गंगा प्रसाद विमल की रचनाएँ

शेष

शेष
कई बार लगता है
मैं ही रह गया हूँ अबीता पृष्ठ
बाकी पृष्ठों पर
जम गई है धूल।

धूल के बिखरे कणों में
रह गए हैं नाम
कई बार लगता है
एक मैं ही रह गया हूँ
अपरिचित नाम।

इतने परिचय हैं
और इतने सम्बंध
इतनी आंखें हैं
और इतना फैलाव
पर बार-बार लगता है
मैं ही रह गया हुं
सिकुडा हुआ दिन।

बेहिसाब चेहरे हैं
बेहिसाब धंधे
और उतने ही देखने वाले दृष्टि के अंधे
जिन्होंने नहीं देखा है
देखते हुए
उस शेष को
उस एकांत शेष को
जो मुझे पहचानता है
पहचानते हुए छोड देता है
समय के अंतरालों में…

कौन कहाँ रहता है

कौन कहां रहता है
घर मुझमें रहता है या मैं
घर में
कौन कहां रहता है
घर में घुसता हूँ तो
सिकुड जाता है घर
एक कुर्सी
या पलंग के एक कोने में
घर मेरी दृष्टि में
स्मृति में तब कहीं नहीं रहता
वह रहता है मुझमें
मेरे अहंकार में
फूलता जाता है घर
जब मैं रहता हूँ बाहर
वह मेरी कल्पना से निकल
खुले में खडा हो जाता है
विराट-सा
फूलों के उपवन-सा उदार
मेरे मोह को
संवेदन में बदलता
और संवदेन को त्रास में
घर मुझमें रहता है अक्सर
मैं भी रहता हूँ उसमें
वह बांधे रहता है मुझे
अपने पाश में…!

रूपांतर

रूपांतर
इतिहास
गाथाएं
झूठ हैं सब
सच है एक पेड
जब तक वह फल देता है तब तक
सच है
जब यह दे नहीं सकता
न पत्ते
न छाया
तब खाल सिकुडने लगती है उसकी
और फिर एक दिन खत्म हो जाता है वह
इतिहास बन जाता है
और गाथा

और सच से झूठ में
बदल जाता है
चुपचाप।

स्व चित्र

देर गये पेरिस के कला क्षेत्र
मेरे टूटे अंधेरे.
अभी पीड़ित करते हैं.
अभी बरसता है
और दुबारा

कहवा घर में
घुसता है कलाकार
उलझती हैं आँखें उस सुंदर चिन्ह पर
चेहरे पर टंकी है जबरन एक मुसकराहट.

अब मैं खुद को एक तसवीर की संज्ञा दूँगा
और अदा करूँगा खुद
दो गिलास मदिरा का मूल्य
अच्छा, आओ

करो शुरू……..
ओंठ….. दबी बारूद
मेरा माथा
उचित है पिस्तौल के लिए
मेरी आँखें………..
उन्हे तो मैं खुद भी नहीं समझ पाया.
(वे बंदीगृह के सींखचे नहीं बल्कि तलवार हैं)
परन्तु पलकों के सींखचों से
भाग खड़ा होऊँगा मैं
खुद से ही.

फिर तय कर लूँगा हिसाब
अपनी अस्मिता के इस पिंजरे से
यह यातनादायी पिंजरा.
तुम्हारे लिए तो रह जायेगा यह
स्वनिर्मित चित्र
यह है
जैसा तुम देखते हो
अतिरिक्त रूप से वास्तविक.
ले जाओगे साथ
ले जाओगे अपना खाद्य
मारोगे मुझे रुचेगा तुम्हे यह
जबकि?
छिपाओगे
लोगों के
हृदयों के अंतर में
जो बनाते हैं दहलीज
बनाते हैं
रात में क्रूर
सीढ़ियाँ
सीते हैं
अजाने ध्वज

एक छोटा गीत

अन्तहीन घासीले मैदानों पार
मेरे और
तुम्हारे बीच
बहती है दर्द की वोल्गा
और वहाँ हैं ऊँचे किनारे.
वहाँ है एक ऊँचाई
वहाँ एक भयंकर शत्रु…. वहाँ
वहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं

गोलियों से
गूँथ दिया था तुम्हे
हाँ– बख्तरबंद गाड़ियों के चिन्ह हैं
कुचला था तुम्हें
आग बरसाने वाले गोले से
भून दिया था तुम्हें.

परन्तु जोड़ रहे थे तुम शक्ति.
क्षरित हो गया था जीवन
पर अन्त नहीं आया था अभी
साँस नहीं लेते थे
ओह! अभी साँस नहीं ले रहे थे
ठीक ऐसे ही चीखा था कोई
ठीक ऐसे ही
और जो प्रतिपक्ष में थे
भयंकर हंसी जर्मन वर्दी में
पगला गये थे डरकर
उनके लिए तुम
अमर थे…..

हर एक का अपना पवित्र शिखर है
और वह
अंत तक रक्षित हिना चाहिए.
और तुमने
मृत्यु का वरण किया
बंधन का नहीं
वह महान विवेक
मामायेव कुर्गान है
और विवेक का अमानुषीपन है
फासीवाद!
एक बिम्ब
जो करीब-करीब भयासन्न करता है
तुम उस रहस्य के नरक में
प्रविष्ट हुए

प्यार
यह मामायेव कुर्गान है शेष
बस सनक.
और अब रूसी काल में
और व्यतीत कल के बाद
आज में
उभरते हो
जन-सम्मान के अमापे
शिखर में.

करुणा और मान के साथ
दहकते मुकुट
मेरे प्यारे
मेरे पावन्क्ष
मामायेव कुर्गान!

शक्ति 

जन्मी है शक्ति
गरीब की उपजाऊ धरती से
बेबसी में ही बढ़ी है
हमारी महान
सामर्थ्य

दो मुझे
दो शक्ति
जिसे हृदय ने रोपा है
जिसे रोप कर काटा है आदमी ने
और मापा है
फांसी के फंदों से.

सम्मान की खातिर 

ओ मेरे प्रपिता
दूरस्थ प्रपिता
सौ साल से भी उपर होंगे
उस उत्सव दिन की शाम को
जब तुमने दिया था मुझे
नाम.
यही तो है बूढ़े चरवाहे की कथा
तुमने प्यार किया सुन्दरी को
पर उसका बाप था थुलथुल महाजन
और दे दी लड़की एक तुर्क को
पैसों के लिए
लेकिन उत्सव दिन ही था
जब विवाह के ढोल डगमगाना शुरू हुए थे
तुमने छीन ली थी लड़की
उनके कब्जे से
साथ ही
मार दिया था दूल्हा अपने मुक्के से
और कसमें खाते हैं चरवाहे
कि तुमने मार दिया था उसे
बाएँ हाथ से ही
बस तभी से रह गया
छुटका-सा नाम
जो रक्षित करता है हमारा सम्मान
‘खपचू’ (बाएँ हाथ से काम करने वाला)
वाह, मेरे दादा!
दूर गये प्रपितामह!
तुम्हारा ही खून बहता है मेरी नसों में
और मुझे दिया गया है तुम्हारा नाम……
दो मुझे अपनी प्राचीनता
और शक्ति
इसलिए कि जब उकता जाऊँ
हस्तक्षेप से
या डुबाने वाली गप्पों से
नहीं हो सकता आज्ञाकारी
न सुन सकता हूँ आदेश
बन्द करता हूँ उन्हें अपने मुक्के से
बदमाश
बकवादी
तो देता हूँ भयानक लताड़
किसी के मान का मूल्य क्या है.
क्योंकि जिसे प्यार किया था और करता हूँ
किसी को भी नहीं
दादा
उसे नहीं देता समर्पण
अच्छा होता खत्म ही कर देता
इस सिर को
पर इसे होना ही है
सम्मान के निमित्त.

संगीत सुनते युद्धबंदी 

भूल चुके वे
कैसे किया जाता है जीवन
वे जानते हैं
कैसे मरते हैं.
और अब वे छाया की तरह
रास्ते पर
चलते हैं आदेश से
रुकते हैं हुक्म से ही
और हर तरह की विवसता में ही बस हँसते हैं.
परन्तु क्रूर हैं
क्रूर हैं लोग.
लापरवाही से खोलते हैं गवाक्ष
और उड़ेल देता है पुराने गीतों की धुनें ग्रामोफोन….
और धूल सने युद्धबन्दी रुकते हैं भौंचक
जैसे कोई पशु-समूह आँधी देख सिर उठाता हो
और काँपता हो भय में

यह प्यारा पुराना गीत,
उभार देता है असंतोष उनकी आँखों में
और जल्लाद चकित हैं
किस बात से भौंचक हैं वे
छायाओं ने क्या पाया है?
किसने दिया है संगीत युद्धबंदियों को?
ओह! कितने क्रूर हैं क्रूर हैं लोग!

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