गिरधर गोपाल की रचनाएँ

शरद की हवा

शरद की हवा ये रंग लाती है,
द्वार-द्वार, कुंज-कुंज गाती है।

फूलों की गंध-गंध घाटी में
बहक-बहक उठता अल्हड़ हिया
हर लता हरेक गुल्म के पीछे
झलक-झलक उठता बिछुड़ा पिया

भोर हर बटोही के सीने पर
नागिन-सी लोट-लोट जाती है।

रह-रह टेरा करती वनखण्डी
दिन-भर धरती सिंगार करती है
घण्टों हंसिनियों के संग धूप
झीलों में जल-विहार करती है

दूर किसी टीले पर दिवा स्वप्न
अधलेटी दोपहर सजाती है।

चाँदनी दिवानी-सी फिरती है
लपटों से सींच-सींच देती है
हाथ थाम लेती चौराहों के
बाँहों में भींच-भींच लेती है

शिरा-शिरा तड़क-तड़क उठती है
जाने किस लिए गुदगुदाती है।

हेमन्ती भोर

हेमन्ती भोर एक जादू की पुड़िया है।

सागर के फेन से बना हुआ बदन इस का,
जंगल की चकित-भ्रमित हरिणी का मन इस का
यह तो एक सोती-जागती हुई गुड़िया है।

कोहरे की झील बीच नाव-सा नगर डोले
दरपन-सा घर डोले काँच की डगर डोले,
धूल है कि छोड़ गई उर्वशी चुनरिया है।

ताल औ’ तलैया हैं जल रहीं अँगीठी-सी
नदी है कि ठहर गई एक नज़र मीठी-सी
घाट-घाट साज रही रूप की नज़रिया है।
जादू की पुड़िया है-
हेमन्ती भोर एक जादू की पुड़िया है।

Share