कृष्णकांत तैलंग की रचनाएँ

छुट्टी के दिन 

ताक धिना-धिन, ताक धिना-धिन!

मोटे बस्ते से कुट्टी है,
छुट्टी है, भाई छुट्टी है,
शाला के दिन कटते गिन-गिन!

खेलें-कूदें, मौज मनाएँ,
नाचें-गाएँ, धूम मचाएँ,
बढ़िया लगते छुट्टी के दिन!

दूर-दूर की सैर करेंगे,
मन में नई उमंग भरेंगे,
मज़ा रहेगा हर पल, हर दिन!

अच्छी-अच्छी नई पुरानी,
खूब पढ़ेंगे कथा-कहानी
सूना लगता नानी के बिन!

सैर-सपाटा

मैं रॉकेट एक बनाऊँगा,
उड़ अंतरिक्ष में जाऊँगा!
चाँद-सितारों को छू लूँगा
दूर ग्रहों की सैर करूँगा!
लोग वहाँ के होंगे कैसे,
क्या होंगे हम लोगों जैसे!
अपना रॉकेट उनको दूँगा,
उड़न तश्तरी उनसे लूँगा!
रोज सुनाती हमें कहानी,
परी लोक है, कहती नानी!
वहाँ मिलेंगी परियाँ प्यारी,
रंग-बिरंगी दुनिया न्यारी!
खूब करूँगा सैर सपाटा,
आऊँगा कर उनको टा-टा!

मूँछें बाबा की 

लम्बी लम्बी भूरी मोटी बाबा की थी मूँछें,
मानो होंठों पर रक्खी हो, ला घोड़े की पूँछें।
पीछे दौड़ा करते बाबा, मुझे पकड़ जब लेते,
मूँछ गड़ाकर चूम-चूम कर आफत-सी कर देते।
एक रोज थे सुख से सोते बाबा खर्राटे भर,
नाक बजाते, गाल फुलाकर मुँह अपना बिचका कर।
मुझको तब सूझी शैतानी लख बाबा की मूँछें,
मैंने कैंची लाकर कतरीं घोड़े की वह पूँछें!

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