कुलवंत सिंह की रचनाएँ

वंदना (माँ शारदा की) 

वर दे … वर दे … वर दे।
शतदल अंक शोभित, वर दे।

मधुर मनोहर वीणा लहरी,
राग स्रोत की छटा है छहरी,
कण-कण आभा अरुण सुनहरी,
तान हृदय में परिमित गहरी।
उर में मेरे करुण भाव भर दे।
वर दे … वर दे … वर दे…
शतदल अंक शोभित, वर दे।

तरु दल पर किसलय डोले,
पीहूं पीहूं पपीहा बोले,
मलय तरंगित ले हिंडोले,
आशीष शारदा मन पट खोले।
काव्य किलोल कर मधुरिम कर दे।
वर दे … वर दे … वर दे…
शतदल अंक शोभित वर दे।

द्विज विस्मित कलरव विस्मृत,
सुरभि मंजरी, दिगंत विस्तृत,
नाचे मयूर, झूमे प्रकृति,
अंब वागेश्वरी संगीत निनादित।
गीतों में मेरे रस छंद ताल भर दे।
वर दे … वर दे … वर दे …
शतदल अंक शोभित वर दे।

प्रभात 

जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, सिमटी, शरमाई।

अष्ट अश्व रथ हो सवार
रक्तिम छटा प्राची निखार
अरुण उदय ले अनुपम आभा
किरण ज्योति दस दिशा बिखार।

सृष्टि ले रही अंगड़ाई,
जाग जाग है प्रात हुई।

कण-कण में जीवन स्पंदन
दिव्य रश्मियों से आलिंगन
सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग
भर रही मधु, मंगल चेतन।

मधुर रागिनी सजी हुई,
जाग जाग है प्रात हुई।

अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित
धरती अंचल रंजित शोभित
भृंग-दल गुंजन कुसुम-वृंद
पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित।

उनींदी आँखे अलसाई
जाग जाग है प्रात हुई।

रमणीय भव्य सुंदर गान
प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान
शीतल झरनों सा संगीत
बिखरते सुर अलौकिक भान।

छोड़ो तंद्रा प्रात हुई,
जाग जाग है प्रात हुई।

उषा धूप से दूब पिरोती
ओस की बूंदों को संजोती
मद्धम बहती शीतल बयार
विहग चहकना मन भिगोती।

देख धरा है जाग गई,
जाग जाग है प्रात हुई।

प्रकृति 

सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,
प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन।

कन-कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,
किरनें छन-छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं।

सरसिज दल तलैया में,
झूम-झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे।

हर लता हर डाली बहकी,
मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाये।

कल-कल करती तरंगिणी,
उज्ज्वल तरल धार संवरते,
जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।

मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,
अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता।

प्रणय गीत 

गीत प्रणय का अधर सजा दो।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो।

शीतल अनिल, अनल दहकाती,
सोम कौमुदी मन बहकाती,
रति यामिनी बीती जाती,
प्राण प्रणय आ सेज सजा दो।
गीत प्रणय का अधर सजा दो।

गीत प्रणय का अधर सजा दो।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो।

ताल नलिन छटा बिखराती,
कुंतल लट बिखरी जाती,
गुंजन मधुप विषाद बढाती,
प्रिय वनिता आभास दिला दो।
गीत प्रणय का अधर सजा दो।

गीत प्रणय का अधर सजा दो।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो।

नंदन कानन कुसुम मधुर गंध,
तारक संग शशि नभ मलंद,
अनुराग मृदुल शिथिल अंग,
रोम रोम मद पान करा दो।
गीत प्रणय का अधर सजा दो।

गीत प्रणय का अधर सजा दो।
स्निग्ध मधुर प्यार छलका दो।

वेदना

अश्रुधार में हिमखंड को
आज पिघल जाने दो।
अंतर्मन में दबी वेदना को
आज तरल हो जाने दो।

सजल नयन कोरों से
अश्रु गाल ढुलकने दो।
करुण क्रंदन से विषाद को
आज द्रवित हो जाने दो।

विकल प्राण, दुख से विह्वल
निरत व्यथा मिट जाने दो।
मथ डालो इस तृष्णा को
पूर्ण गरल बह जाने दो।

सूनी आहों में सुस्मित
अभिलाषा को करवट लेने दो।
निस्तब्ध व्यथित पतझड़ में
ऋतु बसंत छा जाने दो।

नीरव निशा गहन तम में
स्वर्ण किरण खिल जाने दो।
अंधकारमय जीवन पथ पर
ज्योति पुंज बिखर जाने दो।

हृदय मरुस्थल जीवन को
आज हरित हो जाने दो।
पादप बंजर पर उगने को
आज हल चल जाने दो।

कुसुम कुंज खिल चुका बहुत
मधुकर को अब गाने दो।
स्वतः भार झुक चुका बहुत
मकरंद मधु बन जाने दो।

विरह तप्त इस गात पर
मेघ बिंदु बरसाने दो।
उद्वेलित ह्रदय उच्छवासों को
सुधा मधुमय हो जाने दो।

प्रेम सिंधु लेता हिलोरें
लहरों को उन्मुक्त उछलने दो।
मादकता बिखर रही अनंत
प्रणय मिलन हो जाने दो।

यौवन सरिता का रत्नाकर से
निसर्ग मिलन हो जाने दो।
रति और मनसिज सा
पावन परिणय हो जाने दो।

करुणा, विनय, माधुर्य का
निर्जर संगम हो जाने दो।
जीवन सौंदर्य अंबर तक
बन उपवन महकाने दो।

आओ दीप जलाएँ

आओ खुशी बिखराएँ, छाया जहाँ गम है।
आओ दीप जलाएँ, गहराया जहाँ तम है॥
एक किरण भी ज्योति की
आशा जगाती मन में;
एक हाथ भी कांधे पर
पुलक जगाती तन में;
आओ तान छेड़ें, खोया जहाँ सरगम है।
आओ दीप जलाएँ, गहराया जहाँ तम है॥
एक मुस्कान भी निश्छल
जीवन को देती संबल;
प्रभु पाने की चाहत
निर्बल में भर देती बल;
आओ हँसी बसाएँ, हुई आँखे जहाँ नम हैं।
आओ दीप जलाएँ, गहराया जहाँ तम है॥
स्नेह मिले जो अपनो का
जीवन बन जाता गीत;
प्यार से मीठी बोली
दुश्मन को बना दे मीत;
निर्भय करें जीवन जहाँ मनु गया सहम है।
आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है॥

कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ 

छा रहे निराशा के बादल,
अंधियारा बढ़ रहा प्रतिपल।
घुट-घुट कर जी रहा आदमी
आदमी नचा रहा आदमी।

आशा के कुछ गीत सजा तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

मानवता लहू लुहान पड़ी,
बुद्धि चेतना से बनी बड़ी।
रक्त पिपाशा है पशु समान,
हेय मनुज अन्य, निज अभिमान।

सुन धरती का यह रोना तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

कर्म क्रूर, पाखण्ड, धूर्तता,
विध्वंस, वासना, दानवता।
लुप्त मानव का जन से प्यार,
निज स्वार्थ वश करता संहार।

जागरण के अब गीत गा तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

भोग में है खोया इंसान,
भूल गया है स्नेह, बलिदान।
उन्माद, शोषण, कुमति विचार,
बना यही मानव व्यवहार।

पथ मानव को उचित बता तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

हैं जेबें भर रहे कुशासक,
जनता पिस रही क्यों नाहक।
सुविधाओं की खस्ता हालत,
पग-पग, पल-पल जीवन आहत।

उनींदी आँखे खोल अब तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

अर्थ सभी कृत्यों का तल है,
ज्ञान, तेज, तप सब निर्बल है ।
विस्मित सभ्यता, मौन आघात,
कैसे मिटे यह काली रात?

ज्योति पुंज कोई बिखरा तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

वाणी-अमृत, अंतर-विष है,
जीवन बना छल साजिश है।
धमनी रक्त श्वेत हुआ है,
प्रस्तर मानव हृदय हुआ है।

प्राणों में नव रुधिर बहा तूँ,
कवि अपना कर्तव्य निभा तूँ।

पुकार

सहिष्णुता की वह धार बनो
पाषाण हृदय पिघला दे।
पावन गंगा बन धार बहो
मन निर्मल उज्ज्वल कर दे।

कर्मभूमि की वह आग बनो
चट्टानों को वाष्प बना दे।
धरती सा तुम धैर्य धरो
शोणित दीनों को प्रश्रय दे।

ऊर्जित अपार सूर्य सा दमको
जग में जगमग ज्योति जला दे।
पावक बन ज्वाला सा दहको
कर दमन दाह, कंचन निखरा दे।

अति तीक्ष्ण धार तलवार बनो
भूपों को भयकंपित रख दे।
पीर फकीरों की दुआ बनों
हर दरिद्र का दर्द मिटा दे।

शौर्य पौरुष सा दिखला दो
दमन दबी कराह मिटा दे।
अंबर में खीचित तड़ित बनो
जला जुल्मी को राख कर दे।

सिंहों सी गूंज दहाड़ बनो
अन्याय धरा पर होने न दे।
बन रुधिर शिरा मृत्युंजय बहो
अन्याय धरा पर होने न दे।

अपमान गरल प्रतिकार करो
आर्त्तनाद कहीं होने न दे।
बन प्रलय स्वर हुंकार भरो
शासक को शासन सिखला दे।

पद दलितों की आवाज बनो
मूकों का चिर मौन मिटा दे।
कर असि धर विषधर नाश करो
सत्य न्याय सर्वत्र समा दे।

सृष्टि सृजन का साध्य बनो
विहगों को आकाश दिला दे।
बन शीतल मलय बहार बहो
हर जीवन को सुरभित कर दे।

वीरों का कर्तव्य

साहस संकल्प से साध सिद्धि
विजयी समर में शूर बुद्धि,
दृढ़ निश्चय उन्माद प्रवृद्धि
ज्वाला सी कर चिंतन शुद्धि ।
कायरता की पहचान भीति है
अंगार शूरता की प्रवृत्ति है,
शोषित जीवन एक विकृति है
नहीं मृत्यु की पुनरावृत्ति है।
भर हुंकार प्रलय ला दो
गर्जन से अनल फैला दो,
शक्ति प्रबल भुजा भर लो
प्राणों को पावक कर लो।
अनय विरुद्ध आवाज उठा दो
स्वर उन्माद घोष बना दो,
शीश भले निछावर कर दो
आँच आन पर आने न दो।
जीवन में हो मरु तपन
सीने में धधकती अगन,
लक्ष्य हो असीम गगन
कंपित हो जग देख लगन।
श्रृंगार सृष्टि करती वीरों का
पथ प्रकृति सँवारती वीरों का,
आहुति अनल निश्चय वीरों का
शत्रु संहार धर्म वीरों का।
चट्टानों सा मन दृढ़ कर लो
तन बलिष्ठ सुदृढ़ कर लो,
निर्भयता का वरण कर लो
उन्माद शूरता को कर लो।
तपन सूर्य की वश कर लो
प्रचण्ड प्रदाह हृदय धर लो,
तूफानों को संग कर लो
शौर्य प्रबल अजेय धर लो।
गगन भेदी रण शंख बजा दो
वज्र को तुम चूर बना दो,
विजय दुंदुभि स्वर लहरा दो
श्रेय ध्वजा व्योम फहरा दो।
रोष, दंभ वीरों को वर्जित
करुणा, विनय वीरों को शोभित,
दीन, कातर हों कभी न शोषित
सत्य, न्याय से रहो सुशोभित।

नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ 

नील कण्ठ तो मै नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है!
कवि होने की पीड़ा सह लूँ
क्यों दुख से बेचैन धरा है?

त्याग, शीलता, तप सेवा का
कदाचित रहा न किंचित मान।
धन, लोलुपता, स्वार्थ, अहं का,
फैला साम्राज्य बन अभिमान।

मानव मूल्य आहत पद तल,
आदर्श अग्नि चिता पर सज्जित।
है सत्य उपेक्षित सिसक रहा,
अन्याय, असत्य, शिखा सुसज्जित।

ले क्षत विक्षत मानवता को
कांधों पर अपने धरा है।
नील कण्ठ तो मैं नही हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है।

सौंदर्य नही उमड़ता उर में,
विद्रूप स्वार्थ ही कर्म आधार।
अतृप्त पिपासा धन अर्जन की,
डूबता रसातल निराधार।

निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा?

असहाय रुदन चीत्कारों को,
प्राणों में अपने धरा है।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है।

तृष्णा के निस्सीम व्योम में,
बन पिशाचर भटकता मानव।
संताप, वेदना से ग्रसित,
हर पल दुख झेल रहा मानव।

हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों?

शिरोधार्य कर अटल सत्य को,
सीने में अंगार धरा है।
नीलकण्ठ तो मैं नही हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है।

नारी

मानव पर ऋण –
नारी का.
नारी  !
जिसने माँ बन –
जन्म दिया मानव को.

ईश्वर पर ऋण –
नारी का.
ईश्वर !
जिसने जन्म लिया हर बार
एक मां की कोख से.

प्रकृति पर ऋण –
नारी का.
प्रकृति !
जिसने सौंपा यह महान उद्देश्य
नारी के हाथ.

विडंबना

क्या विडंबना है – हम इतनी तरक्की कर पाए,
भिखारी को मोबाइल तो दे सके किंतु रोटी न दे पाए।

क्या विडंबना है – 70 साल से प्रौढ़ शिक्षा चला रहे हैं,
बच्चों को अनपढ़ रख उन्हें बूढ़े होने पर पढा रहे हैं।

क्या विडंबना है – में मेट्रो रेल तो ला सके हैं,
लेकिन आम आदमी को एक घर न दे सके हैं।

क्या विडंबना है सबसे अधिककानून हमने बनाए
लेकिन भ्रष्टाचार देश का अभिन्न अंग है यही समझ पाए।

क्या विडंबना है- खेती की पैदावार दस गुना बढ़ा चुके हैं,
लेकिन किसानों की आत्महत्या को नहीं रोक सके हैं।

क्या विडंबना है- बच्चे भगवान का रूप होते हैं,
लेकिन सबसे अधिक बाल मजदूर हमारे यहां होते हैं।

क्या विडंबना है- मल्टीप्लेक्स, माल्स, गगनचुंबी इमारतें हैं,
लेकिन यहां आधे लोग झुग्गी झोंपड़ी में रहते हैं।

क्या विडंबना है – कितने कोर्ट कचहरी खुलवाए
लेकिन एक मुकदमा निपटाने को चार जन्म लेने पड़ जाएं।

क्या विडंबना है लाखों डिग्री धारक बना दिए हैं,
लेकिन उनको रोजगार के कोई साधन नहीं दिए हैं।

क्या विडंबना है – कितने करोड़पति पैदा किए घर से
लेकिन आधी जनता दो वक्त की रोटी को तरसे।

क्या विडंबना है – देश को ये नेता चलाते हैं,
जो देश को कम देशवासियों को ज्यादा चलाते हैं।

भारती 

भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती.

देश के युग तरुण कहाँ हो ?
नव सृष्टि के सृजक कहाँ हो ?
विजय पथ के धनी कहाँ हो ?
रथ प्रगति का सजा सारथी.
भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती.

शौर्य सूर्य सा शाश्वत रहे,
धार प्रीत बन गंगा बहे,
जन्म ले जो तुझे माँ कहे,
देव – भू पुण्य है भारती.
भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती.

राष्ट्र ध्वज सदा ऊँचा रहे,
चरणों में शीश झुका रहे,
दुश्मन यहाँ न पल भर रहे,
मिल के सब गायें आरती.
भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती.

आस्था भक्ति वीरता रहे,
प्रेम, त्याग, मान, दया रहे,
मन में बस मानवता रहे,
माँ अपने पुत्र निहारती.
भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती.

द्रोह का कोई न स्वर रहे,
हिंसा से अब न रक्त बहे,
प्रहरी बन हम तत्पर रहें,
सैनिकों को माँ संवारती.
भारती भारती भारती,
आज है तुमको पुकारती

माँ तुझको शीश नवाता हूँ

माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …
तेरे चरणों की रज पाकर,
अभिभूत हुआ मैं जाता हूँ
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …

आशीष वचन सुन तेरे मुंह से,
मैं फूला नहीं समाता हूँ
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …
ममता तेरी जब भी पाता,
मैं राजकुँअर बन जाता हूँ।
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …

गम मुझको हैं छू नहीं पाते,
आंचल जब तेरा पाता हूँ
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …

अवगुण मेरे ध्यान न लाये,
मैं हर दिन माफी पाता हूँ
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …

मेरी दुनिया तू ही माँ है,
तुझमें ही सब कुछ पाता हूँ
माँ तुझको शीश नवाता हूँ। माँ …

गीत कौन सा मैं गाऊँ

जग ये जैसे रो रहा है
मातम घर घर हो रहा है.
गीत कौन सा मैं गाऊँ ?
कैसे दुनिया को बहलाऊँ ?

देने सुत को एक निवाला
बिक जाती राहों में बाला.
कौन धान की हांडी लाऊँ ?
भर भर पेट उन्हें खिलाऊँ ?

खेल अनय का हो रहा है
न्याय चक्षु बंद सो रहा है.
कौन प्रभाती राग सुनाऊँ ?
इस धरा पर न्याय जगाऊँ ?

दो कौड़ी बिकता ईमान
’क्यू’ में खड़ा हुआ इंसान.
कौन ज्योति का दीप जलाऊँ ?
मानस को अंतस दिखलाऊँ ?

सत्य सुबकता कोने में
झूठ दमकता पैसे में.
कौन कोर्ट का निर्णय लाऊँ ?
झूठ सच का अंतर बतलाऊँ ?

पुष्प का अनुराग

विधु से मादक शीतलता ले
शोख चांदनी उज्ज्वलता ले,
भू से कण कण चेतनता ले
अंतर्मन की सुंदरता ले.

अरुणिम आभा अरुणोदय से
सात रंग ले किरण प्रभा से,
रंग चुरा मनभावन उससे
प्रीत दिलों में जिससे बरसे.

जल बूंदों से निर्मलता ले
पवन तरंगों से झूला ले,
संगीत अलौकिक नभ से ले
मधु रस अपने यौवन का ले.

डाल डाली पर यौवन भार
गाता मधुमय गीत बहार,
पुष्प सुवास बह संग बयार
रति मनसिज सी प्रेम पुकार.

पाकर मधुमय पुष्प सुवास
गंध को भर कर अपनी श्वास
इक तितली ने लिया प्रवास,
किया पुष्प पर उसने वास.

मधुर प्रीत की छिड़ गई रीत
दोनों लिपटे कह कर मीत,
पंखुड़ियों ने भूली नीति
मूक मधुर बिखरा संगीत.

अतिशय सुख वह मौन मिलन का
मद मधुमय उस रस अनुभव का,
कंपन करती पंखुड़ियों का
तितली के झंकृत पंखों का.

पराग कणों से कर आलिंगन
शिथिल हुए दोनों के तन मन,
सुख मिलता सब करके अर्पण
हर इक कण में रब का वर्णन.

नव वर्ष 

नव सृजन, नव हर्ष की,
कामना उत्कर्ष की,
सत्य का संकल्प ले
प्रात है नव वर्ष की.

कल्पना साकार कर,
नम्रता आधार कर,
भोर नव, नव रश्मियां
शक्ति का संचार कर.

ज्ञान का सम्मान कर,
आचरण निर्माण कर,
प्रेम का प्रतिदान दे
मनुज का सत्कार कर.

त्याग कर संघर्ष का,
आगमन नव वर्ष का,
खिल रही उद्यान में
ज्यों नव कली स्पर्श का.

प्रेम की धारा बहे,
लोचन न आंसू रहे,
नवल वर्ष अभिनंदन
प्रकृति का कण कण कहे.

माँ इसको कहते

जब भारत ने हमें पुकारा,
इक पल भी है नहीं विचारा,
जान निछावर करने को हम
तत्पर हैं रहते.
माँ इसको कहते.

इस धरती ने हमको पाला,
तन अपना है इसने ढ़ाला,
इसकी पावन संस्कृति में हम
सराबोर रहते.
माँ इसको कहते.

इसकी गोदी में हम खेले,
गिरे पड़े और फिर संभले,
इसकी गौरव गरिमा का हम
मान सदा करते.
माँ इसको कहते.

देश धर्म क्या हमने जाना,
अपनी संस्कृति को पहचाना,
जाएँ कहीं भी विश्व में हम
याद इसे रखते.
माँ इसको कहते.

मिल जुल कर है हमको रहना,
नहीं किसी से कभी झगड़ना,
मानवता की ज्योत जला हम
प्रेम भाव रखते.
माँ इसको कहते.

कौन हो तुम

अधरों पे राग मलंद लिये,
मद-मधु-रस मकरंद पिये,
नयनों में संसृति हर्ष लिये,
सुंदर रचना कौन हो तुम?

अलकों में तेरी सांझ ढ़ले,
पलकों से मृदुहास छले
उर में मधुर प्रसून खिले,
शोभित रमणी कौन हो तुम?

तन कौमुदी सिंगार किये
पावों में प्रमाद लिये
मिलन का अभिप्राय लिये
कांति कामिनी कौन हो तुम?

वाणी कोकिल वास करे,
सुर में लय और छंद भरे,
खनक मधुर हृदय हरे,
चारु चंचला कौन हो तुम?

यह कौन 

यह कौन घर सजा गया! यह कौन घर सजा गया?

हर वस्तु को उसका, पता ठिकाना बता गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

तम विचरित नीड़ में, किरण पुंज बिखरा गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

जहां निराशा बसती थी, आशा के दीप जला गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

जहां न खिलते थे प्रसून, अधर कुसुम खिला गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

जहां न तिरते थे सुर, राग मल्हार गा गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

उर तपता था जहां, शीतलता बिखरा गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

सूनेपन का था प्रवास जहां, खुशियों को बिखरा गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

प्रीत से था बैर जहां, हृदय हलचल मचा गया.
यह कौन घर सजा गया! यह कौन….

प्यार 

प्यार के लिये उम्र की कोई बंदिश नही होती,
लेकिन प्यार हो जाये तो उम्र है आहिस्ता बढ़ती.

खुशियों की सौगात यदि ज़िंदगी में चाहिये,
खुशियों को बांटने वाला एक हमसफ़र चाहिये.

प्यार पा लिया एक बार, उसे पत्थर का बुत न बनाइये,
गूंधिये रोज़ आटे की तरह और नई रोटी बनाइये.

दिल को उपहार समझ पाने की तमन्ना न रखो,
दिल तो दिल है, उसे प्यार करो और जीत लो.

दुनिया के लिये तुम केवल एक इंसान हो,
लेकिन प्यार में किसि के लिये तुम पूरी कायनात हो.

प्यार कीजिये तो कीजिये पागलपन की हद तक,
मिटा दे हस्ती खुद की, फ़ना हो जये रूह तक.

दुनिया में सबसे बड़ा गम यह नही कि इंसान मरते हैं,
गम है तो यह कि इंसान प्यार करना छोड़ देते हैं.

प्यार वह चाबी है जिससे खुशियों के सारे ताले खुलते,
दुनिया से दुख दर्द मिट जाते, गर इंसा से इंसा प्यार करते.

छुपा कहां भगवान 

छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?
श्रद्धा, शांति, सत्य त्याग, दंभ में खोया इंसान,
नहीं झांकता मन मंदिर, भ्रम में भटक रहा इंसान,
तप, पूजा, जप का मान, भूल गया है इंसान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

कहां गई वह हिंद संस्कृति जिसका था सम्मान,
कहां गई भारत सभ्यता जिसका था अभिमान,
कहां गाई लक्ष्मी देवी, जिसका था बेटी नाम,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

तज शील मर्यादा को, धन का करता गुणगान,
करुणा, न्याय, दया, दान का लोप हुआ है मान,
रिश्ते, नाते, परिजनों का बिलकुल रहा न ध्यान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

चमक दमक में खोया, गर्व गरिमा से अनजान,
दीन का करता शोषण, अनुचित का रहा न भान,
स्नेह, कृपा, पावन प्यार, ऐसा था हिंदुस्तान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

तार-तार हुआ समाज, मनुज बन गया हैवान,
अंधाधुंध सब भाग रहे, मंजिल का नही ज्ञान,
गमों में सब जी रहे, खुशी का न नामों निशान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

जमीं थी जब स्वर्ग यहां, भूला जीवन का तान,
आत्म चिंतन बंद किया, लोभ लिप्सा ही अरमान,
निशा का गहन साम्राज्य, दिक्खता न कहीं ईमान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

धरा तुझे पुकार रही, करो दमन बहुत शैतान,
दृष्टि, दिशा दो जीवन को, कण कण ईश समान,
अब न सताओ आ भी जाओ, दीन का सुन गान,
छुपा कहां भगवान तू है छुपा कहां भगवान?

इस गवार को

हो भूख से बेजार बढ़ाकर जब कोई हाथ
उतारता स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ
तो इस गवार को भी यह बात समझ आती है।

लेकिन रहने वाले ऊँची अट्टालिकाओं में
सेकते हैं रोटियाँ जब जल रही चिताओं में
तो इस गवार को भी यह बात गवारा नहीं है।

भरसक मेहनत के बाद जब एक श्रमिक के हाथ
जुटा पाते न रोटी दो वक्त की एक साथ
चुराना एक रोटी का मुझे समझ आता है।

माँ, पत्नी की लाश पर कर रहे हैं जो नग्न नृत्य
जमीन जायदाद खातिर कर रहे जो भर्त्स कृत्य
यह बात इस गवार को नागवार गुजरती है।

गाँवों में साधन नहीं, कमाई का ठौर नही
शहरों में भाग आते चार पैसे मिलें कहीं
बदहाल सा जीना उनका समझ आता है।

लेकिन शहरों से जा खेतों पर कब्जा करना
एक साथ सैकड़ों किसानों की जमीन छिनना
मुझे क्या किसी भी गवार को समझ आता नहीं।

कलेजे पर रख पत्थर भेज विदेश बच्चों को
स्वर्णिम भविष्य देने की चाहत लाडलों को
बुढ़ापे में खुद को ढोना समझ आता है।

लेकिन उन लाडलों का क्या जो छीन कर सब कुछ
बेघर कर देते बूढ़े माँ बाप को समझ तुच्छ
गँवार को लगता खूब सयाने वो लाडले हैं।

पिता का हाथ बँटाता बचपन खेत खलिहान में
माँ का हाथ बँटाता बचपन घरों के काम में
गवार को क्या समझदार को भी समझ आता है।

लेकिन बचपन खुद को कांधों पर धर जीता है
होटलों, दुकानों, सड़कों, फैक्ट्रियों में पलता है
लगता गवार को हुई बेमानी जिंदगी है।

कायर बन जो जीते हैं, शांति शांति जपते हैं
कातर बोल रखते हैं, अपमान भी सहते हैं
दमन इन जातियों का एक दिन समझ आता है।

किंतु ब्याघ्र बन जो छोटे राष्ट्र निगल जाते हैं
दूसरे देशों की भी बागडोर चलाते हैं
इस गवार के पल्ले तो कुछ भी नही पड़ता है।

नेता बनने से पहले वह खाना खाते हैं
राजनीति में जमने पर बस पैसा खाते हैं
नेताओं का करोड़पति बनना समझ आता है।

लेकिन आम जनता त्रस्त, अपमान सहती रहे
भूख, गरीबी, जुल्म, भ्रष्टाचार से भिड़ती रहे
देश को बेचें नेता, गवार समझ पाता नहीं।

अरे समझदारों ! इस गवार को भी समझा दो
ऊट पटांग हरकतों को भेजे में घुसवा दो
गर नहीं तो इस गवार को मूर्ख ही बतला दो।

कोख से 

एक गर्भवती महिला अल्ट्रासोनोग्राफी सेंटर में भ्रूण के लिंग का पता कराने के लिए जाती है। जब पेट पर लेप लगाने के बाद अल्ट्रासाउंड का संवेदी संसूचक घुमाया जाता है, तो सामने लगे मानिटर पर एक दृष्य उभरना शुरू होता है। इससे पहले कि मानिटर में दृष्य साफ साफ उभरे, एक आवाज गूंजती है। और यही आवाज मेरी कविता है– ‘कोख से’। आइये सुनते हैं यह आवाज

माँ सुनी मैने एक कहानी !
सच्ची है याँ झूठी मनगढ़ंत कहानी ?

बेटी का जन्म घर मे मायूसी लाता,
खुशियों का पल मातम बन जाता,
बधाई का एक न स्वर लहराता,
ढ़ोल मंजीरे पर न कोई सुर सजाता ! माँ….

न बंटते लड्डू, खील, मिठाई, बताशे,
न पकते मालपुए, खीर, पंराठे,
न चौखट पर होते कोई खेल तमाशे,
न ही अंगने में कोई ठुमक नाचते। माँ….

न दान गरीबों को मिल पाता,
न भूखों को कोई अन्न खिलाता,
न मंदिर कोई प्रसाद बांटता,
न ईश को कोई मन्नत चढ़ाता ! माँ…..

माँ को कोसा बेटी के लिए जाता,
तानों से जीना मुश्किल हो जाता,
बेटी की मौत का प्रयत्न भी होता,
गला घोंटकर यां जिंदा दफ़ना दिया जाता ! माँ….

दुर्भाग्य से यदि फ़िर भी बच जाए,
ताउम्र बस सेवा धर्म निभाए,
चूल्हा, चौंका, बर्तन ही संभाले जाए,
जीवन का कोई सुख भोग न पाए ! माँ…..

पिता से हर पल सहमी रहती,
भाईयों की जरूरत पूरी करती,
घर का हर कोना संवारती,
अपने लिए एक पल न पाती ! माँ….

भाई, बहन का अंतर उसे सालता,
हर वस्तु पर अधिकार भाई जमाता,
माँ, बाप का प्यार सिर्फ़ भाई पाता,
उसके हिस्से घर का पूरा काम ही आता ! माँ….

किताबें, कपड़े, भोजन, खिलौने,
सब भाई की चाहत के नमूने,
माँ भी खिलाती पुत्र को प्रथम निवाला,
उसके हिस्से आता केवल बचा निवाला ! माँ….

बेटी को मिलते केवल ब्याख्यान,
बलिदान करने की प्रेरणा, लाभ, गुणगान,
आहत होते हर पल उसके अरमान,
बेटी को दुत्कार, मिले बेटे को मान ! माँ….

शिक्षा का अधिकार पुत्र को हो,
बेटी तो केवल पराया धन हो,
इस बेटी पर फ़िर खर्चा क्यों हो ?
पढ़ाने की दरकार भला क्यों हो ? माँ….

आज विज्ञान ने आसान किया है,
अल्ट्रा-सोनोग्राफ़ी यंत्र दिया है,
बेटी से छुट्कारा आसान किया है,
कोख में ही भ्रूण हत्या सरल किया है ! माँ…

माँ तू भी कभी बेटी होगी,
इन हालातों से गुजरी होगी,
आज इसीलिए आयी क्या टेस्ट कराने ?
मुझको इन हालातों से बचाने ! माँ….

माँ यदि सच है थोड़ी भी यह कहानी,
पूर्व, बने मेरा जीवन भी एक कहानी,
देती हूँ आवाज कोख से, करो खत्म कहानी,
करो समाप्त मुझे, न दो मुझे जिंदगानी।
करो समाप्त मुझे, न दो मुझे जिंदगानी।
करो समाप्त मुझे, न दो मुझे जिंदगानी।

पदचिन्ह

बचपन में मैने महाभारत पढ़ी थी
युधिष्ठिर का चरित्र भाया था।
सोचा था -‘मै भी
जीवन में सदैव सत्य बोलूंगा।’
समझ नही आता –
आज लोग मुझे
‘पागल’ क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने गौतम बुद्ध को पढ़ा था
उनका साधूपन भाया था।
सोचा था – ‘मै भी
तन से न सही
मन से अवश्य साधू बनूंगा।’
समझ नही आता –
आज लोग मुझे
‘बेवकूफ’ क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने गीता पढ़ी थी
कृष्ण का उपदेश भाया था
सोचा था –‘मै भी
कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन
अपनाऊँगा।‘
बस कर्म करूंगा
फल की इच्छा नही रखूंगा।
समझ नही आता –
आज लोग क्यों कहते हैं –
अरे! इसका खूब फायदा उठा लो
बदले में कुछ नही मांगता!

बचपन में मैने पढ़ा था-दहेज कुप्रथा है।
सोचा था – ‘बिना दहेज शादी करूंगा
पत्नी को सम्मान दूंगा,
उसके माँ बाप को
अपने माँ बाप का दर्जा दूंगा।’
समझ नही आता –
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं –
धोबी का ——–
न दामाद न बेटा !

बचपन में मैने गांधी को पढ़ा था।
सोचा था- ‘ मै भी अपनाऊँगा
सादा जीवन उच्च विचार’
समझ नही आता –
आज लोग मुझे
‘गधा’ क्यों कहते हैं?

बचपन में मैने मदर टेरेसा को पढ़ा था ।
सोचा था- ‘बड़ा हो कर
मै भी करूँगा
लोगों की निस्वार्थ सेवा।’
समझ नही आता –
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं –
जरूर इसकी निस्वार्थ सेवा में भी
कुछ स्वार्थ होगा !

मुसाफ़िर

यह दुनिया एक रंगमंच है
मुसाफ़िर आते हैं,
अपना किरदार निभाते हैं
फिर चले जाते हैं।

सब अपना अपना रंग दिखा जाते हैं
कुछ अच्छे, कुछ बुरे काम कर जाते हैं।
कुछ हीर-रांझा, लैला-मजनू
जैसा प्यार कर जाते हैं।

कुछ धर्मगुरू शंकराचार्य बन
अद्वैत और विश्वास दे जाते हैं।
कुछ नानक, बुद्ध, ईसा, पैगंबर बन
मानवता को दिशा दे जाते हैं।

कुछ राणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविंद बन
दीनों को जुल्मियों से बचा जाते हैं।
कुछ नादिर, गोरी, तैमूर बन
देश को लूट ले जाते हैं।

कुछ आर्यभट्ट, भास्कर बन
खगोल बना जाते हैं।
कुछ चरक, सुश्रुत बन
चिकित्सा को आयाम दे जाते हैं।

कुछ अशोक, चंद्रगुप्त, आकबर बन
देश को जोड़ जाते हैं।
कुछ औरंगजेब, मीर जाफ़र, जयचंद्र बन
देश को तोड़ जाते हैं।

कुछ गांधी, विवेकानंद बन
ऎसे कर्म कर जाते हैं,
कि अपने पीछे, अपने
पदचिन्हों को छोड़ जाते हैं।

कुछ भक्ति में लीन हो जाते हैं
मीरा बन कृष्ण को पा जाते हैं।
कुछ समाज सुधारक बन
राम मोहन राय और कबीर बन जाते हैं।

कुछ मदर टेरेसा बन
दूसरों की सेवा अपना लेते हैं।
उनमें ही ईश्वर और खुशी ढ़ूंढ़
खुद को भूल जाते हैं।

कुछ भगत, आजाद, बोस बन
देश पर निछावर हो जाते हैं
कुछ तेलगी, हर्षद, वीरप्प्न बन
देश को ही चूस जाते हैं।

कुछ युवाओं के आइकान बन
किंग-खान, बिग- बी बन जाते हैं ।
कुछ पागलपन की हद तक गिर
अपनों की पीठ में छुरा घोंप जाते हैं।

कुछ हैवान बन जाते हैं
कुछ शैतान बन जाते हैं
कुछ बेईमान बन जाते हैं
कुछ सम्मान पा जाते हैं।

कुछ विज्ञान से यान बना जाते हैं
कुछ जीवन को रोशन कर जाते हैं।
कुछ मानवता को तबाह करने
परमाणु बम गिरा जाते हैं।

कोई खुन बहाता है
कोई खून चूसता है।
कोई धर्म, देश, जाति पर
खून निछावर कर जाता है।

यह दुनिया एक रंगमंच है
मुसाफ़िर आते हैं,
अपना किरदार निभाते हैं
फिर चले जाते हैं।

हिंदी 

अभिमान है, स्वाभिमान है,
हिंदी हमारा मान है।

जान है, जहान है,
हिंदी हमारी शान है।

सुर, ताल है, लय, भाव है,
हिंदी हमारा गान है।

दिलों का उद्गार है, भाषा का संसार है,
हिंदी जन-जन का आधार है।

बोलियों की झंकार है, भारत का शिंगार है,
हिंदी संस्कृति का अवतार है।

विचारों की खान है, प्रेम का परिधान है,
हिंदी भाषाओं में महान है।

बाग की बहार है, राग में मल्हार है,
हिंदी हमारा प्यार है।

देश की शान है, देवों का वरदान है,
हिंदी से हिंदुस्तान है।

भारत

अरुण प्रभात किरणें प्रथम
चूमतीं हिंद भाल अप्रितम,
करतीं आदित्य रश्मियाँ
सृष्टि का अभिषेक प्रथम।

हिम शैल श्रृंगों से
अवतरित हो अप्सरा सी,
झूमती मद नर्तन करतीं
आलोक फ़ैलातीं पफ़ुल्ल सी।

नैसर्गिक सौंदर्य छटा निराली
गूंजते स्वर देवालयों से,
ईश स्तुति, अर्चन, आरती
हिंद के हर नगर से।

शंखों का पावन नाद
स्पंदित घंटों का निनाद,
डोलते देवों के सिंहासन
भक्तों का अतिरेक उन्माद।

कान्य कुमारी की सुषमा
मन देख – देख हर्षाता,
तीन दिशा में विस्तृत जलनिधि
बंग, अरब, हिंद लहराता।

अरुणोदय और अस्तांचल
चरणों में शीश नवाता,
तीन सागरों का संगम
मिल रज-चरण बाँटता।

मंदाकिनी, कालिंदी, नर्मदा
शोभित करतीं हिंद धरा,
कावेरी, कृष्णा, महानदी
हरित सिंचित उपजाऊ धरा।

छलका अमृत जहाँ वसुधा
विश्व ख्याति पावन महत्ता,
उज्जैन, नासिक, प्रयाग, हरिद्वार
महाकुंभ तीर्थ लगता।

जनक विश्व सभ्यता का
हड़प्पा, मोहन-जोदाड़ो का,
शून्य की उत्पत्ति का
प्राचीनतम भाषा संस्कृत का।

वेदों, उपनिषद, पुराणों का
रामायण, महाभारत, गीता का,
भाष्कर, मिहिर, आर्यभट्ट का
सुश्रुत, जीवक, चरक का।

पूर्ण विश्व को पाठ पढ़ाया
दर्शन, संस्कृति, अध्यात्म,
ज्ञान, भक्ति, कर्म त्रिवेणी
अच्युत बहती धारा परमार्थ।

धर्मों, संस्कृतियों का अद्भुत संगम
पल्लवित अनेक मत संप्रदाय,
विभिन्न मत धाराएं मिलीं
बनी एक-प्राण पर्याय।

विस्मित करती पुरा वास्तुकला
उन्न्त था इतना विज्ञान,
समृद्ध कला, कारीगरी
विश्व करता था सम्मान।

विद्वानों, वीरों की पुन्य धरा
ज्ञानी, दृष्टा, ॠषि, महात्मा,
बद्री, द्वारका, पुरी, रामेश्वर
हर धाम बसा परमात्मा।

संघर्ष, सवार्थ, अहंकार, मद
परित्याग का दिया संदेश,
सत्य, अहिंसा, त्याग मर्म
विश्व ने पाया उपदेश।

तेरी गोद जन्म एक वरदान
माँ स्वीकारो कोटि प्रणाम,
जननी जन्मभूमि स्वर्ग समान
अभिनंदन भूमि लोक कल्याण।

स्वागत गीत 

(भूतपूर्व राष्ट्रपति महामहिम डा. एपीजे अब्दुल कलाम के स्वागत में रचा गया गीत)
स्वागतम सुस्वागतम
महामहिम सुस्वागतम।

रामेश्वर की पवित्र भूमि पर
जन्म लिया इक महामना ने,
‘थिरुकराल’ के महान ज्ञाता
नई दिशा दी कवि मना ने।
स्वागतम सुस्वागतम
अभ्यागत सुस्वागतम, स्वागतम सुस्वागतम।

विज्ञान को उन्न्त बनाया
भारत को गौरव दिलवाया,
‘नाग’, ‘अग्नि’, ‘पृथ्वी’, ‘आकाश’
शक्ति संपन्न देश बनाया।
स्वागतम सुस्वागतम
प्रतिभा धनी सुस्वागतम, स्वागतम सुस्वागतम।

दूर गगन में हम उड़े
पंख खोल हम संग तेरे,
नित नई ऊचाईयां
भारत ने पाईं संग तेरे।
स्वागतम सुस्वागतम
भारत रत्न सुस्वागतम, स्वागतम सुस्वागतम।

भारत को सुपर बनाने का
स्वप्न सजाया जो आपने,
करेंगे पूरा हम उसको
नव रुधिर जगाया आपने।
स्वागतम सुस्वागतम
महामहिम सुस्वागतम, स्वागतम सुस्वागतम।

भरम पाला था मैने

भरम पाला था मैने प्यार दो तो प्यार मिलता है।
यहाँ मतलब के सब मारे न सच्चा यार मिलता है।

लुटा दो जां भले अपनी न छोड़ें खून पी लेंगे,
जिसे देखो छुपा के हाथ में हथियार मिलता है।

बहा लो देखकर आँसू न जग में पोंछता कोई,
दिखा दो अश्क दुनिया को तो बस धिक्कार मिलता है।

नहीं मै चाहता दुनिया मुझे अब थोड़ा जीने दो,
मिटाकर खुद को देखो तो भी बस अंगार मिलता है।

मै पागल हूँ जो दुनिया में सभी को अपना कहता हूँ,
खफ़ा यह मुझसे हैं उनका मुझे दीदार मिलता है।

मुखौटा देख लो पहना यहाँ हर आदमी नकली
डराना दूसरे को हो सदा तैयार मिलता है।

यकीं किस पर करूँ

यकीं किस पर करूँ मै आइना भी झूठ कहता है।
दिखाता उल्टे को सीधा व सीधा उल्टा लगता है॥

दिये हैं जख्म उसने इतने गहरे भर न पाएंगे,
भरोसा उठ गया अब आदमी हैवान दिखता है।

शिकायत करते हैं तारे जमीं पर आके अब मुझसे,
है मुश्किल देखना इंसां को नंगा नाच करता है।

वजह है दोस्ती और दुश्मनी की अब तो बस पैसा,
जरूरत पड़ने पर यह दोस्त भी अपने बदलता है।

है बदले में वही पाता जो इसने था कभी बोया,
इसे जब सह नही पाता अकेले में सुबकता है।

भले कितनी गुलाटी मार ले चालाक बन इंसां
न हो मरजी खुदा की तब तलक पानी ही भरता है।

बने हैं पत्थरों के शहर जब से काट कर जंगल,
हकीकत देख लो इंसान से इंसान डरता है।

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