गणेश पाण्डेय की रचनाएँ

यह देश 

यह देश मेरा भी है
यह देश आपका भी है
एक मत मेरे पास है
एक मत आपके पास भी है

एक अरब आपके पास है
एक सौ मेरे पास है
यह देश आपको प्यारा है
मुझको भी जान से प्यारा है

एक छोटी-सी जिज्ञासा है
मान्यवर, यह देश
कितना आपका है कितना हमारा है ।

पृथ्वी पर काली छाया 

पृथ्वी पर
एक विशाल काली छाया
उतर आई है पास और पास
बरगद पर पीपल पर
मन्दिर पर मस्जिद पर चर्च पर
ऊँची-ऊँची
बहुमंज़िली इमारतों से लेकर
फ़ुटपाथ की गुमटियों पर
झोपड़ियों पर
वायुयान पर साइकिल पर
मिसाइल पर फाउण्टेन पेन पर
माल पर सब्ज़ी की दुकान पर
नाई के सैलून पर आटाचक्की पर

अमरीका पर
इटली पर स्पेन पर जर्मनी पर
ईरान पर पाकिस्तान पर
दिल्ली पर कोलकाता पर
मुम्बई पर श्रीनगर पर
राजस्थान पर मध्यप्रदेश पर
उत्तर प्रदेश पर बिहार पर
नेपाल पर बांग्लादेश पर
चीन पर जापान पर
देश पर विदेश पर
धरती पर आकाश पर

काली से भी काली छाया
महा से भी महाकाली छाया
बूढ़े अधेड़ जवान बच्चे
स्त्री पुरुष किन्नर सबपर
छाई है यह अनाहूत
अप्रिय अवांछित
छाया

कोई जादू है इसके पास
सबको फाँस लिया अपने पाश में
काला जादू है किसी जादूगर का
जादूगर अदृश्य है छाया दृश्य है
अनुभवजन्य है

कोई जानकार
माथे का ताप देखकर बता सकता है
छाया अमुक शरीर के भीतर है
उतर रही है छाया उसके गले से
उसके फेफड़े में शनैः – शनैः
हवाईअड्डे पर रेलवे स्टेशन पर
बस अड्डे पर गायिका के बड्डे पर
अस्पताल की सफ़ेद चादर पर
मिट्टी के फ़र्श पर संगमरमर पर
छाया का साम्राज्य है
यह छाया जितनी प्रकट है
उतना राज़ है काला जादू है

कोई कहता है
शी चिन फिंग का कालाजादू है
वुहान से निकलती है यह प्रेतछाया
पूरी दुनिया पर छा जाती है
बीजिंग शंघाई को छोड़ देती है
आख़िर शी उसका कौन है
शी कहता है यह कालाजादू
डोनाल्ड ट्रम्प का है
पूरी दुनिया हलकान है
इन दोनों की शरारतों से

दुनिया बन्द है
किसी शहर और मुहल्ले की तरह
एक छोटी-गुमटी की तरह
माचिस की डिबिया की तरह बन्द
एक विश्वव्यापी कर्फ़्यू है इमरजेंसी है
भय की एक पूरी दुनिया है
पता नहीं यह काली छाया
कहाँ-कहाँ अपने विशाल पग धरेगी
कहाँ-कहाँ कोमल उँगलियाँ फिराएगी
महासुन्दरी के घने लम्बे केशों में
उसके रक्ताभ कपोलों पर अधरों पर
किस सुन्दरी के प्राणप्रिय पतिदेव को
सहसा कहीं से खींचकर
अपने तम के पाश में सुला लेगी
अपने अरूप रूप से बेसुधकर
किसी सुगन्ध की तरह उसके सांसों में
बस जाएगी

किसी पिता को
राशन चाहे सब्ज़ी की दुकान पर
पकड़ लेगी कोई भी रूपधर
चाहे बालरूप धरकर
चलती चली आएगी उँगली पकड़कर
किसी के घर
किसी के भाई की मोटरसाइकिल पर
बैठकर चाहे उसकी कलाई पर
राखी की तरह चिपक कर
बेटी हो या बहन पत्नी हो या माँ
कोई उसे अपनी आँखों से
देख नहीं पाएगी मति मारी जाएगी
निश्चिन्त हो जाएगी
उसे पता ही नहीं चलेगा
कि थैले के ऊपर गोभी पर मूली पर
मिठाई के डिब्बे पर बर्फ़ी पर बैठकर
कौन आ गया है उसके घर
किसी को मालूम नहीं
किसी समारोह में किसी भीड़ में
किसी जुटान में किसी के संग
कब किसकी देह से कूदकर
बैठ जाएगी किसपर

आधा दृश्य और आधा अदृश्य
इस काली छाया को कभी
चश्मा लगाकर भी
कोई देख नहीं पाएगा
कभी नंगी आँखों से आप से आप
कोई छाया आसपास दिख जाएगी
चलती-फिरती नाचती
कानों के पास भनभनाती

एक बुजुर्ग के कानों में
काली छाया की यह गूँज बढ़ते-बढ़ते
पृथ्वी के महासन्नाटे को चीरती हुई
विस्फोट में बदल जाती है
पूरे ब्रह्माण्ड में यह आवाज़
बादलों
और बिजली की गड़गड़ाहट की तरह
गरज उठती है- कोरोना कोरोना कोरोना
सूर्य-चन्द्र और दूसरे ग्रह-उपग्रह
सब चकित सारे देवी-देवता स्तब्ध
ओह पृथ्वी महासंकट में है

किसी के पास नहीं है कोई उपाय
पृथ्वी के किसी धर्म किसी ग्रन्थ
किसी के पास नहीं है
विपदा का दूर करने का कोई मन्त्र
सारे मन्दिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे बन्द
बड़े-बड़े धर्माचार्यों के फूले हैं
हाथ-पाँव

दिन हो रात हो सब एक जैसा है
टीवी के एक-एक चैनल पर
एक-एक एंकर के लिपे-पुते चेहरे पर
काली छाया की एक मोटी परत है
महिलाओं एंकर की लिपिस्टिक
होती है लाल और दिखती है काली
और काजल पर काली छाया की छाया है
टीवी के सामने बैठे बूढ़े
समाचार नहीं मृत्यु देखते हैं
पृथ्वी पर महामृत्यु का नंगानाच देखते हैं
हर चीज़ में
चील की तरह मण्डराती काली छाया देखते है

पूरी दुनिया
एक विशाल शवगृह में बदल गई है
मृत्यु का एक महाठण्डाघर जिसमें
बैठकर यह काली छाया खाएगी
एक-एक शव नोच-नोच कर

दुनिया के किसी दारोगा के पास
इतनी हिम्मत नहीं होगी कि उससे पूछे
यह क्या कर रही है काली बुढ़िया
अभी और कितने शव चाहिए तुझे

कह दो
कह दो कह दो दुनिया से कह दो
कोई नहीं है अब यहाँ महाशक्ति
सब मिट्टी के खिलौने हैं
पुतले हैं पुतले सारे एण्टीमिसाइल
नहीं है कोई लड़ाकू जहाज़ और टैंक
जो रोक सके काली छाया की आन्धी

बच्चो और युवाओ
इस समय पृथ्वी पर सबसे भयभीत हैं बूढ़े
इसलिए नहीं कि काली छाया को
पकी हुई देहें बहुत प्रिय है
उन्हें खा जाएगी
उन्हें डर है कि उनके बहाने
उनका घर देख लेगी
उनके बच्चों को देख लेगी

बूढ़े
बहुत से बहुत डरे हुए हैं बच्चो
वे अपने नन्हे-नन्हे पोतों को
उठाकर गोद में नहीं ले रहे हैं
दिल बहुत मचलता है
उनके नन्हें होंठ चूम नहीं पा रहे हैं
इसलिए कि काली छाया उनकी खोज में
तमाम समुद्र तमाम आकाश को छानकर
एक कर रही है

एक दादी है
जरा-सा छींक आ जाए तो इस उम्र में
पूरे घर में पोंछा लगाने लगती है
बच्चों को ख़ुद से दूर भगाने लगती है
कामवाली बाई को हटा दिया है
दूध लेने बाहर नहीं जाती है
अपने बूढ़े को भी बिस्तर पर
दूसरी करवट सोने के लिए कहती है

यह कैसी काली छाया है
अभी खाएगी कितने घर
कब जाएगी अपने देश अपने घर
कहाँ है इसका घर
क्या वुहान है इसका घर
जहाँ भी हो इसका घर
जाए अपने घर
दादी कहती है चाहे अपने
शी चिन फिंग के सिर पर
चाहे किसी समुद्र में फाट पड़े

टीवी तो नहीं फटती है
लेकिन टीवी के सामने बैठे बुजुर्गों का
रोज़-रोज़ कलेजा फट रहा है
जो बच्चे घर पर हैं उनके लिए भी
जो बाहर हैं उनके लिए तो और भी
बड़ी बिटिया किस हाल में होगी
छोटी कैसे होगी
सबकी बेटियाँ और बेटे कैसे होंगे

देश बन्द है
जहाज बन्द है रेल बन्द है
आना-जाना सब बन्द है फिर भी
कुछ मज़दूर हैं मजबूर हैं
जिनके पास कोई ठिकाना नहीं
चल पड़े सब पैदल अपने घर
अपने गाँव
शायद गाँव की गोद बचा ले उन्हें
इस काली छाया से

सरकारें जाग रही हैं
खजाने की तोप का मुँह पूरा खोलकर
ख़ाकी वर्दी
और सफ़ेदपोशाक की फ़ौज बनाकर
सड़कों और अस्पतालों में
काली छाया से
सफ़ेद तरीके से रोज़ लड़ रही हैं
ये तो काली छाया है छद्मयुद्ध कर रही है
छिप-छिपकर पीछे से
किसी का भी कालर पकड़कर खीच ले रही है
दूसरे के कन्धे पर बन्दूक रखकर चला रही है
धोखा देकर किसी भी देश में किसी भी राज्य में
किसी भी घर में घुस जा रही है

एक
पैंतालीस और चालीस साल का
बेहद ख़ूबसूरत जोड़ा
काली छाया की गिरफ़्त में
नाउम्मीद होकर
सबके सामने
पृथ्वी का श्रेष्ठ चुम्बन ले रहा है
अपने जीवन को चूम रहा है
अपने प्रेम को चूम रहा है
पृथ्वी को चूम रहा है

एक
साठ साल का बुज़ुर्ग
काली छाया की मृत्युकारा से
पाँच मिनट का पेरोल लेकर
अपने घर के गेट के सामने
काँच की दीवार के उस पार
अपने भरे-पूरे परिवार को
निहार रहा है

छाया का
न कोई धर्म है न ईमान
अभी-अभी इस क्रूर छाया ने
एक अड़तीस साल के युवा को
खींचकर अपना आहार बना लिया है
जिसकी बीवी रात के भोजन पर
उसकी प्रतीक्षा कर रही है
और उसकी नन्ही बच्ची
इन्तज़ार करते-करते सो गई है
जबकि छाया को ऐसा नहीं करना था
उस युवा के बुजुर्ग पिता कभी भी
छाया का भोजन बनने के लिए
प्रस्तुत थे

एक स्त्री
अपनी चूड़ियाँ तोड़ रही है
अपना सिर दीवार पर मार रही है
अटूट विलाप कर रही है
पर्वत रो रहे हैं नदियाँ आँसू बहा रही हैं
फूले हुए सुर्ख़ गुलमोहर
और पीले अमलतास रो रहे हैं
गुलाब असमय अपनी टहनियों से
मुरझाकर गिर रहे हैं

प्रकृति रो रही है
काली छाया हंस रही है
डायनासोर की तरह पृथ्वी को
रौंद रही है
दर्प में चूर निर्वस्त्र हो रही है
वीभत्स हो रही है
कई राजाओं महाराजाओं
और राष्ट्रध्यक्षों के सिर पर पैर रखकर
अहंकार में नाच रही है
यह विहसना ठीक नहीं है छाया
पृथ्वी से यह क्रूरता ठीक नहीं है छाया
मनुष्य से यह शत्रुता ठीक नहीं है छाया

यह एक ऐसा युद्ध है
सभी देशों की सरकारें एक साथ जाग रही हैं
और इस काली छाया के नाश के लिए
सारा विश्व एक है
घर-घर में
जितना भय है उससे ज़्यादा रोष है
दुनियाभर की असँख्य माँएँ विकल हैं
दुनियाभर के असँख्य पिताओं के सीने में आग है

दुनियाभर के असँख्य बेटे
कुछ सोच रहे होंगे कुछ कर रहे होंगे
यह काली छाया आज है कल नहीं रहेगी
नहीं रहेगी नहीं रहेगी नहीं रहेगी
पृथ्वी रहेगी पृथ्वी माँ है सबकी
इसी धरती के असँख्य लाल जुटे होंगे
अपनी माँ को बचाने के काम में जी-जान से
कोई दौड़कर बांस काट रहा होगा
कोई बन्दूक में गोली भर रहा होगा
कोई म्यान से तलवार निकाल रहा होगा
कोई काली छाया का झोंटा पकड़ने के लिए
अपनी भुजाओं को तैयार कर रहा होगा
कोई काली छाया को वश में करने के लिए
किसी प्रयोगशाला में कोई प्रयोग कर रहा होगा ।

देश के कहार हैं हम

देश के पैर हैं हम
देश के हाथ हैं हम
देशरत्न हैं आप
देश के कहार हैं हम

देश के मान्यवर हैं आप
यह देश हमारा भी है
यह देश आपका भी है

यह देश आपके पास है
हमारे पास क्या है ?

यह देश जो हमारा है 

कितना दम है मान्यवर
आपकी बूढ़ी हड्डियों में
अभी और आगे ले जाएँगे आप
इस देश को

कितना भरोसा है आप पर
कितना बोझ है आपकी आत्मा पर
माननीय प्रधानमंत्री जी
कितने दृढ़-प्रतिज्ञ हैं आप

आखिरी साँस तक ले जाएँगे अपने संग
इस देश को अभी और कितनी दूर ।
यह देश जो हमारा है और हमसे दूर होता जा रहा है ।

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा 

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है

तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है

तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कंडा अच्छा पाथती हो
कंडे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो

तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियाँ
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है
यह बात कितनी अच्छी है

तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा
चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो ।

पितृपक्ष 

जैसे रिक्शेवाले भाई ने किया याद
पूछा जैसे जूतों की मरम्मत करनेवाले ने
जैसे दिया जल-अक्षत सामनेवाले भाई ने
जैसे दिया ज्ञानियों ने
और कम ज्ञानियों ने
जैसे किया याद
अड़ोस-पड़ोस और गाँव-जवार ने
अपने-अपने पितरों को

मैंने भी किया याद
पिता को और पिता की उँगली को
बुआ को और बुआ की गोद को
और उसकी खूँट में बँधी दुअन्नी को
सिर से पैर तक माँ को
माँ के आँचल के मोतीचूर को
मामा को और मामा के कंधे को
दादी को और दादी की छड़ी को

अनुभव की चहारदीवारी में
और याद की चटाई पर
आते गए जो भी आप से आप
मैंने सबको किया याद
जिन्हें देखा और जिन्हें नहीं देखा

जैसे ठेलेवाले भाई ने किया याद
जैसे याद किया नाई ने
मैंने भी जल्दी-जल्दी खाली कराया
पितरों के बैठने के लिए अपना सिर ।

कालानमक 

दादा के हैं ये खेत
दादा कहते थे
उनके दादा के हैं
जाने कितने परदादाओं के हैं
ये खेत
गाँव के सबसे अच्छे
जड़हनिया खेत
बरस जाए ज़रा-सा पानी
तो लग जाता है काम भर का
और
समय से मिल जाए पानी
तो झूम उठती हैं
छाती से भी ऊँची-ऊँची
काले धान की बालियाँ
जिसे देख फूल जाती है
दादा के नाती-पोतों की छातियाँ
स्वस्थ बालियों के भीतर
देख-देखकर
कालानमक चावल के
सफेद हँसमुख दाने
खिलखिला उठते हैं
उनके दाँत

दादा के परदादा कहते थे
शुद्धोदन काका के भात से
अधिक गमकता था
हमारे चूल्हे का भात
हमारा कालानमक चावल
काका के बेटे के
मशहूर होने से पहले
दूर-दूर तक जाना जाता था
जाना तो अब भी जाता है
लेकिन
उसकी ख़ुशबू को
किसी की नज़र लग गई है
उपज घट गई है
काले नमक की डली से
अधिक मोहक
और गुड़ से अधिक मीठे
दादाओं के दुलारे
कालानमक धान की ऐसी अनदेखी
कपिलवस्तु में
इससे पहले कभी न हुई थी
इसी के भात ने उपजाया था
सिद्धार्थ में वेदना का विवेक
इसी ने किया था
यशोधरा को मुग्ध
राहुल को इसी से मिला था
बल
इसी ने बनाया था मुझे कवि
मृत्युशैया पर लेटे
इस जीवनदाता को
प्रणाम ।

बच्चों की दुनिया की ख़्वाहिश है 

पैंसठ की उम्र तक
आदमी में हाथ के अलावा
दो इतने मज़बूत पंख आ जाने चाहिए
कि समन्दर न पार सके तो कोई बात नहीं
कम से कम देश में उड़कर आ-जा सके
ख़ासतौर से ऐसे दिनों में

जब सरकारें
और पुलिस और जहाज़ और रेलें
हमें अपने बच्चों के पास ले जाने में
सबसे ज़्यादा नाकाम हों
जब धरती पर आदमी को आदमी से
यहाँ तक कि उसके साये से भी
ख़तरा पैदा हो जाए

तब हमारे लिए ये पंख
दूसरी ज़िन्दगी की मानिन्द होंगे
जब चाहूँ बेटियों के शहर में
ठीक उनकी छत पर उतरूँ
चाहे बेटे-बहू के शहर में
पहुँच जाऊँ

नाती-नातिनों और पोते-पोतियों को
पीठ पर बैठाकर पार्क के चक्कर लगाऊँ
चाहे आसमान की सैर कराऊँ
चाँद तक घुमा लाऊँ

पैंसठ पार एक बुज़ुर्ग को
और क्या चाहिए इन बेकार की सरकारों
और इस कचरे का ढेर जैसी दुनिया से
बड़े-बड़े राजनेताओं और महाकवियों को
अपनी इन्हीं आँखों से
बहुत से बहुत छोटा होते देखा है
बड़े-बड़े नए-नए पुल ढहते देखा है
ज़िन्दा तो ज़िन्दा मुर्दे को भी
अस्पतालों में मारे-मारे फिरते देखा है
किसी को भूखा, किसी को नंगा
किसी की आबरू
और किसी की जान जाते देखा
ये मत पूछो कि क्या नहीं देखा है

राम रहीम आसाराम
और रामकृपाल वगैरह को
बाकायदा जेल‌ जाते हुए देखा है
नाम के निर्मल बाबाओं को
समोसा और इमरती के नाम पर
भक्तजनों को मूँड़ते देखा है
बाबाओं-साबाओं को
इतना देख लिया है
कि अब उन पर रत्तीभर
भरोसा नहीं है

ख़ुदा पर है, गॉड पर है
और सबसे बढ़कर अपने राम पर
दोनों आँख मून्द कर भरोसा है
तब से है, जब मैं माँ की गोद में
राम हनुमान और दुर्गा माँ के सामने
आधे कपड़े में शीश नवाता था
क्या पता माँ के गर्भ में रहा होऊँ
और मन्दिर में आया होऊँ
माँ ने मन ही मन मिलाया हो
अपने प्रभु से
जब मैं कुछ भी
जानने की उम्र में नहीं था
अपने भगवान को तब से जानता हूँ
माँ जितना मानती थी उतना ही
मानता हूँ

ऐ ख़ुदा, हे मेरे राम !
कर दो, बस, एक काम
और कुछ नया न हो पाए
चाहे तमाम चीज़ें दुरुस्त न हो पाएँ
तो भी बुज़ुर्गों को इस क़ैद से आज़ाद करो
साइंसदानों से कहो
कि जैसे आदमी को चाँद पर
भेजने का कारनामा करके दिखाया है
आदमी को बदलकर दिखाए
उसमें उड़ने की ताक़त पैदा कर दें
बीमारियों से लड़ने की ग़ैरमामूली
सलाहियत पैदा कर दें

इस बुज़ुर्ग को अपने पोते
अपनी माँ और बाऊजी के पड़पोते
और पनातियों के पास जाना है
उनके साथ रहना है खेलना है
उनका घोड़ा बनना है‌
उनके संग दौड़ना है
उन्हें चूमना है प्यार करना है
बहुत लिख लिया कविता
अब जीना है।

हे प्रभु अब आप ही कर सकते हैं
किसी मनुष्य को पंख देने का अजूबा
ग्रन्थों में भरा पड़ा है आपके बारे में
आपके बड़े-बड़े कारनामें
जो भरोसा नहीं करते न करें
हाँ किशोरावस्था में
दर्शन-दिग्दर्शन पढ़कर
मेरा भी दिमाग़ बौड़िया गया था
जब ज़िन्दगी में कड़ी मारें पड़ी
कभी आँधी-तूफ़ान कभी सैलाब
और जब नौकरी के भीषण संघर्ष में
मैं अकेला और सामने बीस
आदमी के भेस में राक्षस आए
कम्युनिस्ट तक राक्षसों के दल में थे
चारो तरफ़ से घेर लिया गया था
तब आपके अलावा और कौन
मेरे साथ था मेरी पीठ पर
सिर्फ़ आपका हाथ था

इन्हीं नेत्रों से देखा था सबकुछ
इन्हीं बाजुओं से ख़ूब लड़ाई की थी
इस लम्बी लड़ाई को जीतने के बाद जाना
कि इस दुनिया में सब बहुत ख़राब है
बहुत गन्दा है बहुत घिनौना ओह
इस पर और इन बुरे चेहरों पर
अब थूकने का भी मन ही करता

सबसे
मुश्किल दिनों में माँ याद आई थी
बचपन की एक-एक बात याद आई थी
प्रभु याद आए थे प्रभु तो माँ के हृदय में
न जाने कब से बसे थे
प्रभु हों न हों, प्रभु के बारे में
अनीश्वरवादी कुछ भी कहें
जब गुरु ख़िलाफ़ थे गोविन्द ही तो साथ थे
उस वक़्त प्रभु मेरे बहुत काम आए थे
मुझे बड़ी से बड़ी लड़ाई से
डिगने नहीं दिया और क्या चाहिए था

अब इस उम्र में
बच्चों की दुनिया को मेरी ज़रूरत है
बच्चों के बच्चों को मेरी बहुत से बहुत
ज़रूरत है इस दुनिया को मेरी ज़रूरत है
मेरी लड़ाका देह की नसों में
सिर्फ़ गर्म ख़ून नहीं
सागर की तरह हिलोरे लेता
प्यार भी बहता है
यह प्यार मेरे बच्चों के लिए है
उनके बच्चों के लिए है
और पृथ्वी के सभी बच्चों के लिए है
मनुष्य के हों चाहे मनुष्येतर
मेरे हृदय में राक्षसों के
बच्चों के लिए भी प्यार है
चाहे उन्होंने मेरे बच्चों को
प्यार न किया हो
मेरे बच्चों के हिस्से का दूध
और छोटी-छोटी ख़ुशियां छीनी हों

प्रभु !
मैंने अपने हृदय का आयतन
कभी छोटा नहीं किया
किसी का नुक़सान नहीं किया
धोखा सह लिया, धोखा दिया नहीं
न पेट पर वार किया, न पीठ पर
जब भी मारा छाती ठोंककर
छाती पर मारा

पैंसठ पार अब इस दुनिया में
मेरे लिए न कुछ वीरोचित बचा है
न कोई लिप्सा, न आकर्षण
बस, मुझे बच्चों की दुनिया का
उड़ने वाला दादू और नानू बना दो, प्रभु !
आज भी मेरे काम आओ, प्रभु !
लड़ने वाले इन दो बाजुओं के अलावा
उड़ने वाले बाजूनुमा दो पंख दे दो, प्रभु !
उड़ूँ ख़ूब उड़ूँ बच्चों के संग-संग ।

प्रथम परिणीता

जिस तलुए की कोमलता से
वंचित है
मेरी पृथ्वी का एक-एक कण
घास के एक-एक तिनके से
उठती है जिसके लिए पुकार
फिर से जिसे स्पर्श करने के लिए
मुझमें नहीं बचा है अब
चुटकीभर धैर्य
जिसके पैरों की झंकार
सुनने के लिए
बेचैन है
मेरे घर के आसपास
गुलमोहर के उदास वृक्षों की कतार
और तुलसी का चौरा
जिसकी
सुदीर्घ काली वेणी में लग कर
खिल जाने के लिए आतुर हैं
चाँदनी के सफ़ेद नन्हे फूल
और
असमय
जिसके चले जाने के शूल से
आहत है मेरे आकाश का वक्ष
और धरती का अंतस्तल

तुम हो
तुम्हीं हो
मेरी प्रथम परिणीता
मेरे विपन्न जीवन की शोभा
जिसके होने और न होने से
होता है मेरे जीवन में
दिन और रात का फेरा
धूप और छाँव
होता है नीचे-ऊपर
मेरे घर
और
मेरे दिल
और दिमाग का तापमान

अच्छा हुआ
जो तुम
जा कर भी जा नहीं सकी
इस निर्मम संसार में मुझे छोड़कर
अकेला
सोचा होगा कैसे पिएँगे प्रीतम
सुबह-शाम
गुड़
अदरक
और गोलमिर्च की चाय
भूख लगेगी तो कौन देगा
मीठी आँच में पकी हुई
रोटी
और मेथी का साग
दुखेगा सिर
तो दबाएगा कौन
आहिस्ता-आहिस्ता
सारी रात

रोएँगे जब मेरे प्रीतम
तो किसके आँचल में पोछेंगे
रेत की मछली जैसी
अपनी तड़पती आँखें
और जब मुझे देख नहीं पाएँगे
तो जी कैसे पाएँगे
कैसे समझाएँगे
ख़ुद को
कैसे पूरी करेंगे जीवन की कविता
कैसे करेंगे मुझे प्यार

अच्छा हुआ
मीता
मेरी प्रथम परिणीता
छोड़ गई मेरे पास
स्मृतियों की गीता
दे गई
एक और मीता
परिणीता

जिसके जीवन में शामिल है
तुम्हारा जीवन
जिसके सिंदूर में है तुम्हारा सिंदूर
जिसके प्यार में है
तुम्हारा प्यार
जिसके मुखड़े में है तुम्हारा मुखड़ा
जिसके आँचल में है तुम्हारा आँचल
जिसकी गोद में है तुम्हारी गोद

कितना अभागा हूँ
भर नहीं पाया तुम्हारी गोद
तुम्हारे कानों में पहना नहीं पाया
किलकारी के एक-दो कर्णफूल
तुम्हारी आँखों के कैमरे में
उतार नहीं पाया
तुम्हारी ही बाल-छवि

किससे पूछूँ कि जीवन के चित्र
इतने धुँधले क्यों होते हैं
समय की धूल
उड़ती है
तो आँधी की तरह क्यों उड़ती है
प्रेम का प्रतिफल
दुख क्यों होता है
और
अक्सर
तुम जैसी स्त्री का सखियारा
दुख से क्यों होता है

तुम नहीं हो
तुम्हारी सखी है
है दुख है तुम्हारी सखी है
कर लिया है उसी से ब्याह
हूँ जिसके संग
देखता हूँ उसी में
तुम्हें नित ।

उस चाँद से कहना

तुम्हारे उड़ने के लिए है
यह मन का खटोला
खास तुम्हारे लिए है यह
स्वप्निल नीला आकाश
विचरण के लिए
आकाश का
सुदूर चप्पा-चप्पा
सब तुम्हारे लिए है

तनिक-सी इच्छा हो तो
चाँद पर
बना लो घर
चाहो तो चाँद के संग
पड़ोस में मंगल पर बस जाओ
जितनी दूर चाहो
जाओ

बस
देखना प्रियतम
अपने कोमल पंख
अपनी साँस
और भीतर की जेब में
मुड़ातुड़ा
अपनी पृथ्वी का मानचित्र
सोते-जागते दिखता रहे
आगे का आकाश
और पीछे प्रेम की दुनिया
धरती पर
दिखती रहें
सभी चीज़ें और अपने लोग

उड़नखटोले से
होती रहे
आकाश के चांद की बात
पृथ्वी के सगे-संबंधियों
और अपने चाँद की
आती रहे याद

जाओ जो चाहो तो जाओ
जाओ आकाश के चाँद के पास
तो लेते जाओ उसके लिए
धरती का जीवन
और संगीत
मिलो आकाश के चाँद से
तो पहले देना
धरती के चाँद की ओर से
भेंट-अँकवार
फिर धरती की चंपा के फूल
धरती की रातरानी की सुगंध
धरती की चाँदनी का प्यार
धरती के सबसे अच्छे खेत
धरती के ताल-पोखर
धान
और गेहूँ के उन्नत बीज
थोड़ी-सी खाद
और एक जोड़ी बैल
देना

कहना कि कोई सखी है
धरती पर भी है एक चाँद है
जिसे
तुम्हारे लौटने का इंतज़ार है
कहना कि छोटा नहीं है
उसका दिल
स्वीकार है उसे
एक और चाँद
चाहे तो चली आए
तुम्हारे संग
उड़नखटोले में बैठकर
मंगलगीत गाती हुई
धरती के आँगन में
स्वागत है ।

वर्दी में 

कई थीं
ड्यूटी पर थीं
कुछ तो बिल्कुल नई थीं

अँट नहीं पा रही थीं वर्दी में
आधा बाहर थीं आधा भीतर थीं ।

एक की खुली रह गई थी खिड़की
दूसरी ने औटाया नहीं था दूध
झगड़कर चला गया था तीसरी का मरद
चौथी का बीमार था बच्चा कई दिनों से
पाँचवीं जो कुछ ज़्यादा ही नई थी
गपशप करते जवानों के बीच
चुप-चुप थी

छठीं को कहीं दिखने जाना था
सातवीं का नाराज़ था प्रेमी
रह-रह कर फाड़ देना चाहता था
उसकी वर्दी ।

गुरु से बड़ा था गुरु का नाम 

गुरु से बड़ा था गुरु का नाम
सोचा मैं भी रख लूँ गुरु से बड़ा नाम
कबीर तो बहुत छोटा रहेगा
कैसा रहेगा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
अच्छा हो कि गुरु से पूछूँ
गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में ।

पागल हो, कहते हुए हँसे गुरु
एक टुकड़ा मोदक थमाया
और बोले-
फिसड्डी हैं ये सारे नाम
तुम्हारा तो गणेश पाण्डेय ही ठीक है ।

ओ ईश्वर 

ओ ! ईश्वर तुम कहीं हो
और कुछ करते-धरते हो
तो मुझे फिर
मनुष्य मत बनाना

मेरे बिना रुकता हो
दुनिया का सहज प्रवाह
ख़तरे में हो तुम्हारी नौकरी
चाहे गिरती हो सरकार

तो मुझे
हिन्दू मत बनाना
मुसलमान मत बनाना

तुम्हारी गर्दन पर हो
किसी की तलवार
किसी का त्रिशूल

तो बना लेना मुझे
मुसलमान
चाहे हिन्दू

देना हृष्ट-पुष्ट शरीर
त्रिपुंडधारी भव्य ललाट
दमकता हुआ चेहरा
और घुटनों को चूमती हुई
नूरानी दाढ़ी

बस एक कृपा करना
ओ ईश्वर !
मेरे सिर में
भूसा भर देना, लीद भर देना
मस्जिद भर देना, मंदिर भर देना
गंडे-ताबीज भर देना, कुछ भी भर देना
दिमाग मत भरना

मुझे कबीर मत बनाना
मुझे नजीर मत बनाना
मत बनाना मुझे

आधा हिन्दू
आधा मुसलमान ।

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला

कहाँ फेंका था तुमने
अपना वह माउथ आर्गन
जिस पर फ़िदा थीं तुम्हारी सखियाँ
कहाँ गुम हुईं सखियाँ किस मेले-ठेले में
किसके संग

कैसे तहाकर रख दिया होगा तुमने
अपना प्यारा-प्यारा स्लेटी स्कर्ट
किस खूँटी पर फड़फड़ा रहा होगा
वह बेचारा लाल रिबन
सब छोड़-छाड़ कर

कैसे प्रवेश किया होगा तुमने
पहली बार
भारी-भरकम प्रभु की पोशाक के भीतर

यह क्या है तुममें
जो बज रहा है फिर भी मद्धिम-मद्धिम
कहाँ हैं तुम्हारी सखियाँ

कोई क्या करे अकेले
इस राग का

देखो तो आँखें वही हैं
जिनमें छिपा रह गया है फिर भी कुछ
जस के तस हैं काले तुम्हारे वही केश
होठों में गहरे उतर गया है नमक
कुछ भी तो नहीं छूटा है
वही हैं तुम्हारे प्रियातुर कान
किस मुँह से जाओगी प्रभु के पास

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला
कैसे करोगी तुम ईश का ध्यान
जब बजने लगेगा कहीं
मद्धिम-मद्धिम
माउथ आर्गन ।

ज़मीनख़ोर

वे ज़मीनख़ोर थे
चाहते थे
औने-पौने दाम पर
कस्बे की मेरी पुश्तैनी ज़मीन
मेरा पुराना दुमंज़िला मकान

वे चाहते थे
मैं उच्छिन्न हो जाऊँ यहाँ से
अपने बीवी-बच्चों
पेड़-पौधों
फूल-पत्तियों
गाय-कुत्ते समेत

वे चाहते थे मैं छोड़ दूँ
धरती मइया की गोद
हटा दूँ अपने सिर से
उसका आँचल

वे चाहते थे बेच दूँ
ख़ुद को
रख दूँ
अपने मज़बूर हाथों से
उनकी आकाश जैसी असीम
लालची हथेली पर
अपनी जन्मभूमि
अपना ताजमहल

और
जीवन की पहली
अनमोल किलकारी का
सौदा कर लूँ

वे चाहते थे कर दूँ
उसे नंगा और नीलाम
भूल जाऊँ
अपने बचपन का
एक-एक डग

पहली बार
धरती पर
खड़ा होना
गिरते-पड़ते
पहला डग भरना

वे चाहते थे
बाबा बुद्ध की तरह
चुपचाप निकल जाऊँ
अपनी धरती छोड़कर
किसी को करूँ न ख़बर

वे तो चाहते थे
कि जाऊँ तो ऐसे
कि फिर लौट कर आने का
झंझट ही न रहे

वे मेरे मिलने-जुलने वाले थे
मेरे पड़ोसी थे
कुछ तो बेहद क़रीबी थे
और मेरे ही साथ
मेरी धरती के साथ
कर रहे थे राजनीति
खटक रहा था उन्हें
मेरा अपनी ज़मीन पर बने रहना

वे चाहते थे कि देश-विदेश
अनन्त आकाश में कहीं भी
चाहे उसी ज़मीन के नीचे
जल्द से जल्द चला जाऊँ
पाताल में।

यह घर शायद वह घर नहीं है

जिस घर में रहते थे हम
यह शायद वह घर नहीं है
कहाँ है वह घर

और
कहाँ है उस घर का लाडला
जो दिन में मेरे पैरों से
और अँधेरी रातों में
मेरे सीने से चिपका रहता था

कहाँ खो गया है
बहती नाक और खुले बाल वाला
नंग-धड़ंग मेरा छोटा बाबा
मुझे ढूँढ़ता हुआ
कहाँ छिप गया है
किस कमरे में
किस पर्दे के पीछे
कि माँ की ओट में है
नटखट

यह कौन है जो तन कर खड़ा है
किसका बेटा है मुझे घूरता हुआ
बेटा है कि पूरा मर्द
भुजाओं से
पैरों से
और छाती से
फट पड़ने को बेचैन

आख़िर क्या चाहिए मुझसे
किसका बेटा है यह
जो छीन लेना चाहता है मुझसे
सारा रुपया

मेरा बेटा है तो भूल कैसे गया
माँगता था कैसे हज़ार मिट्ठी देकर
एक आइसक्रीम
एक टाफ़ी और थोड़ी-सी भुजिया

माँग क्यों नहीं लेता उसी तरह
मुझसे मेरा जीवन
किसका है यह जीवन
यह घर

कहाँ छूट गई हैं
मेरी उँगलियों में फँसी हुईं
बड़ी की नन्ही-नन्ही कोमल उँगलियाँ
उन उँगलियों में फँसा पिता
कहाँ छूट गया है

किसी को ख़बर न हुई
हौले-हौले हिलते-डुलते
नन्ही पँखुड़ी जैसे होंठों को
पृथ्वी पर सबसे पहले छुआ
और सुदीप्त माथा चूमा
पहली बार
जिनसे
मेरे उन होंठों को क्या हो गया है
काँपते हैं थर-थर
यह कैसा डर है
यह कैसा घर है

छोटी की छोटी-छोटी
एक-एक इच्छा की ख़ातिर
कैसे दौड़ता रहा एक पिता
अपनी दोनों हथेलियों पर लेकर
अपना दिल और कलेजा
अपना सब कुछ
जो था पहुँच में सब हाज़िर करता रहा

क्या इसलिए कि एक दिन
अपनी बड़ी-बडी आँखों से करेगी़
पिता पर कोप

कहाँ चला गया वह घर

मुझसे रूठकर
जिसमें पिता पिता था
अपनी भूमिका में
पृथ्वी का सबसे दयनीय प्राणी न था
और वह घर
जीवन के उत्सव में तल्लीन
एक हँसमुख घर था

यह घर शायद वह घर नहीं है
कोई और घर है
पता नहीं किसका है यह घर ?

यह अटाला ही अब जिसका ठिकाना है 

कहाँ हो तुम
उजाले में हो कि किसी अँधेरे में
बोलो अकेले में हो
कि किन्हीं अपनों के बीच
कि यादों के किसी तहख़ाने में
बंदी

किसी छत के नीचे हो
कि खुले आसमान में
पृथ्वी के किस कोने में हो
इस वक़्त
कितनी तेज़ है धूप
और हवा कितनी गर्म

जहाँ भी हो
कैसी हो
किसी घर में हो
सुकून का घर है
कि घर है
कोई खिड़की है घर में
जिसके आसपास हो

जो दिख जाय
यह अटाला कहीं से
तो देख लो
काम भर का है यहाँ भी सब

इस अटाले पर
बस
एक मैं हूं
जो किसी काम का नहीं हूं

चाय की पत्ती है
तो चीनी नहीं है मेरे पास
चीनी है तो माचिस नहीं
माचिस है
तो उसमे अब आग कहाँ
तुम्हारे पास आग है

ऐसे ही बदल जाती हैं चीज़ें
बदलने के लिए ही होती हैं चीज़ें
इस दुनिया को देखो
कितनी बदल गई है

जहाँ होना था चैन का घर
लग गया है वहाँ मुश्किलों का कारख़ाना
रोज़ सुबह
एक थका हुआ आदमी निकलता है घर से
और
शाम को थोड़ा और थका हुआ
लौटता है बाहर से

अब कोई नहीं देखता चाव से
मेरी अधलिखी कविता
किसे फ़ुरसत है कि देखे
क्या पक रहा है
क्या रिस रहा है
मेरे भीतर
किससे कहूँ कि आओ बैठो
घड़ी भर
मेरे इर्द-गिर्द

ज़ंजीर की झंकार सुनो
देह के हर हिस्से से उठती हुई
पुकार सुनो
ये देह और देह का मूल
सब हुआ है थककर चूर

कैसी हो तुम
किस हाल में हो
किसी सितार का कीमती तार हो
ख़ुश हो
कि मेरी तरह हो
साँस है कि टूटती नहीं
और लेना उससे भी कठिन
भला अब कौन आएगा
आख़िरी वक़्त में
इस भीड़ भरे एकांत में
मेरा पुरजा-पुरजा जोड़ने

कैसा आदमी हूँ
बावला नहीं हूँ तो और क्या हूँ
अपने को ख़त्म करते हुए
सोचता हूँ ज़िंदगी के बारे में
अपनी कविता का अन्त जानते हुए —
इस कबाड़ के ढेर पर
एक फेंका हुआ सितार हूँ बस
और
यह अटाला ही अब जिसका ठिकाना है ।

कहाँ जान पाते हैं सब लोग

नाती-पोतों की दुनिया में मगन
दादियों और नानियों की
थुलथुल टोली की वह नायिका
इतनी वयस्त है कि भूल गई है
काफ़ी समय से बंद
खिड़कियों को खोलना
वक़्त की तमाम धूल को झाड़ना
किसी को याद रखना
भूल गई है नूरजहाँ का गाना

कहती है–
अब मेरे लिए
इतना वज़नी शरीर लेकर
न नाचना मुमकिन है न गाना

बीते दिनों में लौटना
पीछे की पगडंडी पर कदम रखना
और किसी पुरानी छत पर
चाँदनी रातों में तन्हा टहलना
अब मुमकिन नहीं

कह दो
अब कुछ नहीं मुमकिन
पता नहीं कहाँ रख दी है
वह क़िताब

कह दो
प्रेम मेरे लिए
पहली कक्षा का एक पाठ था
किस कमबख़्त को याद रहता है
इतना पुराना पाठ
कोई याद दिलाए भी तो हँसकर
टाल जाना बेहतर

आख़िर
कितना वक़्त लगता है
किसी पाठ के कुपाठ होने में
मैं जिसे प्रेम करती हूँ
राख में दबी हुई चिंगारी की तरह
बस प्रेम करती हूँ
उसे याद नहीं करती हूँ

प्रेम मेरे लिए
न मेरी दिनचर्या का हिस्सा है
न मेरे घर के कोने में
इस तरह की
किसी जानलेवा चीज़ के लिए
झाड़ू जितनी जगह है
घर की कारा में ऐसा कुछ रखना
कितना ख़तरनाक होता है
कहाँ जान पाते हैं
सब लोग ।

गर्वीली बिंदी 

ज़रा-सा
छू गई थी बस
वह कलफ़दार साड़ी गुलाबी
सुबह की गाड़ी के पहले डिब्बे में
किसी माता के मंदिर को जातीं
और उसी के गुन गातीं
कई रंग और कई उम्र
और कई चेहरों वाली
स्त्रियों के बीच ।

देर से
रह-रह कर हिल-डुल रहा था
एक कंगन और एक मुखड़ा
बीचोबीच ।

आउटर सिंगनल पार करते-करते
दिशाओं में जीवन रस घोलती हुई
एक लंबी सीटी के साथ
दिल के किसी कोने से निकला– हाय
कोई बेधक गान।

प्लेटफार्म पर उतरते-उतरते
लगा कि मुझे
खींच नहीं पा रही थी पीछे से
सोने की मोटी चेन ।

चश्मे के सुनहले फ्रेम से
पलक झपकते
बाहर हो गया था मैं ।

मुझे ढूँढ़ नहीं रही थीं
रेले में पता नहीं किसे ढूँढ़ती हुई
वे दो खोई-खोई आँखें।

बोलते-से होंठ बुला नहीं रहे थे मुझे
अपने पास।

फिर भी
एक इच्छा हुई कि देखूँ पीछे मुड़कर
और दौड़कर
चूम लूँ उसकी गर्वीली बिंदी
झुककर
पर यह तो कोई बात न हुई ।

उठो यशोधरा ! तुम्हारा प्यार सो रहा है 

कैसे जगाऊँगा उसे
जिसे जागना नहीं आता
प्यार से छूकर कहूँगा उठने के लिए
कि चूमकर कहूँगा हौले से

जागो यशोधरा !
देखो कबसे जाग रही है धरा
कबसे चल रही है सखी हवा
एक-एक पत्ती
एक-एक फूल
एक-एक वृक्ष
एक-एक पर्वत
एक-एक सोते को जगा रही है
एक-एक कण को ताजा करती हुई
सुबह का गीत गा रही है

उठो यशोधरा !
तुम्हारा राहुल सो रहा है
तुम्हारा घर सो रहा है
तुम्हारा संसार सो रहा है
तुम्हारा प्यार सो रहा है

कैसे जगाऊँ तुम्हें
तुम्हीं बताओ यशोधरा !
किस गुरु के पास जाऊँ
किस स्त्री से पूछूँ
युगों से
सोती हुई एक स्त्री को जगाने का मंत्र

किससे कहूँ कि देखो
इस यशोधरा को
जो एक मामूली आदमी की बेटी है
और मुझ जैसे
निहायत मामूली आदमी की पत्नी है
फिर भी सो रही है किस तरह
राजसी ठाट से

क्या करूँ
इस यशोधरा का
जिसे
मेरे जैसा एक साधारण आदमी
बहुत चाह कर भी
जगा नहीं पा रहा है
और
कोई दूसरा बुद्ध ला नहीं पा रहा है ।

जो उसके पास हुआ मुझसे बड़ा दुख 

इस घर से
जो निकलना ही हुआ
तो किधर ले चलेंगे मुझे
मेरे क़दम

कहीं तो रुकेंगे
कोई ठिकाना देखकर
किस घर के सामने रुकेंगे
ये पैर

अब इस उम्र में
किस अधेड़ स्त्री को होगा भला
मेरी कातर पुकार का इन्तज़ार

फिर मिली कोई चोट
तो मर नहीं जाऊँगा
डर कर
फिर मुड़ेंगे किधर मेरे पैर
किस दिशा में ढूँढ़ेंगे
कोई रास्ता
किस बस्ती में पहुँच कर
किस स्त्री के कंधे पर रखूँगा सिर
क्या करूँगा जो उसके पास हुआ
मुझसे बड़ा दुख

दो दुखीजन मिल कर
बना सकते हैं क्या
एक छोटा-सा
सुखी घर ।

भरभराकर ढह गया है

ढलान पर चलते हुए
सोचता हूँ कि यह कैसी तेज़ी है
भागते हैं पैर आप से आप
कहाँ पहुँचकर चाहते हैं
सुस्ताना
धरती के किस भाग पर
होना चाहते हैं मुझसे अलग
और मेरी बाँहें भी पैरों के संग-संग
किससे मिलने की जल्दी में हैं

मेरी देह का हर हिस्सा
छोड़ना चाहता है मुझे
दुर्दिन की यह कैसी बरसात है
कि चू रहा है जगह-जगह
देह का घर

ज़रा-सी बरसात में
भरभरा कर
ढह गया है दिल का कमरा
आँखों के बरामदे में
अब कैसे बीतता है
खाली-खाली दिन
और काली-काली रातें

किसे सुनाऊँ —
जीवन की कमजोर पटकथा
किस रचयिता से कहूँ —
मुझ ग़रीब की कथा में ला दे
कोई मोड़
ढलान पर बिछा दे हरियाली
थके हुए पैरों को मिला दे
कल-कल करते झरने से

आँखों में भर दे जीवन का रंग
और धरती का असीम आकाश
आतुर कानों के पास कर दे
किसी की पुकार
एक साधारण हृदय को बना दे
प्रेम का असाधारण सभागार

मेरी कविता को कर दे
फिर से जीवित
और इस कवि को बना दे
नवजीवन का कवि ।

किसी का गुमशुदा समान हूँ 

कहाँ हो तुम
न जाने कब से
खुला है यह द्वार तुम्हारे लिए
मिश्री की डली
एक गिलास शीतल जल
और एक कप गर्म चाय
खास तुम्हारे लिए

मेरी थाली का पहला कौर
मेरी आँखों की पहली नींद
और पहला स्वप्न तुम्हारे लिए
कोई तीस बरस से
सब जस का तस
तुम्हारे लिए

गुलमोहर के ये लाल फूल
खिलते हैं तुम्हारे लिए
मेरी खिड़की के सामने
झूमता है
अमलतास के पीले फूलों का
गुच्छा
खास तुम्हारे लिए

मेरे कमरे की छत पर
छाती है काली घटा
और बरसता है मेघ तुम्हारे लिए
निकलता है दिन
और होती है रात तुम्हारे लिए
उगता है चांद
और बहती है ठंडी-ठडी पुरवाई
तुम्हारे लिए

किसी की शादी हो
चाहे कोई संगीत संध्या
दिन और मौसम कोई भी
अपने में लीन स्त्रियों
और इत्र की ख़ुशबुओं के बीच
तुम्हें ढ़ूँढ़-ढूँढ कर
लौटता हूँ थक-हार कर
नित्य

बाहर का उजाला हो
चाहे भीतर का अँधेरा
जर्जर किवाड़ पर हर दस्तक
हर आहट पर दौड़ पड़ता हूँ
फ़ोन की हर घंटी पर भागता हूँ
तुम्हारे लिए

जैसे मैं बना ही हूँ तुम्हारे लिए
कहाँ हो तुम
अपने इस पुराने और बेमरम्मत
सामान को छोड़कर
इस उम्र में
और इस मोड़ पर
अब और क्या हो सकता है भला
इस टूटे-फूटे जीवन में
इसके सिवा कि मैं किसी का
एक गुमशुदा सामान हूँ ।

जिसे ले जाना हो मुझे आए

जीवन में सुख और दुख
और जीवन में हार और जीत
जीवन की चौखट पर
जैसे उजाला और अँधेरा
जीवन में
जैसे कंटीले पथ पर धूप और बदली

प्रेम में
जैसे किसी का मिलना और दूर होना
जैसे समुद्र में विलीन
कोई मछली सहसा उछली
और फिर खो गई

अतल गहराई में कहीं
जैसे ढ़ूँढ़ना रेत में जल
और जल में प्यास की परछाईं
जीवन में जैसे करना
जीवन की खोज

जीवन की बंजर धरती पर
कुछ बेतरतीब चीज़ें और चेहरे
कुछ बेमतलब ठोकरें और मारकाट
कुछ फ़ालतू पत्थर और कबाड़
कुछ विस्मय और टूटी हुई आस
और एक भूला हुआ रास्ता
एक भूली हुई याद
एक भूला हुआ स्वप्न
जैसे किसी
पतंग की उलझी हुई डोर
जैसे किसी बच्चे का
टूटा हुआ खिलौना

यह कैसा जीवन है
जिसमें मैं हूँ और नहीं हूँ
मेरा जीवन मेरा नहीं है
यह किसका जीवन जी रहा हूँ मैं
जीवन की इस भूलभुलैया में
किस मंज़िल पर आ गया हूँ मैं

कुछ भी नहीं दिखता जहाँ से
न ताजमहल जैसा कुछ
जीवन में अविस्मरणीय
न कोई ढंग का ठिकाना
न कोई बहती हुई नदी
न कोई चलती हुई रेल
न कोई उड़ती हुई तितली
न कोई महकता हुआ फूल
चारो तरफ बस धूल ही धूल

यह कैसी धूल भरी आँधी है
जिसमें फँस गया हूँ मैं

मेरी आँखों के सामने
यह कोई सचमुच का अँधेरा है
कि धरती से बोरिया-बिस्तर समेटने का
इशारा
कि किसी दूसरे ग्रह से कोई बुलावा
यह कैसा सन्नाटा है मेरे भीतर
और बाहर कैसा शोर है

कह दो–
मैं नहीं हूँ अपने में
कह दो–
अब यहाँ कोई नहीं रहता
न हवाओं में गंध
न फूलों में रंग और सुगंध

न बालियों में साबुत धान
न जामुन में स्वाद
न आग में ताप
न बर्फ़ में ठंड
न सूर्य में प्रकाश
न जल में तृप्ति
न जीवन में प्राण

कह दो–
यह पृथ्वी
अब प्राणवंचितों की पृथ्वी है
जीवन का पठार है पृथ्वी
भरे-पूरे हाड़-माँस वाले
दुखी
और असहाय पुतलों की पृथ्वी है

पुतलों जैसे इस जीवन का क्या करूँ
क्या करूँ पैरों में बंधी इस पृथ्वी का
कह दो —
जिसे ले जाना हो मुझे
आए
और मेरी बाँहों को थाम ले ।

यहीं देखा 

कई
कवि देखे
कई तरह के
कवि देखे

कोई मधुकर था यहाँ
कोई काला था, कोई दिलवाला
कोई परमानंद, कोई विश्वनाथ ।
देवेंद्र कुमार को यहीं देखा
अपनी हीर कविता के लिए राँझा बनते ।

एक चाँद कम पड़ जाता है 

कई बार एक जीवन कम पड़ जाता है
एक प्यार कम पड़ जाता है कई बार
कई बार हज़ार फूलों के गुलदस्ते में
चम्पे का एक फूल कम पड़ जाता है
एक कोरस ठीक से गाने के लिए
एक हारमोनियम कम पड़ जाता है
कई बार ।

सांसें लम्बी हैं अगर
और हौसला थोड़ा ज़्यादा
तो तबीयत से जीने के लिए
एक रण कम पड़ जाता है
जो है और जितना है उतने में ही
एक दुश्मन कम पड़ जाता है।

दिल से हो जाय बड़ा प्यार अगर
तो कई बार
एक अफ़साना कम पड़ जाता है
एक हीर कम पड़ जाती है
ठीक से बजाने के लिए
सितार का एक तार कम पड़ जाता है
एक राग कम पड़ जाता है ।

कई बार
आकाश के इतने बड़े शामियाने में
एक चाँद कम पड़ जाता है
दुनिया के इस मेले में देखो तो
एक दोस्त कहीं कम पड़ जाता है
एक छोटी-सी बात कहने के लिए
कई बार एक काग़ज़ कम पड़ जाता है
एक कविता कम पड़ जाती है ।

गायिका

बस
ऐसे ही
गाती रहो गायिका
इस जमघट के घट-घट में
ढूँढ़ो
नन्द के लालन को
पकड़ो
रंग डारो
छा जाओ गायिका
आतुर
रागमेघ बनकर टूट पड़ो
अरराकर

विकल अति तप्त धरा के
एक-एक कण
और एक-एक बीज को
छू-छू कर बरसो गायिका
एक-एक पुकार से
लिपट-लिपट कर बरसो
गायिका
आज की रात
और
मेरे जीवन की रात के हर क्षण को
बना दो अपने जैसी गाती हुई ।

यह एक खास रात है
गायिका
तुम बरस रही हो
और कोई तुम्हें सुन रहा है
रोम-रोम से
ऐसे ही बरसती रहो गायिका
अनुभव और स्मृति की उर्वर घरती पर
तुम गा रही हो
तुम बरस रही हो मुझ पर ऐसे
कि कोई और नहीं बरस रही है
पृथ्वी पर
कोई और गायिका नहीं गा रही है
किसी लोक में ऐसे
कोई और नहीं सुन रहा है तुम्हें
जिस तरह मैं सुन रहा हूँ तुम्हें ।

गायिकी की नौका में तुम्हारे संग
ऐसे ही हिचकोले खाते रहना चाहता हूँ
सारी रात
ऐसे ही गाती रहो गायिका
जैसे
नन्ही-नन्ही उँगलियों के इशारे पर
नाचता है तुम्हारा हारमोनियम
बांसुरी जैसे
जैसे ढोल ।

ऐसे ही गाती रहो
ऐसे ही बार-बार
गंव से लट पीछे ले जाओ
छेड़ती रहो
आलाप जैसी उठी हुई बाँहों से तान
एक-एक बोल पर
थिरकती हुई अपनी आँखों से गाओ
गाते हुए होंठों से गाओ
कण्ठ के भीतर बैठी हुई
राधा के कण्ठ से गाओ
गायिका
ऐसे ही ।

कोई और फिर से याद आकर
जाए तो जाए निष्ठुर
आज की रात
मुझे छोड़कर
तुम न जाओ गायिका
ऐसे ही बस गाती रहो
जब तक मैं हूँ ।

इतनी अच्छी क्यों हो, चन्दा ! 

तुम अच्छी हो
तुम्हारी रोटी अच्छी है
तुम्हारा अचार अच्छा है
तुम्हारा प्यार अच्छा है
तुम्हारी बोली-बानी
तुम्हारा घर-संसार अच्छा है
तुम्हारी गाय अच्छी है
उसका थन अच्छा है
तुम्हारा सुग्गा अच्छा है
तुम्हारा मिट्ठू अच्छा है
ओसारे में
लालटेन जलाकर
विज्ञान पढ़ता है
यह देखकर
तुम्हें कितना अच्छा लगता है ।

तुम
गुड़ की चाय
अच्छा बनाती हो
बखीर और गुलगुला
सब अच्छा बनाती हो
कण्डा अच्छा पाथती हो
कण्डे की आग में
लिट्टी अच्छा लगाती हो
तुम्हारा हाथ अच्छा है
तुम्हारा साथ अच्छा है
कहती हैं सखियाँ
तुम्हारा आचार-विचार
तुम्हारी हर बात अच्छी है ।

यह बात कितनी अच्छी है
तुम अपने पति का
आदर करती हो
लेकिन यह बात
बिल्कुल नहीं अच्छी है
कि तुम्हारा पति
तुमसे
प्रेम नहीं करता है
तुम हो कि बस अच्छी हो
इतनी अच्छी क्यों हो, चन्दा !

चुप क्यों रहती हो
क्यों नहीं कहती अपने पति से
तुम उसे
बहुत प्रेम करती हो ।

तुम्हें माँग सकता हूँ फिर से 

न तुम्हारा अटाला दूर है
और न मैं उन रास्तों से
अनजान
बस कोई मोड़ आ गया है
जिसे फान्दकर
क्या मैं आ सकता हूँ
फिर से
तुम्हारी दहलीज़ पर

जानता हूँ
मैं तुम्हारी आत्मा का द्वार
और अपूर्व देह का चप्पा-चप्पा
अब उसे
छू सकता हूँ क्या कभी

तुम्हारी आँखों के एकान्त में
दिन तो दिन
रात के अन्तिम पहर में
नज़र बचाकर
आ सकता हूँ क्या कभी

मीठे सन्तरे की फाँक
और गुलाब की पँखुड़ियों जैसे
होंठों पर
अपना खुरदुरा नाम
लिख सकता हूँ क्या कभी
रेशम जैसी बाँहों के फन्दे में
झूल सकता हूँ फिर कभी

चान्द तारों से सजी
तुम्हारी साड़ी की खूँट में
अपनी डबडब आँखें
बान्ध सकता हूं क्या कभी
तुम्हारी सांसों के आसपास
सांस ले सकता हूँ
फिर कभी

जीवन अपनी इच्छा से
जी सकता हूँ
अब कभी
कुछ दिनों के लिए
समय देवता से
तुम्हें
फिर से माँग सकता हूँ
क्या कभी।

घर सीरीज

1

यह अटाला ही अब जिसका ठिकाना है

कहाँ हो तुम
उजाले में हो कि किसी अन्धेरे में
बोलो, अकेले में हो
कि किन्हीं अपनों के बीच
कि यादों के किसी तहख़ाने में
बन्दी

किसी छत के नीचे हो
कि खुले आसमान में
पृथ्वी के किस कोने में हो
इस वक़्त
कितनी तेज़ है धूप
और हवा कितनी गर्म
जहाँ भी हो
कैसी हो
किसी घर में हो
सुकून का घर है
कि घर है
कोई खिड़की है घर में
जिसके आसपास हो

जो दिख जाए
यह अटाला कहीं से
तो देख लो
काम भर का है यहाँ भी सब

इस अटाले पर,
बस,
एक मैं हूँ
जो किसी काम का नहीं हूँ
चाय की पत्ती है
तो चीनी नहीं है मेरे पास
चीनी है तो माचिस नहीं
माचिस है
तो उसमे अब आग कहाँ
तुम्हारे पास आग है

ऐसे ही बदल जाती हैं चीज़ें
बदलने के लिए ही होती हैं चीज़ें
इस दुनिया को देखो
कितनी बदल गई है
जहाँ होना था चैन का घर
लग गया है वहाँ मुश्किलों का कारख़ाना
रोज़ सुबह
एक थका हुआ आदमी निकलता है घर से
और
शाम को थोड़ा और थका हुआ
लौटता है बाहर से

अब कोई नहीं देखता चाव से
मेरी अधलिखी कविता
किसे फ़ुरसत है कि देखे
क्या पक रहा है
क्या रिस रहा है
मेरे भीतर
किससे कहूँ कि आओ बैठो
घड़ीभर
मेरे इर्द-गिर्द

ज़ंजीर की झनकार सुनो
देह के हर हिस्से से उठती हुई
पुकार सुनो
ये देह और देह का मूल
सब हुआ है थककर चूर

कैसी हो तुम
किस हाल में हो
किसी सितार का क़ीमती तार हो
ख़ुश हो
कि मेरी तरह हो
साँस है कि टूटती नहीं
और लेना उससे भी कठिन
भला, अब कौन आएगा
आखिरी वक़्त में
इस भीड़ भरे एकान्त में
मेरा पुरजा-पुरजा जोड़ने

कैसा आदमी हूँ
बावला नहीं हूँ तो और क्या हूँ
अपने को ख़त्म करते हुए
सोचता हूँ ज़िन्दगी के बारे में
अपनी कविता का अन्त जानते हुए —
इस कबाड़ के ढेर पर
एक फेंका हुआ सितार हूँ, बस !
और
यह अटाला ही अब जिसका ठिकाना है ।

2

कितना अच्छा होता जो प्रेम होता

अच्छा होता
जो मेरा घर
हरी-हरी और कोमल पत्तियों के बीच
खिले हुए फूलों की गन्ध
और पके हुए फलों के बिल्कुल पास
चोंच भर की दूरी पर होता ं
किसी दरख़्त पर
एक-एक तिनका जोड़कर
और
नादान आदमियों की नज़र बचाकर
सुरुचि से बनाया गया
सबसे छोटा
घर

अच्छा होता
जो पक्षियों के बीच होता
मनुष्यों के शब्द
और सभ्यता की क़ैद से मुक्त होता
प्रेम और जीवन के संगीत में
जितना चाहता डूबता
न किसी से घृणा
न कोई दम्भ
न कोई लूट
न पीढ़ियों के लिए कुछ
न कोई दिखावा
न कोई टण्टा
न कोई रोना
न किसी से अप्रेम
न किसी पर क्रूरता
न किसी से छल
न असत्य का आग्रह
न किसी के संग बुरा होता

जो किसी का साथ होता
मन से मन का साथ होता
साथ में जो होता
दोनों के साथ होता
साथ रहते तो रहते
न रहते तो न रहते
न मारकाट होती
न मनमुटाव होता
कितना अच्छा होता
जो प्रेम होता

संघर्ष जीवन का होता
जैसे रहते भूधर और वटवृक्ष
जैसे छोटे-छोटे पौधे
और कीट-पतंग
प्रचण्ड धूप में
अटूट बारिश में
और भयँकर आन्धी-तूफ़ान में
ज़िन्दा रहते
घर रहते नहीं रहते
घर के मुहताज नहीं रहते

हौंसले
और कोशिश से फिर बनता धर
एक नहीं हज़ार बनता
रुपया रहता नहीं रहता
रुपये का क्या ग़म रहता
हम रहते

और घर रहता

न कोई कर रहता
न कोई डर रहता
न कोई अफ़सर
न कोई काग़ज़-पत्तर
बस, हम रहते
सरोसामान रहता नहीं रहता
जीवन साथ रहता
मेरे मन के मीत तुम क्या रहते
तोता होते कि मैना रहते

छोड़ो भी अब
जब होते तब होते
और
उस घर का क्या
जो बन नहीं सका
जब उसमें रहते तब रहते
अनुभव की उस दुनिया में
जिस दुनिया में
और
जैसे घरों में रहते हैं हम
कैसे रहते हैं
किसी से कह नहीं सकते
और चुप रह नहीं सकते ।

3

यह घर शायद वह घर नहीं है

जिस घर में रहते थे हम
यह शायद वह घर नहीं है
कहाँ है वह घर
और
कहाँ है उस घर का लाडला
जो दिन में मेरे पैरों से
और अन्धेरी रातों में
मेरे सीने से चिपका रहता था
कहाँ खो गया है
बहती नाक और खुले बाल वाला
नंग-धड़ंग मेरा छोटा बाबा
मुझे ढूँढ़ता हुआ
कहाँ छिप गया है
किस कमरे में
किस पर्दे के पीछे
कि माँ की ओट में है
नटखट

यह कौन है जो तन कर खड़ा है
किसका बेटा है मुझे घूरता हुआ
बेटा है कि पूरा मर्द
भुजाओं से
पैरों से
और छाती से
फट पड़ने को बेचैन
आख़िर क्या चाहिए मुझसे
किसका बेटा है यह
जो छीन लेना चाहता है मुझसे
सारा रुपया
मेरा बेटा है तो भूल कैसे गया
माँगता था कैसे हज़ार मिट्ठी देकर
एक आइसक्रीम
एक टाफ़ी और थोड़ी-सी भुजिया
माँग क्यों नहीं लेता उसी तरह
मुझसे मेरा जीवन
किसका है यह जीवन
यह घर

कहाँ छूट गई हैं
मेरी उँगलियों में फँसी हुईं
बड़ी की नन्ही-नन्ही कोमल उँगलियाँ
उन उँगलियों में फँसा पिता
कहाँ छूट गया है
किसी को ख़बर न हुई
हौले-हौले हिलते-डुलते
नन्ही पँखुड़ी जैसे होंठों को
पृथ्वी पर सबसे पहले छुआ
और सुदीप्त माथा चूमा
पहली बार
जिनसे
मेरे उन होंठों को क्या हो गया है
काँपते हैं थर-थर
यह कैसा डर है
यह कैसा घर है

छोटी की छोटी-छोटी
एक-एक इच्छा की ख़ातिर
कैसे दौड़ता रहा एक पिता
अपनी दोनों हथेलियों पर लेकर
अपना दिल और कलेजा
अपना सबकुछ
जो था पहुँच में सब हाज़िर करता रहा
क्या इसलिए कि एक दिन
अपनी बड़ी-बडी आँखों से करेगी़
पिता पर कोप

कहाँ चला गया वह घर
मुझसे रूठकर
जिसमें पिता पिता था
अपनी भूमिका में
पृथ्वी का सबसे दयनीय प्राणी न था
और वह घर
जीवन के उत्सव में तल्लीन
एक हंसमुख घर था
यह घर शायद वह घर नहीं है
कोई और घर है
पता नहीं किसका है यह घर ।

4

जो उसके पास हुआ मुझसे बड़ा दुख

इस घर से
जो निकलना ही हुआ
तो किधर ले चलेंगे मुझे
मेरे क़दम
कहीं तो रुकेंगे
कोई ठिकाना देखकर
किस घर के सामने रुकेंगे
ये पैर
अब इस उम्र में
किस अधेड़ स्त्री को होगा भला
मेरी कातर पुकार का इन्तज़ार
फिर मिली कोई चोट
तो मर नहीं जाऊँगा
डरकर
फिर मुड़ेंगे किधर मेरे पैर
किस दिशा में ढूँढ़ेंगे
कोई रास्ता
किस बस्ती में पहुँचकर

किस स्त्री के कन्धे पर रखूँगा सिर
क्या करूँगा जो उसके पास हुआ
मुझसे बड़ा दुख
दो दुखीजन मिलकर
बना सकते हैं क्या
एक छोटा-सा
सुखी घर ।

5

कैसे निकलूँ सोती हुई यशोधरा को छोड़कर

कैसे निकलूँ इस घर से
सोती हुई यशोधरा को छोड़कर
कितनी गहरी है यशोधरा की नीन्द
एक स्त्री की तीस बरस लम्बी नीन्द
नीन्द भी जैसे किसी नीन्द में हो
चलना-फिरना
हंसना-बोलना
सजना-संवरना
और लड़ना-झगड़ना
सब जैसे नीन्द में हो

बस, एक क्षण के लिए
टूटे तो सही यशोधरा की नीन्द
मैं यह नहीं चाहता कि मेरा निकलना
यशोधरा के लिए नीन्द में कोई स्वप्न हो
मैं निकलना चाहता हूँ उसके जीवन से
एक घटना की तरह
मैं चाहता हूँ कि मेरा निकलना
उस यशोधरा को पता चले
जिसके साथ एक ही बिस्तर पर
तीस बरस से सोता और जागता रहा
जिसके साथ एक ही घर में
कभी हंसता तो कभी रोता रहा
मैं उसे इस तरह
नीन्द में
अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहता
मैं उसे जगाकर जाना चाहता हूँ
बताकर जाना चाहता हूँ
कि जा रहा हूँ
मैं नहीं चाहता कि कोई कहे
एक सोती हुई स्त्री को छोड़कर चला गया
मैं चाहता हूँ कि वह मुझे जाते हुए देखे
कि जा रहा हूँ
और न देख पाते हुए भी मुझे देखे
कि जा रहा हूँ ।

6

उठो, यशोधरा तुम्हारा प्यार सो रहा है

कैसे जगाऊँगा उसे
जिसे जागना नहीं आता
प्यार से छूकर कहूँगा उठने के लिए
कि चूमकर कहूँगा हौले से
जागो, यशोधरा !
देखो कबसे जाग रही है धरा
कबसे चल रही है सखी हवा
एक-एक पत्ती
एक-एक फूल
एक-एक वृक्ष
एक-एक पर्वत
एक-एक सोते को जगा रही है
एक-एक कण को ताज़ा करती हुई
सुबह का गीत गा रही है

उठो, यशोधरा !
तुम्हारा राहुल सो रहा है
तुम्हारा घर सो रहा है
तुम्हारा संसार सो रहा है
तुम्हारा प्यार सो रहा है

कैसे जगाऊँ तुम्हें
तुम्हीं बताओ, यशोधरा !
किस गुरु के पास जाऊँ
किस स्त्री से पूछूँ
युगों से
सोती हुई एक स्त्री को जगाने का मन्त्र
किससे कहूँ कि देखो
इस यशोधरा को
जो एक मामूली आदमी की बेटी है
और मुझ जैसे
निहायत मामूली आदमी की पत्नी है
फिर भी सो रही है किस तरह
राजसी ठाट से

क्या करूँ
इस यशोधरा का
जिसे
मेरे जैसा एक साधारण आदमी
बहुत चाहकर भी
जगा नहीं पा रहा है
और
कोई दूसरा बुद्ध ला नहीं पा रहा है।

7

बहुत उदास हूँ आज की रात

किससे कहूँ
कि मुझे बताए
अभी कितने फेरे लेने होंगे वापस
जीवन की किसी उलझी हुई गाँठ को
सुलझाने के लिए
जो खो गया है
उसे दुबारा पाने के लिए
कहाँ हो, मेरे प्यार !
देखो
जिस छोटे-से घर को बनाने में
कभी शामिल थे कई बड़े-बुजुर्ग
आज कोई नहीं है उनमें से
कितना अकेला हूँ
हज़ार छेदों वाले इस जहाज़ को
बचाने के काम में
जहाज़ का चूहा होता
तो कितना सुखी होता
मेरी मुश्किल यह है कि आदमी हूँ

कितना मुश्किल होता है कभी
किसी-किसी आदमी के लिए
एक धागा तोड़ पाना
किसी तितली से
उसके पँख अलग करना
किसी स्त्री के सिन्दूर की चमक
मद्धिम करना
और अपने में मगन
एक दुनिया को छोड़कर
दूसरी दुनिया बसाना

कोई नहीं है इस वक़्त मेरे पास
कभी न ख़त्म होने वाली
इस रात के सिवा
बहुत उदास हूँ आज की रात
यह रात
मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात है
कैसे सम्भालूँ ख़ुद को
मुश्किल में हूँ
एक ओर स्मृतियों का अधीर समुन्दर है
दूसरी तरफ दर्द का घर
कुछ नहीं बोलते पक्षीगण
कि जाऊँ किधर
पत्तियाँ भूल गई हैं हिलना-डुलना
चुप है पवन
बाहर
कहीं से नहीं आती कोई आवाज़
बहुत बेचैन हूँ आज की रात
किससे कहूँ
कि अब इस रात से बाहर जाना
और इसके भीतर ज़िन्दा रहना
मेरे वश में नहीं ।

किसी का गुमशुदा सामान हूँ

कहाँ हो, तुम ?
न जाने कब से
खुला है यह द्वार तुम्हारे लिए
मिश्री की डली
एक गिलास शीतल जल
और एक कप गर्म चाय
खास तुम्हारे लिए

मेरी थाली का पहला कौर
मेरी आँखों की पहली नीन्द
और पहला स्वप्न तुम्हारे लिए
कोई तीस बरस से
सब जस का तस
तुम्हारे लिए

गुलमोहर के ये लाल फूल
खिलते हैं तुम्हारे लिए
मेरी खिड़की के सामने
झूमता है
अमलतास के पीले फूलों का
गुच्छा
खास तुम्हारे लिए

मेरे कमरे की छत पर
छाती है काली घटा
और बरसता है मेघ तुम्हारे लिए
निकलता है दिन
और होती है रात तुम्हारे लिए
उगता है चान्द
और बहती है ठण्डी -ठण्डी पुरवाई
तुम्हारे लिए

किसी की शादी हो
चाहे कोई संगीत संध्या
दिन और मौसम कोई भी
अपने में लीन स्त्रियों
और इत्र की ख़ुशबुओं के बीच
तुम्हें ढ़ूँढ़-ढूँढ़ कर
लौटता हूँ थक-हार कर
नित्य

बाहर का उजाला हो
चाहे भीतर का अन्धेरा
जर्जर किवाड़ पर हर दस्तक
हर आहट पर दौड़ पड़ता हूँ
फ़ोन की हर घण्टी पर भागता हूँ
तुम्हारे लिए

जैसे मैं बना ही हूँ तुम्हारे लिए
कहाँ हो, तुम
अपने इस पुराने और बेमरम्मत
सामान को छोड़कर
इस उम्र में
और इस मोड़ पर
अब और क्या हो सकता है, भला !
इस टूटे-फूटे जीवन में
इसके सिवा कि मैं किसी का
एक गुमशुदा सामान हूँ ।

एक-एक पत्ती की भूमिका है 

किसी पत्ती को
उदास करने लिए
थोड़ी- सी तेज़ धूप
और एक छोटा-सा
चुभता हुआ काँटा
बहुत है

एक उदास
पत्ती के लिए
हवा का जरा-सा धक्का
किसी से मिली
कोई हल्की-सी चोट
काफ़ी है
टूट जाने के लिए

दुख की धरती पर
दुख के वन में
दुख के लम्बे-लम्बे वृक्ष ज़्यादा हैं
और घने वृक्षों की गोद में
उदास पत्तियाँ सबसे ज़्यादा
फूल थोड़े हैं
जिन्हें ढँग से चाहने वाले
और भी कम
सुगन्ध थोड़ी-सी है
और धरती असीम

जितनी भी बड़ी हो पृथ्वी
उदास पत्तियों की पंक्ति
उससे बड़ी है
एक पत्ती को टूटकर गिरने
और गिरते-गिरते किसी के वास्ते
मर-मिटने के लिए
चाहिए
बस, उतनी-सी मिट्टी
चाहिए जितनी जगह
किसी लम्बी उड़ान पर निकले
एक थके हुए पक्षी को
बस, ज़रा-सा
अपने पैर रखने के लिए

इस जीवन में
एक पत्तियों को
और क्या चाहिए
फूलों और फलों के लिए
मर-मिटने के सिवा

पत्तियों की इस दुनिया में
एक-एक पत्ती की भूमिका है
दुख है तो है
दुख के इस महारंग में
थोड़ा प्रेम का रंग है
थोड़ा साहचर्य का रंग
थोड़ा जीवन का

इसी में कोई-कोई पत्तियाँ
चाय की पत्तियों की तरह
अपना लहू निचोड़ कर
टूटे हुए दिल जोड़ती हैं
और अपना दुख छिपाकर
दुनिया के दुख से करती हैं
हंस-हंसकर बातें ।

कैसे निकलूँ सोती हुई यशोधरा को छोड़कर 

कैसे निकलूँ इस घर से
सोती हुई यशोधरा को छोड़कर
कितनी गहरी है यशोधरा की नींद
एक स्त्री की तीस बरस लंबी नींद

नींद भी जैसे किसी नींद में हो
चलना-फिरना
हँसना-बोलना
सजना-सँवरना
और लड़ना-झगड़ना
सब जैसे नींद में हो
बस एक क्षण के लिए
टूटे तो सही यशोधरा की नींद

मैं यह नहीं चाहता कि मेरा निकलना
यशोधरा के लिए नींद में कोई स्वप्न हो
मैं निकलना चाहता हूं उसके जीवन से
एक घटना की तरह
मैं चाहता हूं कि मेरा निकलना
उस यशोधरा को पता चले
जिसके साथ एक ही बिस्तर पर
तीस बरस से सोता और जागता रहा
जिसके साथ एक ही घर में
कभी हँसता तो कभी रोता रहा

मैं उसे इस तरह
नींद में
अकेला छोड़कर नहीं जाना चाहता
मैं उसे जगाकर जाना चाहता हूँ
बताकर जाना चाहता हूँ
कि जा रहा हूँ

मैं नहीं चाहता कि कोई कहे
एक सोती हुई स्त्री को छोड़कर चला गया
मैं चाहता हूँ कि वह मुझे जाते हुए देखे
कि जा रहा हूँ
और न देख पाते हुए भी मुझे देखे
कि जा रहा हूँ ।

इस अटूट वर्षा में

एक थका हुआ तन भीगता है
एक उदास मन भीगता है
एक सूखी हुई धरती
और एक अपलक आकाश
भीगता है
इस अटूट वर्षा में

कोई बताए
कि क्या भीगता है
और क्या नहीं भीगता है

मेरा रोम-रोम भीगता है
मेरी आँखे
मेरा वक्षस्थल
और अन्तस्तल
मेरी पृथ्वी का कण-कण
एक-एक घास
एक-एक पत्ता
पूरा का पूरा वृक्ष
एक-एक पक्षी

और
मन के
झिलमिल पानी में
मेरा चान्द भीगता है
अपने चान्द से लिपट कर
मैं भीगता हूँ ऐसे
कि पृथ्वी पर कोई और
नहीं भीगता है ।

बुरा यह कि मैं कम बुरा हुआ

बुरा यह
कि मैं कम बुरा हुआ
किसी स्त्री से कुछ न छिपाया
किसी का दिल न दुखाया
किसी बच्चे से छल न किया
और बच्चे की माँ को छोड़कर
कहीं और गया नहीं
उस स्त्री से पूछने भी नहीं गया
कि उसने मेरा दिल क्यों दुखाया
यह सोच-सोच कर
मेरा हाल और बुरा हुआ
कि उस वक़्त कहाँ था कमबख़्त मैं
जब बँट रही थी बुराई
बेहिसाब

यह और बुरा हुआ
कि बुराई की इस चमकीली दुनिया में
कुछ भी ख़ास नहीं कर पाया
आख़िर
था तो मैं भी
कुछ-कुछ पढ़ा-लिखा
फिर क्यों नहीं कुछ बन पाया
पैसा तो पैसा
कोई ढंग की कविता
नहीं लिख पाया
किसी से
कभी ऊभ-चूभ जैसा
प्यार तक कर नहीं पाया

बुरा हुआ मेरे साथ
कि मैं कुछ भी नहीं कर पाया
बच्चों को छोड़कर
बीवी से भागकर
कुछ दूर
एक मुहल्ले से निकलकर
दूसरे मुहल्ले में तो जा नहीं पाया
बात-बेबात
खाता रहा बच्चों की डाँट
और बच्चों की माँ ने जब चाहा
रुलाया

हाय
इस जीवन में
जहाँ बहुत से लोगों ने
जी लिया कई जीवन
और कर लिया बहुत कुछ
मैं न कुछ कर पाया
न जी पाया
जीना तो दूर
मर तक तो पाया नहीं
बता दे कोई
अब तो बता दे
कि आख़िर मेरे जैसे
एक मामूली आदमी के साथ
इतना बुरा क्यों हुआ
कि मैं कम बुरा हुआ ।

आत्मा का एकांत आलाप 

अजीब आदमी है
ढलान से उतरते हुए
मुड़-मुड़ कर
आकाश में चाँद को
देखता है

इतने बड़े आकाश में
चाँद को अकेला देखता है
देखता है कैसे
कहीं गिर न जाए बेचारा
खड्ड में

उसे अकेला चांद
बिल्कुल अपने जैसा लगता है

कितना अच्छा लगता है
अपनी तरफ एकटक देखते हुए
चाँद के कान के पास मुँह ले जाकर
कहता है–

कितनी अजीब बात है
मैं भी भटक रहा हूं कोई तीस बरस से
अपने आकाश में अकेला
और जिसे प्रेम करता हूँ
कुछ नहीं कहता हूँ उससे अब
यह भी कि मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ

जिससे प्रेम नहीं करता हूँ
उससे भी नहीं कहता
कि मैं तुम्हें प्रेम नहीं करता हूँ

मेरे लिए प्रेम
बिल्कुल निजी घटना है
आत्मा का एकांत आलाप
अभिव्यक्ति के सारे दरवाज़े बंद हैं जहाँ
बस एक अद्वितीय अनुभव है
प्रौढ़ता का एक शालीन विस्फोट
जिसने मेरे प्रेम को
त्वचा की अभेद्य सतह को भेदकर
भीतर कहीं गहराई में पहुँचा दिया है

शायद मेरे लिए प्रेम
एकांत में किसी फूल से मिलना है
अपनी ही हथेली को
बार-बार चूमना है
किसी पुलिया पर बैठ कर
आहिस्ता-आहिस्ता
डूबते हुए सूरज को देखना है
उम्र की ढलान पर

पुराने प्रेमियों के लिए शायद
स्मृति का महोत्सव है प्रेम
जीवन का अंतिम राग है
जीवन की चुनरी का
मद्धिम रंग है

रेलगाड़ी के किसी पुराने डिब्बे में
किसी छोटे-से स्टेशन पर
किसी शहर में
किसी ग़रीब के लोटे की तरह
कि उसके बदनसीब दिल की तरह
छूट गया
अनोखा वाद्य है ।

परिणीता (कविता) 

यह तुम थी !
पके जिसके काले लम्बे बाल असमय
हुए गोरे चिकने गाल अकोमल
यह तुम थी !
छपी जिसके माथे पर अनचाही इबारत
टूटा जिसका कोई क़ीमती खिलौना
एक रेत का महल था जिसका
एक पल में पानी में था
कितनी हलचल थी कितनी पीड़ा थी
भीतर एक आहत सिंहनी कितनी उदास थी
यह तुम थी !
ढल गया था चान्द जिसका
और चान्द से भी दूर हो गया प्यार जिसका
यह तुम थी !
श्रीहीन हो गया जिसका मुख
खो गया था जिसका सुख, यह तुम थी !
यह तुम थी एक-एक दिन
अपने से लड़ती-झगड़ती खुद से करती जिरह
यह तुम थी ! औरत और मर्द दोनों का काम करती
और रह-रह कर किसी को याद करती
यह तुम थी !
कभी गुलमोहर का सुर्ख़ फूल
और कभी नीम की उदास पीली पत्ती
यह तुम थी !
अलीनगर की भीड़ में अपनी बेटी के साथ
अकेली कुछ ख़रीदने निकली थी
यह तुम थी !
यह मैं था
साथ नहीं था आसपास था
मैं भी अकेला था तुम भी अकेली थी
मुझसे बेख़बर यह तुम थी !

बहुमूल्य
चमचमाती और भागती हुई
कार के पैरों के नीचे एक मरियल काले पिल्ले-सा
मर रहा था किसी का प्यार
और तुम बेख़बर थी
यह तुम थी ! जिसकी किताब में लग गया था
वक़्त का दीमक
कुतर गए थे कुछ शब्द कुछ नाम कुछ अनुभव
एक छोटी-सी दुनिया अब नहीं थी
जिसकी दुनिया में यह तुम थी !
जो अपनी किताब में थी और नहीं थी
जो अपने भीतर थी और नहीं थी
घर में थी और नहीं थी
यह तुम थी !
बदल गई थी
जिसके घर और देह की दुनिया
जुबान और आँख की भाषा
बदल गया था
जिसके चश्मे का नम्बर और मकान का पता
यह तुम थी !
जिसकी आलीशान इमारत ढह चुकी थी
मलबे में ग़ुम हो चुकी थी जिसकी अँगूठी
और हार छिप गया था किसी हार में
यह तुम थी !

जीवन के आधे रास्ते में
बेहद थकी हुई झुकी हुई
देखती हुई अपनी परछाईं
समय के दर्पण में
जो इससे पहले कभी
इतनी कमज़ोर न थी
इतनी उदास न थी
यह तुम थी
किसी की परिणीता !

और
यह !
तुम थी !!
मेरी तुम !!!
जो अहर्निश
मेरे पास थी
जिसकी त्वचा
मेरी त्वचा की सखी थी
जिसकी सांसों का
मेरी सांसों के संग
आना-जाना था
मेरे बिस्तर का आधा हिस्सा जिसका था
और जिसका दर्द मेरे दर्द का पड़ोसी था
जिसके पैर बन्धे थे मेरे पैरों से
जिसके बाल कुछ ही कम सफ़ेद थे
मेरे बालों से
जिसके माथे की सिलवटें कम नहीं थीं मेरे माथे से
जिससे मुझे उस तरह प्रेम न था
जैसा कोई-कोई प्रेमी और प्रेमिका किताबों में करते थे
पर अप्रेम न था कुछ था ज़रूर
पर शब्द न थे जो भी था एक अनुभव था
एक स्त्री थी
जो दिन-रात खटती थी
सूर्य देवता से पहले चलना शुरू करती थी
पवन देवता से पहले दौड़ पड़ती थी
हाथ में झाड़ू लेकर
बच्चों के जागने से पहले
दूध का गिलास लेकर
खड़ी हो जाती थी मुस्तैदी से
अख़बार से भी पहले
चाय की प्याली रख जाती थी
मेरे होठों के पास मीठे गन्ने से भी मीठी
यह तुम थी
मेरे घर की रसोई में
सुबह-शाम सूखी लकड़ी जैसी जलती
और खाने की मेज़ पर
सिर झुकाकर
डाँट खाने के लिए तैयार रहती
यह तुम थी !
बावर्ची
धोबी
दर्ज़ी
पेण्टर
टीचर
खजाँची
राजगीर
मेहतर
सेविका
और दाई
क्या नहीं थी तुम !
यह तुम थी !
क्या हुआ
जो इस जन्म में मेरी प्रेमिका नहीं थी
क्या पता मेरे हज़ार जन्मों की प्रेयसी
तुम्हारे अन्तस्तल में छुपी बैठी हो
और तुम्हें ख़बर न हो
यह कैसी उलझन थी मेरे भीतर कई युगों से
यह तुम थी अपने को मेरे और पास लाती थी
जब-जब मैं अपने को तुमसे दूर करता था
यह तुम थी !
जो करती थी मेरे गुनाहों की अनदेखी

मेरे खेतों में
अपने गीतों के संग पोछीटा मार कर
रोपाई करती हुई मज़दूरनी कौन थी!
अपनी हमजोलियों के साथ
हंसी-ठिठोली के बीच
बड़े मन से मेरे खेतों में एक-एक खर-पतवार
ढूँढ़-ढूँढ़ कर निराई करती हुई
यह तन्वंगी कौन थी!
मेरे जीवन के भट्ठे पर पिछले तीस साल से
ईंट पकाती हुई झाँवाँ जैसी यह स्त्री कौन थी
यह तुम थी!

और यह मैं था एक अभिशप्त मेघ !
जिसके नीचे न कोई धरती थी न ऊपर कोई आकाश
और जिसके भीतर पानी की जगह प्यास ही प्यास
कभी
मैं ढू़ँढ़ता उस तुम को !
और कभी इस तुम को !
कभी किसी की प्यास न बुझाई
न किसी के तप्त अंतस्तल को
सींचा
न किसी को कोई उम्मीद बन्धाई
यह मैं था प्रेम का बंजर
इतनी बड़ी पृथ्वी का
एक मृत और विदीर्ण टुकड़ा
अपनी विकलता और विफलता के गुनाह में
डूबा
यह मैं था ! यह मेरे हज़ार गुनाह थे
और तुम मेरे गुनाहों की देवी थी !
यह तुम थी!
जिससे
मेरी छोटी-सी दुनिया में
गौरैया की चोंच में अँटने भर का
उसके पँख पर फैलने भर का
एक छोटा-सा जीवन था
एक छोटी-सी खिड़की थी
जहाँ मैं खड़ा था
सुप्रभात का एक छोटा-सा
दृश्यखण्ड था
यह तुम थी ! मेरी आँखों के सामने
मेरी तुम थी
यह तुम थी !
मेरे गुनाहों की देवी!
मुझे मेरे गुनाहों की सज़ा दो
चाहे अपनी करुणा में
सजा लो मुझे
अपनी लाल बिन्दी की तरह
अपने अन्धेरे में भासमान इस उजास का क्या करूँ
जो तुमसे है इस उम्मीद का क्या करूँ
आत्मा की आवाज का क्या करूँ
अतीत का क्या करूँ अपने आज का क्या करूँ
तुम्हारा क्या करूँ
जो मेरे जीवन की सखी थी और सखी है
जिसके संग लिए सात फेरे
मेरे सात जन्म के फेरे हैं
जो मेरी आत्मा की चिरसंगिनी थी मेरा अन्तिम ठौर है
यह तुम थी !
यह तुम हो !!
मेरी मीता
मेरी परिणीता ।

धर्मशाला बाज़ार के आटो लड़के 

वे दूर से देखते थे और पहचान लेते थे
मद्धिम होता मेरा प्याजी रंग का कुर्ता
थाम लेते थे बढ़कर कंधे से
मेरा वही पुराना आसमानी रंग का झोला
जिसे तमाम गर्द-गुबार ने
खासा मटमैला कर दिया था

वे मेरे रोज़ के मुलाक़ाती थे
मैं चाचा था उन सबका
मेरे जैसे सब उनके चाचा थे
कुछ थे जो दादा जैसे थे
इस स्टैंड से उस स्टैंड तक
फैल और फूल रहे थे
छाते की कमानियों की तरह
कई हाथ थे उनके पास
रंगदारी के रंग कई

दो-दो रुपये में
जहाँ बिकती थी पुलिस
वे तो बस
उसी धर्मशाला बाज़ार के
आटो लड़के थे हँसते-मुस्कराते
आपस में लड़ते-झगड़ते
एक-एक सवारी के लिए
माथे से तड़-तड़ पसीना चुआते
पेट्रोल की तरह ख़ून जलाते

वे मुझे देखते थे
और ख़ुश हो जाते थे
वे मेरे जैसे किसी को भी देखते थे
ख़ुश हो जाते थे
वे मुझे खींचते थे चाचा कहकर
और मैं उनकी मुश्किल से बची हुई
एक चौथाई सीट पर बैठ जाता था
अंड़स कर

वे पहले आटो चालू करते थे
फिर टेप–
किसी खोते में छिपी हुई
किसी “अहि रे बालम” चिरई के लिए
फुल्ले-फुल्ले गाल वाले लड़के का
दिल बजता था

उनका टेप बजता था
आटो में ठुँसे हुए लोगों में से
किसी की साँसत में फँसी हुई
गठरी बजती थी
किसी की टूटी कमानियों वाला
छाता बजता था
किसी के झोले में
टार्च का ख़त्म मसाला बजता था
और अँधेरे में
किसी बच्चे की क़िताब बजती थी
किसी छोटे-मोटे बाबू की जेब में
कुछ बेमतलब चाबियाँ बजती थीं
कुछ मामूली सिक्के बजते थे

किसी के जेहन में-
धर्मशाला बाज़ार की फलमंडी में
देखकर छोड़ दिया गया
अट्ठारह रुपये किलो का
दशहरी आम
और कोने में एक ठेले पर
दोने में सजा
आठ रुपये पाव का जामुन बजता था
और घर पर इन्तज़ार करते बच्चों की आँखें
बजती थीं सबसे ज़्यादा ।

कहाँ जलाओगे मेरी देह 

कहाँ जलाओगे मेरी देह
ओ जलाने वाले

शिव की नगरी के गंगातट पर
जहाँ कोई नहीं जानता है मुझे
काशी नरेश से लेकर
मामूली से मामूली आदमी तक

कि रामजी की जिस अयोध्या को
देखा नहीं अब तक
उसी के सरयू-तट पर
कि यहीं दो क़दम पर बहने वाली
अपनी राप्ती के तट पर
फूँक दोगे मुझे
कि लेकर चलोगे मुझे
मेरे पुरखों के जमुआर-तट पर

ओ जलाने वाले
कौन होगे तुम
मेरे बेटे
भाई के
कि रिश्ते के बेटे

ओ बेटे
तुम जिसके भी बेटे होना
मुझ ग़रीब के लिए
उठाना
थोड़ी सी जहमत
ले जाकर रखना मुझे उस घाट पर
जिससे नाता हो मेरी देह का

जैसे
देखोगे
आसपास
मुझे जलाने वाले
वहीं कहीं
बिखरी तमाम सदियों की राख में

सोने की कील-सी दमकती हुई
दिख जाएगी
मेरी आतुर माँ
न जाने कब से अपने आँचल में छिपाए हुए
जीवन-रस

ओ जलाने वाले
रखना माँ की गोद में ऐसे मेरी देह
जैसे मैं पहली बार उसकी गोद में
पहले पूछना उससे
फिर जलाना मुझे
धीरे से

यह भी ध्यान रहे जलाने वाले
पिता के पैरों के पास रहूँ
जिनसे सीखा है मैंने चिपक-चिपक कर
जीवन की सख़्त मिट्टी पर चलना

हो सके तो
कुछ देर के लिए ही सही
मेरी बाँहों के घेरे के भीतर रखना
जामुन के दरख़्तों की कतार के नीचे
कंचा खेलने और बीड़ी पीने वाले
एक से एक गप्पी और पतंगबाज़
और मुझसे भी कम कामयाब
नन्हे दोस्तों का संसार

जिस रास्ते से निकलना
मुझे लेकर
दोस्तों और दुश्मनों
और ख़ास तौर से
मददगारों के सामने झुककर
शुक्रिया अदा करने देना
भर आई किसी की आँख तो पोंछने देना
ज़रूर

देर नहीं करूँगा
किसी ग़रीब के लिए खुली हुई हथेलियों को
बस चूमता हुआ चल दूँगा
और अंत में लड़ना-झगड़ना क्या किसी से
फिर मिलेंगे — कहता हुआ चल दूँगा

ओ मुझे जलाने वाले
थोड़ी-सी मदद करना और
जो हो जाय मेरे साथ
सरोसामान
कुछ ज़्यादा

मेरी मामूली देह से लिपट-लिपट कर
कुछ ठंडी और बहुत कुछ
ज़माने भर की गर्म हवाएँ
मेरे पैरों के संग चलती हुई
रास्ते की थोड़ी-सी हरियाली
और बहुत सारी मुरझायी हुई पत्तियाँ
और पूजा और प्रेम के थोड़े से ताज़ा फूल
क्या गज़ब कि सब चलना चाहें
मेरे साथ

ओ मेरे बच्चे डरना मत
कह देना पृथ्वी के दारोगा से
क्या गुलमोहर और क्या अमलताश
और क्या मेरी चंपा
जो मेरी ज़िंदगी में
और मेरी यादों में शामिल हैं
सबके रंग
स्पर्श
और गंध
चुराकर ले जाऊँगा पृथ्वी से

देखना
ओ जलाने वाले
जल न जाए जलाते वक़्त
मेरा अनगिनत सामान
और तुम्हारी थोड़ी-सी चतुराई

तय कर लो पहले से
आग लगाओगे कैसे
शुरू से
खुली रखना अपनी आँखें
देखना झाँककर
मेरी बंद आँखों में
छिपे तो नहीं रह गए हैं किसी कोने में
नन्हे-नन्हे स्वप्न बेशुमार

होठों पर
चिपकी तो नहीं रह गई हैं
हज़ार मिट्ठियाँ[1]
बेचारे कान
तरस तो नहीं रहे हैं अब तक
किसी अच्छी ख़बर के लिए

देखना
सिर के एक-एक सफेद बालों को हटाकर
फँसी तो नहीं रह गई हैं
जीवन की चक्की में साथ-साथ पिसने वाली
निर्दोष प्रिया की बेचैन उँगलियाँ
कुछ कहने के लिए

देखना लड़के
मुझे साबुत चाहिए
मेरे ये सामान

ओ जलाने वाले
ये सब तो ठीक
पर बताओ — मरूँगा कहाँ
और तुम रहोगे कहाँ
जीवन की डोर टूटेगी किसके पास

राजस्थान में मरूँगा
कि मरूँगा उत्तर प्रदेश में
देश में मरूँगा कि मरूँगा विदेश में
अपनों के बीच एक छोटे से कमरे में
कि छत पर टहलते हुए नाती-पोतों के संग
कि गैरों के संसार में कहीं
धरती पर कि आसमान में
कि बदहवास भागती हुई ट्रेन में

इसे भी छोड़ो
जहाँ भी और जैसे मरना होगा मर लूँगा
पर ये तो बताओ — पहुँचोगे कैसे
जो रहना हुआ तुम्हें
सात समुंदर पार
और स्थगित हो गई उड़ान
कि कई हज़ार किलोमीटर दूर

छूट गई ट्रेन
तुम
पहुँच नहीं पाए तो करूँगा क्या
कितना करूँगा इंतज़ार
जो देह को फौरन हुई
आग की दरकार

आखिर लौंडे-लफड़ियों के चक्कर में
कब तक कराऊँगा
देह की साँसत

माफ करना
ओ जलाने वाले
जब ज़िंदगी में तुम सब में
कोई फ़र्क किया नहीं
विदा की बेला में
कैसा भेद

बेटियों से करूँगा विनती —
हे बड़ी
हे छोटी
दूर क्यों खड़ी हो
आओ मेरे पास
और लाओ मेरे पास
थोड़ी-सी आग

ये क्या
रोओ मत
घबड़ाओ मत
मैं हूँ बिल्कुल पास
डरो मत मेरी बहादुर लड़कियो

याद करो
कितनी बार
सिखाया है तुम्हें छत पर
खुले आसमान में
धुआँधार पटाखे और राकेट
और रंग-बिरंगी छुरछुरियाँ जलाना
कैसे जलाती थी नटखट
ख़ुश हो होकर
बचाते हुए अपनी नन्हीं-सी
छींटदार फ्रॉक

देखो तो
कैसे छुरछुरी बन गई है आज मेरी देह
तुम्हारे लिए

हे छुटकी देर न करो
आओ बेटा
जलाओ बेटा
अपनी नायाब छुरछुरी
चलो जल्दी करो
नहीं तो आ जाएगी बड़ी
क्या पता पहुँच रहा हो भइया ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें चुम्बन

खेलो छोटे बहादुर

आओ बहादुर
बैठो बहादुर
खाओ बहादुर
ये खुरमा
ये सेवड़ा
ये देखो रंगवर्षा
खेलो छोटे बहादुर ।

छोड़ो बहादुर
संभ्रांत पंक्ति का
पनाला
रहने दो आज जाम
बहने दो जहाँ-तहाँ
छोड़ो कुदाल
फेंको बाँस
ले खुली साँस ।

आओ छोटे बहादुर
बताओ छोटे बहादुर
क्या कर रही होगी
इस वक्त पहाड़ पर माँ
माँ के मुख रंग बताओ
छोटे बहादुर ।

कितनी दूर है
तुम्हारा पर्वत-प्रदेश
मुझे ले चलो अपने घर
अकलुश आँख की राह
आओ छोटे बहादुर
अपने अगाये कंठ से
बोलो छोटे बहादुर
मद्धिम क्यों है आज
मुखाकृति ।

बाबू क्लीनर 

बाबू क्लीनर
इतने गंदे क्यों रहते हो
क्यों खाते हो हरदम पान
बात-बात पर हँसते क्यों हो
हो-हो ।

हर गाने पर मूड़ी खूब हिलाते क्यों हो
लगता है तुम सचमुच
इस गाड़ी के मालिक हो ।

कुछ तो बोलो
बाबू क्लीनर
ख़ुश दिखने का भेद तो खोलो
हँसकर दर्द छुपाते क्यों हो ।

सलाम अलैकुम 

सब साहिबान को सलाम
जो मुझे छोड़ने आए थे सिवान तक
उन भाइयों को सलाम जो अड्डे तक आए थे
मेरी छोटी-छोटी चीज़ों को लेकर ।

उन चच्चा को ख़ासतौर से सलाम
जिन्होंने मेरा टिकट कटाया था
और कुछ छुट्टे दिए थे वक़्त पर काम आने के लिए।

बचपन के उन साथियों को सलाम
जिन्होंने हाथ हिलाया था
और जिन्होंने हाथ नहीं हिलाया था ।

अम्मी को सलाम
जिन्होंने ऐन वक़्त पर गर्म लोटे से
मेरा पाजामा इस्त्री किया था और जल गई थी
जिनकी कोई उँगली ।

आपा को सलाम
जिनके पुए मीठे थे ख़ूब और काफ़ी थे
उस कहकशाँ तक पहुँचे मेरा सलाम
जो मुझे कुछ दे न सकी थी
खिड़की की दरार से सलाम के सिवा ।

उस याद को सलाम
जिसने ज़िन्दा किया मुझे कई बार
उस वतन को सलाम
जो मुझे छोड़कर भी मुझसे छूट नहीं पाया ।

रास्ते की तमाम जगहों और उन लोंगो को सलाम
जिन्होंने बैठने के लिए जगह दी
और जिन्होंने दुश्वारियाँ खड़ी कीं

उस वक़्त को सलाम
जिसने मुझे मार-मार कर सिखाया यहाँ
किसी आदमी को रिश्तों से नहीं
उसकी फितरत से जानो ।

ऐ ज़िंदगी तुझे सलाम
जो किसी काम के वास्ते तूने चुना
किसी गरीब को ।

एकता का पुष्ट वैचारिक आधार 

एक वीर ने उन्हें तब घूरा
जब वे सच की तरह कुछ बोल रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब टोका
जब वे किसी की चमचम खाए जा रहे थे ।

एक वीर ने उन्हें तब फटकारा
जब वे किसी मोढ़े की परिक्रमा कर रहे थे ।

असल में
एक वीर ने दम कर रखा था
उनकी उस अक्षुण्ण नाक में
जिसे तख़्ते-ताउस की हर गंध
एक जैसी प्यारी थी ।

एक दिन वे एकजुट हुए
क्योंकि एकता का पुष्ट वैचारिक आधार उनके सामने था ।

पाठ्यक्रम समिति की उस बैठक में
लिया उन्होंने निर्णय कि
‘सच्ची वीरता’[1] को
जीवन से निकाल दिया जाय ।

शब्दार्थ
  1. ऊपर जायें अध्यापक पूर्ण सिंह का महत्त्वपूर्ण निबंध ।

एक भिण्डी 

यह जो छूट गई थी
थैले में अपने समूह से
अभी-अभी अच्छी भली थी
अभी-अभी रूठ गई थी
एक भिण्डी ही तो थी ।

और एक भिण्डी की आबरू भी क्या
मुँह फेरते ही मर गई ।

अभी

बची हुई है अभी थोड़ी-सी शाम
बची हुई है अभी थोड़ी-सी भीड़
नित्य उठती-बैठती दुकानों पर

रह-रह कर सिहर उठती है
रह-रह कर डर जाती है
नई-नई लड़की
छोटी-सी श्यामवर्णी
जिसके पास बची हुई है अभी
थोड़ी-सी मूली

और
मूली के पत्तों से गाढ़ा है
जिसके दुपट्टे का रंग
जिससे ढाँप रखा है उसने
आधा चेहरा, आधा कान

अनमोल है जिसकी छोटी-सी हँसी
संसार की सभी मूलियाँ
जिसके दाँतों से सफ़ेद हैं कम

और
पाव-डेढ़ पाव मूली एक रुपए में देकर
छुट्टी पाती है मण्डी से
ख़ुश होती है काफ़ी
एक रुपये से कहीं ज्यादा

मण्डी से लौटते हुए मुझे लगता है-
मूली से छोटी है अभी उसकी उम्र
और मूली से बीस है अभी उसकी ताज़गी

घर में घुसता हूँ तो अहसास होता है-
अरे!
ये तो मूली में छिपकर
घुस आई है नटखट मेरे संग
अभी-अभी शामिल हो जाएगी
बच्चों में ।

जब मुझे मेरे गुरु ने बरख़ास्त किया 

मैं तनिक भी विचलित नहीं हुआ
न पसीना छूटा, न लड़खड़ाए मेरे पैर
सब कुछ सामान्य था मेरे लिए
जब मुझे मेरे गुरु ने बरख़ास्त किया
और बनाया किसी खुशामदी को अपना
प्रधान शिष्य ।

बस इतना हुआ मुझसे
कि मैं बहुत जोर से हँसा ।

जब गुरु ने मेरे विरुद्ध मिथ्या कहा 

कोई पत्ता नहीं खड़का
मंद-मंद मुस्काता रहा पवन
आसमान के कारिंदों ने
लंबी छुट्टी पर भेज दिया मेघों को
जब गुरु ने मेरे विरुद्ध मिथ्या कहा ।

अद्भुत यह कि
पृथ्वी पर भी नहीं आई कोई खरोंच

कच्चे थे कुछ गुरु जी के कान 

सुंदर केश थे गुरु जी के
चौड़ा ललाट, आँखें भारी
लंबी नाक, रक्ताभ अधर
उस पर गज भर की जुबान।

गजब का प्रभामण्डल था
कद-काठी, चाल-ढाल
सब दुरुस्त ।

जो छिपकर देखा किसी दिन
कच्चे थे कुछ गुरु जी के कान ।

निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं 

कैसे हो सकता था
कि जो गुरु के गण थे, नागफनी थे
जड़ थे, कितने कार्यकुशल थे ।

आगे रहते थे, निकट थे इतने
जैसे स्वर्ण कुंडल, त्योंरिया, हाथ ।

क्या खतरा था उन्हें मुझसे
तनिक भी दक्ष नहीं था मैं
निकटता का पाठ मेरे कोर्स में था ही नहीं ।

क्यों रोकते थे वे मुझे कुछ कहने से
ज़रूर हुई होगी कोई असुविधा
ठसी तरह वैशम्पायन के गुरुकुल में
याज्ञवल्क्य से ।

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