गिरधारी सिंह गहलोत की रचनाएँ

आदमी के पास हो दौलत नहीं आराम है 

आदमी के पास हो दौलत नहीं आराम है
ज़िंदगी में कुछ नहीं फिर ज़िंदगी नाकाम है।

वक़्त इतना भी नहीं गर खा सके दो रोटियां
किसलिए करता बशर फिर रात दिन यूँ काम है।

बाज आओगे नशे से तुम नहीं हरगिज़ अगर
ग़म को न्योता दे रहे हो मौत ही अंजाम है।

अब सियासत को भरम है कुछ बिगड़ना है नहीं
इसलिये दिन मद भरे हैं और रंगीं शाम है।

जो भी दुनियां में जुबानें ख़ूबसूरत हैं सभी
रार कर भाषा पे तू क्या दे रहा पैग़ाम है।

अपने मुँह बनते मियां गर खुद ही मिठ्ठू याद रख
कौन कितने आब में सब देखती आवाम है।

कौन तुझको छोड़कर यूँ जा सका है ज़िंदगी
बांधने को मोह की जंजीर कितनी आम है।

मतलबी दुनियां बहुत है लोग भी शातिर बहुत
पाक दामन हो रहा क्यों हर कदम बदनाम है।

याद भी सबको दिलाना क्यों पड़े है अब ‘तुरंत’
हर बशर के काम आना हर बशर का काम है।

अगर औरत बिना संसार होता

अगर औरत बिना संसार होता।
वफ़ा का ज़िक्र फिर बेकार होता।

ये किस्से हीर लैला के न मिलते।
हर एक आशिक़ यहाँ बेजार होता।

क़लम ख़ामोश रहता शायरों का
बिना रुजगार के फ़नकार होता।

नहीं फिर जिक्र होठों पर किसी के
नयन जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार होता।

न करता कोई बातें ग़म ख़ुशी की
किसी को कब किसी से प्यार होता।

सजावट धूल खाती फिर मकाँ की
लटकता आइना ग़मख़्वार होता।

सभी ख़ामोश होती महफ़िलें भी
नहीं फिर रूप का बाज़ार होता।

बहन माशूक मां बेटी ओ बीबी
बिना कोई न रिश्तेदार होता।

‘तुरंत ‘ अब ये हक़ीक़त और जानो
बिना औरत बशर क्या यार होता।

आज की दुनियां में नैमत है ये ज़ज्बा प्यार का 

आज की दुनियाँ में नैमत है ये ज़ज्बा प्यार का।
ये जहाँ मौजूद हो तो काम क्या तलवार का।

हारना सीखा नहीं है ज़िंदगी हो इश्क़ हो
आजतक देखा नहीं हैं मुँह किसी भी हार का।

तीरगी अब रोशनी को रोक सकती हैं नहीं
रात ढलते ही सहर होगी चलन संसार का।

हौसलों से बात बनती है कभी खोना नहीं
पार होगा जानता है जो हुनर पतवार का।

अब जरूरी हो गया है मुल्क में पहचानना
हाथ में किसके अलम है नफरतों के वार का।

धार लगनी चाहिए इल्म-ओ-हुनर को बारहा
जंग खाकर जो पड़ा औजार है बेकार का।

चाहते ख़ुशियाँ घरों में रास्ता बस एक है
छोड़िये दामन हमेशा ज़िद वहम तकरार का।

दूर कर दी औरतों की मुश्किलें दावे बहुत
आज भी होती तिजारत क्या किया बाज़ार का।

एक होकर ही हमेशा जंग कर सकते ‘तुरंत’
मिल न पाए ग़र जहाँ में हक़ किसी हक़दार का।

अब अकेलापन घरों में ले रहा अँगड़ाइयाँ 

अब अकेलापन घरों में ले रहा अँगड़ाइयाँ।
लील लेता है मुबाइल आज सब किलकारियाँ।

अब सिकुड़ती जा रही ख़ुद में सभी की ज़िंदगी।
रोज बढ़ती जा रही है दूरियाँ और खाइयाँ।

डोर उल्फत की तनी है टूटती या जा रही
दिन ब दिन बढ़ने लगी है इश्क़ में रुसवाइयाँ।

भूल जाओ वो ज़माना साथ मिल बैठे सभी
लूटती अब रात दिन है फ़िक्र और तन्हाईयाँ।

हाथ बाँधे फ़ौज़ियों के क्या नहीं उनके हकूक
जीत फिर कैसे सकेंगे दहशतों से बाज़ियाँ।

कब तलक सहते रहेंगे जुल्म हद होगी कहीं
मातमों की चीख़ में क्यों खो रही शहनाइयाँ।

अब तलक आये नहीं हैं अच्छे दिन आवाम के
ज़िंदगी में बढ़ रही है दिन ब दिन दुश्वारियाँ।

दाल की सुनते हमेशा और महँगी हो रही
ज़ोश में है आजकल तो ख़ूब ये तरकारियाँ।

मौसमों पर क्या भरोसा अब करें क्यों कर ‘तुरंत’
ठण्ड के मौसम में गर्मी खो गई पुरवाइयाँ।

अगर हमसे मुहब्बत की ये नादानी नहीं होती

अगर हमसे मुहब्बत की ये नादानी नहीं होती।
कसम से फिर हमारे दिल की क़ुर्बानी नहीं होती।

मुझे लगता यक़ीं तुमको नहीं मेरी मुहब्बत पर
अगर रखते रक़ीबों पर नज़रसानी नहीं होती।

शरारत छेड़खानी तंज़ कसना है अदा तेरी
मगर अच्छी कभी दिल से ये शैतानी नहीं होती।

जनम से साथ रहते हैं हमेशा ग़म मेरे घर में
है मेरी ज़ीस्त का हिस्सा तो हैरानी नहीं होती।

उठाते बोझ कुनबे का न शानों पर अगर अपने
हमारी भी शिकनयफ़्ता ये पेशानी नहीं होती।

अगरचे इश्क़ की परवाज़ हम दोनों नहीं करते
न कोई बादशा होता कोई रानी नहीं होती।

हमारे मुल्क की तहजीब का पालन अगर करते
लिबासों की समाजों में ये उर्यानी नहीं होती।

नहीं अख़लाक़ सीखें गर किसी भी क़ौम के तालिब
कहीं दुनियाँ जहाँ में फिर क़दरदानी नहीं होती।

मुहब्बत का हसीं ज़ज्बा कभी का ख़त्म हो जाता
खुदा की गर ‘तुरंत’ हम पर मेहरबानी नहीं होती।

जवान हुश्न है रखना ज़माल अच्छे से 

जवान हुश्न है रखना ज़माल अच्छे से।
क़दम जरा तू ले अपने सँभाल अच्छे से।

अदा है खूब पलक को उठा गिराने की
अता किया है ख़ुदा ने कमाल अच्छे से।

वो जिसने बख़्श तुझे दी है हुश्न की दौलत
वही करेगा ख़ुदा देखभाल अच्छे से।

मची है खलबली तेरे गली में आने पर
कि आशिकों में उठेगा बवाल अच्छे से।

अना तुझे है अगर हुश्न की भले रखियो
मगर तमीज की देना मिसाल अच्छे से।

खड़ा हुआ है अगर बदतमीज़ रस्ते में
नज़र ज़ुबाँ का दिखाना जलाल अच्छे से।

मुझे करे न करे तू अगर मुहब्बत पर
भले रक़ीब हो रखना खयाल अच्छे से।

ज़ुकाम मर्ज़ ये कमबख्त छीनता है सुकूं
हुजूर साथ में रखना रुमाल अच्छे से।

‘तुरंत’ रोज तो मुश्किल है ढूँढना कोई
नया सा दाद की खातिर ख़याल अच्छे से।

दौर होगा बड़ा मुश्किल कभी सोचा भी न था / गिरधारी सिंह गहलोत

दौर होगा बड़ा मुश्किल कभी सोचा भी न था।
ज़िंदगी इतनी हो बोझिल कभी सोचा भी न था।

हादसे देख सड़क पर ये पिघलता ही नहीं
पत्थरों जैसा हुआ दिल कभी सोचा भी न था।

नौजवाँ सोच रहे आज किधर हम जाएँ
दूर सबकी हुई मंज़िल कभी सोचा भी न था।

काट लेता है कोई सर यहाँ दुश्मन मेरा
पर सियासत रहे ग़ाफ़िल कभी सोचा भी न था।

दहशतों ने जो बिगाड़ी है वतन की ये फ़ज़ां
आदमी होगा यूँ क़ातिल कभी सोचा भी न था।

कट रहा था ये सफर कैसे बताऊं अब क्या
आप हो ज़ीस्त में शामिल कभी सोचा भी न था।

भूलना कैसे है मुमकिन वो बहारों का समां
सूनी हो जाएगी महफ़िल कभी सोचा भी न था।

डूब जाएगा सफ़ीना भी तलातुम में मिरा
सामने जब कि हो साहिल कभी सोचा भी न था।

नाम दुनिया में सुख़न की मिले हसरत थी ‘तुरंत’
शुहरतें होंगी ये हासिल कभी सोचा भी न था।

ख़याल कुछ भी नहीं है दिल में / गिरधारी सिंह गहलोत

ख़याल कुछ भी नहीं है दिल में समझ न आये कि क्या कहूँ मैं
यही समझ लो लिखा जो अब तक ख़ुदा तुम्हारी रज़ा कहूँ मैं।

हसीं जवानी शबाब पर तो अज़ब लिखा है गज़ब लिखा है
हर एक हरकत पे दिलबरों की लिखा उसे तो अदा कहूँ मैं।

ग़रीब पर भी अमीर पर भी लिखा कभी तो ज़मीर पर भी
कभी कसीदे पढ़े ख़ुदा पर उन्हें तो दिल की सदा कहूँ मैं।

क़लम चला है कभी क़ज़ा पर कभी बनी ज़िंदगी सजा जब
बहा ख़ुशी ग़म जो लफ्ज़ में ढल हयात का तर्ज़ुमा कहूँ मैं|

ये कैसे मुमकिन नहीं लिखूंगा मुहब्बतों पर जवाँ दिलों पर
मिला जो अनमोल एक ज़ज्बा ख़ुदा से रहमत अता कहूँ मैं।

बहुत पुराना चलन लिखूं मैं नज़र लबों गेसुओं के ख़म पर
नक़ाब रुख पर है पल्लू सर पर इसे किसी की हया कहूँ मैं।

लिखा है मैंने भी चांदनी पर खिली सहर पर अँधेरी शब पर
कभी क़मर पर लिखा तो सूरज से कैसे ख़ुद को जुदा कहूँ मैं।

करी है कोशिश लिखूं हमेशा नए नए नित ख़याल लेकर
यही तमन्ना कि शायरी को कभी नहीं अलविदा कहूँ मैं।

कभी समझ क़ायनात फ़ानी लिखी जो मैंने यही कहानी
‘तुरंत’ बातें लिखी रुहानी इसे महज़ फ़लसफ़ा कहूँ मैं।

जरा हयात को सांचे में ढाल अच्छे से / गिरधारी सिंह गहलोत

जरा हयात को सांचे में ढाल अच्छे से।
तभी ये ज़िंदगी होगी निहाल अच्छे से।

समझ ज़माने की तिरछी ये चाल अच्छे से।
हैं लोग दुनिया में करते हलाल अच्छे से।

सियासतों के सदर आज चुप है क्यों बैठे
करो न कुछ तो मिटे हर बवाल अच्छे से।

यही चलन तो हमेशा रहा है दुनिया का
जो बोलता है बिके उसका माल अच्छे से।

सिमट के रह गई तादाद ऐसे लोगों की
सजाते रोज जो थाली में दाल अच्छे से।

ग़मों का बोझ अकेले उठा रहे हो क्यों
बयाँ करो न किसी से ये हाल अच्छे से।

अवाम आज है महफ़ूज़ फौज के दम पर
निभाते फ़र्ज़ वो माई के लाल अच्छे से।

सुकून दिल को मिलेगा ख़ुशी में ग़म में भी
नज़र से अश्क़ अगर दो निकाल अच्छे से।

मिली अगर जो मुझे दाद इस कदर सबकी
करूँ ‘तुरंत’ सुख़न में धमाल अच्छे से।

ग़म अभी तक ज़ीस्त में ठहरा न था / गिरधारी सिंह गहलोत

ग़म अभी तक ज़ीस्त में ठहरा न था।
इश्क़ की वादी में जब कुहरा न था।

कोशिशें कितनी हजारों बार की
पर मुहब्बत का अलम फहरा न था।

ख़ैर मक़दम था हमेशा आपका
कू-ए-दिल में तो कभी पहरा न था।

आपको पक्का कोई धोखा हुआ
मैं रक़ीबों का कभी मुहरा न था।

बारिशें ही बारिशें थी प्यार की
दिल तो मेरा आज तक सहरा न था।

हिज़्र का क्या लेना देना ज़ीस्त से
अब तलक दिल में कोई चहरा न था।

थी खता मेरी न दी कोई सदा
कैसे सुनता ये ख़ुदा बहरा न था।

क्या सुनाता दास्ताँ दिल की ‘तुरंत’
आपसे रिश्ता ही जब गहरा न था।

दर्द अपना छुपा नहीं सकते / गिरधारी सिंह गहलोत

दर्द अपना छुपा नहीं सकते।
हर किसी को सुना नहीं सकते।

बस लबों पर हँसी सजाये हुए
दिल से तो मुस्करा नहीं सकते।

तोड़ते क्यों जनाब घर कोई
जब किसी का बसा नहीं सकते।

दिल में गर आपके ज़ुनून नहीं
मंजिलें कोई पा नहीं सकते।

दूर करना दिलों को सोचें क्यों
पास गर उनको ला नहीं सकते।

रहनुमाओं के बस की बात नहीं
मुफ़्लिसी ये मिटा नहीं सकते।

घुल गया ज़ह्र जो हवाओं में
क्या करें अब भगा नहीं सकते।

चंद कागज़ के टुकड़ों की खातिर
आप ईमां डिगा नहीं सकते।

काम अपना ‘तुरंत’ ख़ुश रखना
हम किसी को रुला नहीं सकते।

आईने से मुँह चुराकर क्या करें / गिरधारी सिंह गहलोत

आईने से मुँह चुराकर क्या करें
चोर है जब दिल के अंदर क्या करें।

जानते सब हैं बुरी होती शराब
तोड़ते फिर भी न सागर क्या करें।

देखने वाला अगर कोई न हो
हुश्नवाले सज सजाकर क्या करें।

लाख हम रख लें छुपाकर दर्द को
आग तो जलती है भीतर क्या करें।

ये सियासतदां समझ पाते नहीं
फ़ौज पर बरसे न पत्थर क्या करें।

रहगुजर उल्टी पकड़ हम ख़ुद चलें
मिल के भी फिर लाख रहबर क्या करें।

मुफलिसी की आग में जो जल रहे
हर तरफ मिलती है ठोकर क्या करें।

हमसफ़र कोई नहीं है हमक़दम
प्यार की खाली है गागर क्या करें।

हम क़लम फेंकें ‘तुरंत ‘ या तोड़ दें
बिन ख़यालों के भी शायर क्या करें।

होती है नाज़नीं की इनायत कभी-कभी / गिरधारी सिंह गहलोत

होती है नाज़नीं की इनायत कभी-कभी।
आती है दिलजलों पे क़यामत कभी कभी।

कितने दिनों से ख़त न ही कोई ख़बर भी है
होती है बे-वज़ह यूँ मसाफ़त कभी-कभी।

इल्ज़ाम था जो गैर का डाला किसी के सर
खाती है मार अपनी शराफ़त कभी-कभी।

सज धज के तुम चलो भले इतना ख्याल हो
बनती है अपनी सौत सबाहत कभी-कभी।

वैसे तो परस्तिश पे भरोसा नहीं मुझे
करने लगा हूँ तेरी इबादत कभी-कभी।

आकर के पूछ लीजे कभी हाल आप भी
मरने से पहले कीजे इयादत कभी-कभी।

सोचो जरा मोहब्बतें करने से पहले तुम
ऐसा है जुर्म जिसमे ज़मानत कभी-कभी।

रुसवा न हो कभी कोई उल्फ़त की राह में
देते है लोग इसमें शहादत कभी-कभी।

समझा है कौन फ़लसफ़ा उल्फ़त का आज तक
करते ‘तुरंत’ लोग सराहत कभी-कभी।

फरजंद के लिए सदा उस्ताद है पिता / गिरधारी सिंह गहलोत

फरजंद के लिए सदा उस्ताद है पिता।
वरदान बेटियों को ख़ुदादाद है पिता।

आये किसी घड़ी किसी भी क़िस्म का क़हर
औलाद के लिए सदा फ़ौलाद है पिता।

हालाँकि प्यार उसका बयाँ हो कभी कभी
लेकिन भले हो दूर करे याद है पिता।

शहतीर शामियाना है दीवार-ओ-दर भी वो
माना कि घर तो माँ से है बुनियाद है पिता।

आंखें करे टेढ़ी कोई कुनबे की ओर तो
अज्लाफ़ के लिए बना जल्लाद है पिता।

ऐसा हुआ फँसी कभी मुश्किल में ज़िंदगी
है आसमान से मिली इमदाद है पिता।

पड़ते निभाने फ़र्ज़ उसे कितने क्या कहें
ग़म और ख़ुशी मिली-जुली रूदाद है पिता।

कायम घरों में ये ख़ुशी तब तक रहे ‘तुरंत’
जब तक कि फ़िक्र-ओ-रंज से आजाद है पिता।

ठोकर जरा लगी हमें क्या हार मान लें / गिरधारी सिंह गहलोत

ठोकर जरा लगी हमें क्या हार मान लें।
मंजिल की रहगुजर में क्यूँ दीवार मान लें।

जब तक ज़मीन और फलक है वज़ूद में
क्यों बेवज़ह ही ख़त्म ये संसार मान लें।

इंसानियत का जो भी उठाये रखे अलम
हम आज ही उसे नया अवतार मान लें।

जितना किया है ग़म ने परेशान आपको
उतना ख़ुशी से आप सरोकार मान लें।

चक्कर लगा रहे हैं जो दौलत के इर्द गिर्द
उनको न आप अपना वफ़ादार मान लें।

बातें जो कर रहे हैं बड़ी सिर्फ इसलिए
क्यों हम उन्हें ही सबसे समझदार मान लें।

जो कर रहे हैं अम्न को दिनरात तार तार
आवाम के उन्हें क्यूँ मददगार मान लें।

अवसाद में घिरे कभी जल्दी से लें सलाह
ये है ग़लत कि ख़ुद को गुनहगार मान लें।

आवाज दिल की कर रहे गलती से अनसुनी
ख़ुद को ‘तुरंत’ आप खतावार मान लें।

ग़म में भी सूरत खिली है, और क्या / गिरधारी सिंह गहलोत

ग़म में भी सूरत खिली है, और क्या।
ये मेरी ज़िंदादिली है, और क्या।

मौत की सोचो जरा सी चोट से
ख़ुदकशी तो बुज़दिली है, और क्या।

मसअले हल मुल्क के होते नहीं
ये सरासर ग़ाफ़िली है,और क्या।

नाम तेरा बेवफ़ा कोई न ले
ये जुबां अब तक सिली है, और क्या।

क़त्लो गारत देख कर इंसान की
रूह तक मेरी छिली है, और क्या।

ज़ुर्म है गुलशन से तोड़ो गर कली
जो अभी तक अधखिली है, और क्या।

काम अपना छोड़ते कल पर अगर
ये तो बिलकुल काहिली है, और क्या।

वस्ल का पैग़ाम भेजा ख़ुद मुझे
ये तेरी दरियादिली है, और क्या।

काटनी हर हाल में है अब ‘तुरंत’
ज़िंदगी जैसी मिली है, और क्या।

है जरूरी आप-सा अब नाखुदा संसार में / गिरधारी सिंह गहलोत

है जरूरी आप-सा अब नाखुदा संसार में
डूब जाने का हुनर बस जानते हम प्यार में

मंजिलें उल्फत की खोई राह पाई ही नहीं
राहबर की भी सलाहें काम आई ही नहीं
किस तरह मंजिल मिले अब आपके अधिकार में
डूब जाने का हुनर बस…

हम अकेले काट दें जीवन सफर काबिल नहीं
ले चलोगे जब जिधर अब है मेरा साहिल वहीं
मीत मेरे अब बचालो नाव है मँझधार में
डूब जाने का हुनर बस…

अब नशे में प्यार के हम इस कदर मशगूल हैं
अब किसे मालूम जीवन फूल है या शूल है
अब लुटा दो प्यार है जो आपके आगार में
डूब जाने का हुनर बस…

लौ दिये की बुझ रही है प्रीत घृत अब डाल दो
बातियों को भी सम्हालों मौत कुछ दिन टाल दो
आस का दीपक जला दो घोर इस अँधियार में
डूब जाने का हुनर बस…

है जरूरी आप-सा अब नाखुदा संसार में
डूब जाने का हुनर बस जानते हम प्यार में

रंग भरी ये होली प्रीतम / गिरधारी सिंह गहलोत

रंग भरी ये होली प्रीतम
खेलूँ बोले मेरा जिया

रंग नेह का लिए खड़ी मैं
आतुर आज प्रतीक्षा रत
कब आओगे भेजो पतियां
भूलो आज सजनवा मत
द्वार निहारे नयन बावरे
आकुल व्याकुल मेरा हिया

रंग भरी …..

पांच होलियां गुजरी कब से
छुआ नहीं है रंगों को
नहीं रोकना सम्भव सैंया
मन में उठी उमंगों को
रखूं अगन में दबा सुलगती
कैसे बोलो अब मैं पिया

रंग भरी …..

फागुन में चलती पुरवाई
मस्त मुझे है कर देती
मधुर कल्पना प्रिय आने की
कष्ट सभी है हर लेती
जतन बुलाने का तुमको जो
कर सकती थी मैंने किया

रंग भरी ये होली प्रीतम
खेलूँ बोले मेरा जिया

आओ प्रेमामृत पान करें / गिरधारी सिंह गहलोत

आओ प्रेमामृत पान करें

नयनों से बातें हुई बहुत
बीते न कहीं ये मादक रुत
कर रहा मदन अब आवाहन
आ ऋतु बसंत का मान करें
आओ प्रेमामृत पान करें

जो प्रीत पगी अभिलाषाएं
कहीं व्यर्थ सभी न हो जाएँ
सिर आशंकाओं का कुचलें
चिर लक्ष्य आज संधान करें
आओ प्रेमामृत पान करें

उपलब्ध समय जो यौवन का
उपहार मनोहर जीवन का
जीकर अब हर इक मधुरिम पल
आरम्भ नया आख्यान करें
आओ प्रेमामृत पान करें

प्रेम अनादि अनन्त अमर है

जग जलधि में प्रेम ही सर्वस
प्रेम अनादि अनन्त अमर है

प्रेम है भक्ति प्रेम है शक्ति
प्रेम है युक्ति प्रेम है सुक्ति
प्रेम है चाह प्रेम है राह
प्रेम है बन्ध प्रेम है मुक्ति
प्रेम है धुप प्रेम है छाँह
प्रेम है आह प्रेम है बांह
प्रेम वंदना प्रेम कल्पना
प्रेम मधुर गीतों का स्वर है
जग जलधि में प्रेम ………

प्रेम आन है प्रेम बान है
प्रेम शान है प्रेम मान है
प्रेम तीर है प्रेम पीर है
प्रेम गान है प्रेम तान है
प्रेम साज है प्रेम गीत है
प्रेम हार है प्रेम जीत है
प्रेम धर्म है प्रेम कर्म है
प्रेम मोक्ष की शांत डगर है
जग जलधि में प्रेम ………..

प्रेम इक प्यास प्रेम इक आस
प्रेम विश्वास प्रेम उल्लास
प्रेम आल्हाद प्रेम उन्मांद
प्रेम ब्रजरास प्रेम मधुमास
प्रेम गुमनाम प्रेम उद्दाम
प्रेम अभिराम प्रेम अविराम
प्रेम चिरंतन प्रेम निरंतर
प्रेम मधुर रस का निर्झर है

जग जलधि में प्रेम ही सर्वस
प्रेम अनादि अनन्त अमर है

उसी का रुख़ सदा पुरनूर होता

उसी का रुख़ सदा पुरनूर होता
बशर जो ज़ोश से भरपूर होता।

ये दुनिया दूर रहती है उसी से
अना में जो हमेशा चूर होता।

बिना मेहनत नहीं मिलता यहाँ कुछ
ज़माने का यही दस्तूर होता।

सहे ग़म वो सदा अपनों की खातिर
बशर कितना यहाँ मज़बूर होता।

दिखाता रास्ता बनकर मसीहा
वही फिर जा-ब-जा मशहूर होता।

लगा जो साजिशों में रात दिन है
समाजों का वही नासूर होता।

किसी का ख़्वाब हो जाता है पूरा
कहीं पर ख़्वाब चकनाचूर होता।

मुसीबत जब गले पड़ जाय कोई
ख़ुदा का ज़िक्र फिर मंजूर होता।

ग़रीबों को मुहब्बत जो मिले तो
‘तुरंत’ चेहरे पे उनके नूर होता।

कच्चे आमों जैसा खट्टा

कच्चे आमों जैसा खट्टा
कभी शहद सा होता जीवन

पाया जीवन है जिसने भी
पल पल देनी पड़े परीक्षा
कैसे भी हालात किसी के
जीवन की मत करें उपेक्षा
करते अगर भ्रूण की हत्या
या करते हत्या अपनी तुम
पाप हमेशा कहलायेंगे
न्याय करेगा अगर समीक्षा
अपनी नादानी के कारण
क्यों करते खिलवाड़ मनुज तुम
मिटटी के सम ठोकर मारो
क्या इतना है सस्ता जीवन

कच्चे आमों जैसा खट्टा
कभी शहद सा होता जीवन

माना मन को विचलित करते
जीवन में तूफान सभी को
कभी कभी ही लगे निरंतर
ये जीना आसान सभी को
कंटक बन कर चुभते रहते
विकट कई हालात जगत में
हुए उपस्तिथ ऐसे मंजर
जो करते हैरान सभी को
लाख नज़र आती कठिनाई
हमें बचाना इसको फिर भी
मिला ईश से वर जो सुंदर
पुष्पों का गुलदस्ता जीवन

कच्चे आमों जैसा खट्टा
कभी शहद सा होता जीवन

अगर आपके जीवन में सुख
कूट कूट कर भरे पड़े हैं
दीन दुखी को बांटो थोड़े
ग़म से जो अधमरे पड़े हैं
जिनका नहीं जगत में कोई
पालन हारा सिवा ईश के
भांति भांति के जख्म अभी तक
जिन लोगों के हरे पड़े हैं
इसमें भी संतोष मिलेगा
और मिलेगी सदा दुआएं
औरों के आँगन यदि देखो
जीता हँसता गाता जीवन

कच्चे आमों जैसा खट्टा
कभी शहद सा होता जीवन

राहें बड़ी कठिन जीवन की 

राहें बड़ी कठिन जीवन की,
छोड़ मुझे मत जाना साथी

कुसुमों के लालन पालन में
यौवन के दिन बीत गए हैं
धीरे धीरे अनजाने कब
आयु के घट रीत गए हैं
कैसा भी मौसम आया पर
हर पल हर क्षण लड़ना सीखा
हालातों से हार न मानी
बाधाओं से जीत गए हैं
प्रीत बनी आधार हमेशा
जुड़ा रहा ये अनुपम बंधन
दिन गुजरे हैं सदा प्रीत का
बुनकर तानाबाना साथी

राहें बड़ी कठिन….

जीवन की संध्या बेला है,
घड़ी परीक्षा की अब आई
जैसा भी माहौल मिले आ
करें समय से हाथापाई
पुत्र गए परदेश कमाने
और सुता है पी के घर अब
बन कर ही अवलम्ब परस्पर
दूर कर सकें ये तन्हाई
चाहे दुख की छाई बदली
उमड़ा सुख का कभी समंदर
अब तक साथ निभाते आये ,
थोड़ा और निभाना साथी

राहें बड़ी कठिन ……

की शुरुआत जहाँ से हमने
लो वैसे ही दिन फिर आये
फिर से उन एकांत पलों की
सुधियों के बादल घिर आये
प्रीत मानती कहाँ प्रिये ! कब
बढ़ती आयु का ये बंधन
रहे अधूरे अब तक हैं जो
नयनों में सपने तिर आये
संबल लेकर विश्वासों का
भर कर नया रंग आशा का
पुनः करें आरम्भ प्यार का
भूला वह अफसाना साथी

राहें बड़ी कठिन जीवन की,
छोड़ मुझे मत जाना साथी

जीवन में शामिल है मेरा

जीवन में शामिल है मेरा उतना प्यार तुम्हारा भी है
मेरा तुम पर जितना है उतना अधिकार तुम्हारा भी है

एक राह है साथ सफर में, हम तुम अब तक साथ चले हैं
कंटक हटे सभी रस्ते से, पुष्प खुशी के सदा खिले हैं
आये कुछ कड़वे पल लेकिन,हिम्मत से जीती है बाजी
दुख हरने को किये जतन जो, सबके सब दिनरात फले हैं
छोटा सा मेरा है जितना ये संसार तुम्हारा भी है
मेरा तुम पर…

आगत में भी ऐसे ही तुम,संग हमेशा देते रहना
अभिलाषा हर होगी पूरी, बस थोड़ा सा धीरज धरना
प्रिये ! हौसला हो तुम मेरा, हो सम्बल मेरे जीवन का
तुम देखो सपने है मेरा, लक्ष्य सदा ही पूरा करना
मेरा आदर होगा जितना तो सत्कार तुम्हारा भी है
मेरा तुम पर…

राज छुपा है जीने का बस, मीत प्रेम ढाई अक्षर में
जैसे है संगीत छुपा सा. मुरली में वीणा के स्वर में
तार मिले हों साज बजेगा, धुन निकलेगी मस्त मनोहर
टूटे हों यदि तार कभी भी, असर न छोड़े वो अंतर में
मेरे जीवन नाट्य मंच पर, इक किरदार तुम्हारा भी है
मेरा तुम पर जितना है उतना अधिकार तुम्हारा भी है

जीवन में शामिल है मेरा उतना प्यार तुम्हारा भी है
मेरा तुम पर जितना है उतना अधिकार तुम्हारा भी है

गीत तुम पर क्या लिखूँ

गीत तुम पर क्या लिखूँ
जब तुम स्वयं ही गीत हो

बूँद स्वाति की हैं जीवन चातकों का
ज्ञान लक्ष्य हैं भटकते जातकों का
चाहता चकोर शीतल चांदनी बस
मोक्ष प्राप्ति है उद्देश्य साधकों का
मीन का अवलम्ब हैं जल,प्रीत मेरा
प्रीत का पर्याय हैं सारा जगत, पर
प्रीत तुमसे क्या करूँ
जब तुम स्वयं ही प्रीत हो

गीत तुम पर क्या लिखूँ….

मीत जल्दों का सदा से हैं पवन
मीत तारों का प्रसारित हैं गगन
मीत नदियों का गरजता हैं ये सागर
मीत शलभों का प्रज्ज्वलित हैं अगन
चन्दन तरु हैं मीत सारे विषधरों का
प्राप्त हो सुप्रीति जिससे मीत वह, पर
मीत तेरा क्या बनूँ जब
तुम स्वयं ही मीत हो

गीत तुम पर क्या लिखूँ….

हार का शत्रु हमेशा से जमाना
पर कभी होता समुचित हार जाना
विकट पर मधुरिम अजाने प्रेम पथ पर
हार कर मन को कठिन हैं पार पाना
इस जगत में सहस्त्रों प्रस्तुत उदाहरण
हारा हैं मन प्यार पाने को, मगर
जीत तुमसे क्या सकूँ
जब तुम स्वयं ही जीत हो

गीत तुम पर क्या लिखूँ
जब तुम स्वयं ही गीत हो!

चुपके से सपनों में आना

चुपके से सपनों में आना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?
कभी रूठना कभी मनाना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?

सुधियों में अब तक जिन्दा है
आ चुपके से ढांपी आँखें
कसी जोर से गलबहियाँ फिर
मन का पंछी खोले पांखे
और अचानक लेट गोद में
बिना रुके क्या क्या कहते तुम
बार बार कंगन खनकाना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?

कभी रूठना कभी मनाना……

कभी कभी मन होता जब तुम
लहराकर आँचल आ जाते
और छुपाकर दुनियां से फिर
अधर अधर से कुछ कह जाते
अलकों को छूकर पलकों से
बंद नयन कर क्या कहते तुम
बिन नर्तन पाजेब बजाना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?

कभी रूठना कभी मनाना…..

याद मुझे अब भी है जानम
प्रीत पलों में सुंदर इक पल
चून गूंधते हुए अचानक
फेंक दिया था गालों पर जल
कभी शरारत करके मुझको
चिमटा बेलन ले धमकाना
फिर अपने ही हाथ खिलाना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?

चुपके से सपनों में आना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?
कभी रूठना कभी मनाना
प्यार नहीं तो आखिर था क्या?

सोच रख धनात्मक 

सोच रख धनात्मक
तो होगी जीत सर्वदा
परिस्थिति कोई भी हो
विजय श्री मिले सदा

विचार दृढ हो यदि
तो सर्वदा मिले डगर
लक्ष्य भेद के लिए
जरा न हो अगर मगर
जो ठान ली वो ठान ली
न मन में हो यदा कदा

परिस्थिति कोई भी हो
विजय श्री मिले सदा

यदि तुम्हारे सामने
समग्र लक्ष्य है स्पष्ट
तो पूरे मन से काम कर
न काम अब कोई विकट
आरम्भ कर! क्या देखना
हो पूर्णिमा प्रतिपदा

परिस्थिति कोई भी हो
विजय श्री मिले सदा

समूह पर नियंत्रण
करे भरे जो जोश को
विपत्ति में जो रख सके
अचल स्वयं के होश को
नायक वही बना है जो
दिखाता रास्ता जुदा

परिस्थिति कोई भी हो
विजय श्री मिले सदा

सोच रख धनात्मक
तो होगी जीत सर्वदा
परिस्थिति कोई भी हो
विजय श्री मिले सदा

जन्म है पहला चरण

जन्म है पहला चरण फिर मौत है अंतिम चरण
आत्मा की देह बदली मात्र है जीवन मरण

ये अजर है और अमर भी कह गए पुण्यात्मा
लोग कुछ कहते हैं मरती साथ तन के आत्मा
पर कभी भी आत्मा का है नहीं होता क्षरण
आत्मा की देह बदली मात्र है जीवन मरण

पकड़कर बैठा हुआ है जिंदगी की सूतली
नाचते रहते इशारों पर बने कठपूतली
हरि की इच्छा से ही होता है पुनः भू अवतरण
आत्मा की देह बदली मात्र है जीवन मरण

श्रेष्ठ मानव के लिए है मांग ले उसकी शरण
हो सके सम्भव हमेशा के लिए भव से तरण
एक पथ केवल बचा है जल्द कर इसका वरण
आत्मा की देह बदली मात्र है जीवन मरण

साथ क्या आया है लेके साथ क्या जाता कभी
मोह के बंधन है सारे छोड़ कर जाते सभी
दो पलों में ईश कर लेता यहाँ सब कुछ हरण
आत्मा की देह बदली मात्र है जीवन मरण

जीवन की बातें अनजानी

जीवन की बातें अनजानी
दिल मेरा क्या क्या कहता है

चहुँ और है दुःख का सहरा
पीड़ाओं का कूप है गहरा
निपट हताशा और निराशा
देती जाये निरंतर पहरा
दीन हो रहे दीन निरंतर
खौफ छा रहा मन के अंदर
नित्य अभावों से है नाता
अश्रु का है एक समंदर
भूख प्यास बैचैन कर रही
आकांक्षाएं रोज मर रही
कुदरत जो करती मनमानी
मूक बधिर होकर सहता है

जीवन की बातें अनजानी
दिल मेरा क्या क्या कहता है

कन्धों पर वो लाश लिये है
जाने कैसे पाप किये हैं
सड़कों पर पैदल चलता है
कड़वे कितने घूँट पीये है
आखों में नीरवता छाई
कल तक थी उसकी परछाईं
साथ जो उसका छोड़ चली है
कैसी निर्मम हुई विदाई
इंसानों की ये दानवता?
कहाँ खो गई है मानवता?
दर्द भरी सुनके ये कहानी
मानव कैसे चुप रहता है?

जीवन की बातें अनजानी
दिल मेरा क्या क्या कहता है

दहशत के नूतन समीकरण
यहाँ फिरौती वहाँ अपहरण
दुर्घटनाओं के रूप में अब तो
मौतों का कब कहाँ अवतरण
चोरी जेबतराशी डाका
नफरत का बनता इक नाका
बाकी अब जो बचा रह गया
लूटे भ्रष्टाचार के आका
राजनीति के वादे झूठे
नेता कहते बोल अनूठे
मन में उठती आग, अजानी
पीर का इक दरिया बहता है

जीवन की बातें अनजानी
दिल मेरा क्या क्या कहता है

अब मूक प्रणय अत्यन्त हुआ

अब मूक प्रणय अत्यन्त हुआ
आओ न खुलकर प्यार करें
अभिसार करें

नयनों की भाषा से अब तक
प्रियतम ! बहुत कुछ कथन हुआ
मन की अभिलाषा से अब तक
ये ज्ञात परस्पर चयन हुआ
अधरों को अधरों से जुड़कर
सहचर कुछ बातें करनी है
रसना जब बोलेगी खुलकर
फिर रस की धारा बहनी है
इक कालखण्ड परिपूर्ण हुआ
नव युग का हो अब शिलान्यास
अब छोड़ कल्पना का आँगन
आनंद पाने का हो प्रयास
आओ न आनंद पाने को
आगे का पथ स्वीकार करें
अभिसार करें

अब मूक प्रणय…

आरक्त कपोलों पर मुझको
नव प्रेम को मुद्रित करने दो
सर्पिल केशों को सहलाकर
स्व प्रेम प्रदर्शित करने दो
छुअन से जब हो स्पंदन
करने दो मुझको आलिंगन
छा जाये चतुर्दिक मादकता
छूने दो अब तो सारा तन
श्वासों से हो श्वासों का मिलन
धडकन से मिल जाये धडकन
अग्नि सी जब प्रवाहित हो
तब धन्य धन्य होगा यौवन
यौवन के ये क्षण जीने को
आओ तन एकाकार करें
अभिसार करें

अब मूक प्रणय…

कब तक अभिलाषाओं का प्रिये
यूँ दमन हमें करना होगा
एकांत सताता बहुत आज
कब तक आहें भरना होगा
चाहो तो अब निर्णय ले लें
बांधे इक दूजे से बंधन
अब हुई प्रतीक्षा बहुत कठिन
दिन दिन बढ़ती है और अगन
करूँ लाख जतन बस न चलता
तूफान के सम संवेगों पर
अब और नियंत्रण मुश्किल है
तन के मन के आवेगों पर
उन्मुक्त छोड़ कर अब मन को
आओ सपने साकार करें
अभिसार करें

अब मूक प्रणय अत्यन्त हुआ
आओ न खुलकर प्यार करें
अभिसार करें…

हरेक बात गौर कर

हरेक बात गौर कर सुनीति से विचार कर
स्वयं की दुष्प्रवृत्ति पर स्वयं प्रथम प्रहार कर

असीम दुख,प्रताड़ना, अशेष यातना भुगत
भिड़ा रहा है रात दिन, दो जून चून की जुगत
लिए हुए तृषित अधर, जुगाड़ में जो नीर की
फटे वसन बता रहे, व्यथा अनंत पीर की
नहीं दिखा सहार दे, कोई व्यथा से तार दे
नहीं किसी गरीब को अनीति का शिकार कर
स्वयं की दुष्प्रवृत्ति पर स्वयं प्रथम प्रहार कर

विलासिता प्रधान आज जिंदगी बदल रही
दहेज़ सम अभी प्रथा समाज में है चल रही
नये चलन नये असर नये विधान कर सृजित
विक्षिप्त हो रहे युवा नशे की आग में ग्रसित
विनाश ले अनेक रूप डस रहा है नाग सा
मनुष्य के विकास हित कुरीति में सुधार कर
स्वयं की दुष्प्रवृत्ति पर स्वयं प्रथम प्रहार कर

हरेक बात गौर कर सुनीति से विचार कर
स्वयं की दुष्प्रवृत्ति पर स्वयं प्रथम प्रहार कर

जब भी याद तुम्हारी आती 

जब भी याद तुम्हारी आती
तब क्यों चंचल हो उठता मन
तिरने लग जाते नयनों में
बीते दिन वो बीती रातें
घंटो अपलक खोये रहकर
नैनों की वो गुपचुप बातें
देह न छू कर भी प्रेम के
अहसासों का करना अनुभव
और सहस्त्रों बार जो की थी
प्रीत की मीठी प्यारी घातें
टूटे दर्पण में प्रतिबिम्बित
सी लगती सारी घटनाएं
आज भी भरकर नीर दृगों में
क्यों हो बेकल रो उठता मन

जब भी याद…

पल पल मन के आँगन में नित
मधुरिम सपने करना निर्मित
श्रेष्ठ प्रीतिमय आनंददायी
जीवन लक्ष्य करना कल्पित
करते आशा रच जायेंगे
एक नया इतिहास प्रणय का
और समय के पन्नो पर हम
कुछ अधिकार करेंगे निश्चित
किन्तु स्वपन न हुए सत्य ही
और कल्पना रही अधूरी
खण्ड खण्ड सी प्रेम कथा के
पृष्ठों में क्यों खो उठता मन

जब भी याद…

छोटे से तूफान ने अपनी
कश्ती को रख दिया डूबाकर
हल्के से आघात ने मन को
बुरी तरह रख दिया हिलाकर
दीप बुझ गया आशाओं का
उजियारा पाने से पहले
सूरज बदली ओट हो गया
बस दो क्षण अंधकार हटाकर
नियति का निर्णय क्रूरतम
मन को बदल गया मरघट में
सब कुछ खोकर भी दागों को
अनजाने क्यों धो उठता मन

जब भी याद तुम्हारी आती
तब क्यों चंचल हो उठता मन

दुकूल तुम्हारा क्या लहराया

दुकूल तुम्हारा क्या लहराया
पुरवाई ने छेड़े गीत
शरद चांदनी की रातों में
खोये हुए थे हम बातों में
प्रीत के अनुपम खेलों की
उन मधुर सुहानी शह मातों में
तभी अचानक कुछ रुक रुक कर
कुसुमलता सा किंचित झुककर
चन्दन तन ये क्या अलसाया
अंगड़ाई ने छेड़े गीत

दुकूल तुम्हारा…

रूप तुम्हारा जिसने निहारा
अपना सर्वस तुम पर हारा
तुम भी तो अनभिज्ञ नहीं हो
सुन्दरतम हर अंग तुम्हारा
दर्पण में देखा जब यौवन
किलक उठा लो सारा तन मन
दर्पण देख तुम्हे शर्माया
परछाई ने छेड़े गीत

दुकूल तुम्हारा…

मेरी कल्पना मेरी सरगम
मेरी जीवन नद का संगम
एक तुम्ही तो हो बस जानम
मेरी खुशियां मेरा हर गम
तेरा दर्शन मेरा जीवन
तेरा चिंतन मेरा अर्चन
ध्यान तुम्हारा जब जब आया
तन्हाई ने छेड़े गीत

दुकूल तुम्हारा क्या लहराया
पुरवाई ने छेड़े गीत

सीधे सादे शब्दों में

सीधे सादे शब्दों में
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!

क्यों नदिया सागर के किस्से?
क्यों चाँद-चकोर का ज़िक्र करूँ?
क्यों तारों गगन से हो तुलना?
क्यों शलभ-अगन की बात करूँ?
क्यों कथा हो चातक- स्वाति की?
क्यों गाथा दीपक -बाती की?
क्यों बादल और मयूरा की?
क्यों बात हो राधा -मीरा की?
चुपके चुपके कानों में
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!
सीधे सादे…
@@@@
मैं राम बनूँ तू सीता क्यों?
मैं कृष्ण बनूँ तू राधा क्यों?
मैं मजनूं बनूँ तू लैला क्यों?
तू हीर बने मैं रांझा क्यों?
इनके अपने अपने किस्से
अपना तो अलग फ़साना है!
अब प्यार मेँ तेरे ही लुटकर
बस नाम अमर कर जाना है!
अब कफ़न बांध और ताल ठोक
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!
सीधे सादे…

आके तेरे सपनों में
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!
सीधे सादे…

जब लोग समझ ही न पाएं
क्यों थोपूं मैं कुछ उपमाएं?
भावों को उलझा शब्दों में
क्यों गीत प्रतीकों मेँ गायें?
शब्दों को पहना अलंकार
किसलिए शिल्प से हो श्रृंगार
जब बात कथ्य की है सारी
कहना तो ढाई अक्षर प्यार
आके तेरे सपनों में
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!

सीधे सादे शब्दों में
कह देता हूँ!
मुझको प्यार है!!
तुमसे प्यार है!!!

दीपक में जब तेल नहीं तो

दीपक में जब तेल नहीं तो
कैसे दीप जलाऊँ मैं

दहशतगर्दी की चोटों से
सारा जग ही आहत है
लाख उपाय किये हैं लेकिन
अब भी कुछ न राहत है
सेना पर सब कुछ छोड़ा है
विभीषणों पर नज़र नहीं
बाहर वालों से भिड़ लेंगे
जयचंदों की खबर नहीं
मानवता खतरे में हो तो
चुप कैसे रह जाऊँ मैं

दीपक में जब तेल नहीं तो
कैसे दीप जलाऊँ मैं

अभी भरोसा मुझको लेकिन
बदलेंगे हालात सभी
आशा का सूरज निकलेगा
तम के बादल छंटे तभी
विश्वासों के चंद्रोदय से
अमा विनाश की होगी दूर
भाईचारा प्रेम जगत में
जन जन को होगा मंजूर
घृणा द्वेष छल कपट दूर हो
तब तक अलख जगाऊँ मैं

दीपक में जब तेल नहीं तो
कैसे दीप जलाऊँ मैं

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