ग़ालिब अयाज़ की रचनाएँ

बस तेरे लिए उदास आँखें 

बस तेरे लिए उदास आँखें
उफ़ मस्लहत ना-शनास आँखें

बे-नूर हुई हैं धीरे धीरे
आईं नहीं मुझ को रास आँखें

आख़िर को गया वो काश रूकता
करती रहीं इल्तिमास आँखें

ख़्वाबीदा हक़ीक़तों की मारी
पामाल और बद-हवास आँखें

दरपेश जुनूँ का मरहला और
फ़ाक़ा है बदन तो प्यास आँखें

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला

दर्द जब दस्तरस-ए-चारागराँ से निकला
हर्फ़-ए-इंकार मोहब्बत की ज़बाँ से निकला

ज़िंदगानी में सभी रंग थे महरूम के
तुझ को देखा तो मैं एहसास-ए-ज़ियाँ से निकला

सब ब-आसानी मिरे ख़्वाब को पढ़ लेते थे
फिर तो मैं अंजुमन-ए-दिल-ज़दगाँ से निकला

जज़्बा-ए-इश्क़ ने जब एड़ियाँ अपनी रगड़ीं
ख़ाक उड़ाता हुआ इक दश्त वहाँ से निकला

रोज़न-ए-जिस्म में इक दर्द हुआ था दाख़िल
आख़िर आख़िर मैं वो दरवाज़ा-ए-जाँ से निकला

मुद्दतों तक मिरी तख़ईल अमीं थी उस की
और इक दिन वो मिरी हद्द-ए-गुमाँ से निकला

हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए

हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए
ये रेत जैसा बदन आँधियों के काम तो आए

मुनाफ़िक़त की सभी तोहमतें मुझे दे दे
मिरे तुफ़ैल रफ़ीक़ों में तेरा नाम तो आए

उसे उदास न कर दे ये मेरी सुस्त-रवी
मैं अब के सुस्त चलूँ वो सुबुक-ख़िराम तो आए

ग़म-ए-हयात ग़म-ए-रोज़गार बे-वतनी
सुकून से जो ढले काश ऐसी शाम तो आए

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना 

हुआ करेगा हर इक लफ़्ज़ मुश्क-बार अपना
अभी सुकूँ से किए जाओं इंतिज़ार अपना

उठा लिया है हलफ़ गरचे जाँ-निसारी का
मुझे संभाल कि होता हूँ बार बार अपना

उदास आँख को है इंतिज़ार फ़स्ल-ए-मुराद
कभी तौ मौसम-ए-जाँ होगा साज़गार अपना

तुम्हारे दर से उठाए गए मलाल नहीं
वहाँ तो छोड़ के आए हैं हम ग़ुबार अपना

बहुत बुलंद हुई जाती है अना की फ़सील
सो हम भी तंग किए जाते हैं हिसार अपना

हर इक चराग़ को है दुश्मनी हवा के साथ
बेचारी ले के कहाँ जाए इंतिशार अपना

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो
अब ये दिल बे-क़रार हो कि न हो

मर्ग-ए-अम्बोह देख आते हैं
आँख फिर अश्क-बार हो कि न हो

कर्ब-ए-पैहम से हो गया पत्थर
अब ये सीना फ़िगार हो कि न हो

फिर यही रूत हो ऐन मुमकिन है
पर तिरा इंतिज़ार हो कि न हो

शाख़-ए-ज़ैतून के अमीं हैं हम
शहर में इंतिशार हो कि न हो

शेर मेरे संभाल कर रखना
अब ग़ज़ल मुश्क-बार हो कि न हो

ज़बीन-ए-शौक़ पे गर्द-ए-मलाल चाहती है 

ज़बीन-ए-शौक़ पे गर्द-ए-मलाल चाहती है
मिरी हयात सफ़र का मआल चाहती है

मैं वुसअतों का तलबगार अपने इश्क़ में हूँ
वो मेरी ज़ात में इक यर्ग़माल चाहती है

हमें ख़बर है कि उस मेहरबाँ की चारागरी
हमारे ज़ख़्मों का कब इंदिमाल चाहती है

तुम्हारे बाद मिरी आँख ज़िद पे आ गई है
वही जमाल वही ख़द्द-ओ-ख़ाल चाहती है

हम उसे के जब्र का क़िस्सा तमाम चाहते हैं
और की तेग़ हमारा ज़वाल चाहती है

हरी रूतों को इधर का पता नहीं मालूम
बरहना शाख़ अबस देख-भाल चाहती है

जहाँ ख़राब सही हम बदन-दरीदा सही 

जहाँ ख़राब सही हम बदन-दरीदा सही
तिरी तलाश में निकले हैं पा-बुरीदा सही

जहान-ए-शेर में मेरी कई रियासते हैं
मैं अपने शहर में ग़ुमनाम ओ ना-शुनीदा सही

भले ही छाँव न दे आसरा तो देता है
ये आरज़ू का शजर है ख़िज़ाँ-रसीदा सही

इन्हीं बुझी हुई आँखों में ख़्वाब उतरेंगे
यक़ीं न छोड़ ये बीमार ओ शब-गुज़ीदा सही

दिलों को जोड़ने वाली ग़ज़ल सलामत है
तअल्लुक़ात हमारे भले कशीदा सही

कभी गुमान कभी ए’तिबार बन के रहा 

कभी गुमान कभी ए’तिबार बन के रहा
दयार-ए-चश्म मे वो इंतिज़ार बन के रहा

हज़ार ख़्वाब मिरी मिलकियत में शामिल थे
मैं तेरे इश्क़ में सरमाया-दार बन के रहा

तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन
कभी कभी तो वो इस दिल पे बार बन के रहा

उसी के नाम करूँ मैं तमाम अहद-ए-ख़याल
दरून-ए-जाँ जो मिरे सोगवार बन के रहा

अगरचे शहर में ममनू थी हिमायत-ए-ख़्वाब
मगर ये दिल सबब-ए-इंतिशार बन के रहा

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