है
दिल जैसा दरवाजा
और है दिमाग जैसा रोशनदान

देखना, एक रोज
मेरी जीर्ण-शीर्ण देह से उग ही आयोगा
कोई नीम….. कोई पीपल…. कोई वरगद !

शुक्रिया शहर

इसी अजनबी शहर में कभी
दुरदुराया गया चौतरफा
टौआता रहा कुत्ते-सा दुम दबाये

प्रदूषित हवाओं में से छाना
फेफड़ा भर ऑंक्सीजन
कृत्रिम लाइटों से निकाल ली
ऑंख-भर रोशनी

यहीं देखा छक्के का सातवां पहल
यहीं पाया आठवां रंग
यहीं बिताया जुम्मे-जुम्मे के बीच नौंवी रात
यहीं चखा दसवां रस
यहीं बढ़ा ग्यारहवी दिशा की ओर..

यहीं पर सीखी संकेताक्षरों जैसी भाषा
भाषा के भीतर की भाषा
भाषा के आजू-बाजू की भाषाएं

नाले जैसे बजबजाते इसी शहर में
ढ़ूढ़ लिया लात धरने-भर की जगह
आंतनुमा घुमावदार गलियों में
साबूत रह गया किसी जोंक सा चिपका
शुक्रिया शहर
अब दौड़ूंगा तुम्हारी जलेबीनुमा देह में
चासनी की तरह मिठास बनकर।

साहब के जूते 

नये साहब थे
नये-नये थे जूते

नुकीले थे
रोबीले थे
आइने जैसे चमकते जूते
जिनमें शहर देखता था चेहरा

नये-नये जूतों में
गजब थी चाल उनकी अकड़ भरी
कि दिन में मच्-मच् करते जूते
और रात में करते खम्- खम्
जिनसे धमकता रहता
कलेजा शहर का हरदम

तब आम धारणा यह रही
कि जूते खाने से बनती तकदीर
और सूंघने से टूटती बेहोशी

धीरे -धीरे
धूल फ़ांकते मलिन पडते गये जूते
ठोकरें खाकर कुंद पडती गयी नोक
धीरे -धीरे, उधड़ते गये तस्मे के रेशे
घिसते गये तल्ले

अब तो जूतों पे
मले जा रहे पॅालिश
लगाई जा रही क्रीम
तेजी से फेरे जा रहे ब्रस

वही जूते पहनकर
अभी भी निकलते हैं साहब
पर नहीं रही जूते की वह खमक्

कहाँ गई कविता 

शानदार वायुरूद्ध कक्ष
जिसमें खड़ी की उन्होंने
शब्दों की गगनचुंबी मीनार

सुधि श्रोता नहीं थे
था सिर्फ लंबी नाकवाला माईक
सूंघता, खुफिया टेप करता हुआ

पारदर्शी दीवार की दूसरी तरफ
श्रीमान रेकॉर्डर महोदय
जिन्हें कविता से ज्यादा प्यारी थी रोटी
जिनके इशारे पे वे नाचे दस्तक

बाहर निकलते वक्त
अर्थपूर्ण थी उनकी हथेली और वे
किसी कॉलगर्ल जैसे संतुष्ट

सबकुछ घटित हुआ
एक साजिश जैसा

तैयार हुए
मित्र, मिठाई की शर्त पे सुनने
ट्रांजिस्टर, बैटरी के एवज में सुनाने
यह ठीक वहीं समय था प्रसारण का
जरा-सा अंतराल, पतली गली

युगपुरूषों के अमृत-वचन से लेकर
गर्भ-निरोधक गोलियों के प्रचार तक
सब बकबका गया ट्रांजिस्टर
पर मुए ने नहीं उगली कविता

वे हतप्रभ
रिकार्डिग कक्ष से चली कविता
आखिर गई कहाँ !

वे बोलते हैं 

वे बोलते हैं
वे अच्छा बोलते हैं

वे गोल-गोल बोलते हैं
वे तोल-तोल बोलते हें
वे रस घोल-घोल बोलते हैं
वे रहस्य खोल-खोल बोलते हैं

वे चुनींदे शब्दों में बोलते हैं
वे अलंकृत वाक्यों में बोलते हैं
वे लच्छेदार भाषा में बोलते हैं
वे सम्मोहक वाणी में बोलते हैं

वे जब बोलते हैं तो घुंआंधार बोलते हैं

वे इसीलिए भी बोलते अच्छा हैं
कि बोलने के सिवा उन्होंने किया ही क्या हैं!

निशान

वह युग तो बीत गया कब ही का
फिर आपकी पीठ पर कहॉं से आये
कोड़े के निशान,
कहीं सहलायी तो नहीं पीठ आपकी
आपके भाग्य विघाता ने !

जिंदगी यदि पहाड़ है 

जिंदगी यदि पहाड़ है
तो पहाड़ में उॅंचा मस्तक भी होगा
हौसलाभरा सीना भी होगा
श्रृंखला भी होगी लहराते हाथों की

जिंदगी यदि पहाड़
तो फूटता होगा कोई श्रमशील सोता
उतरती होगी कोई स्वच्छ नदी
झरता होगा कोई निष्छल झरना
लेटी होगी कोई शांतचित्त घाटी
और घाटी में चमकती होगी
ऑंख जैसी कोई झील

जिंदगी यदि पहाड़ है
तो झुका हुआ होगा कोई आकाश
पहाड़ को घेरकर बतियाते होंगे
ग्रह… नक्षत्र…चॉंद…. तारे

जिंदगी यदि पहाड़ है
तो किरणें पहुँचती होंगी वहीं पहले
मौसम उतरता होगा वहीं पहले
बादल बरसाता होगा वहीं पहले
हवा भी वहीं गुनगुनाती होगी ऋचाएं

जिंदगी यदि पहाड़ है
तो कोई आबाद जंगल भी होगा
पेड़-पौधों की हरीतिमा भी होगी
दुर्लभ पशु-पंछी भी होंगे
वहीं चर रही होंगी भेंड़-बकरियॉं
सहृदय चरवाहे भी होगें
निष्कलुष जनजातियॉं भी होंगी
वहीं संरक्षित होगी
छल-प्रपंच रहित कोई संस्कृति

जिंदगी यदि पहाड़ है
तो वह टूटता भी होगा
तो वहॉं पत्थर भी होंगे
और पत्थरों में छुपी होगी चिंगारियाँ

जिंदगी यदि वाकई पहाड़ हो
और काटे नहीं कट रहीं हो
तो उसके सबसे उॅंचे शिखर पर
स्थापित कर लीजिये आस्था-भरा कोई मंदिर
फिर देखते रहिये
दुर्गम नहीं रह जायेगा वह पहाड़

तलाश रहा मैं कुछ शब्द ऐसे

कहाँ से शुरु करुँ कि नहीं मिल रहे शब्द

उन चंचल वाचाल ऑंखों से शुरु करुँ
जो बह रही थी निः…शब्द
और बॉधने के लिए नहीं थे मेरे पास शब्द
या शुरु करुँ उस आदरणीय दिबंगत से
जिनको अर्पित करने थे श्रद्धा के दो शब्द-सुमन
पर देर तक अबरुद्ध रहा मेरा गला

शब्द हीनता की एक स्थिति वह भी रही
जब अर्से बाद मिला था मेरा जिगरी दोस्त
और हर्षातिरेक में मैं रहा बावला

मेरे शब्द प्रबल हैं या मेरी कोमल भावनाएं
शब्दों को लेकर मुझमें इतने अन्तर्द्वन्द
और उधर शब्दों का इतना वितंडा

उधर… उस तरफ शब्द
पत्थरों की तरह फेंके जा रहे
तीलियों की तरह घिसे फेंके जा रहे
तीर तलवारों की तरह चलाये जा रहे
और इस वीभत्स मारा-मारी आपाधापी में
लहूलुहान शब्द चीख पुकारते रहे शब्द.. शब्द

कहीं शब्दों को शाक-सब्जियों की तरह तोले जा रहे
कहीं माल मवेशियों की तरह हंकाये जा रहे
तो कहीं मछलियों की तरह फांसने शब्दों को ही
बडी साफगोई से बुने जा रहे शब्द-जाल

कहीं शब्द हैं तो अर्थ नहीं
अर्थ हैं तो भावनाएँ नहीं
भावनाएँ हैं तो संभावनाएँ नहीं

हैरत हुई उन प्रकाण्ड शब्द-विदों पर
जिन्हेांने बहा दी शब्दों की तिलस्मी गंगा
और प्यासे जन चिल्लाते रहे.. शब्द.. शब्द

आखिर कहॉं हैं वे शब्द
जो डूबते के लिए बन सके तिनके

न शब्दों की तिजारत करने
न ही करने शब्दों की बाजीगरी
तलाश रहा मैं कुछ शब्द ऐसे
जिनसे शुरु कर सकूँ मैं वह अनकही व्यथा…

ट्रांजिस्टर में छुपे कत्थई कीड़े के बारे में 

क्यों छुपा है
क्या खाता क्या पीता है
बिन बोले कुछ कैसे जीता है
शीत निष्क्रियता में पड़े किसी प्रदेश का
कोई सुसभ्य जीव तो नहीं यह ।

इतनी बड़ी है दुनिया
किसी कोने-दोगे में छुप लेता
बचा लेता अपनी नाजुक नन्हीं जान
दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह क्या अब यही

फिर किसका डर किस बात का डर
क्या किसी डरावने चंगुल में फंसी
विवश होकर नाच रही यह पृथ्वी
या फिर क्या वाकई जरूरी है
जीने के लिए अक्रामक होना
जो यहाँ छुपा यह जीव निरीह

इन दिनों सबसे ज्यादा जोर-शोर से जारी है
विध्वंश की कलाबाजियां
फिर, घुंघ-घुएं में तलाशी जा रही जिंदगी
नष्ट की जा रही प्रजातियां
और फिर जीवों के विलुप्त होने पर
व्यक्त की जा रही शानदार चिंतायें
कहीं अपनी संतति को बचाने के लिए
तो नहीं आ छुपा यह जीव सलोना

रो-धोकर चुप हो गया
यह कोई विस्थापित तो नहीं
या फिर, विकल आत्मा तो नहीं
उखाड़ दिये गये किसी पौधे की
जिसकी जड़ के मुलायम रेशे छूट गये हों
वहीं…. उसी मिट्टी में

खिसकता हूँ कांटे को
तो आगे-पीछे घूमता वह नाचता फिरता
जिज्ञासावश झांकता हूँ खोलकर
तो स्पीकर के गासे में चिपके उसके अंडे
अरे, कहीं यह कोई संगीत प्रेमी तो नहीं
संगीतविहीन हो रही दुनिया से ऊबा हुआ
फिर क्या, कायम रह पायेगा यहाँ उसका विश्वास

कितनी अजीब है उसकी जिजीविषा
कि जितनी बार निकालना चाहा
असफल हुआ हूँ उतनी ही बार
फिर सोचता हूँ क्या बिगड़ रहा मेरा
रह लेगा यह भी मेरे घर
जैसे धरती पे रहते एक साथ इतने जीव

कभी सोचता हूँ यही तो है एक गवाह
कि किन-किन गीतों को सुनकर
छलक पड़ती मेरी आँखें
और कैसी-कैसी खबरों पर
ऑंखों में उतर आता है खून !

देहगंध

उठ रही यह कैसी गंध
किस स्तनी घाटी से
किस कस्तूरी नामि से
किन जंघाओं के वन-प्रांतर से
धरती के किस कोने से आ रही यह गंध

किस दिव्य पुष्प की मादकता इसमें
किस अलौकिक फल का आस्वाद इसमें
किस लोक के वनस्पति का रस इसमें

कोई नर्म स्पर्श
कोई मीठी चुभन
कोई हल्का नशा
कोई मद्धिम तपिश
किस मुलायम संगीत की तरंग यह

एक साथ
उभर रहे इतने सारे रंग
तैर रहे इतने अक्स कतरे
हिल रहीं इतनी आकृतियाँ
एक देह का इतना विस्तार
एक देह का अदभुत संसार

कितना चुम्बकीय है सम्मोहक यह गंध
जो जुदा कर रही देह से कोई देह
अलग कर रहीं आत्मा से कोई आत्मा
किसी और देह किसी और आत्मा के लिए

कितने घेरे बना रखे हैं इस मधुर गंध ने
कितना मुश्किल है इन घेरों से मुक्त होना
शरारती भी इतनी कि पकड़ कर ऊगलियाँ
खींचे जा रही यह गंध उस देह की तरफ…

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