जमाल ओवैसी की रचनाएँ

गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ

गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ
चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ

न मौज-ए-तुंद है कुछ ऐसी जिस से खेलें हम
चढ़ते हुए हैं जो दरिया कहो उतर जाएँ

अजब क़रीने के मजनूँ हैं हम कि रहते हैं चुप
न ख़ाक-ए-दश्त उड़ाएँ न अपने घर जाएँ

जबीं है ख़ाक से ऐसी लगी कि उठती नहीं
जुनून-ए-सज्दा अगर हो चुका तो मर जाएँ

ज़माना तुझ से ये कहना है मर चुके हम लोग
अब अपनी लाश तिरे बाज़ुओं में धर जाएँ

हमीं बचे हैं यहाँ आख़िरूज़-ज़माँ लेकिन
सभों को अपना तआरूफ़ दें दर-ब-दर जाएँ

हर लम्हा दिल-दोज़ ख़ामोशी चीख़ रही है

हर लम्हा दिल-दोज़ ख़ामोशी चीख़ रही है
मैं हूँ जहाँ तन्हाई मेरी चीख़ रही है

घर के सब दरवाज़े क्यूँ दीवार हुए हैं
घर से बाहर दुनिया सारी चीख़ रही है

ख़ाली आँखें सुलग रही हैं ख़ुश्क हैं आँसू
अंदर अंदर दिल की उदासी चीख़ रही है

तूफ़ानों ने सारे ख़ेमे तोड़ दिए हैं
यूँ लगता है सारी ख़ुदाई चीख़ रही है

रात की चीख़ों से आबाद हुआ हर ख़ित्ता
कब से नवेद-ए-सुब्ह बेचारी चीख़ रही है

कारोबार न करना लोगो देखो दिल है
इक मुद्दत से रूह हमारी चीख़ रही है

मैं ने अपनी मौत पे इक नौहा लिक्खा है

मैं ने अपनी मौत पे इक नौहा लिक्खा है
तुम को सुनाता हूँ देखो कैसा लगता है

जिस्म को कर डाला है ख़्वाहिश का हरकारा
चेहरे पर मस्नूई वक़ार सजा रक्खा है

सूनी कर डाली है बस्ती ख़्वाब-नगर की
कल तक जो दरिया बहता था ख़ुश्क हुआ है

होंटों से जंज़ीर-ए-ख़मोशी बाँध रखी है
ताक़-ए-उम्मीद पे दिल का चराग़ बुझा रक्खा है

नींद से बोझल पल्कों पर अँदेशा-ए-मिट्टी
कश्ती-ए-जाँ के डूबने का लम्हा आया है

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