घनश्याम चन्द्र गुप्त की रचनाएँ

तुम असीम

रूप तुम्हारा, गंध तुम्हारी, मेरा तो बस स्पर्श मात्र है
लक्ष्य तुम्हारा, प्राप्ति तुम्हारी, मेरा तो संघर्ष मात्र है

तुम असीम, मैं क्षुद्र बिन्दु सा, तुम चिरजीवी, मैं क्षणभंगुर
तुम अनन्त हो, मैं सीमित हूँ, वट समान तुम, मैं नव अंकुर
तुम अगाध गंभीर सिन्धु हो, मैं चँचल सी नन्हीं धारा
तुम में विलय कोटि दिनकर, मैं टिमटिम जलता-बुझता तारा

दृश्य तुम्हारा, दृष्टि तुम्हारी, मेरी तो तूलिका मात्र है
सृजन तुम्हारा, सृष्टि तुम्हारी, मेरी तो भूमिका मात्र है

भृकुटि-विलास तुम्हारा करता सृजन-विलय सम्पूर्ण सृष्टि का
बन चकोर मेरा मन रहता अभिलाषी दो बूँद वृष्टि का
मेरे लिये स्वयं से हट कर क्षण भर का चिन्तन भी भारी
तुम शरणागत वत्सल परहित-हेतु हुए गोवर्धनधारी

व्याकुल प्राण-रहित वंशी में तुमने फूँका मंत्र मात्र है
राग तुम्हारा, ताल तुम्हारी, मेरा तो बस यंत्र मात्र है

समोसे 

बहुत बढ़ाते प्यार समोसे
खा लो, खा लो यार समोसे

ये स्वादिष्ट बने हैं क्योंकि
माँ ने इनका आटा गूंधा
जिसमें कुछ अजवायन भी है
असली घी का मोयन भी है
चम्मच भर मेथी है चोखी
जिसकी है तासीर अनोखी
मूंगफली, काजू, मेवा है
मन भर प्यार और सेवा है

आलू इसमें निरे नहीं हैं
मटर पड़ी है, भूनी पिट्ठी
कुछ पनीर में छौंक लगा कर
हाथों से सब करी इकट्ठी
नमक जरा सा, गरम मसाला
नहीं मिर्च का टुकड़ा डाला

मैं भी खा लूँ तुम भी खा लो
पानी पीकर चना चबा लो
तुमसे क्या पूछूँ कैसे हैं
जैसे हैं ये बस वैसे हैं
यानि सब कुछ राम भरोसे

बहुत बढ़ाते प्यार समोसे
खा लो, खा लो यार समोसे

अर्द्ध-उन्मीलित नयन

अर्द्ध-उन्मीलित नयन, स्वप्निल, प्रहर भर रात रहते
अधर कम्पित, संकुचित, मानो अधूरी बात कहते
बात रहती है अधूरी
आस रहती है अधूरी
श्वास पूरे, पर अधूरी प्यास रहती है अधूरी
इस अधूरी प्यास को ही स्वप्न की सौगात कहते
अधर कम्पित, संकुचित, मानो अधूरी बात कहते

स्वप्न की परतें खुलीं तो सत्य के समकक्ष पाया
भीड़ छँटते ही अकेलापन निडर हो निकट आया
छोड़ सब मेले-झमेले
साधना-पथ पर अकेले
सत्य में ही स्वप्न को भी बुन अनोखे खेल खेले
निमिष भर में युगों के आघात-प्रत्याघात सहते
अधर कम्पित, संकुचित, मानो अधूरी बात कहते

अर्द्ध-उन्मीलित नयन, स्वप्निल, प्रहर भर रात रहते
अधर कम्पित, संकुचित, मानो अधूरी बात कहते

मुझे आपसे प्यार हो गया 

.मुझे आप से प्यार हो गया

मुझे आप से प्यार हो गया
एक नहीं, दो बार हो गया

पहली बार हुआ था तब जब हमने ली थी चाट-पकौड़ी
तुमने मेरे दोने में से आधी पूरी, एक कचौड़ी,
एक इमरती, आधा लड्डू, आलू छोड़ समोसा सारा,
कुल्फी का कुल्हड़, इकलौता रसगुल्ला औ’ शक्करपारा

लेकर जतलाया था जैसे मुझ पर कुछ उपकार हो गया
और तुम्हारा मेरी हृदय-तिजोरी पर अधिकार हो गया

मुझे आप से प्यार हो गया
एक नहीं, दो बार हो गया

और दूसरी बार हुआ जब मंगवाई थी कोका-कोला
प्यार बढ़ाने का निश्चय कर बोतल के ढक्कन को खोला
एक सींक से दो चुस्की ले बोतल मैंने तुम्हें थमाई
सींक फेंककर तुमने झट से बाकी की इल्लत निपटाई

यह तो सिर्फ बानगी थी, फिर ऐसा बारम्बार हो गया
हंसी खेल की बातें थीं, फिर जीवन का व्यवहार हो गया

मुझे आप से प्यार हो गया
एक नहीं, सौ बार हो गया

शयन-कक्ष में बहुत लगन से मैंने सुन्दर सेज सजाई
तुमने आते ही उस पर कुछ लक्ष्मण-रेखा सी दिखलाई
हाय राम अब कैसे होगा, दो क्षण तो यह चिन्ता व्यापी
पलक झपकते सीमाओं का उल्लंघन स्वीकार हो गया

किसके हिस्से में क्या आया जब यह बात भुला दी हमने
तब हमने सब कुछ ही पाया सहज प्रेम-व्यापार हो गया

मुझे आप से प्यार हो गया
यूं मेरा उद्धार हो गया

– घनश्याम
७ अगस्त, २०११

मुझे आपसे प्यार नहीं है

मुझे आपसे प्यार नहीं है

मुझे आपसे प्यार नहीं है
साड़ी छोड़ चढ़ाई तुमने पहले तो कमीज़-सलवार
ऐसा लगा छोड़ कर बेलन ली हो हाथों में तलवार
इतने पर भी मैंने अपनी छाती पर चट्टान रखी
लेकिन पैंट, बीच की बिकिनी, मिनी-स्कर्ट के तीखे वार
सह न सका तो गरजा, देवी! मुझको यह स्वीकार नहीं है
मुझे आपसे प्यार नहीं है

तुमको यह स्वीकार नहीं है तो फिर कहीं किनारा कर लो
पहला ब्याह नहीं रुचता तो जाओ ब्याह दुबारा कर लो
मेरे रहन-सहन में बिल्कुल टोका-टाकी नहीं चलेगी
घास डालती हो जो तुमको उसके साथ गुज़ारा कर लो
समझदार हो, बात समझ लो, तुमको कुछ अधिकार नहीं है
मुझे आपसे प्यार नहीं है

उबटन छोड़, किया फेशल तो क्या मैंने टोका था तुमको?
सैलूनों में बाल कटाने जाने से रोका था तुमको?
चलती थी जो कैंची सी वह जिह्वा भी छिदवा आईं तुम
पैसा पानी जैसा, डाइम एक नोट सौ का था तुमको
फिर तुमने टट्टू गुदवाये, क्या यह अत्याचार नहीं है?
मुझे आपसे प्यार नहीं है

कौन रोकता है तुमको, कटवा लो मूछें, बाल बढ़ा लो
दाढ़ी रख लो, चाहे पूरी बोतल रम की आज चढ़ा लो
खबरदार, हम एक नहीं हैं, दो हैं, कभी भूल मत जाना
सम्भव है क्या पढ़ी-लिखी को तुम मनचाहा पाठ पढ़ा लो
बाँदी-बन्दी नहीं तुम्हारी, घर है कारागार नहीं है
मुझे आपसे प्यार नहीं है

अच्छा देवी बहुत हो गया, सो जाओ अब रात हो गई
इस होली पर भी तुम जीतीं, मेरी अक्सर मात हो गई
कल दोपहर मित्र आयेंगे गुंझियों की आशायें लेकर
उन्हें निराश न करना मेरी उनसे पक्की बात हो गई
मेरे पास तुम्हें देने को कुछ भी तो उपहार नहीं है
फिर मत कहना प्यार नहीं है
होली के अवसर पर कृत्रिम झगड़े से इन्कार नहीं है

– घनश्याम
७ अप्रैल २०१२

भरी बज़्म में मीठी झिड़की 

हर दाने पर मोहर लगी है किसने किसका खाया रे
फिर भी उसका हक बनता है जिसने इसे उगाया रे

अपना सब कुछ देकर उसको हमने दामन फैलाया
वो छू दे तो लोग कहेंगे इसने सब कुछ पाया रे

एक दरीचा, एक तबस्सुम, एक झलक चिलमन की ओट
हुस्ने-ज़ियारत के सदके से सारा जग मुस्काया रे

एक गया तो दूजा आया ऐसा चलन यहां का है
कैसा हंसना, कैसा रोना, सुख दुःख का माँ जाया रे

भरी बज़्म में मीठी झिड़की, दादे-सुखन, अन्दाज़े-निहां
“मेरे दिल की बात ज़ुबां पर तू कैसे ले आया रे ?”

हमने तो बस एक सिरे से पकड़ी ऐसी राह तवील
तू बतला ये रिश्ता तूने कितनी दूर निभाया रे

नापा-तोला समझा-बूझा परखा फिर अन्दाज़ किया
सब नाकारा सब बेमानी प्रीतम जब मन भाया रे

ब्रह्म सत्य है केवल, बाकी जग का सब जग मिथ्या है
ब्रह्मस्वरूप जीव को हर पल नचा रही है माया रे

०५फरवरी २०१३

आज दिल के उदास कागज़ पर 

आज दिल के उदास कागज़ पर

आज दिल के उदास कागज़ पर
एक मज़बूर लेखनी स्थिर है
एक नुक़्ते पे टिक गई किस्मत
कह रही है उदास कागज़ से
भाग्य-रेखा नहीं खिंचेगी अब
मुस्कुराहट नहीं दिखेगी अब
एक चेहरा उभर रहा था जो
फिर से कागज़ में डूब जाता है
रात-दिन एक ही फसाने से
आदमी ऊब-ऊब जाता है

मैंने जो रंग घोल रक्खे थे
सब तराजू में तोल रक्खे थे
रंग फीके से पड़ गये हैं अब
एक तमाचा सा जड़ गये हैं सब
तर्क, विश्वास, तथ्य, तरुणाई
इनके चेहरे बिगड़ गये हैं सब
सच वही है जो सामने आया
सच वही है जो अन्त में पाया
घुप अंधेरे में एक साया सा
छुप गया वो भी किसी माया सा
और दिल के उदास कागज़ पर
उसकी परछाइयां उभरती हैं
मेरे नाकिस ज़मीर की नज़रें
उसको पहचानने से डरती हैं

मुझको मालूम था कुरेदेंगे
मेरे नाखुन पुरानी यादों के
उन सभी नामुराद ज़ख्मों को
जो भरे भी तो भर नहीं पाये
जो हरे हैं, जो मर नहीं पाये
जो न सूखे, न आज रिसते हैं
जो मेरी रूह में भी बसते हैं
ले के मुट्ठी में मुझे कसते हैं
मेरी बेचारगी पे हँसते हैं
ज़ख्म यूं दोस्ती निभायेंगे
ज़ख्म ये मेरे साथ जायेंगे

और दिल के उदास कागज़ पर
नज़्म अफसुर्दा लिखी जायेगी
जब लिखी जायेगी कहानी ये
खुल के बेपर्दा लिखी जायेगी

– घनश्याम
२८ अप्रैल २०१३

ई-कविता पर अप्रैल २०१३ उत्तरार्द्ध वाक्यांश पूर्ति हेतु प्रेषित

तुम कहां हो

तुम कहां हो

तुम कहां हो
खो गये क्या तुम
पराये हो गये क्या तुम
तुम्हारी याद में मैंने बहुत आँसू बहाये
तुम न आये

तुम कहां हो
ढूंढती हूँ मैं तुम्हें हर फूल में, हर पात में
सौन्दर्य के प्रतिनिधि सुकोमल गात में
पर तुम नहीं हो दृष्टिगोचर सांध्यदीपित गेह में
तुम खो गये हो क्यों अंधेरी रात में
क्या तुम मिलोगे भोर के उस स्वप्न में
इस व्यग्रता में पलक झपकने न पाये
तुम न आये

तुम कहां हो
ढूंढती है बस तुम्हें ही दृष्टि मेरी
तुम हुए ओझल नयन से
शून्य मानों हो गई है सृष्टि मेरी
मैं समर्पित देह से, मन-प्राण से
प्रियतम, मुझे स्वीकार लो
मैं खोजती अवलम्ब, तुम हो त्राण से
रह मौन कितने गीत मैंने वन्दना के गुनगुनाये
तुम न आये

घड़ी की सुईयां

घड़ी की सुईयां निर्विकार चलती हैं
न तुमसे कुछ प्रयोजन, न मुझसे
श्वासों का क्रम गिनती पूरी होने तक निर्बाध
याम पर याम, याम पर याम
महाकाल की ओर इंगित करती हैं सुईयां घड़ी की

तब तुम समझोगी पाषाणी

जीवन के फेनिल समुद्र में उठता ज्वार किसे कहते हैं
मृदु मनुहार किसे कहते हैं, अमृतधार किसे कहते हैं
प्रियतम के स्वागत में सजती बन्दनवार किसे कहते हैं

आंकोगी जब मूल्य अश्रु का, पदचिन्हों को दोहराओगी
तब तुम समझोगी पाषाणी, पागल प्यार किसे कहते हैं

रूप चाँद सा, सूरज सा है, धीरे-धीरे ढल जायेगा
रूप पाहुना है दो दिन का, आज नहीं तो कल जायेगा
रूप मोम की गुड़िया जैसा, छांव तले तो महक-बहक ले
भरी दुपहरी गर्म रेत में पांव पड़े तो गल जायेगा

रूप न होगा जब चंदा सा, सूरज सा, मोमी गुड़िया सा
तब पहचानोगी सपनों का राजकुमार किसे कहते हैं

कोलाहल में लुप्त हो गये, कैसे मूक हमारे स्वर थे
बनते ही सत्वर मिट जाने वाले अक्षर क्या अक्षर थे
प्रश्न-चिन्ह सी देहगन्ध आनाकानी करती आंगन में
अनायास बन जाने वाले क्या संबंध सभी नश्वर थे

सत्य सनातन, प्रीति पुरातन, अन्तर में जब लख पाओगी
तब तुम जानोगी कल्याणी, प्रत्युपकार किसे कहते हैं

ठोकर लग जाने के भय से मैं पथ से हट जाऊंगा क्या
कटु सत्यों से बच, मिथ्या माया की टेक लगाऊंगा क्या
क्या मैं अपनी भाषा-परिभाषा से समझौता कर लूंगा
ऊब अकेलेपन से भीड़-भड़क्के में खो जाऊंगा क्या

ढूंढोगी जब घर-आंगन में, वन-उपवन में, नगर-गाँव में
देखोगी उन्मुक्त प्राण का मुक्त विहार किसे कहते हैं

मैं नचिकेता

मैं नचिकेता
मैंने यम के द्वार पहुंच कर दस्तक दी थी
द्वार खोल यम
प्रश्न पूछने आया हूं मैं
अनुत्तरित प्रश्नों का मैं उत्तराधिकारी
प्रश्नों का अक्षुण्ण स्रोत
निर्झर नैसर्गिक प्रश्न-प्रणेता
मैं नचिकेता

मुझे पिपासा शुद्ध ज्ञान की सभी युगों में
सतयुग हो या द्वापर हो या कलियुग त्रेता
मैं नचिकेता

मुझे न भाते मुक्ता-माणिक
रत्नखचित आगार सुसज्जित गेह
स्वर्णमय मानव-निर्मित कलश-कंगूरे
हो न सका प्रज्ज्वलित दीप यदि अन्तर में तो
अर्थहीन है होम व्यर्थ आहुतियां मंत्रोच्चार अधूरे
दीप-दान का याचक मैं अन्तर्हित चिन्गारी का क्रेता
मैं नचिकेता

मुझे न भाता मायामय सौन्दर्य
क्षणिक क्षणभंगुर अस्थिर
कृत्रिमता से लदा वसन-आभूषण सज्जित
नर्त्तित पंचभूत-निर्मित लौकिक अतिरंजित
मुझे नहीं अभिलाषा तुच्छ सुखों की धन की
मुझे व्यापती है चिन्ता जन-जन के काल-ग्रसित जीवन की

मैं मृत्युमित्र निर्भय अशंक
मेरे सन्मुख है ध्येय अटल दुर्गम दिगन्त
मैं अग्निदूत मैं अग्रदूत
उन्मुक्त दिशा का अन्वेषक
मैं ज्योतिपुंज नूतन संभावित का प्रेषक
मेरा विकल्प घनघोर तिमिर अज्ञान भ्रान्ति
मैंने पाई उत्सुकता में सम्पूर्ण शान्ति

अनवरत साधना अनुशासन से ही निखरा
मैं शान्ति-प्रणेता आत्म-विजेता नचिकेता

उपलब्धि और निवृत्ति

उपलब्धि और निवृत्ति

जो भी, जैसा भी, जितना भी
दोनों बांहों के घेरे में आ समाया
उसी से सम्पन्न,
वैसे से ही संतुष्ट
उतने से ही परिपूर्ण
मैंने उसे यथाशक्ति जकड़ लिया
अपनी बाहों के शिथिल बंधन में
छूटना चाहे तो छुट जाय
उसकी मुक्ति, मेरी मुक्ति

और जो रह गया परिधि के बाहर
सीमा से परे
क्षितिज के उस पार
अलभ्य, अग्राह्य, अप्राप्य
उसके लिये स्वीकार है
अन्ततोगत्वा मरण
उपलब्धि के लिये नहीं
निवृत्ति के लिये

१४ फरवरी, २००९

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