कैलाश मनहर की रचनाएँ

गुलाब

गुलाब को नहीं जानते आप
और वह भी आपको नहीं जानता
और सच्चाई तो यह है कि
मैं भी पूरी तरह नहीं जानता
गुलाब के बारे में क्योंकि
वह मौक़ा ही नहीं देता जानने का

गुलाब ढोलकिया है हमारे इलाके का नामी

वह रतजगे और जागरण में भी ढोलक बजाता है और
कव्वालों और हिजड़ों के साथ भी ढोलक बजाता है

हनुमान जी के मन्दिर में भी ढोलक बजाता है गुलाब
और पीर के चिल्ले पर भी बजाता है हर शुक्रवार

गुलाब ढाढ़ी है
गुलाब मिरासी है

पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता है गुलाब और
सुबह जागते ही
गायत्री मन्त्र बोलते हुये सूर्य को हाथ जोड़ता है

मुसलमानों से मिलते समय अस्सलाम वालेकुम बोलता है गुलाब
हिन्दुओं से मिलता है तो हाथ जोड़कर राम राम करता है

गुलाब रोज़े रखता है पूरे महिने भर तक और
पूरे महिने ही कार्तिक स्नान करता है हर वर्ष

गुलाब के बच्चे गायें चराते हैं दिनभर बस्ती वालों की
और “तेरी भूरी भी चराई, तेरी काली भी चराई” गाते हुए
हर महिने उगाही करने जाते हैं घर-घर जबकि
गुलाब की पत्नी ढप बजाते हुए बधावे गाने जाती है
सगाई ब्याह और जलवा माण्डले के मौकों पर यजमानों के

गुलाब ईद पर नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाता है
दीवाली पर नए कपड़े पहनकर दीपक जलाता है गुलाब

होली पर रंग खेलता है
मुहर्रम पर मर्सिया गाता है

गुलाब हर साल अलीबख़्शी ख़याल देखने जाता है बहरोड़
और भट्ट जी का तमाशा देखने आमेर भी जाता है अक्सर

गुलाब लुँगी बाँधता है चौख़ाने वाली रेशमी
गुलाब दो लाँग की सूती धोती पहनता है

गुलाब वसन्त पँचमी के दिन सरसों के फूल लेकर आता है
इदुल फितर पर गुलाब की पँखुड़ियाँ बाँटता है घर-घर में

आप गुलाब को नहीं जानते
और वह भी आपको नहीं जानता
और मैं जो उसके बारे में इतना जानता हूँ तो भी
मुझे पता नहीं पक्के तौर पर कि
वह गुलाब खाँ है या गुलाबचन्द
अथवा गुलाब मोहम्मद है या गुलाबराम

गुलाब मुझे साँझे हिन्दुस्तान की सच्ची विरासत लगता है

नमक की बात न करें

किसी अनावश्यक कानून के
अनावश्यक भय से भुरभुराते
शताब्दी के अनावशक महानायक ने
सिगरेट पीना छोड़ दिया, अनावश्यक

कानून और पूँजी के गठबन्धन में
आक्रोश,
(जो युवावस्था की पहचान था)
अर्थहीन शब्द हो गया, अनावश्यक ।

क्यारियाँ तो सूखी पड़ी हैं और
फ्रेश स्टोर में भीड़ है ग्राहकों की आजकल
सब्ज़ियों को अफ़ीम पिलाई जाती है
ज़बरदस्ती
लोगों को संस्कारित कर रही है, राजनीति,

उनींद में अलसाए नशेबाज़ हैं
अनावश्यक राष्ट्रवाद के सच्चे सिपाही
सब्ज़ियाँ नहीं,
कि तड़पती नहीं हैं वे काटे जाने पर
और तोड़ी जा सकती हैं – कच्ची भी ।

एक यूनिट ख़ून की बोतल में
कितना नमक होता है ? और
दो रोटियों के लिये चाहिए कितना नमक ?
और बिना नमक
क्यों नहीं बनती सब्ज़ियाँ स्वादिष्ट ?

स्वाद की पहचान के युग से
नमक के लिए ही क्यों जीते हैं करोड़ों लोग
हज़ारों मुश्किलों के बावजूद
नमक पर ही क्यों करते हैं इतना यक़ीन
आख़िर
कहाँ से आता है, आँसू और पसीने में
नमक का खारापन ?

ईश्वर की आँखों में नहीं आते आँसू
पसीना भी नहीं आता ईश्वर की देह पर और
ईश्वर कभी थकता भी नहीं एक ही मुद्रा में
बैठे, खड़े या सोए हुए
उसके कभी बिवाई भी नहीं फटती किन्तु
वह बिना नागा भोजन करता है और
सुन्दर वस्त्र पहनता है, मूल्यवान
मुकुट के साथ, चमचमाता ईश्वर
नमक नहीं खाता जन्म से ही
उसे काम भी क्या है आख़िकार
अपनी आरती सुनने और
नियम भंग होने पर, नाराज़ होने के सिवा ……

किस के हिस्से में कितना दुःख और सुख
वही तो मनुष्य का भाग्य
ईश्वर ने तय किया अच्छे अभिनेता की तरह
मेहनतकशों के लिये थक कर भी भूखे रहना
और हत्यारों के लिये चैन की नींद
अन्याय के तराजू से तौलता

क्या फिर भी अच्छा और समझदार है ईश्वर ?
और हम ?
जो पूजते हैं उसे
बिना सवाल किए उसके विरूद्ध
अपने दुःखों पर….

हमारी अधसुनी कहानियों के नायकों ने
विलाप किया,
तो हम रोने लगे उनके अरण्य-रोदन के साथ
वे चीख़ने लगे अपने कुण्ठित आक्रोश में
और हमने
आँखों में ख़ून उतारना सीख लिया रातों-रात
और जब पूरी होने को आई
हमारी विश्वसनीय कहानी सुबह-सुबह
उन्हीं नायकों ने
आँखों पर पट्टी बाँध कर पूरी निष्ठा के साथ
चमत्कृत कर दिया सुनाकर
अँधेरे के दृश्यों का, आँखों देखा हाल….
नील और नमक और शराब और सिगरेट
जब से कानून की निगाह में आए
जो ख़ुद भी सोया पड़ा था पूँजी की बगल में
अजीब इत्तफाक हुआ कि
प्रतिरोध भी बाज़ार में बिकने लगा
सज-धज कर
उदारवाद के साथ, हाथों-हाथ….

पूँजी की नदी में, धर्म की पतवार से
सियासत की नाव खेते हुए वे,
ईश्वर की महानता के बारे में लगाते रहे
गगनभेदी नारे और
सड़कों पर घोष वादन की लय-ताल के साथ
विधर्मियों का नाश करते समय
ईश्वर ने उन्हें अपने नख-दन्त पुरस्कार में दिए
कमालपूर्ण जुगलबन्दी की तरह यह
संविधानशास्त्र में
राष्ट्रवादी संगीत का अनावश्यक अध्याय था….

पीछे पड़े भेड़ियों के डर से
भागती हुई गर्भवती बकरी
गलती से राजपथ पर आ गई,
जो शासकों के लिए ही आरक्षित था संवैधानिक
और बकरी को
उस निरापद मार्ग पर असमय बियाने के अपराध में
आतंकवाद निरोधक कानून के तहत
दण्ड मिला….
भेड़ियों का न्याय था, और कानून भी
सिर्फ़ बकरियों के लिए ही तो था उन दिनों
शेर भी सर्कस में करतब दिखाते थे….
पूरब की बकरियों का गोश्त और
पश्चिम के धोरों से निचोड़ा हुआ पानी
उत्तर के लोहे की कड़ाही में भरे
मध्य के उबलते तेल में
दक्षिण के मसालों के साथ वाकई
दिल्ली में खाने का मज़ा ही आ जाता है
जो दिल्ली जाता है, भरपेट खाता है….

किन्तु नमक की बात न करें
उदारवाद की नीतियों में
नमक धीरे-धीरे लुप्त होने लगा है
कानून में सिगरेट की तरह
बाज़ार से खोने लगा है….

यह एक भयानक समय है 

यह एक भयानक समय है

बर्फ और अंगार
कँपकँपी और पसीना
सूखा और सैलाब
एक साथ फैला रहे हैं आतंक
देवदूत और हत्यारे
गले मिल रहे हैं, बाज़ और गिद्ध
कि चिड़ियाएँ
अपने संजीदा सवालों के साथ
अँधेरे के आगोश में सोई पड़ी हैं
उजाले से
पीठ मोड़ कर डरी-सहमी, लाचार….

यह एक भयानक समय है

कि रोती हुई माँ हो
या गिर-गिर कर उठता हुआ बच्चा
अपने आँसुओं और ख़ून से भी
नहीं पिघला पा रहे हैं क्रूर
और विलासी शासकों का पाषाण-हृदय
इस समय
किसी जलते हुए मरूस्थल की
झलझलाती हुई रेत में
दम तोड़ रहा है, हाँफता हुआ हरिण
और वह आदिवासी स्त्री कारावास से
अपने पति को, छुड़ाने के लिए
पूरी कर रही है, कानून के कर्णधारों की
अनैतिक लिप्साएँ —

यह एक भयानक समय है

कि रात के ग्यारह बज़कर पैंतीस मिनट पर
एक सिगरेट के लिए खंगाल रहा हूँ मैं
समूचा संग्रहालय और
बाहर गलियारे में
देसी के ठेके से लौटता हुआ रफ़ीक
पूरी दुनिया को
अपनी उत्तेजित गोद में बैठा रहा है…..

इस समय
चाहे चढ़ती हुई सुबह हो
या ढलती हुई रात
कहीं भी
निश्चिन्त नहीं है उजाले की उम्मीद
और जीवन की ज़रूरत ।

यह एक भयानक समय है

सड़कों पर दौड़ रही है मौत
ख़ूनी पंजों में
दबोच लेने को ज़िन्दगी की औक़ात
नुकीलों जूतों में सुरक्षित पाँव
ठोकरों में रौंद रहे हैं
अपने शौक के लिए
धरती की हरियाली…..

और वहाँ
उस पहाड़ के पीछे वाली बस्ती के
आख़िरी मकान की छत पर
कोई उदास और अकेली लड़की
कौए उड़ाते हुए कर रही है
परदेस गए
अपने प्रेमी की पाग़ल प्रतीक्षा….

यह एक भयानक समय है

कि सन्देहास्पद हो चुके हैं प्रायः सभी रास्ते
और रहबर
अपनी सलामती के लिए ढूँढ़ रहे हैं
खोया हुआ भाग्य और भविष्य

पाखण्ड ने ओढ़ लिया है
धर्म का आवरण
और आचरण को निगल रहा है
अकड़े हुए आडम्बर का अधाया अजगर
कि लोग
घरों को भूलकर मकानों में रहने लगे हैं
आजकल
मकानों से भी अधिक महत्त्व
मन्दिरों का जताने में व्यस्त हैं शीर्ष जन
जहाँ
प्रार्थनाओं की कमजोरी से स्खलित हो रहा है
सांस्कृतिक साहस और
हथौड़ों का काम सिर्फ़ सिर फोड़ना है
या दिल तोड़ना है, विधर्मियों का …….

यह एक भयानक समय है

कि न्याय की हत्या को बता रहे हैं वे
अपराध का दण्ड
और कानून की किताब में सूख रहे हैं
क्रान्ति की बलिवेदी पर बिखरे हुए लाल गुलाब ।

इसी समय
तुम मेरी स्मृतियों के द्वार पर दस्तक देते हो
और मैं
राजा के दरबार में जाने को उद्यत हूँ
पुरस्कार प्राप्ति के लिए
सुसज्जित….

साथी !
यह एक भयानक समय है
और इस समय में
भययुक्त कर सकती है सिर्फ़
एक प्राणवान कविता
अच्छी-सी….

ठहाकों में अनुपस्थित उदासी

तीन घण्टे भी अलग नहीं रह सकते थे जो,
तीन वर्षों से नहीं मिले, वे तीनों दोस्त ।।

हमउम्र
हमख़याल
हमराज़
पैसा कमाने को लग गए
शादी हो जाने के बाद
रोज़गार के नाम पर नौकरी में
समझने लगे अपनी ज़िम्मेदारियाँ
ज़िन्दगी की
बहती हुई नदी को बाँधने के लिए
छोटे से पोखर में
भर लिया भावनाओं का जल
जो बल था
सात समन्दर पार से आती
पूँजी की हवाओं के
छल का …….
कपड़े की दुकान में नापते हुए
शर्ट पीस
अचानक मन्नू के ख़यालों में
कौंध गया है बण्टी—-

ऐसी ही कमीज़ पहनकर तो गया था दिल्ली

हुँह ! आख़िरी पीस बचा है
दो मीटर का
‘‘आप कोई दूसरा ख़रीद लीजिए, भाई साहब !
यह बिका हुआ है पहले से’’ कहकर
रख दिया रैक में वापस
और अपने आप लग गई टकटकी
मन्नू की शून्य में……

उठकर चला गया है ग्राहक
किन्तु निर्विकार
मन्नू की आँखों के सामने अभी भी
मचल रहे हैं बण्टी की कमीज़ के रंग
जो
पहनकर गया था वह दिल्ली…….

और उधर
ठीक साढ़े तीन मील दूर दिल्ली में
मोतीराम एण्ड सन्स के एकाउन्ट्स सेक्शन में
कोने वाली टेबल पर
बण्टी के कम्प्यूटर पर खुला है
गाड़ी नम्बर 9350 का खाता कि — हैं हँ !
यह तो मन्नू की बाइक का नम्बर है
ड्राइवर को देनी है पावती….
और पड़ोसी क्लर्क से कहकर कि —
‘‘यार! यह रसीद बना दो 9350 की’’
उधर लॉन में जाकर
सिगरेट सुलगा लेता है गुमसुम बण्टी
पता नहीं
जूजू ने छोड़ा या नहीं अभी तक
खैनी चबाना ?

और जूजू
एक उद्घाटन समारोह की कवरेज में है
इधर,
कैमरे पर आँख लगाए साधता फ़ोकस
कि लैन्स में घुसे चले आते हैं
उद्घाटनकर्ता मन्त्री के भाषण के शब्द
जिन्हें
पाखण्ड कहा करते थे हमेशा
बण्टी और मन्नू ।

अचानक-सी क्यों आती हैं यादें
अक्सर
जैसे ताज़ा हवा का झोंका आता है
जंगल की उदासी के साथ ।

पता नहीं कहाँ छिपे होते हैं
जीवन के सवालों के जवाब उलझे हुए
जिन्हें किताबों में ढूँढ़ते हैं
दुनियादारी से दूर कई लोग पढ़-लिखकर ……

वही, टिमटिमाते हुए रंग
बण्टी की कमीज़ के
वही, गाँव के रास्तों पर दौड़ती मन्नू की बाइक
वही, छोटी-सी नाक वाली वचनी
और कैमरे के लैन्स पर लगी हुई
छलकने लगी हैं, जूजू की आँखें …….

और जूजू
अलीगढ़ शहर के उस भव्य पण्डाल में
चैनी खैनी का पाउच निकालकर
होठों तले दबा लेता है कुछ पत्तियाँ
तनाव में
पिच्च्च थूक देता है लिसलिसा पीक
कारपेट की खूबसूरती पर……

पता नहीं,
यह कोई ज़िम्मेदारी है,
या मज़बूरी ?
पता नहीं,
यह कोई समस्या है
या षड़यन्त्र ?
पता नहीं,
यह कोई यात्रा है
या भटकाव ?

कि मन्नू और बण्टी और जूजू
कपड़ा बेचते हुए दुकान पर,
ऑफिस में काम करते कम्प्यूटर पर,
और फ़ोटो खींचते हुए समारोह की
दूर होते हुए एक दूसरे से
सैकड़ों मील
और याद करते हुए तीन वर्ष पहले का समय
एक साथ ग़ाली देते हैं पैसे को
‘‘ऐसी की तैसी — ये स्साला पैसा….”

और इधर घर में
कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए
लापरवाही भरे
हमारे ठहाकों में अनुपस्थित है
उनकी उदासी…..

पुराना शहर 

पुराना शहर, अभी पुराना ही है
बुद्धि प्रकाश,
अभी भी जमती है चौपड़ और शतरंज
कान्ह महाजन के बड़ के पास
अभी भी फेंटी जाती है, ताश की गड्डी…

पुराना शहर, अभी भी पुराना है ।

नूरी तेलन का नूर बुझ गया है, तो क्या ?
और रामजीवन हलवाई अब नहीं है, तो क्या ?
धोक के कोयले वाली अँगीठी
जर-जरा कर गल चुकी, तो क्या ?
और रबर की टोंटी में पानी नहीं आता,
तो भी क्या ?

कि आज भी उठ रही है चिलम की लपट, सपट
अभी भी छानी जा रही है, बादाम की ठण्डाई ।

हाँ भाई, हाँ ! अभी भी पुराना ही है
पुराना शहर ।

तबले और और हारमोनियम हो गए हैं
गए-गुज़रे वक़्त के ठीकरे
(यह सी० डी० युग है यार)
और जन्नत की पोतियाँ मल्लिका बन चुकी हैं

कि बावजूद बहुत सारे ख़तरों और ख़ामियों के
देसी के ठेके वाला बाड़ा रहता है
अभी भी आबाद रात भर
पुराना शहर भूला नहीं है
गुलाब की दहकन का गहराता नशा ।

वाकई
पुराना शहर, अभी भी पुराना ही है
यूसुफ़ मियाँ !

सिर्फ़ भेष और भाषा बदली है भडुओं की
अब कोई नहीं जानना चाहता फ़र्क
उस्ताद और उस्ताद जी के बीच,
अब सारे रास्ते खुले रहते हैं, चाँदपोल में
पर उल्फ़त नहीं रहती प्यारेलाल
काई जम चुकी है, कोठे की सीढ़ियों पर….
कम्प्यूटर पर चैटिंग होती है, चीटिंग की तरह
अँगुलियाँ बटन दबाती हैं,
पल्लू नहीं दबाती, दाँतों में, लजाकर…..
मगर फिर भी,
पुराना शहर, आज तक पुराना ही है, मास्साब !
पौन पंजे पौने चार का ज़माना लद चुका है
आजकल !
मिलियन और बिलियन में होती है, खुसर-फुसर
लव बर्ड्स की तरह उड़ रहे हैं लड़के-लड़कियाँ
मुहब्बत के सलीके नहीं सीखते ज़िन्दगी में
कैरियर के तरीके ढूँढ़ते हैं, रात-दिन……

कि आज भी होती हैं हत्याएँ
और आत्महत्याएँ तो आम बात हो गई हैं
पुराने शहर में
सिएफ़ वज़ह बदली है, होने या न होने की
रिवाज वही है —
बल्कि पुख्ता हो गए हैं……

पुराने शहर में, उफ़नती हैं सड़ी हुई
गलियाँ और गालियाँ अभी भी —
मौजूद हैं अपने गवाक्षों से आँसू बहाती
मायावी हवेलियों के खण्डहर — अभी भी
दीवारों की दरारों
और आँगन की सीलन से जूझतीं
अँधेरी सीढ़ियों की दहशत
सिर्फ़ छत पर ही पा सकती है चमकती धूप
और खुली हवा, आज भी
घर भर के धुले कपड़े सूखते हैं
छत की मुण्डेरों पर, अक्सर हर रोज़……

हाँ, मेरे अजीज़ो और रक़ीबो, हाँ !
हाँ, मेरे दोस्तो और दुष्मनो, हाँ !
पुराना शहर, अभी भी पुराना है !

अपनी तमाम-तमाम, गलीज़ और नाचीज़
बातों के बावजूद
अभी भी जीवित हैं मेरे भीतरी तहख़ाने में
तुम्हारी यादें और मुरादें अभी भी
मेरी कुल जमा दौलत हैं सारी उम्र की…..

पुराना शहर, पुराना ही है, मेरी दिलरूबा !
अभी भी खन्दे में बैठते हैं कभी-कभी
ग़लत और बन्द तालों की
सही चाबी बनाने वाले कारीगर
अभी भी चौखटे आबाद रहते हैं
बेरोज़गार मज़दूरों से अल्ल सुबह हर रोज़
अभी भी कोतवाली में होता है
निर्लज्जता को लाँघता रात का जश्न —
अभी भी
बड़े मियाँ और और पण्डित जी के बीच पसरी है
आधे यक़ीन और पूरी आशंका से बनी
ठोस और चौड़ी सड़क ।

हाँ, आज भी,
पुराना शहर, पुराना ही है, रमजान भाई !

मुहर्रम के दिन लगाते हैं, बहुत से हिन्दू
केवड़े और गुलाब से गमकती सबीलें
और छाती पीटते हुये मातम करते हैं
‘‘हाय हुसैन ! हम ना हुए’’ —-

हाँ हाँ, पण्डित वेद प्रकाश, आज भी,
दशहरा मैदान पर इकठ्ठा होते हैं हज़ारों मुसलमान
‘‘रावण का नाश हो’’ के नारे लगाते
रामजी की सवारी उठाते हैं,
जालूपुरा के बहुत से नौजवान…!

सच है,
और अभी तक तो सच ही है !
मेरे महबूब ! मेरे प्रियतम !
पुराना शहर, अभी भी पुराना ही है……

अक्खड़पन में, झक्खड़पन में,
साफ़गोई, दिलजोई और हिम्मत में
मुहब्बत, शराफ़त और ताक़त में
पुराना शहर, अभी भी पुराना ही है
मेरे कवि….. (साहेबान)

इसी अधकचरे समय में

इसी अधकचरे समय में से चुनने हैं
कुछ पल हंसी के
मुस्कराहट के कुछ लम्हे ढूँढ़ने हैं

जैसे उस रपटीली जगह पर
फिसलकर गिर जाने के लिए
घर आकर हंस लेना है ठहाका लगाते हुए
और समोसे का गरमागरम आलू
तालू में चिपक जाने की बात पर
कहकहा लगाते हुए बच्चों के साथ
बिता लेनी है यह ढलती शाम

इसी अधकचरे समय में से सँजो लेना है
वह क़ीमती क्षण
जब वह प्रौढ़ा
मेरे लम्बे बालों को देखकर मुस्कराई थी
और मैं स्वयँ पर ही मोहित हो गया था
उस वक़्त
जब पहला पैग पीने के बाद
मैंने बहुत मस्त अँग्रेज़ी बोली थी सगर्व
अन्धेरी रात में भी
मैं घर पहुँच गया था सही-सलामत

इसी अधकचरे समय में से
निकाल फेंकनी हैं कुछ यादें
कि नोटबन्दी के दिनों में
कितनी किल्लतें झेलीं थीं हमने सपरिवार
बिना सब्ज़ी खानी पड़ी थीं रोटियाँ
और बेरोज़गार बेटे पर
बहुत प्यार उमड़ आया था उन दिनों
पोते-पोतियों ने भी नहीं की थी
दूध और बिस्किट के लिए जिद्द

इसी अधकचरे समय में से बनाने हैं
कुछ हास्यास्पद लतीफ़े
कि छह सौ करोड़ देशवासियों द्वारा
निर्वाचित बताया था प्रधानमन्त्री ने स्वयँ को
और गुरुनानक गोरखनाथ और कबीर
को एक साथ बैठा दिया था चौपाल-चर्चा में
जबकि मौत
मुठ्ठी में लेकर पैदा होते थे हमारे जवान

इसी अधकचरे समय में से रचनी हैं
कुछ कहावतें हमें कि
षड़यन्त्रपूर्वक क़त्ल को ’लोया होना’ कहते हैं और
सरेआम हत्या को ’धर्म-संस्थापन’
विधायकों की ख़रीद-फरोख़्त को
’सरकार-परिवर्तन’ कहा जाता है जबकि
सरकारी दल के अध्यक्ष द्वारा
सारे मन्त्रिमण्डल को निर्देशित करना
लोकतन्त्र का ही विकसित रूप है

हम नहीं तो काहे के तुम शाह जी

हम नहीं तो काहे के तुम, शाह जी !

राज कर लो भींतड़ों पर
हर तरफ़ ड्योण्डी पिटा दो
सच कहणिए सब जनों को
ज़मीं पर से ही मिटा दो

नित ग़ुलामों से सुनो — वाह वाह, जी !

हैं भले सरकार ! — यह जैकार
बुलवाओ ख़ुशी से
बेच सारा मुल्क मस्ती में इसे
खाओ ख़ुशी से

मत सुनो मरते ग़रीबों की तनिक भी आह, जी !

हैं अभी ये लोग सोये
चाहे जितना लूट लो तुम
इनको आपस में लड़ाकर
चाम इनकी च्यूँट लो तुम

जग गई जिस दिन ये जनता तो तुम्हें फिर
भागने की भी नहीं मिल पाएगी कुछ राह, जी !

कुछ देर पहले ही 

कुछ देर पहले ही तो गुज़रा है
तूफ़ान ।

स्त्रियों ने सम्भाले थे
अधोवस्त्र
बच्चे हैरत में थे देखकर
अजूबा,
युवतियाँ छिपा रही थी, अपना मुँह
झेंपती ।

जब उनका हेलीकॉप्टर उतरा था
गाँव के पूर्वी मैदान में
अख़बारों और न्यूज चैनलों के कैमरामैन
ध्यानस्थ हो गए थे, एकाग्र
बगुला भगत ।

बूढ़ों और अधेड़ों को
याद आई मधुर बचपन की
युवकों के सपनों की
हरी-भरी फसलों में शनैः शनैः
सुलग उठीं आशंकित
भावी की लाल तप्त चिंगारियाँ ।

कुछ देर पहले ही आए थे, महामहिम
पूरे लाव-लश्कर के साथ
पुलिस और फ़ौज से चाक-चौबन्द
सुरक्षा घेरे में
आतंकवाद विरोधी भाषण देने आए थे
भयभीत
देश की जनता को
सावधान करने का दायित्व निभाना था
संवैधानिक ।

कुछ देर पहले ही तो गुज़रा है, तूफ़ान
सरेआम
जनता की आँखों में धूल झोंक
अभी-अभी गए हैं वे
संसद में
जनता के प्रतिनिधि, महामहिम…..

नीलकण्ठ के जोगी 

नीलकण्ठ के जोगी, याद बहुत आते हैं,
तनन् तनन् तन, तम्बूरा बजता है अनचक !

नीलकण्ठ के जोगी, दीखे बहुत अकेले,
नीलकण्ठ के जोगी, लेकिन बहुत सुखी थे…

आँखों में पानी था, ताक़त थी, पाँवों में,
बीस कोस तक अलख जगाते थे, गाँवों में,
नीलकण्ठ के जोगी, टाट बिछौने पर भी,
दोपहरी कर लेते, कीकर की छाँवों में ।

नीलकण्ठ के जोगी, गुड़-सत्त्तू खाते थे,
सनन् सनन् सन, टहला सर से, शीतल झौंका बह आता है ।

नीलकण्ठ के जोगी, दीखे भीख माँगते —
नीलकण्ठ के जोगी, लेकिन भर्तृहरि थे….

राजौरों के ऊँचे गढ़ की गहरी घाटी,
बीहड़ जंगल में, जीवन की ऊष्मा खाँटी
नीलकण्ठ के जोगी, नाग नाथ लेते थे,
बिना बुलाए आ जाते थे, गोगा-जाँटी ।

नीलकण्ठ के जोगी, जोत अखण्ड जलाए,
जगर-मगर उजियारा रखते थे, सारा जग ।

नीलकण्ठ के जोगी, दीखे, हारे-माँदे
नीलकण्ठ के जोगी थे, पर जीवट वाले…

ईश्वर का ऐश्वर्य, उन्हें स्वीकार नहीं था,
स्वार्थ-सिद्धि से प्यार, और व्यापार नहीं था ।
नीलकण्ठ के जोगी, भरे-पूरे मानुस थे,
सहज भाव में, किंचित भी भय-भार नहीं था ।

नीलकण्ठ के जोगी थे, रूद्राक्ष काल पर
ता धिन, ता धिन नर्तन करते प्रलयंकारी ।

नीलकण्ठ के जोगी, प्यासे थे, बरसों से,
नीलकण्ठ के जोगी, लेकिन महामेघ थे ।

तेग और तिरशूल चमकती थी, हाथों में,
ज्वालामुखी धधकता था, उनकी साँसों में,
नीलकण्ठ के जोगी, महाकाल के गण थे,
पौरूष का सौन्दर्य, छलकता था, आँखों में ।

नीलकण्ठ के जोगी, दीखे आल्हा गाते,
जय हो, जय हो, जय हो, धूम मचाते रण में ।

नीलकण्ठ के जोगी, रात-बिरात हमेशा
चौकस रहते थे, आखेटक आक्रमणों से
नीलकण्ठ के जोगी, मिट्टी के पुतले थे,
नीलकण्ठ के जोगी, थे नक्षत्र गगन के…

नीलकण्ठ के जोगी, याद बहुत आते हैं,
तनन् तनन् तन, तम्बूरा, बजता है अनचक !

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य 

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

हर घड़ी,
हर रास्ते पर
सनसनाता
हवा में बहता जाता है
भय ।

शंकाओं और अपशकुनों के बीच
आवाज़ें बदलकर
चिर्रियाती हैं बिल्लियाँ
और कुत्ते
किसी पहाड़ की तलहटी के खोह में
फनफनाते विषधरों के बीच
सपाट शिलाखण्ड पर लटके हुए
रुंधे गले वाले
कातर आदमी की लम्बी चीत्कार में रो रहे हैं,
घिग्घी बँध रही है
बलात्कारियों से बचकर थाने में पहुँची हुई
आहत लड़की की ।

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

हर लहर,
हर भँवर और हर बूँद में
धुली हुई है मौत
मस्तक के ऊपर से उड़कर
निकल रहे हैं किर्र-किर्र करते क्रूर
पैने पंजों और कठोर चोंच वाले
काले गिद्ध,
ख़ूनी आँखों से
टोहते वधस्थल का वातावरण
हूँक-हूँक करते सियार
गली के नुक्कड़ पर बैठे हैं भेड़िए
लपलपाते जीभ…..

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

संसद में
लज्जित हो रहा है अपनों से ही
विश्व का महान लोकतन्त्र
अनावश्यक
कविता करने लगते हैं प्रधानमन्त्री
और कोई बच्चा कह देता है अचानक
राजा के नंगेपन की सच्चाई

कविता की किताब में छिपे हुए बच्चे की
नंगी छाती पर तनी हैं
राष्ट्रवादी बन्दूकें ।

नई, नहीं, वही, यहीं और अभी
रार ठानने वाली कविता के
कपट और विरोधाभासों के बीच
देसी और विदेशी आतंकवाद का अन्तर
गृहमन्त्री की थुलथुल देह के पीछे से
अयोध्या और कराची के बीच कहीं
अपान वायु की सड़ांध के साथ निकल जाता है
फुस्स
और साधु-साध्वियाँ फिर-फिर
रात को
लौट आते हैं, उन्हीं मठों की ओर

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

भरी दोपहर में
सूरज की रोशनी पर पोत दिया गया है
अमावस का रंग

पहले सूखते हैं, और फिर
बिकते जाते हैं, एक-एक कर खेत
और किसान
उन शहरों में जाते हैं मजूर बनकर
जहाँ
ज़ि़न्दगी की हदें तय करते हैं हत्यारे
हर बार
दो चार बरस के अन्तराल से
संविधान
भाषा और जाति और धर्म और प्रान्त के
सामने समर्पण कर देता है पराजित
बेचारा ।

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

हर सुबह,
हर शाम,
नींद और जाग में
झरता रहता है अकाल
साल दर साल,
बेकार पड़े हलों के काठ में
लगती रहती हैं दीमक
फालों में जंग
और बैलों की
सूखी हड्डियों पर लटकी त्वचा में
नासूर बनने लगते हैं गँठीले ……

गायों के थनों को नोचते हैं
चींचडे, जम जूँ, और जोंक
कुओं की पाल के
अनागत अँधेरों की ढूह में
भर्राये गले से
विलाप कर रहे हैं कबूतर
गुटर गूँ —

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

गाँवों के आसपास
लुप्त होती पगडण्डियों पर
सड़कें बन रही हैं
फोर लेन सिक्स लेन और अखबार
सरकारी उपलब्धियों का खजाना बने हैं
आकाशवाणी और दूरदर्शन के साथ
बहुराष्ट्रीय योजनाकार मिला रहे हैं
गोरे, गुदगुदे, हाथ …….

घी बेचकर तेल खा रहे हैं
लस्सी बेचकर कोकाकोला पिला रहे हैं
झड़बेरियाँ उखाड़कर
गमलों में कैक्टस लगा रहे हैं निर्मूल
हाय, हाय, कूल-कूल ……

और उधर बम्बई (जो अब मुम्बई है) के
भोलेश्वर चौराहे के पास
उस तीन मंज़िला चाल के किसी कमरे में
वह साँवली-सी लड़की
अपने प्रेमी के हथेलियों में भरे चेहरे को
बेतहाशा चूमती हुई लगातार
आँसू बहाते हुए धिक्कार रही है
क़िस्मत को

‘‘उसे बिहारी नहीं होना चाहिए था
हे राम !’’

कहीं कुछ घटता है, अपघट्य

हर बार,
हर चीज़,
हर कविता,
छोड़ जाती है बेवज़ह
अधूरापन….

मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा 

मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा
जब
संसद में चल रही होगी बहस
कि क्यों और कितना जरूरी है
बचाना कानून को ?
कविता से, होने वाले खतरे पर
चिन्तित
सत्ता और प्रतिपक्ष के सांसद
कानून की मजबूती के बारे में
सोच रहे होंगे,
वातानुकूलित सदन में
बाहर की
उमस और गर्मी से बेख़बर ।

मन्दिरों में गूँज रहे होंगे शंख और घड़ियाल
मस्जिदों में अज़ानें
कि शैतान
अब कविता की शक़्ल में आया है
चर्च में
प्रार्थना कर रहे होंगे
यीशु के हत्यारे….

ऐसा ही होगा शायद
कि मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा
जब
तोप के मुँह पर बैठी होगी
चहकती चिड़िया…..

धरती सुगर्भा-सी 

किसी रोते हुए कवि की आत्मा का
एकान्त ढूँढ़ता हूँ मैं
जहाँ अपनी इच्छाओं के बीज रोप सकूँ
आँखों की तरह…..

मेरे रोपे हुए सपनों की फ़सल काटेंगी
आने वाली पीढ़ियाँ और उस वक़्त
किसी कविता की आँख से टपक गया यदि
एक भी आँसू
तो युगों-युगों तक उर्वरा बनी रहेगी
यह धरती सुगर्भा-सी….

भटकना ही है मुझे निरन्तर
किसी रोते हुए कवि की आत्मा के लिए
मैं तुम्हारे पास भी आऊँगा
किसी एक दिन
तुम भी तो रोओगे मित्र
धरती के दुःख में पिघलते
हिमालय-से….

रात का हाल मुझ से पूछ

रात का हाल मुझ से पूछ !

पग पग पर मौत के जबाड़े थे,
हर तरफ ज़िन्दगी का क्रन्दन था,
बिलखते रास्ते बुलाते थे,
नस-नस में चुभते थे अँधेरे —
मैं ख़ुद को क़त्ल करके भी
ख़ुश था —
रात का हाल मुझ से पूछ !

सब अपने आप से नाराज़ थे और
हर कोई भीड़ में अकेला था
राख उड़ती थी उजले सपनों की —
धुआँ था सुलगती मुहब्बत का

धूप में रखा था मोम का पुतला
ख़ून की बारिश से लबालब था ताल
सूरज का, नाम भी गुनाह था जिसका
यह सुबह यूँ ही नहीं देखी है —-

रात का हाल मुझ से पूछ !

हाड़-हाड़ लकड़ी-सा जलता था
रोम-रोम रोता था, लहू की बूँदें
साँसों में तेजाबी कालिख को पीना था,
सीने में चुभते थे, ज़हर बुझे तीर-शूल

आँखों में यादों की लपटें दहकती थीं
डूबना-उबरना था, काल के प्रवाह में
थोड़ें-से उजाले की, छोटी-सी चाहत में
तिल-तिल कर मरना था, बूँद-बूँद झरना था,
डर-डर कर मरना था, मर-मर कर जीना था —

रात का हाल मुझ से पूछ !

पत्थर पर हरी-भरी फ़सल लहलहानी थी,
अँधकार पी-पी कर रोशनी उगलनी थी,
मरूस्थल में अमृत का सागर सरसाना था,
तूफ़ानी लहरों पर, जर्जर नाव खेनी थी —

रात का हाल मुझ से पूछ !

बिगड़ी हुई दुनिया की, हालत बदलनी थी,
टूटे हुए दिल में, साबुत कामना मचलनी थी….

याद रहेगा कालखण्ड यह

एक

याद रहेगा कालखण्ड यह
कैसे भूल पाएँगे आख़िर झूठ और पाखण्डीपन हम
लोकतन्त्र के नाम रचा था जो शासक ने
सत्ता में आने से पहले जाने क्या-क्या
स्वप्न दिखाए परिवर्तन के
भ्रष्टाचार ख़त्म करने का वचन दिया था
और नियन्त्रण में करना था महँगाई को
रुपये का था मूल्य उठाना थोड़ा ऊपर
सबको लेकर साथ
नियोजित करना था विकास भी सबका
और देश को ले जाना था प्रगति-पथ पर
किन्तु हाय रे !
न तो भ्रष्टाचार मिटा, न रुपया उठ्ठा
बल्कि और भी ज़्यादा हो गई हालत पतली
पैट्रोल की क़ीमत बढ़ती रही दिनो-दिन
नागरिकों में भेदभाव भी साफ़ दिखा और
गुण्डागर्दी लगी पनपने खुलेआम अब
याद रहेगा कालखण्ड यह

दो

याद रहेगा कालखण्ड यह
नोटबन्दी में मची किस तरह त्राहि-त्राहि
कैसे बदला धनपतियों ने काला धन अपना सफ़ेद में
कैसे मज़दूरों के धन्धे बन्द हुए और
छोटे व्यापारी सब बेरोज़गार हो गए
जी०एस०टी० के चक्कर में फँस गए बेचारे
और किसानों को फ़सलों का
सही मूल्य भी नहीं मिल सका
नौजवान सड़कों पर लगे भटकने दिनभर
दलितों पर तो अक्सर अत्याचार हुए ही
अल्पसँख्यकों को तो स्पष्ट देशद्रोही ही मान लिया और
गौ-गुण्डों ने जिसको चाहा मारा-पीटा
ऊपर से वक्तव्य मन्त्रियों के सारे ही आग लगाऊ
डर-डर कर जीने की है लाचारी जैसे
अपना देश पराया हो गया, हाय-हाय रे !
काट रहे दिन-रात लोग डर-डरकर अपने
शासन बना हुआ है बन्धक धनपतियों का
आमजनों का जीवित रहना भी मुश्किल है
इसी अन्धेरे और ज़ुल्म के कारण सबको
याद रहेगा कालखण्ड यह

तीन

याद रहेगा कालखण्ड यह
तर्क और वैज्ञानिक चिन्तन प्रतिबन्धित हैं
रहन रखा है धर्मान्धों के पास ज्ञान सब
और विवेक की बातें सारी अर्थहीन हैं
मटियामेट किया जाकर इतिहास समूचा
गड़बड़झाला अन्धास्थाएँ हावी हैं अब
पढ़ना-लिखना हुआ जा रहा सभी निरर्थक
भक्ति-योग है आवश्यक शिक्षित होने को
शिक्षण-संस्थानों में हस्तक्षेप हो रहा खुल्लमखुल्ला
भेदभाव कर रहा राज्य है अल्पसँख्यकों और
दलित छात्रों पर अक्सर होता है जो
अत्याचार पता है सबको किन्तु सभी चुप
राज्य प्रताड़न के भय से हैं विवश करें क्या
जबकि कर रहे तोड़-मरोड़ तथ्यों में भारी
पूर्वाग्रह से ग्रस्त पल रहे हैं झूठे पण्डित सरकारी
बदल रहे इतिहास देश का लाँछित करते
पूर्वजों के किए-धरे को कर अमान्य जो
कायर और समझौतावादी लोगों को घोषित करते हैं
स्वतन्त्रता के सेनानी झूठे दावों से
भुला रहे हैं मूल समस्या आमजनों की
युवा वर्ग को उन्मादी जो बना रहे हैं
विश्वविद्यालय प्राँगण में भी पुलिस-फौज़ से
फैलाते आतँक और आरोप लगाते हैं छात्रों पर
देशद्रोह का मिथ्यावादी जबकि आचरण स्वयँ कर रहे
जनद्रोही वे बैठे हैं सत्ता के भीतर
शिक्षा के गिरते स्तर के लिए हमेशा सजग व्यक्ति को
याद रहेगा कालखण्ड यह

चार

याद रहेगा कालखण्ड यह
जबकि धर्म को राजनीति का शस्त्र बनाकर
शासक स्वयँ फर्क़ करता है आमजनों में
फूट डाल कर नफ़रत फैलाता समाज में
पीट-पीट कर हत्या करते हैं हत्यारे
और मन्त्रीगण बने पक्षधर हत्यारों का मान बढ़ाते
बहुसँख्यक हैं अल्पसंख्यकों पर हावी और
हरेक बात पर शासक दल के छली प्रवक्ता
विधर्मियों को देशद्रोह से आरोपित कर
राष्ट्रवाद के नाम स्वयँ को देशभक्त साबित करते हैं
रहन-सहन और संस्कृति अपनी श्रेष्ठ बताते
अन्यों को लाँछित करते हैं नाहक़ ही और
कभी गाय तो कभी बीफ का नाम लगाकर
चाहे जिसको मार-पीट दंगा फैलाते
मन्दिर तो जैसेकि विषय स्थाई ही है
जब भी उन्हें ज़रूरत होती छेड़ उसे मौक़ा मिलते ही
भड़काने को आग सदा तत्पर रहते हैं
ध्रुवीकरण कर के समाज को बाँट रहे हैं
ओह ! चुनाव की राजनीति का खेल घृणास्पद
खेल रहे हैं शासक-दल के नेता ख़ुद ही
कपटपूर्ण बातों से शासन हथियाकर वह अत्याचारी
सारे देश को कूट-जाल में फँसा रहा है
क्रूर-कपट और छल-छद्मों से
जन-मन को जो भ्रमित कर रहा है वँचक भारी
याद रहेगा कालखण्ड यह

पाँच

याद रहेगा कालखण्ड यह
जब धर्मान्ध बना वह शासक बातें करता है कबीर की
जिसके मन में ज़हर भरा है अन्धास्था का
बात-बात पर प्रतिशोधी तेवर दिखलाता है अक्सर
अपने भीतर के मनुष्य को मार चुका जो
वह जब भी विकास की बातें करता है तो डर लगता है
जाने किसको मारा जाएगा जल्दी ही अब
नक्सलवादी माओवादी या आतँकी
कहकर होगा एनकाउण्टर किसी भले मानुष का शायद
हरदम आशँका रहती है उसके प्रति अब
क्योंकि बहुत ही पतनशील आचरण रहा है
उसका और पूरे ही उसके दल विशेष का
वह शासक जब हाथ नचाकर गुर्राता है ज़ोर-ज़ोर से
देता हुआ ग़ालियाँ लगता है निकृष्टतम
सच को जो स्वीकार तनिक भी कर नहीं सकता
तोड़-मरोड़ कर बतलाता है झूठी बातें
शिक्षा में भी अन्धास्थाएँ शामिल करके पाठ्यक्रमों में
एक समूची पीढ़ी को जो नष्ट कर रहा
इस शासक की काली करतूतों के कारण
याद रहेगा कालखण्ड यह

छह

याद रहेगा कालखण्ड यह
भात-भात चिल्लाते मरते जाएँ बच्चे
बलात्कार को झेल रही स्त्रियाँ हर घड़ी
नहीं सुरक्षित छोटी बालिकाएँ भी लेकिन
शासक-दल के लोग पक्ष में
बलात्कारी के रैली करते हैं सड़कों पर
जबकि विश्व में सबसे ज़्यादा महिला-अत्याचारों का
दाग़ लगा है संस्कृति पर कुख्यात घिनौना
सभी तरफ़ से विकृत मानस के अपराधी
अपसंस्कृति को रोज़ बढ़ावा देते अपने
अविवेकी वक्तव्यों से हैं आग लगाते
बाँट रहा पूँजीपतियों को खेतों की ज़मीन
कौड़ियों के दामों पर ज़ुल्मी शासक
पुलिसबलों की बन्दूकों से ख़ाली करवा
छीन रहे हैं धरती प्राणों से प्यारी जो
जबकि आत्महत्या करते किसान हज़ारों
और शासक सब ज़िम्मेदारी बता विपक्ष की
बड़े मज़े से झूठ बोलकर धोखा देते
क्षय होती जाती है आत्मा सम्विधान की
और मनुष्यता की गरिमा भी नष्ट हो रही
स्वतन्त्रता भी ख़तरे में है आज हमारी
कवियो ! बुद्धिजीवियो ! जागो, लिखो सत्य सब
याद रहेगा कालखण्ड यह

सात

याद रहेगा कालखण्ड यह
सभी पुरानी धरोहरें गिरवी रखने और
बड़ी-बड़ी कम्पनियों और निगमों को बेचे जाने के
घृणित कारनामों के कारण कई दशकों तक
अर्थव्यवस्था सम्भल नहीं पाएगी देश की
जी०डी०पी० के झूठे आँकड़े बता रहे हैं
छोड़-छोड़ कर अर्थशास्त्री त्यागपत्र देते हैं सारे
दास बने हैं टी०वी० चैनल प्रिण्ट-मीडिया
सच कहने की हिम्मत नहीं है शेष किसी में
सब सत्ता से स्वार्थपूर्ति हित झूठ बोलते
राष्ट्रवाद का छद्मभूत सब को दिखलाकर
जनता को बरगला रहे सँचार-माध्यम
छिपा रहे सरकारी काली करतूतों को मिलीभगत से
ले विकास का नाम जँगलों को उजाड़ते
काट रहे लाखों पेड़ों को धनिकों के हित
जल स्रोतों पर कब्ज़ा करते निहित स्वार्थी
पूँजीवादी बर्बरता के घोर समर्थक शासक हैं ये
मानव अधिकारों के भक्षक ये हत्यारे
देश नहीं बिकने दूँगा कहते हैं पर
भीतर-भीतर सब संसाधन बेच रहे हैं चोरी-चोरी
बिकते और कमज़ोर हो रहे महादेश की
नष्ट हो रही संस्कृति और सभ्यता के कारण ही
याद रहेगा कालखण्ड यह

खुलता हूँ 

खुलता हूँ,
किसी वीरान बीड़ में बनी
कोठरी के
जर्जर किवाड़ों की तरह
चरमराता….

खुलता हूँ,
किसी दुर्गम पहाड़ की तलहटी के
गह्वर में
धुँधलाई आँखों की तरह
सरसराता….

खुलता हूँ,
किसी सूखे हुए पोखर के ढूहे पर
दीमक की
बाँबी से निकलती मिट्टी-सा
भुरभुराता…..

खुलता हूृँ,
किसी पके हुए फोड़े के मुहाने की
नोक पर
पैनी धार की तरह
थरथराता….

खुलता हूँ,
ताज़ा हवा के लिए
उजली हँसी के लिए,
सच की तलाश में,
जीवन की आस में —

बार-बार खुलता हूँ…

अजातशत्रु

शोषकों के विरुद्ध लड़ते हुए
मेरे जीवन में
बहुत से शत्रु बन गए हैं जबकि
इधर अजातशत्रु होना
सद्गुण माना जा रहा है
और मैं अपने वर्ग शत्रुओं के ख़िलाफ़
आग उगल रहा हूँ ।
सत्ता के अन्याय के विरुद्ध
खड़े होकर
दरबारियों का मित्र
कैसे रह सकता हूँ मैं आख़िर ?

न्याय और समानता के पक्ष में बने हुए
विषमता पैदा करने वालों से
शत्रुता तो आवश्यक है ।
भला, सकारात्मक कैसे कहूँ
मैं स्वयं को ?
बेईमानी से लाभ कमाने की इस छद्म प्रक्रिया में
कैसे बना रहूँ अजातशत्रु ?

आत्मवँचना के साथ
जो भी कोई
अजातशत्रु होने का दावा करता है,
इन दिनों
साफ़-साफ़ सुनो
यह कटु सत्य पूर्णतया
उसकी मिलीभगत है
मानवता के शत्रुओं से ।

मुझे माफ़ करो, मेरे मित्रो !
मेरे परिवारजनो !
मैं अजातशत्रु बन कर नहीं रह सकता
शोषकों के विरुद्ध लड़ते हुए ।

अजातशत्रु जो हैं इस समय
शोषण की सत्ता के साथ हैं अधिकतर ।

कवि और हत्यारा

कच्चे अमरूद पर टाँच मारते हुए
सुग्गे को निहार रहे थे जब तुम
उस वक़्त
हत्यारा अपना चाकू पैना रहा था

और जब
तुम्हारी निग़ाहें
उस रँगीन तितली के पीछे दौड़ रहीं थीं
तब निशाना साध रहा था
हत्यारा

फिर जैसे ही
बाग़-ओ-बहार पर लिखी
अपनी कविता पढ़ते हुए तुम
रीझने लगे स्वयँ पर तो
सड़क पर एक लाश पड़ी थी
ख़ून में लथपथ

मृतक के सीने पर
चमक रहे थे
अमरूद सुग्गा तितली और कविता
जबकि तुम्हारा पुरस्कार
अगले राष्ट्रीय उत्सव के लिए लगभग
निश्चित हो चुका था

आना 

आऊँगा
बारिश से भीगे खेतों पर
क्वार की धूप बनकर
चमकता-सा….

आऊँगा
थके हुए बदन की रगों में
धारोष्ण दूध की तरह
उफनता-सा….

आऊँगा
रूठी हुई प्रेमिका की आँखों में
मानभरी लालिमा लिए
दमकता-सा….

आऊँगा
अकेले बच्चे के पास
नाचती हुई चिड़िया के परों में
लचकता-सा….

आऊँगा
मकई के दानों में बनकर
मिठास,
शरद के आसपास
सूर्योदय के साथ
चूमने को तुम्हारे खुरदरे हाथ
जरूर जरूर आऊँगा,
करना तुम — इन्तज़ार….

आज मेरा देश

कीचड़ में किलोल
करता हुआ सूअर है
गू में मुँह मारकर
फूहड़ा करती गाय है
पट्टे पर दबाई गर्दन से
टुकुर-टुकुर झाँकता बकरा है
चमचमाता तेज़ धार छुरा है
घर-घर में पसरी हुई
ख़ौफ़नाक ख़ामोशी है
या बेवज़ह गूँजता हुआ
कोलाहल है चारों तरफ़
सत्ताधारी दल के
शोहदे हैं अहँकारी
या पुलिस-फौज़ है
एनकाउण्टर एक्सपर्ट

अधिकारी हैं
बोलने वालोंपर
आँख-कान लगाए
सांसद और विधायक हैं
धमकियाँ देते खुलेआम
मन्त्रीगण हैं
व्याख्या करते
कानून की मनचाही
हर बार नया और
ताज़ा झूठ बोलता
प्रधानमन्त्री है

काले को सफ़ेद बताने
वाले विद्वान हैं
पूँजीपति हैं बैंकों के कर्ज़े से
बनाए हुए साम्राज्य
भाग जाने वालों के लिए
उपलब्ध हैं पारपत्र
माफ़िया के चरणों में
नतमस्तक सरकार है
और दावा है सरकार का
कि लोकतन्त्र है देश में
जो दिखता नहीं
किसी को तनिक भी

पूछूँगा किसी आत्मीय से

पूछूँगा किसी आत्मीय से कभी
कि कहाँ तक जा सकते हैं हमारे सन्देश
और जा भी सकते हैं क्या पूरे
वैसे ही जैसे हम चाहते हैं भेजना ?

कई बार सोच-सोचकर पूरी तरह
हम भेजना चाहते हैं तनाव
और लिखते हैं समझ-बूझकर
कि सब कुशल है, चिन्ता मत करना ।

हम कहना चाहते हैं कि भयंकर बाढ़ है यहाँ
और कह देते हैं कि मौसम अच्छा है ।

हम क्यों लिखते हैं, तनाव को छुपाकर कुशलता ?
और ‘अच्छा है’ कह देने से
क्या मौसम हो जाता है वाकई अच्छा ?
पूछूँगा कभी किसी आत्मीय से कि,
क्या वह भी ऐसे ही भेजता है अपने सन्देश ।

उसने यही कहा था उस दिन
कि चिन्ता मत करना तुम, ख़ुश रहूँगी और मैं
निश्चिन्त रहा आज तक कि वह ख़ुश होगी
भूलकर मुझे अपने घर-परिवार के साथ ।

पता तो अभी-अभी चला उसकी
अन्तिम-यात्रा के समय कि
मुझे निश्चिन्त बनाकर वह
कितनी चिन्ता करती रही हमेशा मेरी ।

यदि मैं पूछूँ भी किसी आत्मीय से तो क्या
साफ़-साफ़ बता देगा अपना दुःख वह
जैसे वह भोगता है यादों के अँधेरे में छीजते हुए
तेल में बाती की तरह जलाकर हरेक साँस ।

पूछूँगा किसी आत्मीय से कि कैसे
सीख लेते हैं अधिकांश आत्मीय जन
अपनों से अपना दुःख छिपाने की यह
अच्छी और ईमानदार आदिम कला ।

खेजड़ा 

अनुकूल मौसम में पनपते हैं कीट
प्रतिकूलताओं में नष्ट हो जाते हैं
नहीं कहीं भी नहीं है जल
दृष्टि सीमा से भी दूर
हर ओर
पसरी हुई है अथाह रेत
कहीं भी नहीं है जल, या जल की सम्भावना
इस मरूस्थल में

किन्तु पूरी दृढ़ता से खड़ा है
हरियल खेजड़ा
सूरज की ज्वाला को मुँह चिढ़ाता
बादलों को अँगूठा दिखलाता
रेत के प्रेमपाश में बँधा
मुस्कुराता वह
आग में से जल निचोड़ने वाला पारखी
पूरी दृढ़ता से खड़ा है
जलहीन मरूस्थल का जीवन, ऋषिवत्

समय, तेरी चुनौती स्वीकार है हमें
दिशाओं को कर सकता है अपने अधीन
किन्तु हम भी
ख़ूब जानते हैं दिशाओं के द्वार खोलना

बुरी औरत के सपनों में 

बुरी औरत के सपनों में
नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ
बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर

बुरी औरत के सपनों में नहीं होती
बदन को धरती बनाकर
धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति
बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला
परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का
पाखण्ड-पर्व
कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में

दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की
चहारदीवारी में
आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता
बुरी औरत के सपनों में ।

बुरी औरत के सपनों में आता है
एक स्वच्छन्द बहती हुई नदी का दृश्य
और मनचाहे फूल पर बैठती हुई
तितली के पंख

बुरी औरत के सपनों में
बार-बार आता है जिबह करने को
लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना

उसके स्वच्छन्द बहते रंगों पर
टपक जाते हैं
किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र
प्रेमाश्रु

बुरी औरत के सपनों में उबलता है
बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध
हृदय का लावा ।

हमें उम्मीद है बेहतर भविष्य की

हमें उम्मीद है बेहतर भविष्य की
और हम लगातार
लड़ रहे हैं अपने वर्तमान से
सोचते यही कि करें तो क्या करें ?

एक भी शस्त्रास्त्र नहीं हमारे पास
जिसे न भेद सके शत्रु और
शास्त्र भी नहीं कोई
जिसका ज्ञान न हो शत्रुओं को ।

जो भी हैं हमारे पास
शस्त्रास्त्र और शास्त्र
शत्रुओं द्वारा ही आविष्कृत हैं और उन्हीं के
नियमों से प्रदत्त और
निर्मित भी उन्हीं की तकनीक से
उन्हीं के हित ।

जब जब भी हम भ्रमित होते हैं
इस छाया-युद्ध में
निरर्थक नष्ट होती शक्ति से दुर्बल
बहुत कम संभावनाएँ होती हैं
जीतने की
समय के विरूद्ध यह संग्राम ।

इन्हीं बहुत कम संभावनाओं में
धरती की देह पर उगा हुआ
पकड़ में आ जाता है
कोई एक तिनका और खिल पड़ती है
हल्की-सी मुस्कान
उम्मीद भरी किरण से प्रकाशित
चमकने लगती हैं
धुँधलाती हुई उदास आँखे ।

हमारे संघर्ष-सधे मजबूत पाँवों को
ईमान की हिम्मत से
मिलने लगता है, स्वतः ही एक मार्ग
धरती के आँचल में ।

आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं 

एक

आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं
इधर से चीखने, रोने, विलाप करने की,
उधर से धमकियाँ,और ग़ालियाँ रंजिश से भरी
वहाँ से लूट लो, पकड़ो इसे, अब छोड़ना मत
यहाँ से मार दो, दफ़्ना दो, जला दो सब कुछ
कहीं से रख भी ले, सम्भाल ले, की खुसरफुसर
कहीं से वोट दो, लो जीत गए, के नारे
उस तरफ़ से कि कल तुमको देख लेंगे हम
इस तरफ़ से कि हम सरकार हैं सबके मालिक
आजकल कानों में आवाज़े बहुत आती हैं

दो

रात भर चीख़ता, चीत्कार करता है जंगल
पेड़ मुर्झाएँ हैं, तालाब पड़े हैं सूखे
फूल खिलते नहीं, बरसों से इधर घाटी में
बाघ और नीलगाय, दौड़ते नहीं दिखते
आते हैं गाड़ियाँ, लेकर बहुत शिकारी अब
ट्रकों में भरते हैं शीशम के कटे पेड़ों को
गाँवों क़स्बों में आ रहे हैं जानवर सारे
रास्ते खो चुके, डामर की चिकनी सड़कों में
शिकारियों का है अड्डा कि जो ये होटल है
रात भर चीख़ता, चीत्कार करता है जंगल

तीन

सुबह के वक़्त, ये पर्वत विलाप करता है
निकाले जा चुके, पत्थर तमाम खानों से
कूटती टूटती हैं रोड़ियाँ, क्रेशर में रोज़
चल रही हैं मशीनें, यहाँ पे रात औ’ दिन
शहर बसते हैं पहाड़ों को काट कर सारे
झरने अब प्यास बुझाते हैं पूँजीपतियों की
अब नहीं जाते, नौज़वान आदिवासी वहाँ
सिर्फ़ मज़दूर हैं सौ रुपया रोज़ के वे बस
मर चुका इश्क़,जो लोगों को पहाड़ों से था
सुबह के वक़्त ये पर्वत विलाप करता है

चार

नदी की सिसकियाँ, सुनता हूँ दोपहर में मैं
हाय, वह सूख चुकी है, अतल में गहरे तक
कहीं नहीं है, अब जल-धारा का प्रवाह कोई
आर्द्रता तनिक भी, नहीं है जलती आँखों में
रेत है रेत, बस, दहकती हुई चारों तरफ़
राहगीरों के कण्ठ, तर भी करे तो कैसे
खुद नदी जब कि अपनी रूह तलक़ प्यासी है
बन रहा जैसे मरूस्थल है दूर तक केवल
सुन रहे हैं कि यहाँ, शहर नया बसना है
नदी की सिसकियाँ सुनता हूँ दोपहर में मैं

पाँच

गूँजता है रुदन, खेतों में उधर रह-रह के
हो चुकी है ज़मीं, बंजर विदेशी बीजों से
घर के उपवन से भी, आती हैं कराहें अक्सर
कैक्टस हैं हरे, पौधे सभी हैं ठूँठ वहाँ
जैसे हर ओर है वातावरण शोकाकुल-सा
पेड़ों से पँछियों के, घोंसले भी ग़ायब हैं
हवा के नाम पे,उठती हैं आँधियाँ एकदम
बारिशें ज़हर की, ढाती हैं कहर तूफ़ानी
किसान, ख़ुदक़शी करने लगे हैं गाँवों में
गूँजता है रूदन, खेतों में उधर रह-रह के

छह

आहें आती हैं, गले घुट रहे हैं गलियों के
सडान्ध मारती हैं, नालियाँ शहर भर की
सड़कों पे शोरोगुल, हड़कम्प,आपा-धापी है
शहर की साँसों में है, चिमनियों का काला धुँआ
कचरे के ढेर हैं हर ओर, सियासत की तरह
ख़ून में लिथड़े, रास्तों पे आना-जाना है
भीड़ में लुप्त हैं, लाचार-से जन-पथ सारे
राज-पथ हरियाली, औ’ रौशनी में डूबे हैं
स्वच्छता-मिशन के चर्चे हैं कागज़ों में बहुत
आहें आती हैं, गले घुट रहे थे गलियों के

सात

हरेक दिशा से विकल, आर्तनाद आता है
धर्मो-मज़हब हैं जैसे,सबसे बड़े आतंकी
सुन रहे हैं कि अब, ग्लोबल विलेज है दुनिया
किन्तु सब कुछ, सिमट रहा है स्मार्ट-सिटी में
काम होते हैं दफ़्तरों में, डिजिटल सारे
आदमी कार्ड और डिजिट में सिमटे जाते हैं
पूँजी और बाहुबल के, साथ मिला कर छल को
नाम खुशहाली का लेते हुये शैतान सभी
सारी इन्सानियतका क़त्ल किए जाते हैं
हरेक दिशा से विकल आर्तनाद आता है

ढोल बजाओ, डोण्डी पीटो 

ढोल बजाओ, डोण्डी पीटो I
राम-धर्म को साथ घसीटो II

काल-अकाल साथ में ले लो I
तारीख़ों से शतरँज खेलो II

शह और मात चलें आपस में I
सारी दुनिया कर लो वश में II

राष्ट्रवाद का राग अलापो I
आम जनों की गर्दन नापो II

वोट बैंक जोड़ो अधिसँख्यक I
छल-बल से बन जाओ नायक II

आओ-आओ राज करो अब I
हरा-भरा है मुल्क़, चरो अब II

आज फिर गाँव जाके आया हूँ

आज फिर गाँव जाके आया हूँ ।
सब से नज़रें चुराके आया हूँ ।

जिस की देहरी पे मेरा काबा है,
मैं वहीं सिर झुका के आया हूँ ।

सुखा रहा था जिसे वक़्त अपनी आँखों से,
वो एक बूँद, नदी में गिरा के आया हूँ ।

तुझे भी रेत से है प्यार बहुत जानता हूँ,
मैं अपनी रूह उसी में छुपाके आया हूँ ।

आज फिर बेज़ुबान-सा हूँ मैं

आज फिर बेज़ुबान-सा हूँ मैं ।
एक ख़ाली मकान-सा हूँ मैं ।

बिन सुने ही किया गया खारिज़,
बाग़ियों के बयान-सा हूँ मैं ।

वो अगर संग दिल है तो भी क्या,
पत्थरों पर निशान-सा हूँ मैं ।

अपनी तारीख़ के उजाले में,
कोई उजड़े जहान-सा हूँ मैं ।

अभी तो वक़्त का काफ़ी हिसाब बाक़ी है 

अभी तो वक़्त का काफ़ी हिसाब बाक़ी है ।
हमें जो पढ़नी है असली किताब बाक़ी है ।

इन्हें सम्भाल कर रखूँगा ग़ुम न जाएँ कहीं,
ख़राबियाँ जो अब देंगी ख़िताब बाक़ी है ।

तेरा गुरूर भी तोड़ेगी आबरू मेरी,
अभी तो आख़िरी जाम-ए-शराब बाक़ी है I

अभी गिरफ़्त में है मुल्क़ तानाशाही की,
कितना जाने अभी ख़ाना ख़राब बाक़ी है ।

तमाम उम्र तेरे जुल्म सहे हैं मैंने,
याद रखना अभी मेरा जवाब बाक़ी है ।

तेरे माफ़िक हैं हवाएँ अभी सही है मगर,
दिलों में मचल रहा इन्क़लाब बाक़ी है ।

अस्ल मुद्दों से तो भटका रहे हैं हमको वे

अस्ल मुद्दों से तो भटका रहे हैं हमको वे ।
कँटीली बाड़ में अटका रहे हैं हमको वे ।

नोट-बन्दी तो कभी गाय कभी जी०एस०टी०,
रोज़ी-रोटी से पर लटका रहे हैं हमको वे ।

विपक्ष-मुक्त ही बनना है कामना उन की,
परस्पर तोड़ कर चटका रहे हैं हमको वे ।

वतन परस्त हैं, बस, वे कि हम गद्दार सभी,
कूड़े-कचरे-सा ही फटका रहे हैं हमको वे ।

रंजिशो-दुश्मनी रखते हैं अपने दिल में औ’
दूसरों का दिखा खटका रहे हैं हमको वे ।

अपने जज़्बात छुपा कर रक्खें

अपने जज़्बात छुपाकर रक्खें ।
जीभ दाँतों में दबाकर रक्खें ।

हर तरफ़ आग लपलपाती है,
आप दामन को बचाकर रक्खें ।

जाने कब साथ छोड़ दें खुशियाँ,
ग़म को सीने से लगाकर रक्खें ।

जम्हूरियत की मत करें बातें,
हक़-ए-इनसाफ़ भुलाकर रक्खें ।

सवाल करने की हिम्मत न करें,
सर-ओ-नज़र को झुकाकर रक्खें ।

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