चन्द्रेश शेखर की रचनाएँ

कैसे गाऊँ कोई गीत

अभिलाषाएं सिसक रही हैं मूक हुआ मन का संगीत
कंठ वेदना से रुंध जाता कैसे गाऊँ कोई गीत

द्विविधा से यह मन स्तब्ध है
मन मन भारी शब्द शब्द है
कैसे भला समझ पाओगे
पीड़ा गहरी पर नि:शब्द है
अपनी किंकर्तव्यविमूढ़ता कैसे तुम्हे बताऊँ मीत

पुनर्मिलन पर आज हमारे
दैव ठिठोली करे निराली
खड़े मूक दर्शक से दोनों
पीड़ा नाच रही मतवाली
पूर्ण कामना हुई किंतु यह हार है मेरी या है जीत

मुझसे दूर सुखी थे तुम यदि
कहाँ गई मुस्कान तुम्हारी
जिसे बिखरता देख सदा थी
मेरी गति होती बलिहारी
मेरी अकुलाहट स्वाभाविक, तुम क्यों दिखते आशातीत

मेरे प्रेम समर्पण को तुम
शायद आज समझ पाये हो
इसीलिए इतने कालान्तर
पर मुझसे मिलने आए हो
कैसे किन्तु तुम्हें अपनाऊँ,बँधी किसी की मुझसे प्रीत

प्रणय प्रस्ताव मधुमय

यह प्रणय प्रस्ताव मधुमय किस तरह स्वीकार कर लूँ

मै थके हारे पथिक सा तुम विटप की सघन छाया
मै वियोगी मार्ग उन्मुख, तुम जगत की मोह माया
मैं हूँ यायावर मुझे, तज मोह आगे पथ निभाना
औ’तुम्हारे भाग्य में नित नव पथिक का प्रेम पाना
दुखद है पर सत्य यह तुम हो क्षणिक पथसंगिनी बस
जानकर भी मोहवश मै किस तरह यह प्यार कर लूँ

व्यर्थ है वह स्वप्न का संसार जो तुमने गढ़ा है
छद्म है यह भाव जो तुमने अभी मुझमें पढ़ा है
तुम चिराचिर तृप्ति का आभास हो मै चिर तृषा हूँ
तुम बताओ तृप्त हो कर कौन फ़िर आगे बढ़ा है
कामना की पूर्ति तक तो ठीक है पर क्यों भला
मैं किसी अगले श्रमित की श्रान्ति पर अधिकार कर लूँ

हाथ छोड़ो सामने बाहें पसारे पथ खड़ा है
बँध खोलो द्वार पर कर्तव्य लेकर रथ खड़ा है
प्रेम क्या है मत बताओ जानकर मैं क्या करूँगा
किन्तु इतना जानता हूँ लक्ष्य जीवन से बड़ा है
प्रेम है वह कामना सौ जनम तक जो तृप्त न हो
मैं घुमन्तू किस तरह निज कामना विस्तार कर लूँ

मन ये दीपक-सा

प्रेम की तुमने ऐसी लगाई थी लौ
मन ये दीपक सा दिन-रात जलता रहा

क्या हुआ जो अगर तुम हमें न मिले
तुमको क्या दोष दूँ, तुमसे कैसे गिले
प्रेम विनिमय नहीं देह से देह का
तन नहीं न सही मन तो मन से मिले
पर तुम्हारा तो मन एक अखबार था
रोज जिसका कलेवर बदलता रहा

लोक-लज्जा तुम्हें बेडियाँ बन गयीँ
मैँने अनुभूतियोँ को लगाया गले
तुम भी मजबूर थे हम भी मजबूर थे
तुम तुम्हारी डगर हम हमारी चले
तुमने दुनिया चुनी तुम निखरती रही
मैंने कविता चुनी उनमें ढलता रहा

दुनिया रजनी कहती है

अखिल विश्व में अँधकार की जो सरिता बहती है
यह रति की अनुचरी,जिसे दुनिया रजनी कहती है

पाकर सेज सरोहन का कोई संदेशा रति से
यह इठलाती बल खाती आती है धीमी गति से

अँबर पट की चादर पर तारों के दीप सजा कर
सिरहाने धर देती विधु को तकिये सा अलसा कर

फिर बेला की बास मिलाकर शीतल शांत मलय में
भर देती अक्षुण्ण सम्मोहन यौवन के किसलय मे

फिर श्रँगार प्रशाधन करती रति का विविध करों से
आवाहन करती अनँग का फिर यह मूक स्वरों से.

और कामना सकल विश्व की तब तृण सी हो जाती
यौवन की झंझा चलती तब बुझ जाती लौ बाती

हर धड़कन मृदंग सी बजती सांसें ताल मिलातीं
असह्य पीर उस निठुर विरह की प्रियतम प्रियतम गाती

नेह का नीर बनकर

नेह का नीर बनकर मिलो तो सही
तुमको मेरे नयन बढ़ के’ अपनाएँगे

गर्द अनुभूतियों पर जमी रह गई
जिंदगी में तुम्हारी कमी रह गई
ग्रंथि संकोच की खुल न पाई कभी
रात इक दरम्याँ शबनमी रह गई
रिक्तियों में समर्पण भरो तो सही
ज़ख़्म रिश्तों के सब खुद ही भर जायेंगे

भाव सोते रहे,शब्द रोते रहे
गीत बन-बन के’ निज अर्थ खोते रहे
मन की माला न हमसे कभी गुँथ सकी
टूटे धागे में सपने पिरोते रहे
प्रेम का गीत बनकर खिलो तो सही
तुमको मेरे अधर झूम कर गायेंगे

तोड़ना है गलत फहमियाँ तोड़ दो
छोड़ना है तो शिकवे-गिले छोड़ दो
जिनमें संचित हुआ अब तलक बस गरल
आओ मिलकर हृदय विष कलश फोड़ दो
प्रेम का एक विनिमय करो तो सही
योग और क्षेम समतुल्य हो जायेंगे

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