गिरिजा अरोड़ा की रचनाएँ

गॉड पार्टिकल 

चलते चलते, उठते बैठते, यूँ ही इधर उधर
मिल जाता है अक्सर गॉड पार्टिकल

वो बीज बन भूमि में जाता, सूर्य बन रश्मि छिटकाता
वायु बन लहराता जंगल, बरसता बन बादल
गॉड पार्टिकल

नदियों की कलकल, सागर की गहराई
गगन का विस्तार, पर्वत की ऊँचाई
पक्षियों का कलरव, धरती का सम्बल
देता है अनुभव, गॉड पार्टिकल
बगिया में मिलता फूल बन के, राह में मिलता धूल बन के
कभी बन करमिलता पत्थर
और दे जाता फल
गॉड पार्टिकल

अहल्या के लिए ही राम नहीं, राम हेतु केवट
सुदामा के लिए ही श्याम नहीं, कृष्ण हेतु चावल
गंगा ही नहीं मानव के लिए, भगीरथभी बन करता तप
गॉड पार्टिकल

हो जाए विश्वास तो,होगा ये अहसास
बस साथ साथ
पास पास, रहता है प्रतिपल
गॉड पार्टिकल

चलते चलते, उठते बैठते, यूँ ही इधर उधर
मिल जाता है अक्सर गॉड पार्टिकल

नए साल 

जादुई पिटारा लेकर आओ नए साल
गम को भी खुशियाँ बनाओनए साल
स्वागत को हम खड़े लेकर यही आस
ख्वाहिशों की झोली भर जाओ नए साल

पहलू एक सिक्के के हैं सुख दुख दोनों
सुख बीते जल्दी दुख नहीं आसान
दिन रोशन करता दिनमान
रातों को पूनम बनाओ नए साल

मेहनत को दे दो भाग्य का साथ
कर्म करते बन जाएं कीर्तिमान
सफलता की सीढ़ी चढ़े जहान
तरक्कियों का श्रेय तुम पाओ नए साल

अमन चैन की राह चलें सब
प्यार ऐसा बरसाओ नए साल
जादू की टोपी में डालो कौवे सारे
शांति के कबूतर उड़ाओ नए साल

रिश्तों के पुल

आँखों के समंदर में
विश्वास की गहराई से
बन जाते हैं
रिश्तों के पुल

दिलों का आवागमन
जज्बातों का आदान प्रदान
कराते हैं
रिश्तों के पुल

दायरे होते हैं इनके
बंधनों की रैलिंगे लगाते हैं
रिश्तों के पुल

वारंटी दिखती नहीं
पर प्यार का भार
जन्म भर उठाते हैं
रिश्तों के पुल

चेतावनी भी नहीं दिखती
अहं की हल्की सी ठोकर से
कांच से चटक जाते हैं
रिश्तों के पुल

हँसते ही

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही

फूल खिल जाते हैं
दिल मिल जाते हैं
गम के स्तंभ हिल जाते हैं

रंग छा जाते हैं
ढंग भा जाते हैं
दंभ के व्यंग सकुचाते हैं

राग बज जाते हैं
भाग जग जाते हैं
हर्ष के पल मिल जाते हैं

पर्दे उठ जाते हैं
अंतर घट जाते हैं
छल के बल घट जाते हैं

बंधन खुल जाते हैं
रस्ते मिल जाते हैं
दर्द के दंश घुल जाते हैं

मुझे नहीं मालूम कैसे
पर हँसते ही
तत्व अमरत्व के पास आते हैं
और
अम्ल आसुरी मुड़ जाते हैं

रीढ़ 

एक ही बीज में रहते थे
पल्लव और जड़
कुछ ही दिन का पोषण था
उनके पास मगर

कुछ मजबूरी, कुछ जिज्ञासा
दोनों के थी अंतर
सहमति से तोड़ा
उन्होंने सुरक्षा कवच

जड़ जड़ गई धरती में
संभाला धरातल
रंग बिरंगी दुनिया देखने
बाहर आया पल्लव

एक मूक अनुबन्ध से
जुड़ा उनका जीवन

तना और पत्ते
जब तक देते रहेंगेहवा, धूप, पानी
और जड़ देती रहेगी खाद
वृक्ष खड़ा रहेगा
सीधी रीढ़ के साथ

तितलियाँ

जब उड़ेंगी, रंग भरेंगी तितलियाँ
हवाओं में आकर्षण रहेंगी तितलियाँ

ढूँढते हो कहाँ यहाँ वहाँ
संग फूलों के मिलेंगीतितलियाँ

लगने दो धूप पंखों को जरा
उड़ तभी तो सकेंगी तितलियाँ

मिले बाग उपवन तो बन जाए बात
कैसे कंकरीट में जिऐंगी तितलियाँ

रसोई फूल की जाएगी फ़िज़ूल
पराग अगर नहीं चखेंगी तितलियाँ

हवा के संग ही बहते हैं सभी फूल पत्तियाँ
फ़िज़ा से कब तक बचेंगीतितलियाँ

तेज़ाबी हवा में फूल भी उगलेंगे ज़हर
कौन जाने फिर कहाँ रहेंगी तितलियाँ

इन दिनों

व्यर्थ बढ़ गई है काँव काँव
कौए मगर दिखते नहीं
दोस्त बेहिसाब बनते हैं
दिल में मगर बसते नहीं

आँखों को सुंदर लगते
मन को भी भाते हैं
खुशबू की खातिर
लोग इत्र लगाते हैं
पेड़ पौधे फ्रेमों में रखते
पत्ते जहाँ गिरते नहीं

नन्ही सी गोरैया प्यारी
प्लास्टिक की बनाते हैं
कृत्रिम घोंसले में रख
घर को सजाते हैं
चूँ चूँ चिड़िया की मीठी
घंटी भी वही लगाते हैं
चुग कर गा पाए चिड़िया
दाना वो रखते नहीं

बातें बहुत सुंदर सुंदर
सुनने को मिलती हैं रोज
तन सुंदर, घर सुंदर
जहां पड़े परछाई अपनी
सारा वातावरण सुंदर
कितनी तहें खोजूँ पर
मन अपने सजते नहीं

एक प्यारा सा बादल

अक्सर आँखों में आकर
कर जाता गीला काजल
एक प्यारा सा बादल

मैं छुईमुई सी घबराती
गरजन सी बातें करता
मुझसे आकर पागल
एक प्यारा सा बादल

मैं फुदकन सी गोरैया
नभ ऊँचा मुझे दिखाता
बिजली सी चमकाकर
एक प्यारा सा बादल

मैं आंगन की चंपा, चमेली
मेरी खिलती रंगत को
लेकर आता सावन
एक प्यारा सा बादल

जग का ताप झुलसा न दे
मेरी काया कोमल
छाया देता साथ में चलता
बनकर मेरी चादर
एक प्यारा सा बादल

लोग 

आँसू याद रख खुशियाँ भुलादेते हैं
मानसून आँखोंमें बसा लेते हैं लोग

फूल की महक लेकर भुला देते हैं
काँटों को दामन से लगा लेते हैं लोग

बातों बातों में मुर्दे गढ़े उखाड़ लेते हैं
जीवन को कब्रिस्तान बना लेते हैं लोग

एक ही बात बार बार दोहराते हैं
कुछ किस्से क्यों नहीं भुला देते हैं लोग

दर्द के गीत ही लिखते हैं गुनगुनाते हैं
गमों को दिल का जहान बना लेते हैं लोग

लोग 1 

अपनी चिंगारी पर डाल दो पानी समय रहते
वर्ना आग को अच्छी हवा देते हैं लोग

ढूंढता है पहले बाँटने से सगा अपना
रेवड़ी अंधों के हाथ थमा देते हैं लोग

मुर्गे की जान की कीमत क्या खबर किसको
यहाँ सिर्फ स्वादों का पता देते हैं लोग

समझते खुद को हैं शेर मगर
जब तब गधे को बाप बना लेते हैं लोग

जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं 

जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं
जाने कहाँ अपनी भावनाएँ छिपाते हैं

मोबाइल, कम्प्यूटर
आखिर इंसानी फैक्टरियों में बनें हैं
ईश्वरीय देन तो
वही दिल है
जो दुखता है तो
ठहरने के लिए एक कंधा ढूँढता है
कैसे दुखन को एक स्क्रीन में दबाते हैं
जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं

वो वक्त भी दूर नहीं गया
जब हल्की सी ठोकर पर
ढेरों आँसू बहाते थे
रूमालों की अपेक्षा नहीं
अब केवल
फीलिंग सैड के इमोटिकॉन से
खुद को सहलाते हैं
जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं

वो भी याद होगा
जबतीखे व्यंग से लबालब तीर
रिश्ते की अहमियत जतातेथे
ये कड़वाहट छिपा लेते हैं
प्यार भरी संवेदनाए लिए
रोज़ रोज़ दिख जाते हैं
जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं

जो टूट चुके थे रिश्ते, जो छूट चुके थे लोग
ऑनलाइन कुछ फिर मिल गए हैं
फटते हुए कपड़ों में जैसे पेबंद लग गए हैं
रूठ कर सिर पटकते नहीं
काँच की तरह चटकते नहीं
बहुत ज्यादा नहीं मिलता इन्हें
अपनों की फोटो से ही
अपनों को करीब पाते हैं
जो वर्चुअल रिश्ते बनाते हैं

स्क्रीन के भीतर की दुनिया

स्क्रीन के भीतर जो सिमट रही है दुनिया
भावनाओं की नई कहानी लिख रही है
काल सर्प बन रिश्तों के, सामंतीपन को डस रही है
रूठना, मनाना, शिकवा, शिकायत नहीं
स्वतः समझौतों से ये गाड़ी बढ़ रही है

अपने अहसासों को दूसरों पर थोपते नहीं
खुद के डर से किसी को रोकते नहीं
सहायता को ऑनलाईन दिख जाते हैं
वर्ना ये कभी टोकते नहीं
ऐसे लाईक, शेयर, फॉर्वर्ड करने वालों की
अब तादाद बढ़ रही है

वास्तविकता की उम्मीद में
उम्र भर ये रुकते नहीं
हँसने का अवसर न मिले तो
आँसू भी ये भरते नहीं
बेड़ियों को काट
आगे जाती ये पीढ़ी दिख रही है

स्क्रीन के भीतर जो सिमट रही है दुनिया
भावनाओं की नई कहानी लिख रही है

परिवर्तन 

परिवर्तन
नियम है संसार का
पर
परिवर्तन पर
संसार सदा है हैरान सा

परिवर्तन
कभी कभी आता है
धीरे धीरे
जैसे बच्चा
कई साल बाद
देखते ही
बढ़ा दिख जाता है
और हैरान कर जाता है

जरा सोचो तो
आखिर
बच्चों का बढ़ना
रूप बदलना
ही तो है
जड़ों का विस्तार
प्राणों का संचार
जीवन का प्रचार

परिवर्तन
कभी कभी आता है
चुपचाप
दबे पांव
अचानक
और
पूर्णतया
और देता है अचंभा

जरा सोचो तो
आखिर
वे हवाएं
जोमौसम के अनुसार
बदल देती हैं
अपनी दिशाएं
पूर्णतया
ला सकती हैं
मानसून
कर सकती हैं
जड़ों का विस्तार
प्राणों का संचार
जीवन का प्रचार

इस लोक में 

इस लोक में देवकन्याएं नहीं आती
आती हैं तो
कभी हँसती, कभी रूठती,
नकचड़ी सी फरमाईशें
जो इसे
देवलोक हैं बनाती

इस लोक में देवता नहीं दिखते
दिखते हैं तो
गठीले, रौबिले फरमान
कभी पूरे, कभी अधूरे
अरमान
जो यहां
कितने देवालय हैं बनाते

इस लोक में कल्पवृक्ष नहीं उगते
उगते हैं तो
रसदार और फलदार
अनुभव
जो जीवन को
सुधा रस से हैं भरते

चांद सितारे बसते अंबर
सूरज का भी घर नील गगन
छोटे छोटे जूगनू भी लेकिन
धरती को कर देते जगमग

क्या होता 

क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।
काँटों की जो सेज न होती, फूल कहाँ पर सोते?
जो ये काली रात न होती, ओंस कहाँ पिरोते?
सुबह सूर्य के दर्शन कर फिर क्यों इतना इतराते?
इतना खिला खिला तब कोई उपवन न होता,
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?

प्यास से न कंठ तरसते पानी अमृत क्यों बनता?
चिलचिलाती धूप न होती, बादल क्यों बरसता?
गरज बरस कर जो धरती से अंबर न मिलता,
हरा भरा धरती पर इतना जीवन न होता
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?

विरह का जो दर्द न होता मिलना किसको कहते?
रातों की जो नींद न उड़ती, थककर कैसे सोते?
सुनहरे सपनों को तब किसके नयन पिरोते?
नित नूतन तब मानव का मन न होता।
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?

देखी जो हार न होती जीत खुशी न देती।
सुख के आँसू कैसे सहती जो आँख कभी न रोती।
खुद न जलती लौ तो फिर तम कैसे हर लेती?
रात न होती, दिन भी इतना उज्जवल न होता।
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?
सच पूछो तब हँसने का भी मौसम न होता।

कामना

दोस्ती के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा
एक ही सफर के हैं सवार सब
हम चलें हैं कोख से मसान तक
आसान ये सफर, बनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा

एक ही हो गीत जिसको सब कहें
एक ही हो ताल जिसपे सब चलें
एक ही वजह हो जिसपे सब हँसे,
संग संग सब खिलखिलाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा

रोशनी हो हर जगह जहान में
न जंग हो न ताप हो न डर ही हो
शोक क्लेश सबके मिट जाएँ तो अच्छा
दिल सबके मुसकुराएँ तो अच्छा
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा

कामयाब हों सभी, सभी दुलारें हों
सभी की राह में चाँद तारें हों
उम्मीद के दिए जलाएँ तो अच्छा
हौंसलों को हम बनाएँ तो अच्छा,
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा

हम कमा रहें हैं पाप पुण्य को
और चुकाते जिंदगी के मूल्य को
चोरों से खुद को बचाएँ तो अच्छा
फर्ज कर्ज दोनों निभाएँ तो अच्छा
प्यार के गीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा
दोस्ती केगीत गुनगुनाएँ तो अच्छा
हम सब एक हो जाएँ तो अच्छा

चलो बीज बोते हैं

चलो बीज बोते हैं
हरे भरेजीवन का सपना संजोते हैं
चलो बीज बोते हैं

संयम की धरती पर सब्र का बीज बोयेंगे
सदाचार के पानी से सींचेंगे
सुना है, ऐसे बहुत मीठे फल होते हैं
चलो बीज बोते हैं

संकल्प की धरती पर ज्ञान का बीज बोयेंगे
पसीने को पानी बना उसी से सींचेंगे
इसी तरह तो सफलता के फल ढोते हैं
चलो बीज बोते हैं

संवेदना की धरती पर दोस्ती का बीज बोयेंगे
आँख के पानी से इसे सींचेगे
ऐसे खुशी के फल वाले कभी नहीं रोते हैं
चलो बीज बोते हैं

जब मंडी में जाएँ फल और हो इनका विश्लेषण
तो यह न मन में आए
कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से पाए
संतुष्टि के फल वाले ही चैन से सोते हैं
चलो बीज बोते हैं

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