केशव तिवारी की रचनाएँ

औरंगज़ेब का मन्दिर 

यहाँ नहीं उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़
या जुजबी ही, भटक आते हैं इधर
जबकि एक रास्ता इधर से भी जाता है

जर्जर देह एक बूढा पुजारी कपड़े में
लपेटे आलमगीर का फ़रमान
सन्दूकची में समेटे है
बड़े जतन से
इस बात का सबूत जिसे तारीख़
ज़ालिम कह नज़ीर देती है
उसका दिया भी कभी-न-कभी
धड़कता था दूसरों के लिए भी

महन्तों मठाधीशों के बीच
परित्यक्त यह बूढ़ा
यहाँ आपको बिना जात-पात पूछे
मिल सकता है भोजन
आप छहाँ सकते हैं
इस पुरनिया पेड़ की छाँह में |

सैकड़ों साल पुराने मन्दिर की रेह खाई दीवारों पर
टिका सकते हैं पीठ
गीता वेद रामायन श्रुतियों के साथ
एक साधु
लिए बैठा है एक बुतशिकन
बादशाह का फ़रमान

इतिहास की मोटी-मोटी किताबों में
तरह-तरह की कूट मंत्रणाओं के बीच
यह पन्द्रह लाईन का एक
अदना-सा-फ़रमान
तमाम धार्मिक उद्घोषों
जयकारों के बीच धर्म और इतिहास के मुहाने से
आती एक चीख़
तमाम ध्वंस अवशेषों से क्षमा मांँगती…

कोई सुने तो रुककर ।

सन्दर्भ – चित्रकूट में औरंगज़ेब द्वारा निर्मित बालाजी मन्दिर।

मोमिना

खटिया बिनती है मोमिना
गाँव- गाँव जाकर
साईकिल मिस्त्री पति नहीं रहा
सयाने होने को दो बच्चे
खटिया बीनना सीख लिया
घुरुहू गडरिया से

यूँ तो दूसरे निकाह की भी
सलाह दी मायके वालों ने
पर लड़के बेटी का मुँह देख
उधर सोचा भी नहीं

रकम-रकम के फूल काढती है
वे अपनी बिनाई में
आप ने धूप में स्वेटर बुनती
महिलाएँ देखी होंगी
नीम के नीचे खटिया बिनते
मोमिना को देखिए

सधे हाथों में बिनाई का बाध
मछली-सी चलती चपल उँगलियाँ
हाथ और चेहरे की तनी नसें
एक थकी-थकी फीकी-सी मुस्कान

खटिया बिनती मोमिना
मेरे गाँव की
सबसे जागती कविता है

ये जानती भी नहीं कब में
आगे बढ़कर निकल आई
परदे के बाहर
मौलवियों की तिरछी नज़र से
बा ख़बर

गाँव-गाँव घूमती
ज़िन्दगी के चिकारे का
तना तार है मोमिना ।

एक औरत 

मेरे भीतर भटक रही है,
एक वतन बदर औरत
अपने गुनाह का सबूत
अपनी लिखी किताब लिए ।

दुनिया के सबसे बडे़ लोकतन्त्र
का नागरिक मैं
उसे देख रहा हूँ सर झुकाए ।

जहाँ मनुष्यता के हत्यारे
खुले आम घूम रहे हों
वहीं सर छुपाने की जगह
माँग रही है वह ।

वह कह रही है
यह वक़्त
सिर्फ़ क़लम की पैरोकारी
का नही है
अपने-अपने रिसालों से
बाहर निकलने का है

उनसे आँख मिलाने का है
जिनके ख़िलाफ़
लिख रहे हो तुम

अपनी छाप लिए

यूँ तो तुम रत्ती भर
नहीं बदले
पर मैं तुम्हे
बदली हुई नज़र से देखता हूँ

तुम्हारे न होने का
ऐलान सुनता हूँ
और तुम्हें देख
आश्वस्त होता हूँ
तुम नही बच पाओगे
सुन कर के ही दहल जाता हूँ
और तुम्हारी विश्वास
से भरी आँखे
मेरा ढाढ़स हैं ।

बदलना ही पड़ा तो
हम मौसमों की तरह
तो बिल्कुल ही
नही बदलेंगे ।
न ही किसी इश्तहार की तरह
ज़िन्दा चेहरों की तरह
अपनी-अपनी छाप लिए
बदलेंगे हम ।

जोखू का पुरवा

कितने दिनों बाद
जोखू का पुरवा आया हूँ
ये मेरी माँ का गाँव है
यहीं पर गड़ा है मेरा नारा

आज यहीं पर खड़े होकर
उन लड़कों के बारे में सोच रहा हूँ
जिनके साथ खेलता था
सुर्ररा और कबड्डी

उन लड़कियों के बारे में
जिनके लिए अमियाँ
तोड़ने चढ़ जाता था
पेड़ों की टुन्नी तक
सोच रहा हूँ

कुछ गाँव में ही रह गए
मित्रों से मिला
लड़कियों की चली चर्चा
तो पता चला
कालिन्दी ने ससुराल में
लगा ली फाँसी
विमला ने भंगेड़ी आदमी से
परेशान हो खा लिया ज़हर
सुशीला को बुला लाए
उसके माँ-बाप घर

ये सब मेरे सपनों में तैरती
तितलियाँ थी जिन्हें इन
हाल में मरना जीना था
मै मूँछो से ढके खोहों से मुँहो से भी
सुन रहा था क़िस्मत
और पुरविल की बातें

देख रहा था एक माँ की
डबडबार्इ आँख
याद आ रहा था नानी
का गाया हुआ गीत —
बाबुल हम तोरे रन बन की चिरर्इ
एक दिन उड़ जैहें
अरे वो बेवक़्त उड़ा दी गई चिरइयों
मेरी स्मृतियों का संसार सूना हो गया है ।

मेरे सपनों का गाँव
जोखू का पुरवा
अचानक बेरंग हो गया है ।

धुन्ध 

हर चीज़ पर चढ़ी है एक धुन्ध
तुम्हारे सच पर मेरे झूठ में भी

वह सच जिसे तुम कविता में
कह कर मुक्त हुए
वह झूठ जिसकी ओट में
छिपाए फिरता हूँ अपना चेहरा
एक ही है ।

दोनों ही एक अलग-अलग ढाल हैं
हमारे लिए ।

उदासी

किस किस को बताता
अपनी उदासी का सबब

किस किस से पूछता एक ऐसी उदासी
जिसमें बैचेनी न हो
हर तरफ फैली

एक मित्र ने कहा — कामरेड
बिना वजह की उदासी भी
एक रूमान है
मैं उसे देखता रहा
वजहों पर बहस क्या करता
बेवजह कुछ करने में भी सुकून है उसे क्या बताता

ऊँट-सी तनी गर्दन लिए
कोर्इ कब तक रह सकता है
वैसे बगुलों-सी झुकी गर्दनें
देख कर भी डर जाता हूँ मै ।

विचार की बहंगी 

जीवन में कितना कुछ छूट गया
और हम विचार की बहंगी उठाए
आश्वस्त फिरते रहे

नदी पर कविता लिखी
और ज़िन्दगी के कितने
जल से लबालब चौहड़े सूख गए

समय नजूमी की पीठ पर
पैर रख निकल जाता है
और अतीत खोह में पड़ा
कराहता है

जिसने प्रेम किया
एक अथाह सागर थहाता रहा
जिसने प्रेम परिभाषित किया
क़िताबो मे दब कर मर गया

हमारे सपने कैसे विस्थापित हो गए

हमें अपनी आखों पर कितना भरोसा था
जब रूक कर सोचने का वक़्त था
ख़ुद को समेटने का
हम विचारों की घुड़सवारी कर रहे थे

वह धीरे-धीरे रास्ता बनाता
आगे बढ़ता कौन था
उसे कहाँ छोड़ आए हम…

ऐसा ही होता है 

पहले वे सिंह-सा दहाड़ते थे
बिगड़ैल साण्ड-सा फुफकारते थे
उन्हें भ्रम था उन्हीं के दम पर है
देश और उसका स्वाभिमान ।

अब वे सियार सा हुहुवा रहे हैं
बगलें झाँक रहे हैं ।

ऐसा ही होता है जब
कीचड़ भरे खेत में
फँसता है गरियार बैल, तब
जुआ छोड़ बैठ जाता है वहीं
फिर कुसिया से खोदने पर भी
उठता नहीं ।

मैं कोई छूट नहीं पा सकता

वे जिस दिन जागेंगे
मुझसे भी मांगेंगे हिसाब
मेरे कहे हर शब्द को
रखेंगे कटघरे में
इन पर कविता लिखकर
मैं कोई छूट नहीं पा सकता

मित्रों ! यदि कलम को सलीब से
अपनी गर्दन को बचाने का
औजार बना रहे हो
तो तुम तलवार को
ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहते हो
और याद रखना ढाल कभी भी
तलवार नहीं बन सकती |

भरथरी गायक

जाने कहाँ-कहाँ से भटकते-भटकते
आ जाते हैं ये भरथरी गायक

काँधे पर अघारी
हाथ में चिकारा थामे
हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये
देर तक टिकते नहीं

पर जितनी देर भी रुकते हैं
झांक जाते हैं
आत्मा की गहराईयों तक

घुमंतू-फिरंतू ये
जब टेरते हैं चिकारे पर
रानी पिंगला का दुःख
सब काम छोड़
दीवारों की ओट से
चिपक जाती हैं स्त्रियां

यह वही समय होता है
जब आप सुन सकते हैं
समूची सृष्टि का विलाप

वे

वे जो लंबी यात्राओं से
थककर चूर हैं उनसे कहो
कि सो जाएँ और सपने देखें
वे जो अभी-अभी
निकलने का मंसूबा ही
बांध रहे हैं
उनसे कहो कि
तुरंत निकल पड़ें
वे जो बंजर भूमि को
उपजाऊ बना रहे हैं
उनसे कहो कि
अपनी खुरदरी हथेलियाँ
छिपाएँ नहीं
इनसे खूबसूरत इस दुनिया में
कुछ नहीं है

जोगी 

इक तारा का तार तो
सुरो से बंधा है
तुम्हारा मन कहां बंधा है जोगी
इस अनाशक्ति के पीछे
झांक रही है एक गहरी आशक्ति
यह विराग जिसमें रह – रह
गा उठता है
तुम्हारा जीवन राग
तुम्हारे पैर तो भटकन से बंधे है
ये निर्लिप्त आंखे कहां
देखती रहती है जोगी
प्रेम यही करता है जोगी
डुबाता है उबारता है
भरमता है भरमाता है
तुम्हारा निर्गुन तो
कुछ और कह रहा है
पर तुम्हारी सांसे
तो कुछ और पढ़ रही हैं जोगी।

दिल्ली में एक दिल्ली यह भी

कंपनी के काम से छूटते ही
पहाडगंज के एक होटल से
दिल्ली के मित्रों
को मिलाया फोन
यह जानते ही कि दिल्ली से बोल रहा हूं
बदल गयी कुछ आवाजें
कुछ ने कहला दिया
दिल्ली से बाहर है
कुछ ने गिनाई दूरी
कुछ ने कल शाम को
बुलाया चाय पर
यह जानते हुये भी कि शाम की
ट्रेन से जाना है वापस
एक फोन डरते डरते मिला ही दिया
विष्णु चन्द्र शर्मा को भी
तुरंत पूछा कहां से रहे हो बोल
दिल्ली सुनते ही तो
वो फट पडे
बोले होटल में नही,
हमारे घर पर होना चाहिये तुम्हे
पूछते पूछते पहुच ही गया
शादत पुर
छः रोटी और सब्जी रखे
ग्यारह बजे रात एक बूढा़
बिल्कुल देवदूतों से ही चेहरे वाला
मिला मेरे इंतजार में
चार रोटी मेरे लिये
दो अपने लिये
अभी अभी पत्नी के बिछड़ने के
दुख से जो उबर
भी न पाया था
मै ताकता ही रह गया उसका मुँह
और वह भी मुझे पढ़ रहा था।
मित्रों मै दिल्ली में
एक बूढे कवि से मिल रहा था
वह राजधानी में एक और
ही दिल्ली को जी रहा था।

गवनहार आजी

पूरे बारह गाँव में
आजी जैसी गवनहार नही थी
माँ का भी नाम
एक दो गाँव तक था
बडी बूढ़ियाँ कहती थी कि
मछली को ही अपना गला
सौप कर गई थी आजी
पर एक फ़र्क था
माँ और आजी के बीच
आजी के जो गीतो में था
वह उनके जीवन में भी था
माँ के जो गीतो मे था
वह उनके जीवन से
धीरे-धीरे छिटक रहा था
उस सब के लिए
जीवन भर मोह बना रहा उनमें
जांत नही रह गए थे पर
जतसर में तुरन्त पिसे
गेंहू की महक बाक़ी थी
एक भी रंगरेज नही बचे थे
पर केसर रंग धोती
रंगाऊ मोरे राजा का आग्रह बना रहा
कुएँ कू्ड़ेदानो मे तब्दील हो गए थे
पर सोने की गघरी और रेशम की डोरी
के बिना एक भी सोहर
पूरा नही हुआ
बीता-बीता ज़मीन बँट चुकी थी
भाइयों-भाइयेां के रिश्तो मे
खटास आ गई थी
फिर भी जेठ से अपनी
झुलनी के लिए
ज़मीन बेच देने की टेक नही गई
माँ के गीतो को सुन कर लगता था
जैसे कोई तेज़ी से सरकती गीली रस्सी को
भीगे हाथो से पकड़ने की कोशिश कर रहा है।

छुन्नू खां

छुन्नू खां जी ये आप
फेर रहे हैं सारंगी पर गज
और महसूस हो रहा है
जैसे कोई माँ अपने बच्चे का
सिर सहलाते हुए लोरियाँ सुना रही है

द्रुत में तो लगता है जैसे इस
रस अँधेरी रात में भी बस तुलू-तुलू
होने को है सूरज और
विलम्ब में मन उदास घाटियों की
अतल गहराईयों में खो जाता है |

क्या शान है आपके गट्टे के तान की
कितने ही नृत्य प्रवीणों का
कितनी ही बार लिया होगा
इसने इम्तिहान

तरब के सुर तो बेचैन रहते हैं
आप की उँगलियों के
जब आप आँख बंद कर उतरते हैं

सुरों की झील में तो
चेहरे पर तिरने लगते हैं
रतजगों के अक्स

यह फटा कुर्ता थकी काया
बीड़ी-बीड़ी को मोहताज
छुन्नू खां जी क्या आपके बाद भी
ऐसे ही बजती रहेगी
आपकी सारंगी |

आसान नहीं है विदा कहना

आसान
नहीं है
विदा कहना

गज़ भर का
कलेजा चाहिए
इसके लिए
कि इस नदी से
विदा कहूँ

भद्दर गरमी
और
जाड़ों की रातों में भी
भाग-भाग कर जाता हूँ
जिसके पास

जो हमें नहीं दिख रहा है 

जो हमें नहीं दिख रहा है
वो भी कहीं हो रहा है

जो हम नहीं सुन पा रहे हैं
वो भी
हमारे ही समय की आवाज़ है

ये सब मिलकर
तय कर रहे हैं
हमारे समय का भविष्य

यह समय है पहचान खोने का 

मेरे गाँव के गडरियों के पास
अब भेड़ नहीं हैं
नानी कहती थीं कि
नई बहुरिया बिना गहने के और
‘चुँगल’ बिना चुगली के भी रह सकते हैं
पर गडरिये बिना भेड़ों के नहीं

ऐसा नहीं है दुनिया भर में अब
भेडें नहीं हैं। नहीं हैं तो
मेरे गाँव के गडरियों के पास भी
अब भेड़ नहीं हैं
नहीं है बूढ़ी हुनरमंद उँगलियों के लिए ऊन
जिनके ऊपर पूरे गाँव की जडावर का
ज़िम्मा था

ऐसा भी नहीं कि अब इस हुनर की
ज़रूरत नहीं है, नहीं है तो अब
इनके हुनर की ज़रूरत नहीं है

अपनी सदियों पुरानी पहचान आज
खो चुके ये लोग अब
किस नई पहचान के साथ जिएँगे

यह समय ही
पहचान खोने और एक
अजनबीपन में जीने का है

पर ऐसा भी तो हुआ है
जब अपनी पहचान को
उठी हैं कौमें तो
दुनिया को बदलना ही पड़ा है
अपना खेल।

ईसुरी

बसंत आ गया है महाकवि
एक बार फिर
तुम्हारी बुन्देली धरती के
सरसों के पीले फूल
और उसकी मादक गंध से
लहस-लहस जाने का
समय आ गया है

तुम्हारी ही बोली में आई नगन-नगन पियराई
यह सत्य है अब महीनों पहले से
नहीं सजती हैं फड़ें
और अब वे फागों के आचार्य भी कहाँ

पर ऐसा भी क्या कि
तुम्हारी चौकडयों और
फागों के बिना बीत जाये बसंत
आज भी जब युवा फगुहार गाता है
पटियाँ कौन सुघर ने पारी
तो नवयौवनाओं के चेहरे
कनेर के फूलों से सुर्ख हो उठते हैं

और रजऊ का दर्द तो
अब भी फाँस की तरह चुभता है
युवाओं के सीने में

बसंत आ गया है महाकवि
एक बार फिर तुम्हारी धरती का
तुम्हारे नाम से धन्य होने का
समय आ गया है

बसंत आ गया है महाकवि।

अच्छा हुआ 

अच्छा हुआ कभी भी
इतना ऊँचा न हुआ मेरा माथ
कि टकराता किसी पहाड़ से

इतना नीचा भी नहीं कि
झुक झुक जाता जगह-जगह पर

अच्छा हुआ कभी भी
इतना सुन्दर न हुआ मैं
कि ढलती काया देख देख
दुखी होता

यह ठीक ही रहा तुमने
मनुष्य मानकर किया स्नेह
और मैं देवताओं के गुनाहों से
बच गया।

हम खड़े थे

किससे बोलता झूठ
और किससे चुराता मुँह
किसकी करता मुँहदेखी
किसके आगे हाँकता शेखी
हर तरफ़ अपना ही तो चेहरा था
नावे तों बहुत थी
नदारद थी तो बस नदी
चेहरों पर थी दुखों की झाँई
जिसे समय ने रगड-रगड़ कर
और चमका दिया था
सारी कला एक अदद
शोकगीत लिखनें में बिला रही थी
जिसने भी रखा पीठ पर हाथ
बस टटोलने लगा रीढ़
हम खड़े थे समय के सामने
जैसे लगभग ढह चुकी
दीवारों वाले घर की चौखट पर
खड़ा हो कोई एक
मज़बूत दरवाज़ा

बदलते समय का संधि पर

कीचड़ में धँसी बैलगाड़ी
अकेले ही झेल देते हो तुम
दिन भर खेतों में, फरहा करते हो
और रात भर मड़ाई
तुम्हारा शरीर जैसे किसी
मूर्तिकार ने इस्पात में ढाल दिया हो
पर बातों की वो बेबाकी कहाँ
चली गई

ये नाप-जोख कर बोलना
कहाँ से सीख लिया तुमने
हर बात पर गोल-मोल जवाब
किसी बात पर राय न देना
ये तुम्हारी अदा तो नहीं थी

कौन सा भय है जिसने ऐसा
बना दिया है तुम्हें
अचानक क्यों खो जाती है रह-रह के
तुम्हारी आवाज़ की खनखनाहट
इस बदलते समय की सन्धि पर
मुझे तुम्ही दिखे थे
सबसे ज़्यादा मज़बूत

मुझे गंदी ग़ाली-सा लगता है
तुम्हारे बारे में बोला कोई भी झूठ
रात में किसी भी गुहार पर
अब तुमने निकलना बंद कर दिया है
दोस्त संकट तो आते ही रहेंगे
कभी तुम किसी को गोहराओगे
कभी कोई तुम्हें गोहराएगा
तुम्हारे दोनों के बाहर न आने पर
एक तीसरा भी है जो बेशरमी से
दूर बैठा मुस्कुराएगा ।

इस अखंड मौन में 

इस अखंड मौन में
सुगबुगा रहा है कुछ अब

कुछ बोझ पहाड़ पर भी
भारी पड़ रहा है ।

कौसानी के असीम सौन्दर्य में

कौसानी के असीम सौन्दर्य में
डूबा मैं
पहाड़ की चोटियों पर
बादलों ढका चाँद देख रहा हूँ

कपिलेश भोज तुम्हारी बेचैन आँखों में
देखा पहाड़ कहीं बीच-बीच में
आ रहा है बार-बार

बसंत में शलभ-सी 

बसंत में शलभ-सी
उड़ने को तैयार वह सोमेश्वर घाटी
पावस में
सीढ़ीदार खेतों के बीच धानी साड़ी पहन
पैर लटकाए बैठी
कोसी से कुछ बतिया रही है ।

त्रिशूल की चोटी के बगल 

त्रिशूल की चोटी के बगल
श्याम पट के आकार पर
सुबह लिख रही है कुछ

कभी गंगोत्री हाट के
चोड़ियार गाँव से भी
खड़े होकर पढ़ो हिमालय

भीग रहे हैं बाँज, देवदार, चीड़

भीग रहे हैं बाँज, देवदार, चीड़
बादलों की ओट में
दूर हिमालय निर्वसन
झीने परदे के पार नहा रहा है
अनासक्ति आश्रम में ।

इस दृश्य से आसक्त दो मित्र
भीग रहे हैं
कौसानी की एक गहराती शाम में

मैं बेचैन हूँ यह देख कर 

मैं बेचैन हूँ यह देख कर
कैसे मेरे भीतर बहती केन
हहराकर उमड़ पड़ी
कोसी को देखते ही ।

मैं इस संगम में डूबता रहा
गले-गले तक ।

नमक

अब प्रेमियों के चेहरे पर
वह नमक कहाँ
प्रेयसियों के चेहरे पर भी
पहले-सी लुनाई नहीं

था कोई वक़्त जब नमक का हक़
सर देकर चुकाया जाता था
सुना है यूनान में तो
नमक के लिए
अलग से मिलता था वेतन

एक बूढ़ा हमारे यहाँ भी था
जो नमक की लड़ाई लड़ने
पैदल ही निकल पड़ा था

हमें कहाँ दिखता है
फटी हथेलियों
और सख़्त चेहरों से
झरता हुआ नमक ।

एक सफ़र का शुरू रहना 

तुम्हारे पास बैठना और बतियाना
और बचपन में रुक-रुक कर
एक कमल का फूल पाने के लिए
थहाना गहरे तालाब को
डूबने के भय और पाने की ख़ुशी
के साथ-साथ डटे रहना

तुमसे मिल कर बीते दिनों की याद
जैसे अमरूद के पेड़ से उतरते वक़्त
खुना गई बाँह को
रह-रह कर फूँकना
दर्द और आराम को
साथ-साथ महसूस करना

तुमसे कभी-न-कभी
मिलने का विश्वास
चैत के घोर निर्जन में
पलाश का खिले रहना
किसी अजनबी को
बढ़कर आवाज़ देना
और पहचानते ही
आवाज़ का गले में ठिठक जाना

तुम्हारे चेहरे पर उतरती झुर्रीं
मेरे घुटनों में शुरू हो रहा दर्द
एक पड़ाव पर ठहरना
एक सफर का शुरू रहना।

तुम्हारा शहर

बेतवा के पुल पर खड़ा मैं
तुम्हारे शहर को देखता हूँ
दो नदियों के बीच बसा ये
चाँदनी रात में
किसी तैरते हुए
जलमहल-सा दिखता है
और घर की छत पर खड़ी तुम
एक जलपरी-सी

इसी शहर की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रते
तुम हुई होगी युवा
किसी को पहली बार देख कर
चमकी होगी नज़र

इसी शहर में है कल्पवृक्ष
जिसके नीचे खड़ी हो कर
देखा होगा उद्दाम यमुना को
महसूस की होगी तटबन्धों की सिहरन

बाहर से कितना शान्त
भीतर से कितना बेचैन
तुम्हारी ही तरह
ये तुम्हारा शहर ।

तुम्हारी स्मृति 

तुम्हारी स्मृति जैसे
तेज़ हवा में घबराई तितली
जब भी आती है
मन के किसी कोने में
चिपक के रह जाती है
मैं इन दिनों
आने वाले दिनों को ले कर
परेशान रहता हूँ

प्रेम जब वस्तु होकर रह जाएगा
लैला और मँजनू एक ब्राण्ड नेम
तब बाज़ार में इंच और मीटर के
नाप से बिकेगा प्रेम
जितनी गहरी जेब
उतना लम्बा प्रेम

एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में
चाय बेचता मैं
हो सकता है मुझे भी
प्रेम बेचने का काम मिल जाय

तब मैं लिखूँगा इन्कारनामा
और
तुम्हारे ऊपर एक कविता
कोई कहे या न कहे पर
तुम तो यह कहोगी ही
एक कवि ने रोटी की शर्त पर
प्रेम बेचने से मना कर दिया ।

साथ-साथ

लगभग एक ही समय
इस धरती पर आए हम
एक ही समय सम्हाला होश

जब पहली बार मिले तो
लगा जैसे मुझे तुम्हारी
और तुम्हें मेरी ही तलाश थी

हम उड़ते रहे उनमुक्त
एक छान के नीचे
जो हमारे लिए
विस्तृत आकाश से कम नहीं था

उन दिनों हम हवाओं पर सवार थे
कल्पना की अर्गला हमारे साथ थी
कहीं पहुँचना कुछ भी पाना
नामुमकिन नहीं था

पर हम भूल गए थे
धीरे-धीरे छीज रही है
हमारी छान
सिमट रहा है हमारा आकाश
अचानक एक तेज़ आँधी
छूट गई अर्गला हमारे हाथ से
और
हम यथार्थ की कठोर भूमि पर
पड़े थे
फिर भी
गहे रहे एक दूसरे की बाँह
ऐसा कौन-सा दुःख था
जिसको मिल कर
साथ-साथ
नहीं सहा हमने
ऐसा कौन-सा सुख्, था
जिसमें एक ही लय पर
नहीं बज उठी हमारे
प्राणों की घण्टियाँ

अब तो
सयाने होने लगे हैं
अपने बच्चे और
तुमने भी देखने शुरू
कर दिए सपने
उनकी आँखों में ।

डिठवन एकादशी 

डिठवन एकादशी
दूसरा दिन है आज

इस साल भी हर साल की तरह
मुँह अन्धेरे महिलाएँ
गन्ने के टुकड़े के सूप पीट-पीट कर
दरिद्दर गाँव से बाहर खदेड़ रही हैं
इस्सर आवें दरिद्दर जाएँ कहते हुए

यह एक रस्म बन गई है धीरे-धीरे
ये जान चुकी हैं
कि इस तरह नहीं भगेगा दलिद्दर
लेकिन उसको भगाने की इच्छा
अभी बची है इनमें

खेतों पर हाड़-तोड़ मेहनत कर के
लकड़ी बेच कर तेंदू पत्ता तोड़ कर
ये खदेड़ना चाह रही हैं दलिद्दर

ये नहीं जान पा रही हैं
आखिर दलिद्दर टरता क्यों नहीं
ये नहीं समझ पा रही हैं
कि कुछ लोग इसी के बल जिन्दा हैं
उनका वजूद/ इनकी भूख पर ही टिका है
जिसे गन्ने से सूप बजा कर
खदेड़ा नहीं जा सकता

जिस दिन इस रस्म में
छिपे राज को ये समझ जाएँगी
उस दिन से इनके जीने की
सूरत बदल जाएगी ।

लड़कियाँ, लड़कियाँ होने से घबराती नहीं 

गर्भ में भ्रूण-हत्या का डर
जनमते ही मारे जाने का डर
सयानी होते ही
कोठे पर बेचे जाने,
और ब्याहते ही
आग में झोंके जाने की आशंका
वृद्धा होते ही
असुरक्षा के दंश
आह !
कितने संकटों को पार करके भी
लड़कियाँ, लड़कियाँ होने से
घबराती नहीं।

घृणा भी करनी पड़ी

कवि ने नदी से
प्रेम किया और
बहने लगा
उबड़-खाबड़ मैदानों
घाटियों के बीच

कवि ने पेड़ों से
प्रेम किया और
बदल गया
हरे-भरे जंगलों में

पहाड़ों से किया प्रेम और
सिहरता रहा छू-छू कर
उनकी चोटियाँ

कवि एक स्त्री से
प्रेम कर बैठा
और उसे अपने
इस धरती पर
होने का मतलब
समझ में आया
वह इस धरती पर
आया ही था सिर्फ़
प्रेम करने के लिए

पर उसे घृणा भी
करनी पड़ी उनसे
जो प्रेम के ख़िलाफ़
कर रहे थे षड्यन्त्र ।

इससे ही पहचाना जाता है एक कवि 

कितने बरस से रहा रहा हूँ
इस शहर में मैं
फिर भी
अक्सर भटक ही जाता हूँ
इसकी टेढ़ी-मेढ़ी गलियों में
ठीक वैसे ही जैसे एक कवि
कभी-कभी भटक जाता है
अपने बिम्बों और कथ्य के बीच

इस शहर में घूमना
कविता लिखने जैसा ही
अनुभव है मेरे लिए
जहाँ नदी और पहाड़ ही नहीं
छोटे-छोटे चाय-पान के खोखे
सड़कों पर चल रहे रिक्शे तांगे
इधर-उधर गप्प हांकते लोग
एक कविता ही रच रहे होते हैं
इसके और कविता के
अन्तर्सम्बन्धों को पहचानने में लगा
एक कवि
इससे ही पहचाना जाता है |

इन्हीं से की जाती हैं ईमान की बातें 

इतने रंगों में एक रंग है
गहरे अवसाद का
बबुल के काले खुरदरे तने-सा
छिमिया रही है अगहनी
हरी अरहर पीले फूलों की
धज के साथ
पर एक ही रंग सबसे
गहरा और स्थाई है

न ही काल्ले में ताकत कम है
न ही मिट्टी में उपज

सुखों की पैमाईश में
इनका हिस्सा
औरों के नाम चढ़ा दिया है
बेईमान पटवारी ने

इन्होने पिलाया प्यासों को पानी
भूखों को दिया भोजन
जीवन-भर डटे रहे
दुखों के सामने

इन्हीं से की जाती हैं
ईमान की बातें
इन्हीं से धीरज की
इन्हीं को दिलाया जाता है
ईश्वर पर भरोसा |

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