कृष्ण मुरारी पहारिया की रचनाएँ

अपना अहंकार तुम गाते रहे रात भर 

अपना अहंकार तुम गाते रहे रात भर
अब प्रभात में मुझको भी कुछ कह लेने दो

मैंने ही दृढ़ अन्धकार की परतें तोड़ी
और तुम्हारी अजगर जैसी बाँहें मोड़ीं
मेरी धरती पर किरणों के तृण लहराए
इसीलिए तो मैंने कठिन ज़मीनें गोड़ीं

तुम काला विध्वंस रचाते रहे रात भर
अब प्रभात के ज्योतित क्षण को रह लेने दो

जितना हो सकता था तुमने विष फैलाया
औरों की तड़पन देखी, त्योहार मनाया
लेकिन सब का समय एक-सा कब होता है
डूबा निशि का राग, प्रभाती का स्वर आया

तुम अपनी फुफकार छोड़ते रहे रात भर
अब प्रभात के मलय-पवन को बह लेने दो

14.08.1962

अपने इन छोटे गीतों को 

अपने इन छोटे गीतों को
हवन कुंड में डाल रहा हूँ
जैसे भी हो सर्जन की
अपनी पीड़ा पाल रहा हूँ

मेरा यज्ञ अनवरत चलता
भले न कोई साथ दे रहा
अग्नि नहीं यह बुझी अभी तक
कहीं न कोई हाथ दे रहा

अपने ही कर जला हवन में
मैं अब तक बेहाल रहा हूँ

भाव बने मेरे वसुधारा
छंदों की समिधा कर डाली
प्राणों की हविष्य लेकर मैं
सज़ा चुका हूँ अपनी थाली

मैं ख़ुद ही अपना जीवन हूँ
ख़ुद ही अपना काल रहा हूँ

अब केवल लपटों से अपना 

अब केवल लपटों से अपना
मिलना और बिछड़ना है
पीड़ा हो या मधुर प्रेम की
नोक ह्रदय में गड़ना है

जैसी बोयी बेल अभी तक
वैसी फलियाँ काटूँगा
अपने अनुभव का गंगाजल
हर परिचित को बाटूंगा
अब तक अपनी उमर खपायी
जीने के संघर्षों में
होना है जाने क्या आगे
आने वाले वर्षों में

अब औरों से नहीं जगत में ,
अपने मन से लड़ना है

अब किसका हिसाब चुकता
करना है जाने से पहले
क्या करना है धन या जन का
कैसे नहले पर दहले
छूट गयी वे दाँव-पेच की
हार जीत वाली घातें
बस थोड़ी सी शेष रह गयी
कहने सुनने की बातें

अब क्या सही गलत के झगड़े
किसके पीछे अड़ना है

अब भी अतीत में धँसे हुए हैं पाँव

अब भी अतीत में धँसे हुए हैं पाँव
आगे बढ़ने का कोई योग नहीं
आँखों के सम्मुख सपनों की घाटी
उस तक पहुँचूँ कोई संयोग नहीं

सुधियाँ भी हैं, सम्बन्ध पुराने हैं
ताज़े होते रहते हैं बीते घाव
इनमें ही फँसकर रह जाता है मन
मर जाता अगला पग धरने का चाव

कुछ ऐसे भी हैं काया के दायित्व
जिनके बोझ से झुके हुए कन्धे
कुछ ऐसे पर्दे भी रीतों के
जिनके रहते ये नयन हुए अन्धे

उर में है चलते रहने का संकल्प
यह बात असल है, कोई ढोंग नहीं

काया की अपनी जो मज़बूरी हो
अन्तस की अपनी ही गति होती है
कैसा ही गर्जन-तर्जन हो नभ में
कोयल केवल मीठे स्वर बोती है

अन्तर्द्वन्दों में जो फँस जाते हैं
उनका भी अपना जीवन होता है
भावी की सुखद कल्पनाओं के बीच
सुख से सारा विष पीना होता है

दुःख, तडपन और निराशा हो प्रारब्ध
यह भी जीना है कोई रोग नहीं

असफलता के मौन क्षणों में, पथ पर हाथ मलेंगे

असफलता के मौन क्षणों में, पथ पर हाथ मलेंगे
हम अपने टूटे पैरों से सारी उम्र चलेंगे

ढलते सूरज-सा शरीर है
रग-रग में उठ रही पीर है
रोगी जैसा कर्मवीर है
हम क्षय की सुलगी भट्टी में, सारी उम्र जलेंगे

यहाँ कहाँ रसवन्त कूल हैं,
जीवन के बहुवर्ण फूल हैं,
पग-पग पर चुभ रहे शूल हैं
हम बबूल के कण्टक-वन में सारी उम्र पलेंगे

दिन कैसे उतरे अवनी पर
चढ़ा मैल नृप की करनी पर
फला स्वार्थ टहनी-टहनी पर
हमें अन्धेरे में ठग-ठाकुर सारी उम्र छलेंगे

16.07.1962

कहाँ के बाप कहाँ के पूत 

कहाँ के बाप, कहाँ के पूत
बँधे हैं सब स्वारथ के सूत

हुए अपने भविष्य से भीत
सभी हैं आज परस्पर मीत
गा रहे तब तक हिलमिल गीत
ढकी जब तक सबकी करतूत

समय का हलका-सा आघात
खोल देता है सारी बात
सूख जाते हैं रातों-रात
नेह के सागर भरे अकूत

18.08.1962

कुछ ऐसा साथी मेरा इतिहास है

कुछ ऐसा साथी मेरा इतिहास है
दुख का सारा वैभव मेरे पास है

मुझको जो भी मिला ख़ुशी से ले लिया
इसीलिए तो मेरा कोष अपार है
इतराते हो तुम छोटी-सी जीत पर
देखो कितनी लम्बी मेरी हार है

फिर भी अपराजित मन का विश्वास है

हर अभाव में मुझको रंगीनी मिली
इसीलिए तो अब तक मुसकाता रहा
जैसा भी दुख-सुख भोगा है आज तक
एकाकी भी, अविरत मैं गाता रहा

मेरा जीवन ही गहरा परिहास है

06.06.1962

घर से जब मैं निकल पड़ा हूँ 

घर से जब मैं निकल पड़ा हूँ
मुझे कहीं तो जाना होगा
अपने थके हुए प्राणों को
दिशा-दिशा भटकाना होगा

इतना तो विश्वास लिए हूँ
ऐसी धरती कहीं मिलेगी
सपनों की यह बेल नयन में
अवसर पाकर जहाँ खिलेगी
इसीलिए पगडंडी पकड़े
जिधर मुड़ रही , चला जा रहा
टुकड़ा एक धूप का पाने
बरस-बरस से छला जा रहा

चाहे जितना अंधकार हो
मुझे प्रभाती गाना होगा

भीतर कोई बोल रहा है
चले चलो रुकना मरना है
अच्छे दिन आने वाले हैं
और तुम्हें ही कुछ करना है
सन्नाटे में शक्ति दे रही
कहीं उठी कोई स्वर लहरी
भीतर की आवाज़ न सुनती
क्या कीजे, दुनिया है बहरी

यह सन्नाटा तोड़ मुझे ही
अब साँकल खटकाना होगा

चिता जहाँ मेरी सजती हो

प्राणों को लय पर तैराकर, अच्छी तरह विदा कर देना

अगर सगे सम्बन्धी मेरे, चिता सजा कर रोयें धोयें
उनसे बस इतना कह देना, कांटे अंतिम बार न बोयें
जब तक साँसें रही देह में, तब तक की सेवा क्या कम है
चलते समय आँख गीली क्यों और पूछना कैसा गम है

वे स्वतंत्र हैं उनकी नैया, उनके हाथ उन्हीं का खेना

तुम पर मेरा, मेरे मित्रों और नहीं इतना तो ऋण है
सारी रचना तुम्हें समर्पी, जैसे हरी दूब का तृण है
उस तृण की शीतलता पीकर, कभी ह्रदय सहलाया होगा
भटका हुआ पिपासित यह मन, क्षण भर को बहलाया होगा

इतना करना मेरी खातिर, खड़ी रहे छंदों की सेना

जब से आपा किया समर्पित 

जब से आपा किया समर्पित
चिंता मिटी, नींद भर सोया
कोई देखे, भले न देखे
मैंने क्या पाया, क्या खोया

अब ऐसा कुछ नहीं रह गया
जिसके पीछे पड़े झगड़ना
जब अधिकार नहीं कुछ फल पर
क्यों इससे उससे फिर लड़ना
जीवन जो संघर्ष बना था
तिरता है अब सहज नाव-सा
रोम-रोम में पुलकन दौड़ी
याद नहीं, था कहाँ घाव-सा

वे क्षण बस इतिहास रह गये
जब मैं कभी फूट कर रोया

माया के बंधन कटने पर
धरती माँ, आकाश पिता है
कोई बोध कान में कहता
वही सेज है , वही चिता है
भीतर एक जोत फूटी है
अंतर्यात्रा सुगम हो गयी
कोई किरण दृष्टी के पथ पर
शुभ सपनों की बेल बो गयी

अब हलका हलका लगता है
बोझा जो जीवन भर ढोया है

तुमने मुझको दरवाज़े से लौटाया है 

तुमने मुझको दरवाज़े से लौटाया है
वही दर्द मैंने इन गीतों में गाया है

तुमने ही पावस के दिन आवाज़ लगाई
पहले ही परिचय में कर ली प्रेम-सगाई
छूकर प्राणों से प्राणों को आग लगाई
आज अचानक स्वर में परिवर्तन आया है

तुमने ही अपनी उपलब्धि गँवाई हँसकर
गाते जैसे वैभव के दलदल में फँसकर
सुखिया कोसेगी तुमको अन्तर में बसकर
छूटेगा अब छल दृगों पर जो छाया है

14.07.1962

तुम्हें गर्व है, तुमने छिपकर तीर चलाए

तुम्हें गर्व है, तुमने छिपकर तीर चलाए
मुझे गर्व है, मैंने उनको सहन कर लिया

तुमने मेरी शुभचिन्ता के अभिनय में जब
ठगवत अपने मीठे-मीठे बोल निकाले
तब पहले तो मुझको कुछ विश्वास हुआ था
अब समझा हूँ मीत तुम्हारे करतब काले

तुम्हें गर्व है, तुमने मुझको विष दे डाला
मुझे गर्व है, मैंने हँसकर ग्रहण कर लिया

मुसकाते हो अब तुम मेरी दशा देखकर
सोच रहे हो अन्तर मेरा रोता होगा
मेरे कौशल को समझोगे आगे चलकर
तुम डूबोगे ऐसे, अन्तिम गोता होगा

तुम्हें गर्व है, तुमने मेरी पीर बढ़ाई
मुझे गर्व है, मैंने चिन्तन गहन कर लिया

14.08.1962

दाह नहीं है, शीतलता है 

दाह नहीं है, शीतलता है
मन छाया-छाया चलता है

सभी हौसले पस्त हो गए
लड़ने के, बदला लेने के
मौलिकता के, चमक दमक
अपनी नाव अलग खेने के

क्रान्ति और उकसाने वाली
भाषा का नाटक खलता है

अब तो शान्त झील जैसा सुख
अभ्यन्तर में रचा-बसा है
विस्मृति में इतिहास पुराना
कब सर्पों ने उसे डंसा है

उसके भीतर झिलमिल-झिलमिल
राग भरा सपना पलता है

नभ पर एक सुनहली रेखा खींचो 

नभ पर एक सुनहली रेखा खींचो

उसके पार बसे सपनों को
अपनी बाँहों मे भींचो

कल का कल्पित आज सत्य हो जाए
मन का सारा अन्धकार खो जाए
युग युग संचित कलुष प्रभा धो जाए
अपना उपवन अपने श्रम से सींचो

सोंच रहे क्या मन की आँखें खोलो

कब तक बैठोगे यों ही अनबोले
सबने तो अपने अपने बल तोले
तुम भी इन आँखों से देखो न मींचो

नहीं जिनके नयनों में लाज 

नहीं जिनके नयनों में लाज
वही आसन पर रहे विराज

सुनेगा कौन तुम्हारी व्यथा
कहोगे किससे दुख की कथा
रहो सहते चुप रहकर यथा

अकेले अपनी पीड़ा आज

कहाँ हैं सुख के स्वर स्वच्छन्द
भाव है किसके कर में बन्द
टूटते हैं बन-बनकर छन्द

गिरी है कवि के मन पर गाज

18.08.1962

बरसो हे सावन मनभावन

बरसो हे सावन मनभावन
धरती को कर दो वृन्दावन

रचो आस के रास हृदय में
गाकर म्रुदु गर्जन की लय में
उबरें मन डूबे संशय में
आओ हे सुधियों के धावन

हर लो तीनों ताप मनुज के
मिटें कष्ट मानस के रुज के
हों निर्बन्ध पराक्रम भुज के
कर दो हे प्राणों को पावन

आई है संक्रान्ति देश पर
ठेस यहाँ लग रही ठेस पर
धिक है छलियों के सुवेष पर
मारो हे दुर्दिन का रावन

15.07.1962

भीतर कहीं हिलोरे लेता, निर्मल पानी केन का

भीतर कहीं हिलोरे लेता, निर्मल पानी केन का
छन्द तैरता जिसके तल पर, जैसे गुच्छा फेन का
चपल मछरियाँ मथे डालती, भीतर उठती पीर है
मंथर गति से धारा बहती, नदिया कुछ गम्भीर है
चट्टानी जबड़ों जैसे तट, और बीच में खाइयाँ
जितना विष पीती बस्ती का, नीलातीं गहराइयाँ

आभारी मैं और गीत भी, इस अनहोनी देन का

किरणें पीकर खिल-खिल करती, फिर क्रीड़ा को टेरती
कुछ ऐसी बंकिम चितवन से, यह योगी को हेरती
खिंचा चला जाता हूँ जैसे, बिन दामों का दास हो
या फिर पिंजरे के पंक्षी को, मिला खुला आकाश हो

बिना तुम्हारे कैसे सधता तप, ओ प्यारी मेनका

मन की धरती पर 

मैंने तो मन की धरती पर
गीतों के सपने बोये हैं
ऊपर से उन्मन लगता हूँ
भीतर प्राण नहीं सोये हैं

प्राणों में सर्जन चलता है
और सदा चलता रहता है
जो भी देखा-सुना जगत में
बिम्बों में ढलता रहता है
जो अपने भीतर-ही-भीतर
कुंठा की गांठे ढोता है
उसको कवी की कारगुजारी
पर विश्वास नहीं होता है

सारा वातावरण गुंजाने
के संकल्प नहीं खोये हैं
सर्जन सदा अकेले होता
यों काया पर दया सभी की
देखो कितने और चले थे
उनकी क्षमता चुकी की
सर्जन में साहस लगता है
यह कायर का खेल नहीं है
अपना लोहू इसे दिया है

किसी तरह से अपने तन पर
दुनिया के बोझे ढोये हैं

मन तुम कहाँ चले यों जाते 

मन तुम कहाँ चले यों जाते
एक ठौर पर नहीं बैठते
दर-दर ठोकर खाते

जहाँ-जहाँ आकर्षण पाया
वहीँ चिपक रहते हो
फिर इच्छाओं की ज्वाला में
बिना वजह दहते हो
क्यों कर तुमको नहीं सुहाती
अपनी राम-मड़ैया
बेड़ा पार इसी से लगना
कुछ तो सोचो भैया

अपनों से दूरी तुम रखते
गैरों के गुन गाते

जहाँ-जहाँ तुम गए भला क्या
लडुआ वहाँ धरे हैं
भला दिखाओ कहाँ तुम्हारे
दोनों हाथ भरे हैं
यह दुनिया बाज़ार सरीखी
मोल ख़रीदो – बेचो
फूँक-फूँक तुम पाँव धरो जू
पल में ऊँचों-नेचो

बड़े-बड़ों को भूलभूलैंयां
के रस्ते भटकाते

मन तुम किसके रूप रचे हो

मन तुम किसके रूप रचे हो
किसके बल पर इस दुनिया में
साबुत अभी बचे हो

क्यों अरूप में रूप देखते
बिम्बों में तस्वीरें
नहीं कल्पना पर थोपी क्यों
काया की प्राचीरें
भीतर कैसा स्रोत खुला है
जिसका रस पीते हो
सारी पीड़ा भूल गये हो
हंसी ख़ुशी जीते हो
नहीं मांगते मान मनौबल
अपने आप लचे हो

घूम रहे निर्जन सड़कों पर
लेकिन नहीं उदासी
कैसा आज तुम्हारा
वृन्दावन, कैसा है काशी
किसकी मुरली गूँज रही है
इन गीतों छंदों में
कैसे तुमको लगा दीखने
ईश्वर इन बन्दों में

अब पहले से ठीक हो गये
मुझको बहुत जँचे हो

मन न मिला तो कैसा नाता 

मन न मिले तो कैसा नाता
भला अकेला ठोकर खाता

जितने थे, झूठे वादे थे
सुख पर सभी बिके प्यादे थे
जाने क्यों मैं समझ न पाया
जग के नियम बड़े सादे थे

अपना ही स्वर मैं दुहराता
भला अकेला ठोकर खाता

फिर तो जो बाधाएँ आईं
बढ़कर मैंने गले लगाईं
उतना ही मैं कुशल हो गया
जितनी असफलताएँ पाईं

अपने घाव स्वयं सहलाता
भला अकेला ठोकर खाता

12.08.1963

मेरे मन की वंशी पर, अंगुलियाँ मत फेरो 

मेरे मन की वंशी पर, अंगुलियाँ मत फेरो
कहीं न सोई पीड़ा जग जाए

अब मुझको दायित्व निभाने दो
अपने जैसों का दुख गाने दो
जिस पर विज्ञापन का पर्दा है
उसको आज खुले में लाने दो

मेरी ओर न ऐसे खोये नयनों से हेरो
कहीं न कोई सपना ठग जाए

कैसे समझाऊँ अपना अभियान
मैंने तो ली है गाने की ठान
एक बूँद अमृत से क्या होगा
जीवन भर तो करना है विषपान

मुझे बाहुओं के रसमय वृत्तों से मत घेरो
कहीं सृजन को राहु न लग जाए

11.11.1962

मैं किसी के प्यार का भटका हुआ उद‍गार हूँ

मैं किसी के प्यार का भटका हुआ उद्‍गार हूँ
आँसुओं से धुल गया मुख का विगत शृंगार हूँ

वर्जनाओं के सहे कितने झकोरे
उम्र के वे पृष्ठ सारे रहे कोरे
जागरण में मैं जिन्हें छू तक न पाया
स्वप्न में वे ही उभरते हाथ गोरे

शून्य में बजते, अदेखे तार की झंकार हूँ

हर अस्वीकृत को किया स्वीकार मैंने
मानकर सबका बड़ा आभार मैंने
कल जिन्होंने प्यार की पाती पढ़ाई
बन्द उनके आज देखे द्वार मैंने

एक विरही प्राण का टूटा हुआ संसार हूँ

15.11.1962

मैं जीवन के इकतारे पर 

मैं जीवन के इकतारे पर
गाता हुआ कबीर
जगा रहा हूँ घट-घट में
सदियों की सोई पीर

आज नहीं मेरे स्वर थकते
किसी सहारे का मुँह तकते
कौन हाथ जो उनको ढकते

फैल रहे हैं दिग-दिगन्त में
आडम्बर को चीर

आज कण्ठ में जीवन आया
आघातों से ही बल पाया
कौन करेगा काली छाया

समा गया है गीतों में
आहत नयनों का नीर

21.08.1962

मैंने पाई पीर 

मैंने पाई पीर
जितना सुख था लूट ले गई
है मेले की भीर

सब अपनी गति भाग रहे हैं
स्वार्थ सम्हाले जाग रहे हैं
कनक गठरियाँ लाद रहे हैं
मैं रह गया फकीर

सफल हुआ सबका प्रयास है
पाया वैभव अनायास है
आनन-आनन विजय-हास है
मेरे नयनों नीर

04.07.1962

हँसो कि सारा जग भर जाए

हँसो कि सारा जग भर जाए
पथ को वृन्दावन कर जाए

यूँ तो उमर बोझ होती है
पीड़ा की गढ़री ढोती है
किन्तु कहीं इसके भीतर भी
सपनों की नगरी सोती है

भले कभी आँसू ढर जाए
पथ को वृन्दावन कर जाए

आँसू तो सुख में भी बहते
दुःख के संग सदा जो रहते
ये हैं गहराई के संगी
दुहरी कथा सदा से कहते

भारीपन अपने घर जाए
पथ को वृन्दावन कर जाए

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