के. पी. अनमोल की रचनाएँ

जिसने हर इक की ज़रूरत का भरम रक्खा है 

जिसने हर इक की ज़रूरत का भरम रक्खा है
रब ने भी उसकी सख़ावत का भरम रक्खा है

उसका एह्सान कभी भूल नहीं सकता मैं
जिसने हर पल मेरी इज़्ज़त का भरम रक्खा है

मुझसे नफ़रत भी दिखावे के लिए कर थोड़ी
इसी नफरत ने मुहब्बत का भरम रक्खा है

मेरी आदत है उसे देखे बिना चैन नहीं
उसने भी ख़ूब इस आदत का भरम रक्खा है

नाम लिख लिख के इमारात कि दीवारों पर
तुमने क्या ख़ूब विरासत का भरम रक्खा है

फूल के बीच में काँटों को बसा कर तुमने
किस नफ़ासत से नज़ाकत का भरम रक्खा है

वो दिलासे जो छलावों की तरह है अनमोल
उन दिलासों ने हुकूमत का भरम रक्खा है

ये पत्तियों पे जो शबनम का हार रक्खा है 

ये पत्तियों पे जो शबनम का हार रक्खा है
न जाने किसने गले से उतार रक्खा है

उस एक उजले सवेरे के वास्ते कब से
अँधेरी रात ने दामन पसार रक्खा है

ग़ज़ल ज़ुबां पे, हँसी लब पे, रंग आँखों में
तुम्हारे प्यार ने मुझको सँवार रक्खा है

मज़ा सफ़र में मिले और बची रहे सेहत
टिफ़िन में खाने के साथ उसने प्यार रक्खा है

कुछेक लोग मुझे जां से ज़्यादा प्यारे हैं
तुम्हारा नाम उन्हीं में शुमार रक्खा है

अगर रुका तो कहीं ये थकान उठने न दे
ये सोच, चलना अभी बरक़रार रक्खा है

ज़रा-सा देख के अनमोल तुम बताओ मुझे
ये मेरे नाम से क्या इश्तिहार रक्खा है

हर एक जानवर की रिहाई का फ़ैसला 

हर एक जानवर की रिहाई का फ़ैसला
हैरान हूँ मैं सुन के कसाई का फ़ैसला

आया है शह्र भर की भलाई का फ़ैसला
लेकिन वो अस्ल में है कमाई का फ़ैसला

बेटी की ख़ैर, एक दो माँगों के ही एवज़
टाला भी कैसे जाए जमाई का फ़ैसला

राखी करेगी माँग किसी दिन कलाई से
थोपा न जाय बहनों पे भाई का फ़ैसला

दहशत के मारे भाग गये दश्त की तरफ
लफ़्ज़ों ने सुन लिया था छपाई का फ़ैसला

लड़कर हमारे पुरखों को हासिल हुआ न कुछ
फिर कर रहे हैं हम क्यों लड़ाई का फ़ैसला

अनमोल एक रोज़ मिलेंगे ज़रूर दिल
है ठीक तेरा हाथ मिलाई का फ़ैसला

बेसबब बात को कुछ और बढ़ाया जाए

बेसबब बात को कुछ और बढ़ाया जाए
वक़्त कुछ देर यूँ ही साथ बिताया जाए

जो मेरे ख़्वाब की ताबीर निगल जाती है
उस हक़ीक़त को भी इक ख़्वाब दिखाया जाए

बाग़बां सोच में डूबा है बड़ी मुद्दत से
कैसे फूलों की नज़ाकत को बचाया जाए

पेशियाँ घर को निगलने को चली आई हैं
फ़ैसला आज तो मी लॉर्ड सुनाया जाए

क्या ग़ज़ब हो कि जिसे लोग समझते हैं दिल
मेरे सीने में वो पत्थर ही न पाया जाए

जिस तरफ ख़ून के धब्बे न चुभें आँखों में
मुझको तस्वीर का वो पहलू दिखाया जाए

ज़ीस्त गर मन के मुताबिक ही मिली है अनमोल
फिर ये क़िरदार सलीक़े से निभाया जाए

खड़े ऊँचाइयों पर पेड़ अक्सर सोचते होंगे 

खड़े ऊँचाइयों पर पेड़ अक्सर सोचते होंगे
ये पौधे किस तरह गमलों में रहकर जी रहे होंगे

अभी तक कान में दादी के मिश्री घोलते होंगे
जो इक-दो शब्द पहली बार पोते ने कहे होंगे

अचानक ठण्ड से ए.सी. की उचटी नींद तो सोचा
परिन्दे ऐसी गर्मी में झुलसते फिर रहे होंगे

उसे कुछ इस तरह शिद्दत से ख़ुद में ढूँढता हूँ मैं
मुसाफ़िर जिस तरह रस्ते में छाया ढूँढते होंगे

बुज़ुर्गों को सुनो, समझो, बहुत अच्छी तरह रक्खो
ये तुमसे कितनी उम्मीदें लगाकर जी रहे होंगे

उन्हें कह दो कि तुमको पार करके ही वो दम लेगा
जो दरिया, देखकर मुझको समन्दर हो गये होंगे

जिन्हें अनमोल ख़ुद को ही सुधरने की ज़रूरत है
अभी वो लोग औरों को नसीहत दे रहे होंगे

फूल का फूल-सा मासूम बदन जल जाए 

फूल का फूल-सा मासूम बदन जल जाए
ऐसी नज़रों से न देखो कि चमन जल जाए

नींद दे जाए मुझे ख़्वाब तुम्हारे जैसा
जिसके बोसे से ये आँखों की चुभन जल जाए

दर्द के मारे क़दम तिलमिला के चीख पड़े
ये बदन तोड़ती मनहूस थकन जल जाए

कैसी हैरत, वो अगर मुड़ के नहीं देखे तो
मेरी ख़ामोश सदाओं का हिरन जल जाए

बादलो! माँग भरो तुम ज़मीं की पानी से
आसमां वरना कहीं ओढ़ अगन, जल जाए

कौन ये कह गया है तुमसे कहो ऐ लोगो!
नफ़रतें इस तरह उगलो कि वतन जल जाए

क्या ज़रूरी है कि अनमोल यहाँ हर कोई
इश्क़ में आग के दरिया को पहन जल जाए

कुछ दुआओं का हक़ीक़त में बदल हो जाना 

कुछ दुआओं का हक़ीक़त में बदल हो जाना
यानी मुश्किल का घड़ी-भर में सहल हो जाना

रात-भर प्यार, हँसी, शिकवे, शिकायत मतलब
एक कमरे का हसीं ताजमहल हो जाना

शीरीं आवाज़, हँसी ख़ास, कहन जादू-भरी
लाज़मी है तेरे लहजे का ग़ज़ल हो जाना

फ़ैसला एक ग़लत और मिला बदले में
ग़म के फेरों का अचानक ही डबल हो जाना

रोज़ नाकामियों के चलते यक़ीनन तय है
मेरी कोशिश का किसी रोज़ सफल हो जाना

हो गया कैसे हर इक काम बहुत हैरां हूँ
मैंने बस मन में ये बोला था कि चल हो जाना

आज के दौर में ‘अनमोल’ बहुत मुमकिन है
एक लम्हे में कई फेरबदल हो जाना

बताए, रास्ता आगे भी यूँ ही जारी है 

बताए, रास्ता आगे भी यूँ ही जारी है
यही तो मील के पत्थर की ज़िम्मेदारी है

तुम्हारे साथ घड़ी भर को खेलकर बच्चो!
मेरे बदन ने दिनों की थकन उतारी है

मुझे ये डर है कहीं मेरी पलकें बोल न दें
तुम्हारे ख़्वाबों का बोझ अबके ज़्यादा भारी है

वो बात बात में याद आ रहा है आज मुझे
जिस एक शख़्स की हर बात मुझको प्यारी है

लगे हैं चाँद सितारे भी दाँव पर कब से
किसे ख़बर है कि ये रात इक जुआरी है

यक़ीन चाह के भी किस तरह करे कोई
वजूद आपका मुद्दत से इश्तेहारी है

वहाँ की फ़िक्र वहीं पर करे न क्यों ‘अनमोल’
यहाँ थी जितनी लिखी, चैन से गुज़ारी है

अकड़ ज़रा-सी भी दरिया अगर दिखाएगा 

अकड़ ज़रा-सी भी दरिया अगर दिखाएगा
मुझे यक़ीन है वो प्यासा लौट जाएगा

मुझे यक़ीन है वो प्यासा लौट जाएगा
वो अपनी प्यास को ऐसे नहीं बुझाएगा

वो अपनी प्यास को ऐसे नहीं बुझाएगा
तमाम पानी को प्यासा ही छोड़ जाएगा

तमाम पानी को प्यासा ही छोड़ जाएगा
तो दरिया कैसे भला ख़ुद को मुँह दिखाएगा

तो दरिया कैसे भला ख़ुद को मुँह दिखाएगा
अना को अपनी अगर चूर, चूर पाएगा

अना को अपनी अगर चूर, चूर पाया तो
सिमट के ख़ुद में ही ‘अनमोल’ डूब जाएगा

वक़्त के साथ चला जाय, यही बेह्तर है 

वक़्त के साथ चला जाय, यही बेह्तर है
वक़्त के साथ ढला जाय, यही बेह्तर है

उम्र के अपने तकाज़े हैं ज़रा ग़ौर करें
इसको बिलकुल न छला जाय, यही बेह्तर है

अश्क़ का झरना लगातार बहे और तेरी
याद की चिट्ठी जला जाय, यही बेह्तर है

पेड़ बनने का इरादा है मेरा अगली दफ़ा
जिस्म मिट्टी में गला जाय, यही बेह्तर है

बेसबब अपनी ही फ़ितरत को बदलने की बजाय
चंद आँखों में खला जाय, यही बेह्तर है

खोज बेह्तर की लिए जा रही है साथ उसे
इसमें सबका है भला, जाय, यही बेह्तर है

इश्क़ अनमोल तेरा है कोई मरहम कि इसे
रूह पर मेरी मला जाय, यही बेह्तर है

किसी की प्यास का तुमको जवाब होना था 

किसी की प्यास का तुमको जवाब होना था
सराब होने से बेह्तर, शराब होना था

वो मेरे रूबरू ताबीर बन के आया है
तमाम उम्र जिसे सिर्फ़ ख़्वाब होना था

न शर्म उनकी अजब थी, न थी हमारी झिझक
अजब तो धड़कनों का बे-हिसाब होना था

उसे सवाल उठाने थे मेरी कोशिश पर
मुझे जवाब में बस लाजवाब होना था

रखा था इसलिए काँटों के बीच तूने मुझे
ऐ मेरी ज़ीस्त! तुझे इक गुलाब होना था

फ़रेब, झूठ, दग़ा, मारकाट क्या क्या उफ़
ज़माने, तुझको यूँ ही क़ामयाब होना था

वो बोले, हम तुझे अनमोल चाहते हैं बहुत
अब इससे बढ़के भला क्या जवाब होना था

जैसे ही फूल शाख़ से गिरकर बिखर गया

जैसे ही फूल शाख़ से गिरकर बिखर गया
सारा चमन उदासियों में डूब मर गया

मुझको तो रोशनी की ज़रा भी तलब नहीं
दहलीज़ पर चिराग़ मेरी कौन धर गया

उलझा है तेरे प्यार के धागों में जबसे दिल
तबसे मेरी हयात का पैकर सँवर गया

अपशब्द चीखते है मोहल्ले में हर तरफ
जाने ये किसकी आँख का पानी उतर गया

“घर की हरेक बात हवाओं को सौंप दो”
उफ़्फ़! कौन आके कान दीवारों के भर गया

ख़ुद को ही देख आईने में सोचता हूँ मैं
मासूम-सा जो शख़्स था इसमें किधर गया

मैसेज उसका आ ही गया आख़िरश मुझे
अनमोल! कॉल आया नहीं, दिन गुज़र गया

महकी हुईं फ़िज़ाएँ दे, कुछ आसमान दे

महकी हुईं फ़िज़ाएँ दे, कुछ आसमान दे
गर हो सके तो हमको नया इक जहान दे

दे जिसमें कोई ख़ौफ़ न हो, रंजिशें न हों
मौला तू मेरे मुल्क को अम्नो-अमान दे

आँखों को हौसला दे कि वो देखें कोई ख़्वाब
ख़्वाबों के हौसलों को मुसलसल उड़ान दे

सच को सही कहें व ग़लत को कहें ग़लत
बेख़ौफ़ ख़यालात दे, सच्ची ज़ुबान दे

हाथों को काम, पेट को हों रोटियाँ नसीब
मेहनत की ख़ुशबुओं से मुअत्तर थकान दे

दिल वन्दे मातरम की सदाओं से हो भरा
जय हिन्द का ज़ुबान को अनमोल गान दे

जिसमें सुकून से रहे हर क़ौम, हर बशर
हमको हमारा फिर वही हिन्दोस्तान दे

चावल, चीनी और आटे पर रोना था

चावल, चीनी और आटे पर रोना था
यानी मन भर सन्नाटे पर रोना था

हँसने लगा मैं उस पल भी जिस पल मुझको
जीवन भर के हर घाटे पर रोना था

आँख खुली जब, चिड़िया ने चुग डाले खेत
अब क्या, अब तो खर्राटे पर रोना था

सबके सब थे मीठे-मीठे ज़ह्र बुझे
और मुझे सबके काटे पर रोना था

जिस पर तुमने जागीरें न्योछावर कीं
तलवो! तुमको उस चाटे पर रोना था

सदियाँ गुज़रीं लेकिन हासिल कुछ भी नहीं
हमको ऐसे फ़र्राटे पर रोना था

जो पन्ने अनमोल थे जीवन-पुस्तक के
इक-इक कर सबके फाटे पर रोना था

बस नज़रों से ही तो छिपकर रहता है 

बस नज़रों से ही तो छिपकर रहता है
वो जो हर इक दिल के भीतर रहता है

जिसके काँधों पर हो ज़िम्मा दुनिया का
कब दीवारो-दर के अंदर रहता है

मैं भी अक्सर याद उसे कर लेता हूँ
साथ मेरे वो भी तो अक्सर रहता है

उसको मज़हब की सरहद में मत बाँधों
वो तो हर इक हद से ऊपर रहता है

हम चाहें तो उसको बिसरा दें लेकिन
उसको सबका ध्यान बराबर रहता है

प्यार से है अनमोल उसे तो प्यार मगर
उसके नाम पे ख़ूनी मंज़र रहता है!

हमारे दर्द, ग़म, आहें, सुकूं और प्यार साझा हैं 

हमारे दर्द, ग़म, आहें, सुकूं और प्यार साझा हैं
मुहब्बत, भाईचारा, दोस्ती, तकरार साझा हैं

हमारे मुल्क की मिट्टी, हमारे गाँवों की गलियाँ
मकानों की छतें, दिल में बसे संसार साझा हैं

दिवाली, ईद, क्रिसमस, लोहिड़ी, होली या बैसाखी
हर इक उत्सव है अपना-सा, सभी त्यौहार साझा हैं

कई फिक्रें, शरारत, उलझनें, मस्ती, खुराफातें
परेशानी की कुछ लड़ियाँ, ख़ुशी के हार साझा हैं

सिखाने-सीखने, हँसने-हँसाने के कई मौक़े
रुलाने, डाँटने, लड़ने के सब अधिकार साझा हैं

बुरे पल में मदद करना, ज़रूरत पर खड़े रहना
वो अपनेपन के सब धागे, दिलों के तार साझा हैं

विवेकानन्द, टेरेसा, कलाम आज़ाद या नानक
हमारे ज़हन में मौजूद सब क़िरदार साझा हैं

तभी अनमोल जग में धूम हिंदुस्तानियों की है
यहाँ एह्सास मन के, इल्म के अंबार साझा हैं

गाँव के बरगद में जो इक घोंसला महफ़ूज़ है 

गाँव के बरगद में जो इक घोंसला महफ़ूज़ है
कह रहा है गाँव की आबो-हवा महफ़ूज़ है

राम, भोला और रहीमन मिल के खाते हैं जिन्हें
उन सिवइयों में अभी तक ज़ायक़ा महफ़ूज़ है

ख़त नदी में डाल कर मैं सब बहा आया मगर
दिल के तहख़ाने में उसकी हर अदा महफ़ूज़ है

रात मैं मंजिल की चौखट चूम कर भी आ गया
देख मेरे पाँव में यह आबला महफूज़ है

सोचिये हमने तरक्क़ी करके हासिल क्या किया
इल्म के इस दौर में भी क्या भला महफ़ूज़ है

बाग़, रस्ते, मॉल हो या कोतवाली शहर की
माँ, बहन, बेटी की अस्मत किस जगा महफूज़ है

तीरगी से अब यहाँ लगता नहीं है डर मुझे
प्यार का अनमोल दिल में इक दिया महफूज़ है

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