Poetry

जगदीश चंद्र ठाकुर की रचनाएँ

मैं कभी मंदिर न जाता

मैं कभी मंदिर न जाता
और न चन्दन लगाता,
मंदिरों-से लोग मिल जाते जहां पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |

जिनके होठों पर हमेशा
प्रेम के हैं फूल खिलते
देख जिनको हैं हृदय में
प्रार्थना के दीप जलते
स्नेह, करुणा से भरी जो आत्मा
हैं हमारे वास्ते परमात्मा
मैं कभी गीता न पढता
और न ही श्लोक रटता
कृष्ण-से कुछ लोग मिल जाते जहां पर
बस वहीँ पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता,गुनगुनाता, गीत गाता |

जिनकी आहट से सदा
मिलती हमें ताजी हवा
दृष्टि जिनकी उलझनों के
मर्ज की प्यारी दवा,
इंसान के दिल में जहाँ
इंसान का सम्मान है
सच कहूँ मेरे लिए
वह दृश्य चरों धाम हैं,
मैं न रामायण ही पढता
और न धुनी रमाता
राम-से कुछ लोग
मिल जाते जहाँ पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोड़ी बैठ जाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |
वेद की बातें समझ में हैं नहीं आतीं
चर्चा पुराणों की तसल्ली दे नहीं पातीं
देश –दुनिया के लिए जो जिंदगी
बस उन्ही के ही लिए ये बंदगी
मैं कभी काशी न जाता
और न गंगा नहाता
लोग गंगाजल सदृश मिलते जहाँ पर
बस वहीं पर सिर झुकाता
देर थोडी बैठ जाता
शब्द-गंगा में नहाता
मुस्कुराता, गुनगुनाता, गीत गाता |

मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर के अंदर मत रखो

मैं कहता हूँ चीज पुरानी घर के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता बादल कब घिर आ जाये |

कभी तो बूढी माँ बन जाती, डाट-डपट भी करती है
छोटी बहन कभी बन जाती, छीन-झपट भी करती है
कभी मित्र बन बातें करती, हँसती और हँसाती है
कभी बहाने कोई ढूढकर रोती और रुलाती है

मैं कहता हूँ बात पुरानी मन के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता, काम वक्त पर आ जाये |

दो युग बीत गये हैं उनके साथ-साथ चलते-चलते
कितने दिन और कितनी रातें साथ बात करते-करते
मस्त रहा हूँ मैं चलनी में पानी बस भरते-भरते
मगन रही है वो चावल में कंकड कुछ चुनते-चुनते

मैं कहता हूँ दर्द पुराना तन के अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता दर्द दवा ही बन जाये |

हाय, नहीं पहचान सके हम एक दूसरे को अब भी
कभी-कभी सोचा करता हूँ बैठ अकेले में अब भी
जीवन के सारे दुःख-सुख का जोड़ शून्य ही होता है
पता नहीं फिर क्यों मानव अपनी किस्मत पर रोता है

मैं कहता हूँ दृष्टि पुरानी अपने अंदर मत रखो
वो कहती है कौन जानता कब क्या किसको भा जाये |

काँटों का फूल से मिलन

काँटों का फूल से मिलन
है अजीब ये समीकरण |
बादल के नाम पर आँधियां चलीं
सरसों के खेत में बिजलियाँ गिरीं
आंसुओं से है भरा चमन
है अजीब ये समीकरण |
खाली हैं आज साधुओं की झोलियां
निकल रहीं तिजोरियों से मात्र गोलियां
बच्चों के सर पे ये कफन
है अजीब ये समीकरण |
बरगद के पेड़ पर मेढ़क चढे
सूरज की जगह आज काजल उगे
नाव और नदी का ये चयन
है अजीब ये समीकरण |

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