छवि की रचनाएँ

तारे भये कारे तेरे नैन रतनारे भये

तारे भये कारे तेरे नैन रतनारे भये ,
मोती भये सीरे तू न सीरी अजहूँ भई ।
छवि कहै पति मै चकैया मिली तू न मिली ,
ठौया तरु छूटी तेरी टेक ना छुटी दई ।
अरुनई नई तेरी अरुनई नई भई ,
चहचही बोली आली तू न बोली ऎबई ।
मँद छबि भए चँद फूले अरविँद बृँद ,
गई री विभावरी न रिस रावरी गई ।

छवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

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