छाया त्रिपाठी ओझा की रचनाएँ

वेदना

वेदना तुम पास आकर
इस हृदय का बल बनो

अश्रु अंतस में हैं ठहरे
दे रहे हैं घाव गहरे
जिन्दगी के हर कदम पर
ज्यों लगे दिन रात पहरे
वेदना तुम आज आकर
चक्षुओं का जल बनो
वेदना तुम पास आकर
इस हृदय का बल बनो

रूठ बैठे स्वप्न सारे
हम हुए हैं बेसहारे
क्या बचा अब शेष कुछ भी
जब कोई अपनों से हारे
वेदना तुम डगमगाती
आस का सम्बल बनो
वेदना तुम पास आकर
इस हृदय का बल बनो

टूटती हर कामना जब
बस तुम्हें ही थामना तब
फिर उजालों से भला मन
सामना कैसे करे अब
वेदना तुम मुस्कुराकर
हर व्यथा का हल बनो
वेदना तुम पास आकर
इस हृदय का बल बनो

महक रहा हो मौसम जैसे

प्रीति हृदय पर कुछ यूँ छाई
महक रहा हो मौसम जैसे

शब्द ठहर जाते अधरों पर
बैठ हृदय में भाव चहकते
खुलतीं बंद सहमती पलकें
देख रहीं बस कदम बहकते
ठहरी-ठहरी मधुर चाँदनी
देख मगर कुछ यूँ मुस्काई
बहक रहा हो मौसम जैसे
प्रीति हृदय पर कुछ यूँ छाई
महक रहा हो मौसम जैसे

आँख मिचौली सँग तारों के
खेल रहे हैं जुगनू सारे
पीकर मदिरा मगन हुए हैं
जैसे ये मदहोश नजारे
इधर उधर कुछ भटके बादल
हँसकर बदन छुए पुरवाई
चहक रहा हो मौसम जैसे
प्रीति हृदय पर कुछ यूँ छाई
महक रहा हो मौसम जैसे

खुशियाँ बैठी हैं सिरहाने
लहराती भावों की सरिता
छिपकर बैठी बना रही है
लाज निगोड़ी अनुपम कविता
करवट-करवट ढीठ कामना
मचल रही है बस हरजाई
दहक रहा हो मौसम जैसे
प्रीति हृदय पर कुछ यूँ छाई
महक रहा हो मौसम जैसे

बैठ अकेला अन्तर्मन 

बैठ अकेला अन्तर्मन ये
अक्सर सोचा करता है।

प्रेमबेल चाहे अनचाहे
दिन प्रतिदिन क्यों बढ़ती है ?
देव बनाकर अपने हिय में
चित्र हजारों गढ़ती हैं
प्रिय का मोहक रूप भला वह
दुख कैसे सब हरता है।
बैठ अकेला अन्तर्मन ये
अक्सर सोचा करता है।

रंग बिरंगे पंछी आंगन
आकर खूब चहकते हैं
किस्म-किस्म के फूल हृदय में
क्योंकर खूब महकते हैं
सोच किसी को क्यों कैसे बस
गंध हृदय में भरता है।
बैठ अकेला अन्तर्मन ये
अक्सर सोचा करता है।

घंटों समय बिताता है क्यों
बैठ सामने दर्पण के
खोज-खोज क्यों पढ़े कहानी
निश्छल नेह समर्पण के
और किसी पर कैसे यह मन
बिना स्वार्थ के मरता है।
बैठ अकेला अन्तर्मन ये
अक्सर सोचा करता है।

बात-बात पर इन नयनों में
आखिर आंसू आते क्यों ?
दुख-विषाद पलकों पर सारे
लेकर सदा उठाते क्यों ?
भीड़ भरी दुनिया में उसको
खोने से क्यों डरता है।
बैठ अकेला अन्तर्मन ये
अक्सर सोचा करता है।

पीर रिमझिम

तोड़ कर तटबंध सारे
आज नयनों के सहारे
है बरसती पीर रिमझिम
है बरसती पीर रिमझिम

काँच जैसे हृदय टूटा
सँग अपनों का भी छूटा
कर्म धोखा खा गया यूँ
भाग्य ने सर्वस्व लूटा
मन विकल हो आज द्वारे,
अब भला किसको पुकारे
है बरसती पीर रिमझिम
है बरसती पीर रिमझिम

राह खुशियों ने है मोड़ा
लक्ष्य ने अनुराग तोड़ा
झूठ रिश्ते और नाते
आज सबने साथ छोड़ा
स्वप्न नेहिल सब हमारे,
रह गए बैठे कुँवारे
है बरसती पीर रिमझिम
है बरसती पीर रिमझम

हंस रही है आज दुनिया
जानती सब राज दुनिया
गीत गाती वेदना अब
दे रही है साज दुनिया
तुम नहीं हो साथ फिर जब
कौन किस्मत को संवारे
है बरसती पीर रिमझिम
है बरसती पीर रिमझिम

कुछ मिश्री सा घोलो तो

नहीं सामने,पर सपनों में
कभी -कभी कुछ बोलो तो
कहो हृदय की मीठी बातें
कुछ मिश्री सा घोलो तो

जीवन का हर पल तुमसे है
आज और प्रिय कल तुमसे है
बाधाओं से कैसा डर जब
अंतस का हर बल तुमसे है
मेरा है सर्वस्व तुम्हारा
मुझको कभी टटोलो तो
कहो हृदय की मीठी बातें
कुछ मिश्री सा घोलो तो

खुशी पकड़ कर द्वारे ला दूं
या कह दो तुम तारे ला दूं
जितने भी हैं नील गगन में
तोड़ -तोड़ मैं सारे ला दूं
एक तुम्हीं तो बस मेरे हो
मुझे कभी तुम तोलो तो
कहो हृदय की मीठी बातें
कुछ मिश्री सा घोलो तो

मुझे पता क्या दुनियादारी
गढूं बैठकर मूर्ति तुम्हारी
दूर – दूर तक महके बेला
नयनों में है चढ़ी खुमारी
नींद मुझे भी आ जाती पर
सुधियों संग तुम डोलो तो
कहो हृदय की मीठी बातें
कुछ मिश्री सा घोलो तो

थोड़ा सा रो लेती हूँ

अन्तर्मन में सुस्मृतियों के बीज रोज बो लेती हूँ।
याद तुम्हारी आती है तो थोड़ा सा रो लेती हूँ।

प्रश्न कई जब उठकर दिल में ,
करने लगते खींचातानी !
गढ़ते नहीं भाव भी आकर
फिर से कोई नयी कहानी !

नयनों में ले नीर सुनो तब, पीर सभी धो लेती हूँ।
याद तुम्हारी आती है तो थोड़ा सा रो लेती हूँ।

सौतन बनकर बैठ गयी है,
अपने द्वारे भले निराशा !
मगर छिपी इन संघर्षों में
जाने कैसी कोमल आशा !

पलकों में स्वप्निल इच्छाएँ, रखकर मैं सो लेती हूँ।
याद तुम्हारी आती है तो थोड़ा सा रो लेती हूँ।

दिखे नहीं अपनी भी छाया
धुंध कभी जब आकर घेरे !
पथ में बन अवरोध खड़े हों
पहरों तक घनघोर अँधेरे !

दीप जला तब नाम तुम्हारे,संग सदा हो लेती हूँ।
याद तुम्हारी आती है तो थोड़ा सा रो लेती हूँ।

झुलस – झुलस मुरझाये सपने 

जीवन की इस तेज धूप में
झुलस झुलस मुरझाये सपने।

घर पावन सा वो मिट्टी का
नेह मिले जो अपने हिस्से
छूट गया अम्मा का आंचल
नहीं रहे नानी के किस्से
गुड्डे गुड़ियों के संग कितने
हमने खूब सजाये सपने।
जीवन की इस तेज धूप में
झुलस झुलस मुऱझाये सपने।

पीहर गयी खुशी ज़्यों अपने
धड़कन – धड़कन भटकें यादें
अधरों पर है मौन सुशोभित
अंतस में चिहुंकें फरियादें
देख देख ऋतुओं के मन को
नयनों ने छलकाये सपने।
जीवन की इस तेज धूप में
झुलस झुलस मुरझाये सपने।

विस्मृत हो जाते दुख सारे
और न आकर चलतीं रातें
अपने पांव धरे फूलों पर
साथ हमारे चलतीं रातें
निष्ठुर जग के ही द्वारे पर
जा जाकर मुस्काये सपने।
जीवन की इस तेज धूप में
झुलस झुलस मुरझाये सपने।

अक्षर – अक्षर गीत

बनकर सुर संगीत अधर पर आओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

हंसे कामना मौन संग इठलाये भी
और प्रीत का गांव मुझे दिखलाते भी
मधुर राग जीवन की ऐसी गाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

पहन नये परिधान बसंती रंग मिले
फूलों पर भी खूब तुम्हारे रंग खिले
मन उपवन को आकर जरा सजाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

गाती रात सितारों के संग मधुर रागनी
नभ से बसुधा तक फैली है शुभ्र चांदनी
इन किरणों से कुछ पल चलो नहाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

खोना पाना जीवन है तो कैसा डर
पास रहो या फिर मुझसे दूर कहीं पर
खुशबू बनकर अन्तर्मन महकाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

आज नहीं हैं साथ उजाले अब अपने
अंधकार में डूब गये हैं सारे सपने
आकर कुछ खुशियों के दीप जलाओ तुम
अक्षर-अक्षर गीतों के बन जाओ तुम

खुली आंख से देखा जिनको

खुली आंख से देखा जिनको
उन सपनों ने ठगा मुझे।

पथ पर फूल बिछाने थे कुछ
तोड़ सितारे लाने थे कुछ
कभी रचे जो तुम्हें सोचकर
वो नवगीत सुनाने थे कुछ
किन्तु बेड़ियां हैं पांवों में
दिया समय ने दगा मुझे।
खुली आंख से देखा जिनको
उन सपनों ने ठगा मुझे।

देख मुझे सब मुंह बिचकाते
अपने सारे रिश्ते नाते
जब-जब दीप जलाती हूं मैं
कर्म-भाग्य मिल सभी बुझाते
सदा उजालों ने भी समझा
अंधियारों का सगा मुझे।
खुली आंख से देखा जिनको
उन सपनों ने ठगा मुझे।

दुख खुशियों के पल हरता है
समय नमन में जल भरता है
मांग रही बस उत्तर दुनिया
प्रश्न कौन कब हल करता है
इसी भीड़ में शामिल तुम भी
अक्सर ऐसा लगा मुझे।
खुली आंख से देखा जिनको
उन सपनों ने ठगा मुझे।

सिन्धु बताओ

कल -कल बहती सरिता की जब
मीठी इतनी जल धारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

झरनें बरखा और सभी ने
मिलकर तुम्हें सजाया है !
न्यौछावर कर नेह असीमित
प्रीति गीत ही गाया है !
किया इन्होंने खुद को अर्पण
सब कुछ तुम पर है वारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

लहरों से ले धाराओं तक
पल-पल स्नेह जताती हैं !
वर्षा की बूंदें भी आकर
मुस्काती मिल जाती हैं !
फिर भी घोर गर्जना करते
थर्राते तुम जग सारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

हीरे मोती नवरत्नों से
भरे हुए हो मान लिया !
तुम विशाल हो तुम महान हो
जलधि नाम है जान लिया !
किन्तु पथिक घनघोर प्यास से
तट पर ही जीवन सारा।
सिन्धु बताओ भला तुम्हारा
फिर क्यों इतना जल खारा।

मन फिर से तुलसी बन जाओ

मन फिर से तुलसी बन जाओ
झूठा जग झूठी सब बातें
झूठी हैं ये झिलमिल रातें !
खोज रहे होकर क्यों व्याकुल
इनमें तुम मीठी सौगातें !
कर्म करो ऐसा कुछ बढ़कर
जीवन का अनुपम धन पाओ।
मन फिर से तुलसी बन जाओ।

झूठा प्रेम है झूठी माया
झूठी है ये कंचन काया !
मत भागो तुम इनके पीछे
ये सब तो हैं दुखती छाया !
नये पाठ की छटा बिखेरो
एक नया सुर ताल सुनाओ।
मन फिर से तुलसी बन जाओ।

बहुत रो चुके दुख का रोना
अश्रु नहीं अब अपने खोना !
लड़कर नित्य स्वयं से सीखो
खुशियों के बीजों को बोना !
कुछ अपने कुछ औरों के हित
एक नया इतिहास बनाओ।
मन फिर से तुलसी बन जाओ।

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