गणेश बिहारी ‘तर्ज़’ की रचनाएँ

दुनिया बनी तो हम्द-ओ-सना बन गई ग़ज़ल

दुनिया बनी तो हम्द-ओ-सना बन गई ग़ज़ल
उतरा जो नूर, नूर-ए-ख़ुदा बन गई ग़ज़ल

गूँजा जो नाद ब्रह्म, बनी रक़्स-ए-महर-ओ-माह
ज़र्रे जो थरथराए, सदा बन गई ग़ज़ल

चमकी कहीं जो बर्क़ तो ऐहसास बन गई
छाई कहीं घटा तो अदा बन गई ग़ज़ल

आँधी चली तो कहर के साँचे में ढल गई
बाद-ए-सबा चली तो नशा बन गई ग़ज़ल

हैवां बने तो भूख बनी, बेबसी बनी
इनसान बने तो जज़्ब-ए-वफ़ा बन गई ग़ज़ल

उठा जो दर्द-ए-इश्क़ तो अश्क़ों में ढल गई
बेचैनियाँ बढ़ीं तो दुआ बन गई ग़ज़ल

ज़ाहिद ने पी तो जाम-ए-पना बन के रह गई
रिंदों ने पी तो जाम-ए-बक़ा बन गई ग़ज़ल

अर्ज़-ए-दकन में जान तो देहली में दिल बनी
और शहर लख़नऊ में हिना बन गई ग़ज़ल

दोहे, रुबाई, नज़्में सब ‘तर्ज़’ थे मगर
असनाफ़-ए-शायरी का ख़ुदा बन गई ग़ज़ल

अश्क बहने दे यूँ ही

अश्क बहने दे यूँ ही
लज्ज़ते ग़म कम न कर

अजनबियत भी बरत
फासला भी कम न कर

पी के कुछ राहत मिले
ज़हर को मरहम न कर

इश्क़ की मार बड़ी दर्दीली, इश्क़ में जी न फँसाना जी 

इश्क़ की मार बड़ी दर्दीली, इश्क़ में जी न फँसाना जी
सब कुछ करना इश्क़ न करना, इश्क़ से जान बचाना जी

वक़्त न देखे, उम्र न देखे, जब चाहे मजबूर करे
मौत और इश्क़ के आगे लोगो, कोई चले न बहाना जी

इश्क़ की ठोकर, मौत की हिचकी, दोनों का है एक असर
एक करे घर घर रुसवाई, एक करे अफ़साना जी

इश्क़ की नेमत फिर भी यारो, हर नेमत पर भारी है
इश्क़ की टीसें देन ख़ुदा की, इश्क़ से क्या घबराना जी

इश्क़ की नज़रों में सब यकसां, काबा क्या बुतख़ाना क्या
इश्क़ में दुनिया उक्बां क्या है, क्या अपना बेगाना जी

राह कठिन है पी के नगर की, आग पे चल कर जाना है
इश्क़ है सीढ़ी पी के मिलन की, जो चाहे तो निभाना जी

‘तर्ज़’ बहुत दिन झेल चुके तुम, दुनिया की ज़ंजीरों को
तोड़ के पिंजरा अब तो तुम्हें है देस पिया के जाना जी

इक ज़माना था कि जब था कच्चे धागों का भरम

इक ज़माना था कि जब था कच्चे धागों का भरम
कौन अब समझेगा कदरें रेशमी ज़ंजीर की

त्याग, चाहत, प्यार, नफ़रत, कह रहे हैं आज भी
हम सभी हैं सूरतें बदली हुई ज़ंजीर की

किस को अपना दुःख सुनाएँ किस से अब माँगें मदद
बात करता है तो वो भी इक नई ज़ंजीर की

एक नज़र क्या इधर हो गई 

एक नज़र क्या इधर हो गई
अजनबी हम से हर नज़र हो गई

ज़िंदगी क्या है और मौत क्या
शब हुई और सहर हो गई

उन की आँखो में अश्क़ आ गए
दास्ताँ अपनी मुख़्तसर हो गई

चार तिनके ही रख पाए थे
और बिजलियो को ख़बर हो गई

छिड़ गई किस के दामन की बात
ख़ुद-ब-ख़ुद आँखे तर हो गई !!

चमकी कहीं जो बर्क तो एहसास बन गई

चमकी कहीं जो बर्क तो एहसास बन गई
छाई कहीं घटा तो अदा बन गई ग़ज़ल

आंधी चली तो कहर के साँचें में ढल गई
बादे सबा चली तो नशा बन गई ग़ज़ल

उठ्ठा जो दर्दे इश्क़ तो अश्कों में ढल गई
बेचैनियाँ बढीं तो दुआ बन गई ग़ज़ल

अर्ज़े दकन में जान तो देहली में दिल बनी
और शेहरे लखनऊ में हिना बन गई ग़ज़ल

जाने जाने की बात करते हो 

जाने जाने की बात करते हो
क्यूँ सताने की बात करते हो

प्यार मिलता है प्यार देने से
किस ज़माने की बात करते हो

छीन कर मुस्कुराहटें ख़ुद ही
मुस्कुराने की बात करते हो

बिजलियाँ रख के आशियाने में
घर बनाने की बात करते हो

जान-ओ-दिल ले लिये मगर फिर भी
आज़माने की बात करते हो

आई मंज़िल तो फिर पलट आया
किस दीवाने की बात करते हो

तुम भी ऐ ‘तर्ज़’ खूब हो दिल से
दिल लगाने की बात करते

बेनियाज़-ए-सहर हो गई

बेनियाज़-ए-सहर हो गई
शाम-ए-ग़म मौतबर हो गई

एक नज़र क्या इधर हो गई
अजनबी हर नज़र हो गई

ज़िन्दगी क्या है और मौत क्या
शब हुई और सहर हो गई

उनकी आँखों में अश्क़ आ गए
दास्ताँ मुख़्तसर हो गई

चार तिनके ही रख पाए थे
आँधियों को ख़बर हो गई

छिड़ गई किस के दामन की बात
ख़ुद-ब-ख़ुद आँख तर हो गई

उनकी महफ़िल से उठ कर चले
रोशनी हमसफ़र हो गई

‘तर्ज़’ जब से छुटा कारवाँ
जीस्त गर्द-ए-सफ़र हो गई

मुझे दे के मय मेरे साक़िया मेरी तिश्नगी को हवा न दे 

मुझे दे के मय मेरे साक़िया मेरी तिश्नगी को हवा न दे
मेरी प्यास पर भी तो कर नज़र मुझे मैकशी की सज़ा न दे

मेरा साथ अय मेरे हमसफ़र नहीं चाहता है तो जाम दे
मगर इस तरह सर-ए-रहगुज़र मुझे हर कदम पे सदा न दे

मेरा ग़म न कर मेरे चारागर तेरी चाराजोई बजा मगर
मेरा दर्द है मेरी ज़िन्दगी मुझे दर्द-ए-दिल की दवा न दे

मैं वहां हूँ अब मेरे नासेहा की जहाँ खुशी का गुज़र नहीं
मेरा ग़म हदों से गुज़र गया मुझे अब खुशी की दुआ न दे

वो गिराएं शौक़ से बिजलियाँ ये सितम करम है सितम नहीं
के वो ‘तर्ज़’ बर्क-ए-ज़फ़ा नहीं जो चमक ने नूर-ए-वफ़ा न दे

रह गए आँसू, नैन बिछाए 

रह गए आँसू, नैन बिछाए
घन आए घनस्याम न आए

दिल तो जैसे तैसे संभला
रूह की पीड़ा कौन मिटाए

मोर मयूरी नाच चुके सब
रो रो सावन बीता जाए

पीली पड़ गई हरियाली भी
धानी आँचल सरका जाए

देख के उनको हाल अजब है
प्यास बुझे और प्यास न जाए

हुस्न का साक़ी प्यार के सागर
‘तर्ज़’ पिए और गिर-गिर जाए

है बात वक़्त वक़्त की चलने की शर्त है

है बात वक़्त वक़्त की चलने की शर्त है
साया कभी तो क़द के बराबर भी आएगा

ऐसी तो कोई बात तसव्वुर में भी न थी
कोई ख़्याल आपसे हट कर भी आएगा

मैं अपनी धुन में आग लगाता चला गया
सोचा न था कि ज़द में मेरा घर भी आएगा

अहल-ए-दिल के वास्ते पैग़ाम हो कर

अहल-ए-दिल के वास्ते पैग़ाम हो कर रह गई
ज़िंदगी मजबूरियों का नाम हो कर रह गई.

हो गए बर्बाद तेरी आरज़ू से पेश-तर
ज़ीस्त नज़्र-ए-गर्दिश-ए-अय्याम हो कर रह गई.

तौबा तौबा उस निगाह-ए-मस्त की सर-शारियाँ
देर-पा तौबा भी ग़र्क़-ए-जाम हो कर रह गई.

उस निगाह-ए-नाज़ को तो कोई कुछ कहता नहीं
और मोहब्बत की नज़र बद-नाम हो कर रह गई.

हर ख़ुशी तब्दील ग़म में हो गई तेरे बग़ैर
सुब्ह मुझ तक आई भी तो शाम हो कर रह गई.

रू-ब-रू उन के कहाँ थी फ़ुर्सत-ए-इज़हार-ए-ग़म
लब को इक जुम्बिश बराए नाम हो कर रह गई.

उन के जलवों की सहर तो ‘तर्ज़’ दुनिया ले गई
गेसुओं की शाम अपने नाम हो कर रह गई.

दोस्ती अपनी जगह और दुश्मनी 

दोस्ती अपनी जगह और दुश्मनी अपनी जगह
फ़र्ज़ के अंजाम देने की ख़ुशी अपनी जगह.

हम तो सरगर्म-ए-सफ़र हैं और रहेंगे उम्र भर
मंज़िलें अपनी जगह आवारगी अपनी जगह.

पत्थरों के देस में शीशे का है अपना वक़ार
देवता अपनी जगह और आदमी अपनी जगह.

ज्ञान माना है बड़ा भक्ती भी लेकिन कम नहीं
आगही अपनी जगह दीवानगी अपनी जगह.

सुब्ह हैं सज्दे में हम तो शाम साक़ी के हुज़ूर
बंदगी अपनी जगह और मय-कशी अपनी जगह.

सारा आलम है तरन्नुम-ख़ेज़ ऐ शाएर-नवाज़
शेर की अपनी जगह और ‘तर्ज़’ की अपनी जगह.

जिस्म तो मिट्टी में मिलता है यहीं 

जिस्म तो मिट्टी में मिलता है यहीं मरने के बाद
उस को क्या रोएँ जो मरता ही नहीं मरने के बाद.

फ़र्ज़ पर क़ुर्बान होने का इक अपना हुस्न है
और हो जाता है कुछ इंसाँ हसीं मरने के बाद.

इक यही ग़म खाए जाता है के उस का होगा क्या
कौन रक्खेगा मेरा हुस्न-ए-यक़ीं मरने के बाद.

ये महल ये माल ओ दौलत सब यहीं रह जाएँगे
हाथ आएगी फ़क़त दो गज़ ज़मीं मरने के बाद.

ज़िंदगी तक के हैं रिश्ते ज़िंदगी तक है बहार
तुम कहीं ऐ ‘तर्ज़’ होगे वो कहीं मरने के बाद.

कितने जुमले हैं के जो रू-पोश हैं 

कितने जुमले हैं के जो रू-पोश हैं यारों के बीच
हम भी मुजरिम की तरह ख़ामोश हैं यारों के बीच.

क्या कहें किस ने बहारों को ख़िज़ाँ-सामाँ किया
देखने में तो सभी गुल-पोश हैं यारों के बीच.

ये भी सच है घर के भेदी ने किया घर को तबाह
ये भी लगता है के सब निर्दोश हैं यारों के बीच.

क्या पता कब ख़ून का प्यासा यहाँ हो जाए कौन
यूँ तो कहने को सभी मय-नोश हैं यारों के बीच.

हाँ चला अब साक़िया जादू भरी नज़रों के तीर
हम भी देखें किस क़दर ज़ी-होश हैं यारों के बीच.

बज़्म-ए-याराँ है ये साक़ी मय नहीं तो ग़म न कर
कितने हैं जो मय-कदा बर-दोश हैं यारों के बीच.

‘तर्ज़’ पढ़ता है कोई जब झूम कर नज़्म ओ ग़ज़ल
ऐसा लगता है ‘फ़िराक़’ ओ ‘जोश’ हैं यारों के बीच.

रह-ए-इश्क़ में ग़म-ए-ज़िंदगी की भी

रह-ए-इश्क़ में ग़म-ए-ज़िंदगी की भी ज़िंदगी सफ़री रही.
कभी नज़्र-ए-ख़ाक-ए-सफ़र रही कभी मोतियों से भरी रही.

तेरी इक निगाह से साक़िया वो बहार-ए-बे-ख़बरी रही.
गुल-ए-तर वही गुल-ए-तर रहा वही डाल डाल हरी रही.

तेरी बे-रुख़ी की निगाह थी के जो हर ख़ता से बरी रही.
मेरी आरज़ू की शराब थी के जो जाम जाम भरी रही.

दम-ए-मर्ग भी मेरी हसरतें हद-ए-आरज़ू से न बढ़ सकीं
उसी काले देव की क़ैद में मेरे बचपने की परी रही.

दिल-ए-ग़म-ज़दा पे गुज़र गया है वो हादसा के मेरे लिए
न तो ग़म रहा न ख़ुशी रही न जुनूँ रहा न परी रही.

वही ‘तर्ज़’ तुझ पे रहीम है ये उसी का फ़ैज़-ए-करीम है
के असाताज़ा के भी रंग में जो ग़ज़ल कही वो खरी रही.

साँसों की जल-तरंग पर नग़मा-ए-इश्क़

साँसों की जल-तरंग पर नग़मा-ए-इश्क़ गाए जा
ऐ मेरी जान-ए-आरज़ू तू यूँही मुस्कुराए जा.

हुस्न-ए-ख़िराम-ए-नाज़ से जादू नए जगाए जा
जब भी जहाँ पड़ें क़दम फूल वहीं खिलाए जा.

आग लगा के हँस कभी बन के घटा बरस कभी
बिखरा के ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं होश मेरे उड़ाए जा.

बरसों के बाद आँखों में छलकी है प्यार की शराब
बंद न कर ये मय-कदे ऐसे ही बस पिलाए जा.

मस्ती भी है समाँ भी है महफ़िल-ए-दिल-बराँ भी है
ऐसे में ‘तर्ज़’ झूम कर रंग-ए-ग़ज़ल जमाए जा.

सामने आँखों के घर का घर बने और टूट

 सामने आँखों के घर का घर बने और टूट जाए
क्या करे वो जिस का दिल पत्थर बने और टूट जाए.

हाए रे उन के फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्दा का जाल
देखते ही देखते इक दर बने और टूट जाए.

हादसों की ठोकरों से चूर होना है तो फिर
क्यूँ न ख़ामोशी से दिल साग़र बने और टूट जाए.

हम भी ले लें लुत्फ़-ए-तीर-ए-नीम-कश गर वो नज़र
आते आते क़ल्ब तक ख़ंजर बने और टूट जाए.

उन के दामन की हवा भी किस को होती है नसीब
आज हर आँसू मेरा गौहर बने और टूट जाए.

यूँ बिखरता ही रहा ऐ ‘तर्ज़’ हर सपना मेरा
सुब्ह जैसे ख़्वाब का मंज़र बने और टूट जाए.

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