कौशलेन्द्र शर्मा ‘अभिलाष’ की रचनाएँ

कैसी होगी मेरी पहली रचना

रोज सुनूँ मैं अच्छी अच्छी बातें,
मिलती थी नवचिंतन की सौगातें।
मधुर मिलन की या पखेरु सा होना,
कैसी होगी मेरी पहली रचना?

नित तरुवर झोकों से चिंतित खोता,
मेघ वायु वर्षा से सिंचित होता।
वर्षा युवती सुन्दर रूप सलोना,
कैसी होगी मेरी पहली रचना?

टंकित हो वह भौंरा पतित हुआ जब,
आया मन में हास्य काव्य का धुन तब।
पुष्प वृक्ष गौरवगाथा या रोना,
कैसी होगी मेरी पहली रचना?

सायं देवालय जाकर जब बैठा,
भक्तिभाव सीचुंगा कहकर ऐंठा।
रामकृष्ण गोपी व्यापीजग कोना,
कैसी होगी मेरी पहली रचना?

आँख बंद स्वच्छंद हवा सा झोंका,
आकर नित के खोजबीन को रोका।
सब रस ओतप्रोत आनंदित करदे,
ऐसी होगी मेरी पहली रचना॥

गोपीगीत सुधामाधुरी (कुछ अंश)

जे पद पंकज दूर करै सब पाप अनेक महा दुख ज्वाला।
जे पद सेवक हौ अभिलाष सजे धन देवि करे नित ख्याला॥
ते पद पे तुम धेनु मझारत यो तक कूद गयौ कलि ब्याला।
ते पद पंकज दासि हृदै रख दौ तजि ताप औ पाप कसाला॥

हे मधुसूदन के पादपंकज नाम तुम्हारो जपा करते हैं।
जो न मिलै सजना को समीप तभो पग छाप छपा करते हैं॥
जो तुम धेनु पछेरन दौरत कंकड़ कंट चुभा करते हैं।
तो सब सोचि के सोचि कै बावरि नैनन नीर बहा करते है॥

साँझ हुवै तब धेनु बटोरि कै आवत गोपिन राह तकै जी।
हे मुखपंकज धेनु खुरोरज आन लदै अलका चटकै जी॥
बा मुखपंकज श्याम लटा जब मंद हँसी पर आ लटकै जी।
बा छबि छाप बिना सगरो सुख पाप समान हमैं खटकैं जी॥

देशभक्त की दहाड़

तेरी यही नापाक करतूते खरोचे देह को,
पर जो नृसिंह क्रोधित हुआ तो चीथड़े उड़ जाएंगे।
पैदा हुआ हमसे हमीको दे रहा धमकी कहाँ,
जो शिव त्रिनेत्र खुले कदा तो राख ही उड़ पाएंगे।
जो सोचते ले उड़ चलेंगे भूधरा को गीदड़ों!
तो राम के बाणों बिंधोगे मृत्यु गीत सुनाएंगे।
जो तुम हज़ारों कंस हो तो हैं करोड़ो कृष्ण भी,
जो छू रहे हैं आग को चिर भस्म ही रह जाएंगे।
चुप्पी को डर तूँ भाँप ना ये तो तुम्हारी भूल है,
जो जयध्वनि गूँजी कहीं काले निलय जल छाएंगे।
इतिहास भी तो जानता गर खेलता हमसे कदा,
भूखण्ड बंजर ही रहा बैठे सदा पछताएंगे।
भीख देकर सिर चढ़ाया भोगना तो है ही है,
तब क्या पता था श्वान के पिल्ले सभी हमसे पले हैं।
दे दिया अपना कहाँ उनका कहाएगा सदा,
कंकण भी ना बच पाएगा अब कुचलना पैरो तले हैं।
वाह धूर्तस्थानियों तुम नीच से भी नीच निकले,
इन सभी कुत्तों से बढ़कर नाल के सूंवर भले हैं।
मूर्खता की हद नहीं कोई बताओ जा जरा,
ये गीदड़ों के झुण्ड देखो सिंह को धरने चले हैं।
अंग में हो कान्ति तो दो हाथ करलो युद्ध में,
जो एक बूद पतित रुधिर पर दस तुम्हारों के गले हैं।
फिर कहुंगा शरण आओ शरण आओ तो भला,
वरना अनेको कीट दीप समीप अनजाने जले हैं

देखो खड़ा किनारा 

मत भूल तूँ कहाँ है किस तक है तुझको जाना,
जो स्वप्न देखता है सच कर के है दिखाना।
चुप चाप चलते चलते पा ले जो तेरी मंजिल,
फिर शोर तेरा होगा जिसका तूँ ही है काबिल।
तब पैर भी कटेंगे गिर जाएगा तूँ इक दिन,
पर उठना तुझको ही है इक भी सहारे के बिन।
बस लक्ष्य एक करले फिर जो रहे मिलेगा,
वह स्वप्न ना मिले तक तुझको न सोने देगा।
वह कोहिनूर भी बिन मदद के जगमगाए,
वह सूर्य भी तपा है तब ही प्रकाश पाए।
बस चल चलो मुसाफिर नहीं तेरा सहारा,
तब पास ही मिलेगा देखों खड़ा किनारा।

सुन ज़रा आत्मा पुकारे 

मै रहूँ नित बंधमुक्त विचार तेरे नित संवारे,
मरणधर्मी देह रूपी यंत्र में नित बंध डारे।
सुन जरा आत्मा पुकारे॥

नीर कुंड बिचर रहे वह मत्स्य ना कुछ भी विचारे,
मैं वही हूँ गगन में स्वच्छंद उड़ती सब बिसारे।
सुन जरा आत्मा पुकारे॥

वायु सी ही तीव्र वेग सुकृत्य से ली थीं बरारे,
तट निकट हो विकट से धीमी पड़ेंगी वो बयारे।
सुन जरा आत्मा पुकारे॥

फिर उठुंगी गगन तक संसार सागर के किनारे,
बादलों से कूद दुंगी संग में “अभिलाष” सारे।
सुन जरा आत्मा पुकारे॥

छुपा आग सा नित्य धुआँ घनेरा 

निशा आ गई सो गया नित्य जैसा,
मृषा स्वप्न खोया मिला विश्व कैसा।
पड़ा मृत्युशैया न वायु रहा है,
दिखे नेत्र से बूँद घेरे बहा है।
स्वजन् कंध लेकर चिता में सुलाते,
सभी पुत्र रोते विधाता रुलाते।
मुझे दृष्य था नित्य सोचा इन्हीं को,
इन्हीं के स्व की नित्य चिन्ता मुझी को।
जिन्हे मैने माना वे रोए घड़ी दो,
चिता में सुलाया मिला मृत्यु ही को।
आँख अाँसू बहा हाथ थामा किसीने,
कहा नित्य जापा मुझीको तुम्हीने।
इसी कर्म का पुण्य मुझको मिला था,
जिन्हे स्व कहा था उसी का सहा था।
इसी वस्त्र को नित्य धोके सुखाया,
सुखी ना किया हास्य मेरा बनाया।
जिन्हे मैंने माना जिन्हे मैंने पाया,
उन्हीने मुझे मृत्युशैया सुलाया।
न अभिलाष है अब उन्ही की हमें भी,
परम् मित्र है एक पीछे खड़े ही।
अरे मूर्ख पीछे दिखे तो दिखेगा,
जरा देख ले मित्र ही वो मिलेगा।
तली पे खड़ा हाथ खोले सदा है,
गिरेगा नही ना सुने वो गिरा है।
जिसे मित्र बोला कही ना दिखा वो,
जिसे याद छोड़ा मिला मैं उसीको।
तभी स्वप्न टूटा नया जन्म मेरा,
छुपा आग था नित्य धुआँ घनेरा।

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