ज़फ़र हमीदी की रचनाएँ

अपने दिल-ए-मुज़्तर को बेताब ही रहने दो

अपने दिल-ए-मुज़्तर को बेताब ही रहने दो
चलते रहो मंज़िल को नायाब ही रहने दो

तोहफ़े में अनोखा ज़ख़्म हालात ने बख़्शा है
एहसास का ख़ूँ दे कर शादाब ही रहने दो

वो हाथ में आता है और हाथ नहीं आता
सीमाब-सिफ़त पैकर सीमाब ही रहने दो

गहराई में ख़तरों का इम्काँ तो ज़ियादा है
दरिया-ए-तअल्लुक़ को पायाब ही रहने दो

ये मुझ पे करम होगा हिस्से में मिरे ऐ दोस्त
इख़्लास ओ मुरव्वत के आदाब ही रहने दो

इबहम का पर्दा है तश्कीक का है आलम
तुम ज़ौक़-ए-तजस्सुस को बेताह ही रहने दो

मत जाओ क़रीब उस के तुम एक गहन बन कर
आँगन में उसे अपना महताब ही रहने दो

जब तक वो नहीं आता इक ख़्वाब-ए-हसीं हो कर
तुम अपने शबिस्ताँ को बे-ख़्वाब ही रहने दो

वो बर्फ़ का तोदा या पत्थर नहीं बन जाए
हर क़तरा-ए-अश्क-ए-ग़म सैलाब ही रहने दो

वो बहर-ए-फ़ना में ख़ुद डूबा है तो अच्छा है
फ़िलहाल ‘ज़फर’ उस को ग़रक़ाब ही रहने दो

जब भी वो मुझ से मिला रोने लगा

जब भी वो मुझ से मिला रोने लगा
और जब तन्हा हुआ रोने लगा

दोस्तों ने हँस के जब भी बात की
वो हँसा फिर चुप रहा रोने लगा

जब भी मेरे पाँव में काँटा चुभा
पत्ता पत्ता बाग़ का रोने लगा

आबयारी के लिए आया था कौन
हर शजर मुरझा गया रोने लगा

चाँद निकला जब मोहर्रम का कहीं
चुप से दश्त-ए-कर्बला रोने लगा

उस पे क्या बीती है अपने शहर में
आश्ना ना-आश्ना रोने लगा

मेरे दुश्मन का रवैया था अजब
जब हुआ मुझ से जुदा रोने लगा

बादलों ने आज बरसाया लहू
अम्न का हर फ़ाख़्ता रोने लगा

देख कर मस्जिद में मुझ को मुज़्तरब
मेरे ग़म में बुत-कदा रोने लगा

था ‘जफ़र’ का इक अनोखा माजरा
ग़ौर से जिस ने सुना रोने लगा

झील में उस का पैकर देखा जैसे शोला पानी में

झील में उस का पैकर देखा जैसे शोला पानी में
ज़ुल्फ़ की लहरें पेचाँ जैसे नाग हो लपका पानी में

चांदनी शब में उस के पीछे जब मैं उतरा पानी में
चाँदी और सीमाब लगा था पिघला पिघला पानी में

कितने रंग की मछलियाँ आईं ललचाती और बल खाती
क़तरा क़तरा मेरी रगों से ख़ून जो टपका पानी में

रौशन रौशन रंग निराले कैसे नादिर कितने हबाब
क़ुल्जुम-ए-हस्ती रक़्स में था या एक तमाशा पानी में

एक क़लंदर ढूँढ रहा था चाँद सितारों में जा कर
उस का ख़ुदा तो पोशीदा था अन्क़ा जैसा पानी में

मुझ को ये महसूस हुआ था अपने अह्द का ख़िज्र हूँ मैं
चुपके चुपके जब भी मैं ने ख़िज्र को ढूँढा पानी में

आलाइश दाग़ों से भरा ये तेरा बदन इक रोज़ ‘जफ़र’
रहमत की घटा जब बरसी थी तो साफ़ हुआ था पानी में

क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में

क्यूँ मैं हाइल हो जाता हूँ अपनी ही तन्हाई में
वर्ना इक पुर-लुत्फ़ समाँ है ख़ुद अपनी गहराई मे

फ़ितरत ने अता की है बे-शक मुझ को भी कुछ अक़्ल-ए-सलीम
कौन ख़लल-अंदाज़ हुआ है मेरी हर दानाई में

झूठ की नमकीनी से बातों में आ जाता है मज़ा
कोई नहीं लेता दिलचस्पी फीकी सी सच्चाई में

अपने थे बेगाने थे और आख़िर में ख़ुद मेरी ज़ात
किस किस का इकराम हुआ है कितना मिरी रूस्वाई में

बदले बदले लगते हो है चेहरे पर अंजानापन
या वक़्त के हाथों फ़र्क़ आया मेरी ही बीनाई में

सुनने वालों के चेहरों पर सुर्ख़ लकीरों के हैं निशाँ
ख़ूनी सोचों की आमेज़िश है नग़मों की शहनाई में

सब क़द्रें पामाल हुईं इंसाँ ने ख़ुद को मस्ख़ किया
क़ुदरत ने कितनी मेहनत की थी अपनी बज़्म-आराई में

अपनी आगाही की उन को होती नहीं तौफ़ीक़ कभी
लोग ख़ुदा को ढूँढ रहे हैं आफ़ाक़ी पहनाई में

दुनिया की दानिश-गाहों में आज अजब इक बहस छिड़ी
कौन भरोसे के क़ाबिल है आक़िल और सौदाई में

जाने किस किरदार की काई मेरे घर में आ पहुँची
अब तो ‘जफ़र’ चलना है मुश्किल आँगन की चिकनाई में

मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ

मैं ज़िंदगी का नक़्शा तरतीब दे रहा हूँ
फिर इक जदीज ख़ाका तरतीब दे रहा हूँ

हर साज़ का तरन्नुम यकसानियत-नुमा है
इक ताज़ा-कार नग़्मा तरतीब दे रहा हूँ

जिस में तिरी तजल्ली ख़ुद आ के जा-गुज़ीं हो
दिल में इक ऐसा गोशा तरतीब दे रहा हूँ

लम्हों के सिलसिले में जीता रहा हूँ लेकिन
मैं अपना ख़ास लम्हा तरतीब दे रहा हूँ

कितने अजीब क़िस्से लिक्खे गए अभी तक
मैं भी अनोखा क़िस्सा तरतीब दे रहा हूँ

ज़र्रों का है ये तूफ़ाँ बे-चेहरगी ब-दामाँ
ज़र्रों से एक चेहरा तरतीब दे रहा हूँ

दुनिया के सारे रिश्ते बे-मअ’नी लग रहे हैं
ख़ालिक़ से अपना रिश्ता तरतीब दे रहा हूँ

पुर-पेच रास्तें पर चलता हुआ ‘जफ़र’ मैं
सीधा सा एक रस्ता तरतीब दे रहा हूँ

 

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