चन्द्रभान सिंह ‘रज’की रचनाएँ

दोहा / भाग 1

प्रेम सतसई

जय जय श्री राधारमन, जय मुकुंद गोविद।
जय स्यामा जय स्याम ‘रज’, जय किसोर व्रज चन्द।।1।।

जय राधे वृषभानुजे, जय जय नंद किसोर।
भले बने व्रज नाथ ‘रज’, विस्व विलोचन चोर।।2।।

मंगल मय मंगल करन, मंगल फल दातार।
मंगल स्यामा-स्याम ‘रज’, सुमिरत मंगल सर।।3।।

तुम्ही गनेस महेस तुम, तुम सारद तुम सेस।
तुम्ही ब्रह्म ब्रज ईस ‘रज’, मम प्यारे प्रानेस।।4।।

हाय राधिक छाँह पै, स्याम गात अनुराग।
हरित होत ‘रज’ भ्रमर जब, पावति पुष्प पराग।।5।।

गिरि-गुहान सिखिरान ह्वै, आई करत कलोल।
‘रज’ सम रुज को करन हित, जय-जय जमुन अडोल।।6।।

बन्दौं सन्त असन्त जन, दोष न दीजौ कोय।
हौ न कही, लिखि स्याम ‘रज, दीनी गुनि करि मोय।।7।।

स्यामा-स्यामा बिहार कौ, चाहौ रज कछु ज्ञान।
सरल जुगति इक जगत बिच, करिये प्रेम सुजान।।8।।

जा ब्रजराज को देव सब, लहहिं सदा सिरधार।
ता ‘रज’ सौं या देह कौ, धर्यो नाम ‘रज’ सार।।9।।

‘रज’ सतसई सप्रेम नित, स्यामा स्याम बिहार।
जाकी जैसी दीठि हो, सो तिमि लेहि निहार।।10।।

दोहा / भाग 2

अरे बावरे ध्यान दै, मति करि तिय अपमान।
सति सावित्री जानकी, ‘रज’ नारी धौं आन।।11।।

संभु राम नहिं करि सके, नहिं पाई निज तीय।
‘रज’ सोइ नारी स्वर्ग तें, लिये फेरि निज पीय।।12।।

बिन नारी नर अर्द्ध रज, वेदहु करहिं बखान।
निंदहिं जे अर्द्धांगिनी, धिक धिक तिनहि महान।।13।।

तिय उर औगुन आठ ‘रज’, कहहिं सु औगुन खान।
उपजहिं रत्न वा खान तें, धु्रव प्रहलाद समान।।14।।

जेहि जगती में हित करत, करत विपति सों पारि।
धर्म, धैर्य अरु ब्रह्म ‘रज’, व्रत, प्रन अरु वर नारि।।15।।

कहत बहुत करतूत नहिं, नित्य बचन दै जाहिं।
‘रज’ प्रन निभवो आज कल, हँसी खेल कछु नाहिं।।16।।

सत्य प्रेम दृढ़ नाव पै, जो चढ़ि जग मझधारि।
स्वयं आप ‘रज’ और कों, देवै पार उतारि।।17।।

होत जहाँ रसरीति कछु, तहँ जग हेतु लखात।
प्रीति-रीति ‘रज’ उपज से, मन मों मन मिलि जात।।18।।

चाहौ धन वर धरम ‘रज’, सुजस धर्म निज नूर।
प्रेम नीति सों पालियो, रैयत को भरपूर।।19।।

नित प्रति सालि उदंड हिय, दंडन को दै दंड।
धाखेहु सो ‘रज’ दीन पै, करियो नाहिं धमंड।।20।।

दोहा / भाग 3

चतुर, गुनी, गायक सरस, श्रेष्ठ साहसी मित्र।
बार मुखी ‘रज’ रसिक कवि, हौवे सभा विचित्र।।21।।

हीरा गिरि मणि सर्प बिच, ‘रज’ सरसिज बिचपंक।
बिधि भूलत ही कंट कहु, दीन गुलाबन डंक।।22।।

दुःख सुख राखौ मनहि बिच, कहौ न किहु सन जाय।
सुनि कै हँसिहैं ‘रज’ सबै, करहि न कोउ सहाय।।23।।

बारमुखी अरु कूप ‘रज’, बिनु गुन नैक न देत।
दै रस कुलटा बावरी, अजस वृथा सिर लेत।।24।।

जड़ चेतन ‘रज’ सग कै, तजि मद मोह प्रपंच।
त्यागि दम्भ पाखण्ड सब, तपहु प्रेम की अंच।।25।।

सीतल मन्द समीर ‘रज’, कालिन्दी के तीर।
सखियन संग श्यामा सहित, झूलत हलधर वीर।।26।।

कालिन्दी कछरान के, कदलि करील सुपुंज।
कदँब, केतकी केवरे, कृष्ण केलि रज कुंज।।27।।

श्याम कंठ बिच राधिका, दिये प्रेम गल बाहिं।
चढ़ी कनक की बेल जिमि, ‘रज’ तमाल तरु माँहि।।28।।

एक दिन राधे प्रेम बस, लीह्ने गोद गोविन्द।
सो छवि लखि उर राखि ‘रज’, उगत निसा बिच चन्द।।29।।

प्रेम रूप ‘रज’ लखत ही, दृग इक टक रहि जात।
लुकि छिपि कै फिर फिर लखत, लखि लखि नहीं अघात।।30।।

दोहा / भाग 4

उत ससि ‘रज’ इत चंद मुख, उत कलंक इत बिन्द।
उत कुरंग इत नैन मृग, चख चकोर गोविन्द।।31।।

‘रज’ सुमुखी तिय पीठ पर, पड़ी लटैं इमि छुट्ट।
मनहु सुधारस लेत अहि, चढ़े ससी पर जुट्ट।।32।।

प्यारी सिर बेनी छुटी, परी पीठ पर आय।
शेष अमी ‘रज’ चखन हित, चढ़ हिम शिल ह्वै धाय।।33।।

बड़े लजीले सजल ‘रज’, मदमाते रति मैन।
अजब रसीले सित असित, गजब सलोने नैन।।34।।

नैन फाँस की गाँस तें, दुसह दुःख ह्वै जाय।
ना निकसै ना दुःख मिटै, पीर सुरज अधिकाय।।35।।

कजरारे कारे दृगन, छलत छबीले चोर।
अनियारी ‘रज’ बाल की, लगत लजीली कोर।।36।।

लोचन सित ‘रज’ असित में, लोहित सुतिल विसाल।
मनहु बीधिगे मीन द्वै, लाल रेसमी जाल।।37।।

नैन कटारी भौंह धनु, बरुनि प्रखर हैं बान।
पलक ढाल की ओट ‘रज’, घालत मैन महान।।38।।

गजब गलाबी गाल बिच, ‘रज’ तिल इमि छबि देत।
मनहु चन्द्र बिन स्यामता, मधुप कमल रस लेत।।39।।

जाके उर ए होत ‘रज’, होति न ताको पीर।
पै जो ताकत हैं इन्हैं, तेहि मन धरत न धीर।।40।।

दोहा / भाग 5

स्याम पाट कुच कंचुकी, फटी तनिक अवरेख।
मनहु कसौटी स्याम ‘रज’, खिची राधिका रेख।।41।।

तिय कत करत रिसौंह दृग, पिय जब सरस हँसौह।
चढ़त घटत फिरि फिरि बनत, थिर नरहत ‘रज’ भौंह।।42।।

परी परी पर्यंक ‘रज’, बिवस नींद के माहिं।
बिखरि केस उघरे कुचन, तिय तन सुधि कछु नाहिं।।43।।

काम कला में अति कुसल, सनी प्रेम ‘रज’ रंग।
खड़ी बिसूरति द्वार पर, तिय-मन पिय के संग।।44।।

थकी खरी रति अंत में, पकरि धरी निसि नाह।
उघरि परी सारी उरी, ‘रज’ सुधि बुधि कछु नाह।।45।।

लुरलुराति सखियान में, मुरकि मुरकि मुसकाति।
अधर दाबि लखि लाल ‘रज’ तृन तोरति जमुहाति।।46।।

रची खरी विपरीत रति, भई अनोखी लूट।
गिर्यो तरौना ‘रज’ मनहुं, चन्द्र यान चक टूट।।47।।

मान समय ‘रज’ पीठ पै, बेनी पीठ सुहाय।
जाके बिच बेनी दई, पीठि दीजियतु ताय।।48।।

धोय-धोय इन दृगन सों, कढ़ि गो बीर अबीर।
जतन बतावौ ‘रज’ अरी, निकसत नाहिं अहीर।।49।।

केलि-कला में तीय कौ, दब्यो कौन ‘रज’ अंग।
रोय रिसाय डराय हँसि, अकुलानि पिय संग।।50।।

दोहा / भाग 6

सम्पति सन्तति कुटुँब सब, रोगहु तनु नाहिं जान।
‘रज’ पिय संग सोवत सुखद, भरे नैन अँसुवान।।51।।

लटपटाति आसव छकी, खटपटाति निस्संक।
सटपटाति ‘रज’ संग हँसि, चटपटाती पर्यंक।।52।।

कहा कहौं ‘रज’ आजु अलि, जो कीनी मंजार।
नखछत कै दोउ उरज बिच, झिझकि जझकि गई द्वार।।53।।

हँसी, लजी, डरपी उमठि, रो अकुलानी नारि।
तऊ समेटि भुज भेंटि ‘रज’, अंक भरी सुकुमारि।।54।।

सारी सिर तें सरकि ‘रज’, गह्यो उरज आधार।
जिमि संकर के सीस तें, बही सुरसरी धार।।55।।

कठिन जतन सों सिंधु मथि, चौदह रतन हँकारि।
प्रेम रतन ‘रज’ कृष्ण ने, ब्रज मथि लियो निकारि।।56।।

प्रेम हमारो कर्म है, प्रेम हमारो धर्म।
हमीं प्रेम रज प्रेम बिच, प्रेम हमारो भर्म।।57।।

प्रेम सरोवर प्रेम जल, प्रेम जलद सोइ पार।
मज्जहुं कछु दिन प्रेम युत, जानि जगत ‘रज’ सार।।58।।

बिहरत कबहूँ सखिन बिच, कबहुँ चरावत गाय।
गुहत राधिका बेनि ‘रज’, कबहुँ खिझावत माय।।59।।

राधा माधो बीच ‘रज’, अद्भुत प्रेम लखात।
बनती कबहुँक स्याम ये, वै राधा बनि जात।।60।।

दोहा / भाग 7

विवस प्रेम बन्धन बँधे, प्रकृति ब्रह्म जग सार।
प्रकटे स्यामा स्याम ‘रज’, करन सुप्रेम प्रसार।।61।।

प्रेम समाज बनाय ‘रज’, सुभग सलोने स्याम।
नृत्यत युवतिन संग नित, श्री बरसाने धाम।।62।।

विषय निरत मन हर्ष ‘रज’, निज बस मन अनुराग।
आनन्द मन बस इन्द्रियाँ, परै सप्रेम-पराग।।63।।

ईस प्रेम द्वै एक ‘रज’, यही वेद को लेख।
जिमि बाढै नव अंक तइ, रूप एक ही देख।।64।।

सबै प्रेम के लालची, प्रम बसी जग जान।
हरिहर लौं बस प्रेम ‘रज’, और कहौं का आन।।65।।

प्रेम प्रेम कहियो सुलभ, करियों कठिन महान।
करिबौ हू ‘रज’ सुगम पै, दुर्लभ निभबौ जान।।66।।

अधर मधुर रस अति सरस, सबही जानत नाहिं।
जिन उर छाक्यो प्रेम ‘रज’, ते जानत मन माहिं।।67।।

सत्य प्रेम ‘रज’ देखि लो, बनत न लागै देरि।
सावित्री एक प्रेमबस, यम सों पति लिय फेरि।।68।।

प्रेम भक्ति अतिही सुलभ, करि जानै ‘रज’ कोय।
पै यामें एतो कठिन, बिनु हरि कृपा न होय।।69।।

‘रज’ दृढ़ व्रत इकत्याग तें, करै प्रेेम पहिचान।
बिनु इच्छा वहि ध्यान तें, बस होवें भगवान।।70।।

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