छवि निगम

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गुलाबो सिताबो

फिर एक दिन
कुछ यूँ बदली किस्मत कठपुतलियों की..
गुलाबो ने सिताबो की आँखों में देखा
सिताबो ने कस कर गुलाबो का हाथ जकड़ा
झटक फेंका नचवैया के कामुक शरीर का बोझा अपनी दुखती देह से
मरोड़ डालीं सब डोरियाँ…
अब गुलाबो आजाद है।
बी गरेड सनीमा देख आती है बेखटके
सीट पर फसट्टा मारे
अलमस्त ठहाके गुंजाती है
द्विअर्थी संवादों पर बेहिसाब सीटियां बजाती है
पर उसपे कोई नहीं झपटता।
भौंचक्की आँखें नाप तौल करती रहतीं हैं बस
न। आसान माल नहीं वो अब
देह की पूँजी कैसे किसपर खरचनी है,जानती है।
कौन सी गाली खींच कब कहाँ मारनी है, पता है
उसे ये भी पता है
पगार बड़वाते वक्त
साहब के आगे पल्लू बस कितना गिराना है
अब मजाल नही खूसट परचूनी की, कि ले जाये फिर से उसे
तंग कोठरी में
दूकान के पिछवाड़े
जब वह दस रूपये का आटा मांगे
बीस की चीनी और चायपत्ती
न ही कोई चाचा मामा भंभोड़ के उसे और रौंद सकता..
अब टटोलते हर हाथ को बेदर्दी से कोंचा करती है।
शहीद पार्क की रेलिंग के पास धुंधलके में
अपनी एक रात का मनमाफिक मोलभाव करती है
गुलाबो खुश है।
खुश तो है सिताबो भी।
गिटपिट करती, मेकअप लादे सितारे सा चमकती
पंचतारा होटल में हो जाये अपनी थोड़ी सी अर्धनग्न नुमायश ,हर्ज़ नहीं
तरक्की के पायदान चढ़ना, इतना भी मुश्किल नहीं
होंठों के त्रिभुज और भवों के वक्र से सौदेबाजी करती है
इश्क़ प्यार के सिक्के विक्के चलन में ही नहीं
जाये, लुढ़कता है तो उसका सिताबा किसी और ठौर
अंटी में दर्जन भर नचवैये अब वो खोंसे चलती है
हाँ पत्नी तो है,पर औरत है वो सबसे पहले
बोली ही लगनी है उसकी ग़र ,तो लगे
पर अपनी क़ीमत तो अब वही तय करती है
हर कसाव का
उठान कटाव गोलाई हर अंगड़ाई का दाम तय है
किसका हो कब कितना इस्तेमाल तय है
यूँ ही नहीं बिक जातीं अब बेमोल
खरीददार बन गयीं अपनी गुलाबो सिताबो
बेचारी नहीं हैं गुलाबो सिताबो
खुश हैं बड़ी अब गुलाबो सिताबो
अब खौफ नही हर आहट का,पीछा करती पदचापों का
रास्ते झपटमार हैं, ये जानती हैं गुलाबो सिताबो।

हॉब्स से एक संवाद 

सुनो हॉब्स!
तुमने कहा था न
तुमने और डर ने एक संग जन्म लिया था…
हाँ ये सही है बिलकुल
मेरा भी ऐसा ही जुड़वां
साथ ही जन्मा था
पर हॉब्स वो डर नहीं था
वो थी जिद!
लेकर रहना जन्म
एक जिद थी
फिर जिद थी इस निर्बन्ध मन को जीना
तन में कैद हो न रहना, ये जिद थी
गूंजना था एक नाद सा
धूप से पैंया पैंया दौड़ लगाने की जिद थी।
कुछ इतर भी होना था
गिलहरी होना था मुझे
जलपरी
या गौरैया
तीनो ही जीवन जीने में रोक क्या थी कहो तो?
एक बूँद बरसना
सागर के हृदय सीप में मोती हो जाना था..
खुद ही उकेरनी थीं
रेखाओं को फिसलते देना था हथेलियों पर मुझे
भागूँ दौडूँ उड़ जाऊँ
तैरूं या कि डूब जाऊँ
अपनी मर्जी से खिलने बिखर जाने की जिद थी
मरने से पहले जी जाऊं थोड़ा बस ये जिद थी
तुम्हें तो उबार लिया लैवायथान ने,ओ हॉब्स
वो आधा मनुष्य पशु आधा
शायद डर को मार पाया हो तुम्हारे
पर मुझे जिलाती मेरे साथ मेरी ज़िद थी
सुनो हॉब्स
तुम न जान पाओगे
पर मेरे टूटने पर हर बार मेरी ज़िद भी बिखरी
और जान लो
 होकर कई गुना आज
असंख्य कोखों में धड़क रही जो
कभी बस मेरी जिद थी।

* थॉमस हॉब्स एक प्रख्यात आधुनिक राजनितिक विचारक थे, जिन्होंने लैवाय्थान नामक ग्रन्थ की रचना की।

फिर तुम

सोचते लगते हो फूल
खिल जाती है वो
दौड़कर तुम्हारी डेस्क पर फूलदान सजा देती है
फुलवारी बन महक उठती है
एक सी लम्बाई की सुतवाँ टहनियाँ,सुघड़ फूल…
किसी कांटे में उलझी कुछ लाल बूँदें चमकती हैं
तुम्हें पता ही नहीं चलता…
सोचते हो भूख तुम
वो आंच में तप जाती है
सुडौल गेंद सी रोटियाँ
मुस्काती,ढेर लगाती जाती है तुम्हारी थाली में
ध्यान नहीं जाता न
जब रोटियाँ
अधपकी कुछ अधजली,कुछ नमकीन सी हो जाती हैं
नींद फिर तुम्हें सताती है
वो बिछ जाती है
अब ध्यान जाता है तुम्हारा
कि बिस्तर पर तुम्हारे सिर्फ सिलवटें ही सोती हैं
कहते हो,कितना मुश्किल है उसे समझ पाना
आखिर चाहती क्या है वो
पर समझते कहाँ हो तुम?
और सोचने लगते हो प्रेम…

दो और दो चार नहीं होते

(एक)

जी हाँ
ठीक कहा
कष्टकारी तो है
शांत रहना
खौलते लहू पर छींटे मारना
बदले की न सोचना
न पलटवार करना
बहादुर बन/बस प्रेम को जीना
जवाब तक न देना
जी बवाल ही है अहिंसा
सत्याग्रह को जीना
सचमुच बड़ा ही मुश्किल
मुश्किल तो
पर असम्भव नहीं…
सनद रहे।

   ( दो)

जब उकता जाते हैं हम राज्य से
तब सुनते हैं
कभी लिखी एक बतकही
था तो जरूर ही एक
मनु एडम या आदम
उसकी पसली से शायद जन्म गयी होगी
उसकी साथी
इड़ा ईव या हौआ
पुरुष का होना वास्तविकता और स्त्री एक संयोग
चाह रही होगी
परिवार की समाज की
राज्य बन गया होगा
तो ऐसे हम तक आया राज्य।
लेकिन
क्या यही चाह थी हमारी भी?
तो फिर
क्यों लौटते हैं हम बारम्बार
असभ्यता में
आदिमानव बनकर?

            (तीन)

युग की पुकार थी
साम्यवादी ललकार थी
शक्तिशाली दौलतमंद
दीन सर्वहारा थे
और मध्य में
चौड़ी खाई पाटी गयी
रक्त से लाल नदी पर
ढहे कुछ पुल
और लो फिर
आ गयी समानता।
आ गयी समानता?
लेकिन क्यों फिर
गूंजते वाद
घुटते विवाद अभी भी
क्यों
झड़ते कगार अभी भी?
निर्वात में
फलता फूलता
घुटता मध्यवर्ग !

   (चार)

अहा प्रजातन्त्र!
सब समान
सभी स्वतन्त्र
बहुमत का प्यारा शासन
झुनझुना
सपना सुंदर
पर क्या सचमुच?
क्यों दिखते यहां केवल कुछ
अधिक समान
केवल कुछ जो थोड़े ज्यादा स्वतन्त्र..
सुनो अरस्तू!
यहां सच में केवल विराजता केवल तुम्हारा कहा
भीड़तंत्र।

नदी की सुनो

कितने ही हुए विमर्श, अटकलें इतनी सारी
पर नदी का अपना रंग रूप तो रहा अबूझा ही
क्या होगी चाह अपनी उसकी…
चाहोगे तुम बूझना?
जाओ टाँग आओ अपना तन दरवेश कहीं किसी झाड़ पर
फिर लौटो
बिना उलीचे तट
बिना उसकी लहरों को कुचले तनिक भी
उतर आओ, गहरे भीतर
मन को बुद्ध कर लो
लेट जाओ तलहटी में गर्भस्थ शिशु से
उसकी सतह का आकाश देखो
जाने कितनी नदियाँ बहा करती हैं अन्तस में उसके
उसके हैं अपने मन के पहाड़ कछार घाटियाँ रेगिस्तान
भटकन के तुम नये आयाम तो गढ़ो
देह की परिभाषा स्थूल ही बनी रहेगी कब तक?
तरलता के उठान कटाव में भी कहीं जरूर दिखेगी आँच
तो इस बार उसमें जल जाओ।
अपनी राख से भरो उड़ान फीनिक्स पक्षी बन
आंको तो उसके आतुर मनोभाव
करो महसूस किनारों में बंधी उसकी कसमसाहट
जब चीरती हो नाव कोई जिगर उसका
पियो बूँद बूँद उसकी व्याकुल सी छटपटाहट…
नदी की सुनो।
नहीं चाहिए उसे रोज़ छलिया सूरज का चुम्बन
जबरन सुनहरा होने से पहले
रक्त छलछला आता है नदी का, तो लाल दिखा करती है
उधार की चाँदनी का रंग भी नहीं
पेड़ों से टप टप चूता हरा रंग भी कहाँ उसका अपना
बीहड़ पठारों का मटमैला रंग भी नहीं
करना चाहती है वापस करना नीलापन आसमान को
अहसानों तले पिसती उसकी रातें स्याह हो जाया करती हैं…
रंगहीन होना ही रंग हो उसका अपना तो?
और बोझ रंगों का उस पर मत डालो
नदी को गुनो।
कल कल छल छल तो शायद तुम सुनते हो
पर नाद कोई तो अपना उसका होगा
सुनो खौलते लावे की बुद बुद उसके अंतर में
आज गूँजता मौन सुनो।
थक चुकी है वो सभ्यताओं को जन्म देते देते
दम्भी खारे सागर में खुद को खोते खोते
रोज नये भंवर रचते
उसमे अपने उद्दाम ज्वार भाटे खुद डुबोते
ऊब चुकी है अपने ऊपर रचे ग्रन्थ सुनते
एक दिन, देखना
उतार फेंकेगी दमघोंटू महानता का चोला
ले करवट, यकायक उठ बैठेगी
खुद चुनेगी।
नही चाहेगी, तो नहीं चुनेगी
अपने ऊपर होते सभी विमर्शों, अटकलों को मूक कर देगी
तुम सुनना जरूर तब…
नदी बोलेगी।

हाँ भूल चुकी तुम्हें

हाँ भूल चुकी हूँ तुम्हें
पूरी तरह से
वैसे ही
जैसे भूल जाया करते हैं बारहखड़ी
तेरह का पहाड़ा
जैसे पहली गुल्लक फूटने पर रोना
फिर मुस्काना
घुटनों पर आई पहली रगड़
गालों पे पहली लाली का आना
तितली के पंखों की हथेली पर छुअन
टिफिन के पराठों का अचार रसा स्वाद
वो पहली पहल शर्माना…
पर जाने क्यों
बेख़याली में कभी
दुआओं में मेरी
एक नाम चोरी से चला आता है चुपचाप
घुसपैठिया कहीं का!

सुबह नहीं होती अब

नींद के खुलते ही
सुबह सुबह रोजाना ही…
और कैसे फौरन
खिलखिलाता
आंखमिचौली सा खेलता
गोलमटोल
मासूम सा सूरज
मेरी खिड़की की गोदी में लपक आता था।
अब…
तप जाता है
थक जाता है
हाँफते हाँफते बेचारा
चढ़ते चढ़ते
दस मंजिलें एक के बाद एक
सामने उग आई
उस नई इमारत की।
मेरी भी निराश खिड़की
बन्द हो चुकती है
तब तक।

देखना

इस अंधेरों के शहर में
अबकि एक चाँद बो दूँगी,
चांदनी के पत्तों पर
पाँव रखते रखते
तुम तक पहुंचूँगी…
और खींच उतारूंगी ।
रख दूँगी तुमको
चीकट सुबकते गालों पे
भिगो दूँगी तुम्हें
उन गालों पर खिंची
मटमैली अधगीली लकीर में,
अटका दूँगी
किसी खाली उधड़ी जेब की
नाउम्मीद सीवन में
टाँग दूँगी किसी
बेतहाशा भीड़ के बीचोंबीच।
फिर
चीखके देखना ज़रा तुम
किसी बेआवाज़ तमाचे से
तड़पना
बेबस इंतज़ार की आखों में
घिसटना
टूटे तले की चप्पल में उलझ
भटकते रहना
एक बेबस माँ के लिखे बैरंग ख़त में।
ए ईश्वर या ख़ुदा
ऐसा करना
अबकि तुम
पीड़ा का सही अर्थ समझना
अबकि तुम
औरत की देह ले जन्मना ।
फिर बताना
कि तब
ख़ुदा कौन
कैसा दिखता है तुम्हें?

कविता नहीं लिखते

न, कविता नहीं लिखते।
जी, बस ऐसे ही टाइम पास करते हैं
हम कुछ खास नहीं करते।
मुआफ़ी चाहते हैं…
वो तो बेसाख़्ता ही
बेमतलब बेमक़सद
बिख़र आते हैं कभी स्याह से बाग़ी ख़यालात किसी सफ़ेद सफ़े पे बरबस..
जब हमसे सम्भाले नहीं सम्भलते।
जी, क्या कहा?
नहीं नहीं।हम कविता नहीं लिखते।
वो तो यूँ ही
कैलेंडर में तारीखों के गिर्द गोले खींचते
बेबस इक उम्र की नाप तौल करते
बेख़याली में, नामालूम सा दर्ज़ हो जाता है, उसी पन्ने के पीछे कुछ ..
दिन रातों के हिसाब शरीक़ करते
समीकरण बैठाते, जोड़ते घटाते कभी कभार
कभी धोबी को दिए कपड़े गिनते गिनते
जाने किस और मुड़ जाती है मुई पेन्सिल बेलगाम
जगह न हो तो, हाशिये पे ही भाग पड़ती है..
कहीं ऐसे भी कविता होती है?
पुरानी कॉपियों के आख़िरी पेज पर
भूले भटके किसी प्रिस्क्रिप्शन, पर्ची कभी किसी बिल को उलट
भागते आ, कुछ लिखना
फिर वापस दौड़ जाना
बताइये, ये हिमाकत भला कविता हो सकती है?
ये कविता नहीं, कोई मर्ज़ है ज़रूर
न कोई सैलाब इसमें, न तनिक बारूद
वो तो बेइख़्तियार, चाय की पतीली से मसालदान में कूद आते हैं
रंगों के भूखे चन्द अलफ़ाज़ बेशऊर
पिस के भुन जाते हैं बेचारे
कभी गूंध लिए जाते है, कभी दूध संग उफ़न बह जाते हैं..
जी सही कहा, कविता ये थोड़े ही न बनाते हैं।
पुलक दबा लेते हैं, हम थिरकन बाँध कर रखते हैं
तल्खी से जज़्बातों की हिफ़ाजत किया करते हैं
वो तो चुभ जाती है बेसाख़्ता कभी कोई किर्च अपने ही वज़ूद की
बुहारते यादों का सीला सा आँगन
बस एक आह सिसक पड़ती है कभी, ग़र छिपा नहीं पाते
जी, जख़्मों का पर्दा रखते हैं।
वो जब आसमाँ का एक टुकड़ा टूट, आ लपकता खिड़की के भीतर जब
बस तारे बीन, चाँद के सदके जुगनू बना उड़ा देते हैं
धड़कन की पायल छनकाते सांसों की परवाजें भरते हैं
कहाँ हम कविता कोई लिखते हैं?
वो तो नामुराद, बेग़ैरत कुछ बेमुरव्वत से सपने
छिप जाते कमबख्त, वैसे तो तनिक सी आहट पर
पर देखो कब्ज़ा जमाये रखते हैं जबरन दिल पर, जेहन पर
नींद में ख़लल डाल, खुद गद्दे के नीचे, किसी कागज़ पर सो जाते हैं
हम सपनों की लत से उबरने की, पर जारी ज़िद रखते हैं
बताने लायक सा, हम तो कुछ नहीं करते
जी, आप सही हैं
फ़क़त जाया वक़्त करते हैं
हम कविता नहीं लिखते।

आत्महत्या

कुछ तो होगा उस पार
जो खींचता होगा…
सोचा होगा तुमने
शायद वहाँ
दिल के फफोले न टीसते होंगे
न सांसों का शोर डराता होगा
न आँसुओं से खारा समन्दर
न ख्वाबों सा चटखता आसमान होता होगा
न रेतीले जिस्म
क्रॉसवर्ड पहेली सी ज़िन्दगी भी नहीं होगी
न भुरभुरा गिरते दिन
न लिबलिबी काई पर फिसलती रातें होंगी
न कैद में ख्वाहिशों की
हथेली की लकीरों के दरख़्त मुरझाते होंगे
न प्यार का अर्थ बोझ
न रिश्तों का मायने फ़ासला होता होगा…
पर रुको ज़रा
ये गर्दन पर आस का फंदा बाँध
उस पार की छलाँग
की जो तैयारी की है न…
सुनो दोस्त
वो चमकती सतह जो लुभा रही है
वैतरिणी की नहीं
न मणिकर्णिका की
न मृत्यु न जीवन न मुक्ति
वो तो आभासी प्रतिबिम्ब दिखाते
इसी दर्पण की है…
सोच लो!

बापू से

क्रांति तो होगी ही बापू
तय है! कौन रोकने पाएंगे?
सत्य अहिंसा महंगे आइटम, अब हम न खरीदने पाएंगे
कसी रगों को फोड़, खौलता लहू लाएगा जलजले
खाल उधेड़ती चाबुक थामे, हाथ बदल अब जायेंगे।
बगावत कर देंगी फसलें सारी
, अपने शोषण को धिक्कारेंगी ।
नीवें उखड़ आएँगी आज़ाद हो
बुर्जुआ कंगूरों का सर झुकायेंगी।
बचपन डर, जा छिपा रहेगा किन्ही अधमुंदी पलकों में
पूंजीवादी सपने न होंगे विधवा भौजी की आँखों में
उफनती जवानी की कामरेडी चहुंओर हरहरायेगी।
गर्द पाट देगी सब गरतें, सैलाब समानता लाएंगे
धरती कड़ा कर लेगी सीना अपना
फावड़े कुदाल हल औजार, सब चूर चूर हो जायेंगे।
बादल बरसाएंगे परचम, नदी केवल ललकारें बांचेगी
सपनो के निवाले निगल सूखी अंतड़ियां नारे लगाएंगी।
क्या नैतिक क्या है अनैतिक बापू?
सर्वहारा तो सदा लूटा ही जायेगा
क्रांति तो होगी ही बापू, बस इक लाल रंग रह जायेगा।
धधकता लावा फूंक देगा हर दरोदीवार, हर छत को
बैनर एक लपेटे, बेचारा बेपर्दा आँगन रह जायेगा।
पर अँधा’वाद धोखा ही देगा, गरीब ठगा रह जायेगा
समय का पहिया रिवोल्यूशन की कीचड़ में फंसके रह जायेगा
ठिठक जायेंगे सारे हारे पग डग में एक दिन फिर से
फिर कोई लाठी थामे, ऐनक से मूँछों में मुस्कायेगा
अँगुलियों भर झुर्रियां पोंछ डालेंगी जंग के निशां सारे
पेशानी पे प्यार लिए, फिर जीने को, जग कोई और जुगाड़ लगाएगा
सीपी से झांकता बचपन, फिर से तुम्हें गुहार लगायेगा
यही क्रांति तो होगी बापू, तुम्हें कौन रोकना चाहेगा।

शब्द

तो बकौल आइन्स्टीन
पदार्थ न मरता है, न बनता
ऊर्जा तक बन सकता है इक निरा पत्थर..
अच्छा!
शब्दों को क्यों नही बूझा किसी ने?
वो भी तो नहीं बनते, मिटते भी नहीं
कहीं कुछ नया नहीं होता कभी कहने सुनने को।
सदियों पहले की कहा सुनी
कान के पर्दे से टकराते रहती है देखो आज भी ..
हीर सोहनी लैला जूलियट.. हाँ, सुनती हूँ तुम्हें सच
समा कर तुम में, मीरा -सी जी लेती हूँ
उफ्फ़!
देह को जिंदा कर जाते हैं, फिर मुर्दा भी
सुकरात के प्याले में घुले आह ये शब्द…
कहाँ बंधेंगे!
पारे की बूँद से ढुलक जाते
कभी पहाड़ हो जाते, किसी मांझी के घन का इंतज़ार करते करते
प्यार के प्यास की भाप कभी उड़ जाती
कभी बारिश की नमी सी जम जाती इन्हीं शब्दों मे
सुनो!
बदल दो न प्यार को भी आइंस्टीन के ‘मैटर ‘में।
शब्दों से उसे जमा लूँ
पिघला भी लूँ कभी मैं
ठंडे लावे से तर कर लूं रूह अपनी।
बस ये बावरा दिल अब बुद्ध हो ले
बेलौस निकल पड़े, बंजारे शब्दों की राह खोजें

स्वतंत्रता

एक भेड़ के पीछे पीछे
खड्ढे में गिरती जाती अंधाधुंध पूरी कतार को
भाईचारे को मिमियाती पूरी इस कौम
इतनी सारी ‘मैं’
हम न हो पायीं जिनकी अब तक, उनको…
चंहु ओर होते परिवर्तन से बेखबर
चाबुक खाते
आधी आँखों पे पड़े परदे से सच आँकते
झिर्री भर साम्यवाद को पूरा सच समझते
दुलत्ती भूल जो
चाबुक खाने की अफीम चख, बस एक सीध में दौड़ लगाते, उन्हें भी तो…
और बाहर निकलने की कोशिश में
टोकरी के खुले
मुहँ तक बस पहुँचने ही वाले
अपने जुझारू साथी केकड़े को खींच घसीट कर
वापस पेंदे में पटककर
समानता का जश्न मनाते वो सब, जी उनको भी…
जुगाली करते
किसी बिसरे सुनहरे युग की
आँखें मूंदे, ऊबते, जम्हाई लेते
फिर इसी संतुष्टि को उगल देते इर्द गिर्द
भ्रमित इसी पीढ़ी पे जो, उन्ही ठेकेदार सम्प्रभुओं को…
हर इन्कलाब की आहट पर
उदासीनता की रेत में सर घुसेड़े
निश्चिन्त झपकते
व्यक्तिवादी शुतुरमुर्ग को भी तो…
मठाध्यक्ष कछुए
उस लपलपाते सेक्युलर गिरगिट
और विकासशील घोंघे को भी…
जिबह हो जाने की तयशुदा बदकिस्मती को नकारती
बाज़ार का मांसल आकर्षण बनती
इतराती, मुस्कान के मुलम्मे तले एक चुप मौत को जीती जाती
आधी आबादी की इसी मासूमियत को…
और खुले पिंजरे को दिल से कस कर भींचे
अपने लोकतन्त्र के मिट्ठू को….
समाजवादी तालाब की मछलियों और बगुले जी को भी…
जी हाँ!
हम सभी को
आज़ादी मुबारक!

एक संदेश एक कविता

लो भई, दी तुम्हे आज़ादी, सच में
लो की तुम पर मेहरबानी कितनी
सर ज़रा झुका रक्खो, चलो आगे बढो़ न
जाओ, जी लो तुम भी थोड़ा बहुत
सच में
ये अहसान किया तुम पर, सनद रहे।
चलो दौड़ो
छोड़ा तुम्हे अपने
सपाट इन दबोचती सडकों पर
आज़ादी के पाट पग बाँधे
ठिठको तो मत अब
देखो पीठ पर कस चाबुक पड़ेंगे जो
सह लो
समझो तो जरा
हैं तुम्हारे ही भले को ये, कसम से
ऐसे ही तो रफ्तार बढेगी न
साँसे ले लो हाँ
लेकिन
जरा हिसाब से
दमघोंटू दीवारों में ही रह कर कसमसाओ तुम
सम्भाल के
सुरक्षित रहना जरूरी है, समझो तो
धुएं के परदे में छिपकर
उगाहो रौशनी
सहेजो जा कर, जाओ ढूँढो तो
तुम्हारे हिस्से की अगर कहीं कुछ होती हो तो।
किसी नुकीले पत्थर पर
पटक दी जाओ गर कभी
पड़ी रहो चुपचाप
करो बर्दाश्त सारी हैवानियते
आराम से बेआवाज़..
चीर दी भी जाओ तो क्या
मरती रहो इंच दर इंच
खामोशी से..
मरती रहो
यूँ ही जीती रहो हौसले से
सबकी लाज का दारोमदार है तुमपर सोचो
लुटेरे तो आयुष्मान ठहरे
जीती रहो का आशीष तुम्हारे नाम हुआ ही कब कहो?
हाँ, अग्निपरीक्षा पर हक तुम्हारा, हे सौभाग्यवती
रास्ता कोई और रहा ही नहीं
पर सदा ही चौकस रहना
इज्जत सभी की हमेशा बची रहे
कुआँ पोखर कुंडा रस्सी..जाने कितने रास्ते
कहीं कोई नाम न उछलने पाए किंचित भी
ऐसा न हो
कि फिर तुम
बस एक चालू मुद्दा
चौराहे की चटपटी गप्प
बहसबाजी का चटखारा
और फिर
एक उबाऊ खबर बन कर ही रह जाओ।
बेस्वाद बासी खबर की रद्दी सी बेच दी जाओ..
कि फिर
केवल याद आओ
तब
जब भी कहीं कोई और गुस्ताख
कभी दरार से झांके, कुछ सांस ले
थोड़ा सा लड़खड़ाये
पर चले
क्षीण सी ही, पर आवाज़ करे
कालिख में नन्हा सा रौशनी का सूराख करे
यूँ कि
फिर से
नया एक मुद्दा बने।

मेरा गाँव

कहीं उकड़ूँ छिपा बैठा है
चौड़ाती सड़कों के किनारे
मेरा गाँव गर्द से ढका बैठा है
कानों में उँगलियाँ खोंसे
पलकें भींचे
बहरा हुआ हाइवे के शोर से
धुंधलाते तारों को तकते हुए
कहीं भाग जाना चाहता है
मोहब्बत है उसे एक पुल से
झील को भी बेइंतहा चाहता है
टप्पेबाज शहरों को
शिकायती ख़त भेजा करता है
दौड़ते काफिलों से नफ़रत उसको
भागते पहियों से खौफ़ है
कुचल न जाएँ नन्हे खेत कहीं
दहशत में सारी रात जगा करता है
बंजर गला हो आया
कल कुएं में जब झांका था
एक ख़ुश्क आँसू था
वही गटके बैठा है
हल्की सी हरारत रहती है
कमर नौहरा के चल पाता है
हथेलियों की मेड़ें खुरचता है
जिगर का टुकड़ा
उसका हरिया
दिखता अब ढाबे का छोटू
और कहीं अँधेरे के तले
बिट्टो को बिकते देख कलपता है
अम्मा के लीपे सतिये में
मुंह गढ़ाए सुबकता है
मेरा गाँव अकुलाता है
भटकता है
आँचल में लगी गांठ में हल्दी संग लरजता है
मचलता है
अब नक्शे में धुंधला जाता है
पर टीस बन धड़कता है
फागुन कजरी रसिया सोहर की गुनगुन
परियों की कहानी सा
नीदें लाती किसी लोरी में
यूँही किसी मोड़ पर याद आ जाता है…
अपनी मुट्ठी में खोटा सिक्का दबाये बैठा है
सीने में एक फाँस है
मेरे शहर के कोने में
मेरा गाँव दुबका बैठा है।

गाथा 

कल्पना के आगे, हकीकत से ऐन पहले
किसी जीवित या मृत से सम्बन्ध रखे बिना
समुदाय विशेष आदि की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की मंशा बिन
बावज़ूद हर ऐहतियात
सन्दर्भ और व्याख्या के बीच की महीन रेखा पर उग आया है
इतिहास की तह से निकल आया
ये प्रसङ्ग
किसी कालखण्ड विशेष से सर्वथा मुक्त…
जब मनुष्य हों या भेड़ या हों चींटी
जीवों में अंतर मुश्किल था।
हाँ तो, उस समय जब
किसी प्रारम्भ से किसी अनन्त को
चली जा रही थी असंख्य चीटियों की जुझारू पंक्ति
काली स्लेटी-सी भूरी छोटी बड़ी सभी
विभिन्न परन्तु समान
किसी आदिम लय पर कदम ताल करते निरन्तर…
कदाचित किताब सी आ पड़ी मार्ग में उसके अनायास
पंक्ति गुजरती गयी उसपर से भी अनवरत
अचानक घटा फिर कुछ अजीब सा
अप्रत्याशित
गूंजी बहुत ही तेज कहीं फुसफुसाहट
सहसा उमड़ी एक लड़खड़ाहट
और फिर
वो सघन पंक्ति टूटती चली गयी कुछ विरल रेखाओं में
छटपटाती सी
कुछ अधकचरी कम्पित रेखाओं में।
ये वर्ग विभेद की शुरुआत का नाद था
भावी पंगु विकास का आगाज़ था
सतत् पीड़ित करता अवसाद था।
भूरी चीटियों ने ली थाम सत्ता की बागडोर
कुछ ऊपर चढ़ जाने दिया था संग वर्णसंकर चींटों को भी
स्वामित्व का ठप्पा लगाये
और बोझा सारा लाद दिया बेचारी काली चीटियों के काँधे…
मनमाने दासत्व के तले
और दाग़ दी उनकी सपनीली आँखें…
बस फिर
बताने को और क्या था
वहां केवल अराजक बिखराव था
कुछ सुना सुना सा इतिहास था
गाथा का अंत क्या, कब कहाँ होगा, ज्ञात किसे?
पर यकीन है
ये स्वार्थी राजनीति का किया धरा अनर्थ ही होगा
वो फुसफुसाहट, अवश्य कोई ‘वाद’ हुआ होगा
और चीटियों..
या कहें कि आदम शवों से पटी वो किताब
जरूर कोई धर्मग्रन्थ ही रहा होगा।

वातायन 

अंदर हूँ मैं
देहरी की लक्ष्मण रेखा के इस पार
शहतीरें साधे
दीवारों को बांधे
आँगन ओढ़े
पैर के अगूंठे से जमीन कुरेदते
छत की आखों से लाज छिपाये
प्रतीक्षा में…
बाहर भी मैं ही हूँ
देह की देहरी के उस पार
बाहों में बादल
बिजली का आँचल
हवाओं की पायल
सपनों की ऊँची परवाज भरते
आखों में नीला आसमां सजाये
प्रतीक्षा में…
इक वातायन के।

पिताजी

घर के बाहरी बरामदे में रहते हैं
फर्नीचर की तरह
वक्त पर झाड़ पोंछ दिए जाते हैं
दाना पानी का वक्त मुक़र्रर
बिलकुल जैसे पिंजरे में लवबर्डस का…
पर क्या करें।
पिताजी डिसिप्लिन्ड नहीं रहते
डिमेंशिया की धुंध में बड़बड़ाते हैं
अम्मा से ख्यालों में जाने क्या बतियाते हैं।
शुगर क्रेटनिन हीमोग्लोबिन बीपी और भी कितनी ही
उफ़ हर पुरानी रिपोर्ट अक्षरशः दोहराते हैं
नाहक याद दिलाते हैं।
सच्ची, कितना भी डिओडोरेंट डालूँ
वो फिनाइल सा महकते हैं।
जाने कैसे तोड़ देते हैं चश्मा अक्सर
दवाइयाँ जान बूझ गुमा देते हैं
ललचाते हैं
बच्चा हुए जाते हैं।
अजनबी तक से मिलने लपकते हैं।
तुम तो साइड वाले गेट से ही आना
सामने का गेट अब हम बन्द रखते हैं।
नहीं मिलता अब कोई केयर टेकर
पिताजी बड़े इनकनवीनिएंट हुए जाते हैं।

चिन्दियों में ख़ुशी-राजनीति

सजी सड़कें मैदान जागे
हुए चुनाव सब दौड़े भागे
नारों प्रचार का गूंजे शोर
चहल पहल दीखे चँहु ओर।

लो जी, गये नेता अभिनेता
राजनीति बीने, चल स्वेता
ये बैनर ददिया ओढेगी
रात में अब न वह ठिठुरेगी।

पर्चों की पुड़िया लो बनाना
चने वाले को बेच कमाना
लिफाफे और बना पाएंगे
शायद दाल आज खायेंगे।

रस्सियाँ राधा बटोर लाएगी
टूटा छप्पर बाँध पाएगी
लम्बी चादर माँ को देंगे
कुछ तन तो उसका ढक देंगे।

बबुआ की कुछ नावें होंगी
हाथ सेकतीं रातें होंगी
बबुनी माला तुम बेच आओ
फटे फ्राक की लाज बचाओ।

वहाँ देख वो छूटी चप्पल
छाला टीसेगा न हर पल
आहा, पा गया टूटी एनक
दादू की आँखों की रौनक।

हो महंगा या सस्ता होवे
मन्दिर मस्जिद हो न होवे
चुनिया मुनिया बस जी पावें
चुन्नू मुन्नू मुस्कुरा पावें।

राजनीति भी कहाँ बुरी है
देती कबाड़, रैलियाँ भली हैं
बाँचते मुद्दे नेता फिर आयें
चिंदी चिंदी खुशियाँ लायें।

देखो न

देखो न
बहुत कुछ बचा रह गया है
बाकी अभी भी
मेरी पिटारी में..
एक अंकुर
लुका छिपा है अरे
रेगिस्तानो के बंजर अंक में कहीं,
इक किलकारी है
सहमी सी
दहशतों के कातिल गर्भ में धंसी हुई।
हाँ, है एक
थरथराती रेखा
उजास की
खामोश-कालिखों की गोद में खेलती,
लड़खड़ाती छत भी है
अंधड़ों पर सधी अब तक
एक किरन भर उजास सही
दरकती दीवारों में हौसला अभी है बाकी।
ये चटखी सी चौखट ही
नयी सृष्टि की होगी बानगी देखना तुम
बागबान हूँ मैँ!
आखों में धूप संजोये
उगा ही लूँगा घोंसले नये
कोंपल सरीखे
खिलन्दड़े बदरा सीन्चेगे जिसे..
बगिया इक सुंदर सपने सी
खिला लूँगा
पिटारी रख अपनी क्षितिज पर
नींव में मिल जाऊँगा
उर्वरता उपजा लूँगा
सूरज चंदा चमका लूँगा
तुम देखना…

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