केशवदास की रचनाएँ

‘केसव’ चौंकति सी चितवै

‘केसव’ चौंकति सी चितवै, छिति पाँ धरिकै तरकै तकि छाँहीं।
बूझिये और कहै मुख और, सु और की और भई छिन माहीं॥
दीठि लगी किधौं बाइ लगी, मन भूलि पर्यो कै कर्यो कछु काहीं।
घूँघट की, घट की, पट की, हरि आजु कछू सुधि राधिकै नाहीं॥

किधौं मुख कमल ये कमला की ज्योति होति 

किधौं मुख कमल ये कमला की ज्योति होति,
किधौं चारु मुख चंद चंदिका चुराई है।
किधौं मृग लोचनि मरीचिका मरीचि किधौं,
रूप की रुचिर रुचि सुचि सों दुराई है॥
सौरभ की सोभा की दसन घन दामिनि की,
‘केसव’ चतुर चित ही की चतुराई है।<b
ऐरी गोरी भोरी तेरी थोरी-थोरी हाँसी मेरे,
मोहन की मोहिनी की गिरा की गुराई है॥

प्रथम सकल सुचि मज्जन अमल बास 

प्रथम सकल सुचि मज्जन अमल बास,
जावक सुदेस केस-पास को सम्हारिबौ।
अंगराज भूषन बिबिध मुखबास-राग,
कज्जल कलित लोल लोचन निहारिबौ॥
बोलनि हँसनि मृदु चाकरी, चितौनि चार,
पल प्रति पर प्रतिबत परिपालिबौ।
‘केसोदास’ सबिलास करहु कुँवरि राधे,
इहि बिधि सोरहै सिंगारनि सिंगारिबौ॥

‘केशव’ सूधो विलोचन सूधी 

‘केशव सूधो विलोचन सूधी, विलोकनि कों अवलोकै सदाई।
सूधिये बात सुनै समुझे, कहि आवत सूधियै बात सुहाई॥
सूधी सी हाँसी सुधाकर, मुख सोधि लई वसुधा की सुधाई।
सूधे सुभाइ सबै सजनी, बस कैसे किए अति टेढे कन्हाई॥

स्वयम्वर-कथा (रामचन्द्रिका से)

   [दोहा]
खंड्परस को सोभिजे, सभामध्य कोदंड।
मानहुं शेष अशेष धर, धरनहार बरिबंड।।१।।

[सवैया]
सोभित मंचन की आवली, गजदंतमयी छवि उज्जवल छाई।
ईश मनो वसुधा में सुधारि, सुधाधरमंडल मंडि जोन्हई।।
तामहँ केशवदास विराजत, राजकुमार सबै सुखदाई।
देवन स्यों जनु देवसभा, सुभ सीयस्वयम्वर देखन आई।।२।।

[घनाक्षरी]
पावक पवन मणिपन्नग पतंग पितृ,
जेते ज्योतिविंत जग ज्योतिषिन गाए है।
असुर प्रसिद्ध सिद्ध तीरथ सहित सिंधु,
केशव चराचर जे वेदन बताए हैं।
अजर अमर अज अंगी औ अनंगी सब,
बरणि सुनावै ऐसे कौन गुण पाए हैं।
सीता के स्वयम्वर को रूप अवलोकिबे कों,
भूपन को रूप धरि विश्वरूप आयें हैं।।३।।

[सवैया]
सातहु दीपन के अवनिपति हारि रहे जिय में जब जानें।
बीस बिसे व्रत भंग भयो, सो कहो, अब, केशव, को धनु ताने?
शोक की आग लगी परिपूरण आई गए घनश्याम बिहाने|
जानकी के जनकादिक के सब फूली उठे तरुपुन्य पुराने||४||

विश्वामित्र और जनक की भेंट
[दोधक छंद]
आई गए ऋषि राजहिं लीने| मुख्य सतानंद बिप्र प्रवीने||
देखि दुवौ भए पायनी लीने| आशिष शिर्श्वासु लै दीने||५||

जौं हौं कहौं रहिए तौ

जौं हौं कहौं रहिए तौ प्रभुता प्रगट होति,
चलन कहौं तौ हित हानि नाहिं सहनो.
भावै सो करहुँ तौ उदास भाव प्राननाथ!
साथ लै चलहु कैसे लोकलाज बहनो.
केशवदास की सौं तुम सुनहु,छबीले लाल,
चलेही बनत जौ पै,नाहीं आज रहनो.
जैसियै सिखाऔ सीख तुमहीं सुजान प्रिय,
तुमहिं चलत मोंहि जैसो कुछ कहनो.

चंचल न हूजै नाथ

चंचल न हूजै नाथ, अंचल न खैंची हाथ ,
सोवै नेक सारिकाऊ, सुकतौ सोवायो जू .
मंद करौ दीप दुति चन्द्रमुख देखियत ,
दारिकै दुराय आऊँ द्वार तौ दिखायो जू .
मृगज मराल बाल बाहिरै बिडारि देउं,
भायो तुम्हैं केशव सो मोहूँमन भायो जू .
छल के निवास ऐसे वचन विलास सुनि,
सौंगुनो सुरत हू तें स्याम सुख पुओ जू .

कैटभ सो

कैटभ सो,नरकासुर सो,पल में मधु सो,मुर सो जिन मारयो.
लोक चतुर्दश रक्षक केशव, पूर्ण वेद पुरान विचारयो .
श्री कमला कुच कुंकुम मंडन पंडित देव अदेव निहारयो .
सो कर माँगन को बली पै करताराहु ने करतार पसारयो .

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