चेतन दुबे ‘अनिल’की रचनाएँ

दर्द में मत दहो

जो लिखा भाग्य में वो मिलेगा मुझे,
तुम अमानत किसी की सलामत रहो।
सारी खुशियाँ तुम्हारे चरण चूम लें,
हैं दुआएँ मेरी दर्द में मत दहो।

टूट जाने दो दिल , है न कोई गिला,
कोई सिकवा नहीं, कुछ शिकायत नहीं।
जान तो मैं गया प्यार होता है क्या,
मुझपे होगी तुम्हारी इनायत नहीं।

मैं मुसाफ़िर हूँ , मेरा पता पूछकर,
कौन कब राह में लूट लेगा मुझे।
छोड़कर यदि अकेला चली तुम गई,
कौन कब हाथ में हाथ देगा मुझे।

प्यार का यह दिया किस तरह से जले,
चल रही है हवा आँधियाँ तेज़ हैं।
कौन – सा एक झोखा बुझा दे दिया,
बिजलियों की दुरभिसंधियाँ तेज़ हैं।

आँसू बन दृग से पीर बहे

आँसू बन दृग से पीर बहे।

झुलसा सपनों का चंदन वन,
लुट गया भावना का मधुवन।
पर पता मुझे अब तक न चला-
दुनिया में कैसी हवा बहे।
आँसू बन दृग से पीर बहे।

यादों का होता अंत नहीं,
आकर्षित करे बसंत नहीं।
मेरे मर्माहत मानस को-
हर पल अंतर का दर्द दहे।
आँसू बन दृग से पीर बहे।

सपने सब गिरकर चूर हुए,
जबसे तुम मुझसे दूर हुए।
अब तुम्हीं कहो जीवन संगिनि!
मेरा मन किसकी शरण गहे।
आँसू बन दृग से पीर बहे।

अपने महबूब से

तुम्हारे सामने तुमसे
तुम्हारी ही शिकायत है
कि जितना बेवफ़ा समझा था
तुम उससे अधिक निकले।

तुम्हारी झील – सी गहरी
इन आँखों की इनायत है।
तुम्हारी ही गली के मोड़ पर
मेरे कदम फिसले।

ये मेरी भूल थी जो
मैंने तुमको बेवफ़ा समझा
मगर तुम बेवफ़ाओं
से भी आगे दो कदम निकले।

तुम्हारे प्यार की तासीर में
बेचैन मेरा दिल
यही ख्वाहिश।
तुम्हारे द्वार पर ही
मेरा दम

खोना-पाना

मैं
खुद को खोकर
तुम्हें पाना चाहता हूँ
क्योंकि पाना
खोने से बेहतर है
और मैं
तुम्हें पाने के लिए
अपना सब कुछ
खोने को
तैयार हूँ।

निकले।

ज़िन्दगी

अमावस्या के
घने अँधेरे में
ताल के किनारे पर खड़ा
बबूल का वो पेड़
जिस पर लटक रहा है
वया का एक घोंसला
और घोंसले के द्वार पर
पुरा है मकड़ी का जाला
जाले में फँसी मकड़ी
बाहर निकलने को
छटपटाती है
पर निकल नहीं पाती ।
ताल के किनारे पर
झींगुरों की झनकार
और मेढकों की टर्र – टर्र
के शोर के बीच
वो मकड़ी
और भी
बेचैन हो जाती है
बाहर निकलने को।
उसी तरह
तुम्हारी यादों के जाले में
फँसा हुआ मेरा मन
तुम्हारी यादों के जाले से
बाहर निकलने को
छटपटाता है
पर निकल नहीं पाता
और मैं
बार – बार सोचता हूँ कि
क्या यही है ज़िन्दगी।

 

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