ज्ञान प्रकाश चौबे की रचनाएँ

प्रेम को बचाते हुए

मैंने उसे एक चिट्ठी लिखी
जिसमें नम मिट्टी के साथ मखमली घास थी
घास पर एक टिड्डा बैठा था
पूरी हरियाली को अपने में समेटे हुए

जाड़े की चटकीली धूप से
लिखा उसमें तुम्हें भूला नही हूँ
तुम्हारा चेहरा बादलों के पीछे
अक्सर दिखाई देता है

तुम्हारी हँसी हँसता हूँ
गाता हूँ तुम्हारे लिखे गीत
अभी भी नर्म शाम में
मेरी लिखी प्रेम कविताओं में
झाँकता है तुम्हारा चेहरा
तुम्हारी हथेली का गुदाज स्पर्श
मेरे कान की लौ लाल करता है
भरी बरसात में भीगते हुए

मैंने लिखा उसे
तुम्हारा रूमाल तुम्हारी महक से भरपूर
मौज़ूद है मेरी बाईं जेब में
मेरी डायरी में ज़िन्दा है तुम्हारा गुलाब
तुम्हारे होंठो की लाली
दिखती है मेरी बनाई तस्वीर में

बेस्वाद नहीं हुई है
तुम्हारी बनाई मीठी खीर
और न ही भूला हूँ
तुम्हारी चिकोटी का तीख़ापन
सबकुछ बचा है
भरपूर नमक और पूरी मिठास के साथ

अंत में लिखा मैंने
मेरे क़दमों के साथ
तुम्हारे क़दमों की थाम बजती है
निशान पड़ते हैं
गीली मिट्टी पर चलते हुए मेरे साथ ही

नदी बोलेगी 

मेरी चुप्पी
नदी की चुप्पी नहीं है
जंगलों में पेड़ों की तादाद
धूप की गर्मी से कम है
मेरे हिस्से की हवा
माँ के बुने स्वेटर की साँस से कम है

बादल छुपे हैं
यहीं कहीं सेमल के पीछे
मेरे हिस्से की धूप लेकर
फूल हँस रहे हैं
वो सब जानते हैं
ज़िन्दगी की एक-एक परत

टूटती उबासी
रेत के साथ गाते हुए
गई है अभी शहर से बाहर
सड़क से उतरकर पगडंडियों के साथ
कितनी तेज़ धूप है
और मेरी छाया उसके साथ है
जंगल की मुर्गाबियाँ
निकली हैं नदी की तलाश में
उनके पैरों के निशान
गुज़रें हैं उस पहाड़ से होकर
हवा से पता पूछते हुए

नदी की चुप्पी
मेरे अन्दर छिपी है पलकों के पीछे
बरबस मैं उसे ढूँढ़ लूँगा
जंगल के पीछे कहीं
कहूंगा ‘झाँ’
नदी खिलखिलाकर हँसेगी
पेड़ों के साथ झूमते हुए
निकल आएगी बादलो के पीछे से
धूप के साथ गलबहियाँ डाले हुए

नीला नभ

कल्पना चावला के लिए

नीला नभ
रंग बदल रहा है
काला हुआ जा रहा है
उसका रंग

किन्तु हँस रहा है
तारे टँके जा रहे हैं
एक के बाद एक
….झिलमिला रहा है
उसका चेहरा

अरे !
वो चलता हुआ उल्का-पिण्ड
स्थिर हुआ जा रहा है
…..की तारा हुआ जा रहा है
एक स्निग्ध मुस्कान
होंठों के कोरों पर
नभ मुस्करा रहा है

हवा से प्रार्थना 

हवा बहो
बहती रहो लगातार
बिना रूके
जैसे गाँव की नदी

तुम दौड़ो
जैसे ख़ून दौड़ता है
हमारी नसों में
रात के अन्धेरे मे
दौड़ते हैं बेशुमार सपने

हवा बहो
बहती हुई जाओ
मेरे गाँव की गलियों तक
दे आओ हमारा सन्देश
दूर शाम ढले खेतों से लौटते
माँ-बाबूजी को

गाँव की दहलीज़ पर
पूछना बूढ़े पाकड़ से उसका हाल-चाल
और नदी से कहना
मैं रोज़ करता हूँ उसे याद

हवा घूमना
घूमकर मारना ज़रूर एक चक्कर
जहाँ हमने खेली कबड्डी लच्ची डाँड़
और गोल चीके

गलियों में भी मारना
ज़रूर आ रही होगी
आइस-पाइस की आवाज़

देखना माँ का चौका
जहाँ हमने छीनी एक-दूसरे की रोटियाँ
और सब्ज़ियों में बने साझेदार

हवा लौटना
और लौटती बेर ले आना
गाँव-गिराँव की चिट्ठी-पतरी
मेरी प्रिया के लिए
हँसते पीले सरसों के फूल
ले आना गायों की ममता भरी आवाज़
माँ की रोटी की सोंधी सुगन्ध
बथुए का साग, आम का आचार
खेत की मिट्टी से पसीने की बास भी

हवा चलना
और चलती बेर पूछ लेना
बड़े-बूढ़ों से उनकी तबीयत

बूढ़़़ी अम्मा से ले आना
उनके पोपले मुँह का आशीर्वाद
टेकना माथा मेरी ओर से
गाँव के सभी देवता-पितरों को
और आख़िर में जब लौटना
गाँव की चौहद्दी को बोलना मेरा प्रणाम

हवा लौटना
और जल्दी लौटना

प्रतीक्षा

दीवारों पर
बनाते हुए तुम्हारी परछाइयाँ
फ़र्श पर उगाई
कई हरी फ़सलें
बिस्तर पर लिखा करवटें
कोने में सुगबुगाते सपनों से कहा
शान्त रहो

प्रत्येक आहट पर
कमरे ने ओढ़ ली मुस्कराहट
बहुत दिनों बाद
क़िताबें छुट्टी पर गईं
सौ वॉट के टिमटिमाते बल्ब ने
अपना ज़र्द चेहरा छुपाते हुए
ग़ुम हो गया दुधिया रोशनी में

नींद ने भेजी मेरे पास
अवकाश की सूचना
और धड़कनें पूरे दिन
करती रहीं भागमभाग
गुड़हल के फूल हँसते रहे पूरे दिन
पलकों की आँखों से कुट्टी देखकर

दरवाज़े ने
हवा के कान में
फुसफुसाते हुए कुछ कहा
खिड़कियाँ मुस्कराईं
रोशनदान कुछ नाराज़ रहा इनसे
दूसरी तरफ़ चेहरा घुमाए
बतियाता रहा चिड़ियों के साथ

आख़िरकार
शाम उतरी आँगन में
रात भी पीछे से दरवाज़े से
चुपके पाँव आईें
उस रात कोई नहीं सोया
रात भी नहीं

एलीट पार्क

सुन सकते हो
हमारी धड़कनों में
बज रहे संगीत के सुरों को
रंग व रेखाओं से परे
रचते नए चित्र
उमंग की लहरों पर
अनगढ़ी उड़ान भरते हुए
हमारे प्रेम को

हम सदी के
सफ़ेद कबूतरों को
छुपाए अपनी गोद मे
क्या सोच रहे हो
इस बरस रही
बारिश की बूँदों के बीच
अन्तस तक भीगते हुए

लिखो न
कोई कविता कोई गीत
तुमसे अच्छा कौन जानेगा
लगातार दिवार के पीछे
चुने जा रहे प्रेम की भाषा को
तुम्हीं पढ़ सकते हो
हमारी तस्वीरों में लिखी
इबारतों को
कि हम मिलतें रहेंगे
या यूँ ही
किसी समय के कोने मे
दफ़्न कर दिए जाएँगे
भविष्य में कटे पंखों के साथ
अन्तहीन यात्रा के लिए

तुम्हारे हिस्से का हरापन

तुम्हारे पास
इतना कुछ कैसे है
कैसे है तुम्हारे फेफड़ों में इतनी जगह
कि तुम भर लेती हो
सबके हिस्से की हवा
अपने फेफड़ों में
और कैसे सबके सपनों की चिड़िया
बेखौफ़ तुम्हारी आँखों में उड़ती रहती है

तुम्हारे सपनो का हरापन
किस जादुई तोते में क़ैद है
कहाँ छुपे हैं
तुम्हारी हँसी के मटियारे बादल
चट्टान के किस कोने में
तुम्हारी जड़ें तलाश रही हैं
अपने हिस्से की मिट्टी

किस हहाते झरने के शोर में
छुपे पड़े हैं
पके गेहूँ के बाल सरीखे
तुम्हारे सुनहरे गीत
किस मोड़ पर बिछड़ी तुमसे नदी
किन घरों की छतों पर
टाँक रखा है तुमने
अपना नीला आसमान

बाहर आओ गौरैय्या
निकलकर हँसो एक बार
हँसते हुए खुली धूप में देखो
वो तुम्हारा हरियाआ आँचर नहीं
स्वप्नों का सुलगता अलाव है तुम्हारे लिए

घुलटते शब्द
तुम्हारी उड़ान के पंख नहीं
आकाश में छितराए दानें हैं
और अजूबे की पत्तियों से उगाई गई इच्छाए~म
तुम्हारी जड़ों के खिलाफ़
बेवकूफ़ियों से भरी अमूर्त कल्पनाएँ

बहुत हुआ
चलो
चलो समुद्र के उस पार
उकेरने हवा की नई तस्वीर

हवा के ख़िलाफ़ चिड़िया

हवा जब भी
डैनों के खिलाफ़ रहती है
चिड़िया पंखों को समेटकर
फेफड़ों में पूरी साँस भरती है
लड़ती है उड़ती है
खिलाफ़ रहती है हवा के

सबकुछ वैसा नहीं होता कभी
जैसा चाहती है चिड़िया
और न वैसा
जैसा की चाहती है नदी
और चाहता है जंगल
किसी भी धुँधलके शाम में
या कि चमकती सुबह में

चिड़िया तलाश रही है
अपना बाग पेड़ डाल घोंसला
तलाश रही है अपनी दुनिया
शाम के पीछे छुपे अन्घेरे को देखती हुई

चिड़िया के पंखों पर
उड़ते बादलों के फाहे
और थोड़ी-सी खिली धूप है
वो चुनती है तिनका
तिनकों से बुनती है दुनिया
उजाले से भरी सुबह
खिलखिलाती सुबह
एक के बाद एक टाँकती है चिडिया
अपने घोंसले में

हवा के खिलाफ़ रहते हुए
चिड़िया समय का गीत गाती है
उसकी लाल चोंच
टिमटिमाती रोशनी है भोर के तारे की
और उसके दुमछल्ले पर
पूनम का अटका हुआ चाँद है
अन्धेरे के खिलाफ़ लड़ते हुए

पाकड़-1

जिस दिन धूप में गंध रहती
पाकड़ हँसता है
उसकी हँसी जाड़े की धूप-सी
बड़ी भली लगती है
उगते हुए गाँव के साथ

दादा कहते रोज़ मुझसे
इसकी पत्तियों का रंग
हमारे चेहरों के रंग से बनता है
और इसका चेहरा
हर फ़सल के बाद
बदल लेता है अपना चेहरा

मेरे गाँव की पगड़ी है
इसकी ख़ूब घनेरी पत्तियों का जंगल
जिसमें अनजाने ढेरों किस्से-कहावतें
लुका-छिपी का खेल खेलती
पहली बार मैंने
यहीं सुना था हवा को गाते हुए
जिसके सुर में
हम चरवाहों की ताने बोलती

जब कोई बाहर जाता
उसकी दुआ-पैलगी ज़रूर होती
बहुएँ मायके से आतीं
बेटियाँ अक्सर ससुराल जातीं
रूकती यहाँ पर आध-एक घण्टे
बतियाती अपना सुख-दुख
शहर से लौटती चिट्ठियाँ
ज़रूर सुस्तातीं इसकी छाँह में

बूढ़ा बुजुर्ग पाकड़
कभी पेड़ नहीं रहा
पूर्वजों की गर्म हथेलियों से उलचता
आशीर्वाद था हमारे लिए

पाकड़-2

बहुत दिन बीते
पाकड़ का छतनार पेड़ नहीं रहा
नहीं रही किसी के होंठों पर छतनार हंसी
और ना ही दादा रहे

लोग नहीं बचे
बुझे चूल्हे-सी उदास
गलियाँ बची रहीं
सर पर उठे हाथों में
ठण्ड के सोते
ख़ून में प्यार की गर्माहट नहीं
कौड़े की आग बची रही

दिअर के देखते देखते
गोरूओं के निशान
लीक पर नहीं रहे
खेत-खलिहान बचे रहे
फ़सलों की आमद नहीं रही

नहीं रहे धड़कनें पहचानने वाले दोस्त
हवा में नमी
और नदी की धार नहीं रही
परी-कथाओं सरीखा बचपन
दादी की जादुई किस्साई पोटली
सुबह के रंग और शाम की रोशनी नहीं रही

हम ढूहों से बचे रहे
धूप में तपते
पाकड़ नहीं रहा
नहीं रहे दादा
पाकड़ की आख़िरी हँसी बची रही

प्रेम मिलता है

निकलती है
जब गुनगुनी धूप
हरी घास से लिपटी
ओस की बूँदें
सिहराती है तलवें

हँसती है
आँगन की रातरानी
माँ की भूनी सेवइयाँ
भर जाती है
बेतहाशा नथुनों में

उम्र से बेख़बर
एक लड़की भीगती जाती है
बरसात में
लिफ़ाफ़े बिना पते के भी
तलाशते हैं अपना कोना

ऊँघते शहर के
बेचैन आख़िरी छोर पर
प्रेम मिलता है
पहाड़ों का रास्ता पूछते हुए

लौट आओ गाँव में 

बैठ गए दो पल
झूठ की नाव में
लौट आओ गाँव में

आँखों पर बँधी पट्टी
घोड़े की दौड़ है
सेहरा मिले जीत का
बाकी सब गौड़ है

मिलेगी ठण्ड कितनी
पैसे की छाँव में
लौट आओ गाँव में

दादी की पोपली हँसी
शामत की घड़ी है
खोई धुएँ-धूल शोर में
दादा की छड़ी है

हँसना नहीं रोना है
कौए की काँव में
लौट आओ गाँव में

चौराहे पर हो रहा
नाटकों का खेल है
हाज़िर है आदमी
आदमीयत गोल है

आती हैं चिट्ठियाँ
भर आँसू आँख में
लौट आओ गाँव में

प्यार करने की उम्र में लड़कियाँ

बसन्त के किसी मोड़ पर
ठहरी हुई उम्र के साथ
लान के पौधों में
फूलों के आने के इन्तज़ार में
अपने बालों में
उड़ती हुई पतंगे उलझाए
बेख़बर लड़की
चुप आकाश की गोद में
सोए हुए तारों के बीच खड़ी है

पुराने काफ़ी-हाउस की महक में लिपटी
किसी शाम की याद में
लड़की तैर रही है
लिफ़ाफ़े के जामुनी आकाश में
उसके अनचिह्ने सपनों को
अपनी चोंच में दबाए सिरगोटी
मेंहदी के झाड़ पर फुदक रही है

लड़की उतर रही है
डायरी के कुछ पन्नों में लिपटी
बर्फ़ की नर्म तलहटी में
बिछी हुई उजास पर
क़दम-दर-क़दम रखती हुई लड़की
बदल रही है
धूप की टुकड़ियों में
बिखर रही है
जंगली घास के सफ़ेद फूलों पर
ओस बनकर

वो पूछती है
माँ तुमने गुज़ारी कोई शाम
या कोई दुपहरी
किसी पार्क की सुनसान बेंच पर
चुप किसी आँख में झाँकते
भीगते हुए बरसात में
यूँ ही सड़कों को नापते हुए
देखते हुए ज़मीन को
आकाश की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए

या कि पिता
कोई शाम बिताई तुमने
शब्दों से परहेज करते हुए
किसी रेस्टोरेण्ट के कोने वाली सीट पर
बजाते हुए चम्मचें
गुनगुनाते किसी पुरानी फ़िल्म का
कोई रोमाण्टिक गाना

बताओ ना दीदी
प्यार करने की उम्र में लड़कियाँ
मेरी तरह होती हैं
या मेरी तरह लड़कियाँ
इस उम्र में करती हैं प्यार

अलविदा दोस्त नई सुबह तक

बाज समय की कोठरी से
निकल एक दिन
किसी छोटे बच्चे की उॅंगली पकड़
ब्रह्माण्ड को इस छोर से उस छोर तक
नापते हुए चहलकदमी में
हरएक कोने में सोई उदासी को
तीखी चिकोटी से जगाते हुए
बाँस के झुरमुठों मे बदल दूँगा

कोई शिकवा या शिकायत नहीं करूँगा
न तुमसे न अपने आप से
कविताएँ लिखूँगा
कहानियों के समय में कहानियाँ
नाटक करूँगा जितना तुम कहोगे
कहोगे तो रच दूँगा
ग्रंथ के ग्रंथ या पुराण-महापुराण भी
हवा को धूप
धूप को नदी
नदी को आसमान
आसमान को हथेली भी कहोगे तो कहूँगा
अपने लिए सिर्फ़
वो पहला ख़त बचाऊँगा
जिसमें लिखा है
तुम मुझे अच्छे लगते हो

तुम्हारी प्रार्थनाएँ और मंत्र
गीतों में ढालते हुए
निकल जाऊँगा
मटर के नीले-सफ़ेद फूलों के बीच से
गुज़रते हुए भविष्य की पगडण्डियों से
रंगो की तमाम सम्भावनाएँ
छींट दूँगा तुम्हारी
बंजर घोषित ज़मीनों पर
इंकार करते हुए उन तमाम फ़ैसलों से
जिनमें कहा गया कि
हमारी संवेदनाए पुराने दिनों की बात हैं
मैं ला खड़ा करूँगा कठघरे में बतौर गवाह
उन छोटी चिड़ियों को
जिनहोंने किसी जंगल की तह में
दबा रखें हैं
नई दुनिया के सैकड़ों बीज
दस्तावेज़ के तौर पर पेश करूँगा
उन हज़ारों-लाखों प्रेम-पत्रों को
जो समय के विकटतम भागों में लिखे गए

जानता हूँ मैं
समय घात करेगा मेरे साथ
और इतिहास धोखे की भूमिका लिखते हुए
पसार देगा मेरे सामने
रास्तों की कई टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
लेकिन सबसे बचते हुए
स्याह आसमान के किसी कोने में
छुपा दूँगा धूप की कोई टुकड़ी
अन्धेरे की जेब में ही
रोशनी छुपा दूँगा चाँद की
उसकी बेख़बरी से दोस्ती गाँठते हुए
इसी तरह थोड़ी नमी
तुम्हारी आँख की किसी कोठरी में छुपाकर
सारे राज बता दूँगा
किसी फूल, किसी पेड़ या किसी नदी से
और कहूँगा तुमसे
अलविदा दोस्त नई सुबह तक

तुम्हारे होने पर 

एक टुकड़ी धूप
जो मेरे छत पर
इस कोने से उस कोने तक
अलसाई-सी पसरी है

और वो हवा का झोंका
जो अचानक
दरवाज़े से आके चुपके से
खिड़की से निकल जाता है

और कमरे में फैली
तुम्हारी देह की गंध
जो शायद तुम छोड़ गई थी

और कुछ सपने भी
जो लिपटे-चिपटे पड़े हैं
मेरे चारपाई के पाँवों से
दुबके-छुपके हैं
मेरे तकिए के नीचे

और भी बहुत कुछ
वैसा ही है
जैसा वर्षों पहले था तुम्हारे होने पर

एक लोकगीत पढ़ते हुए

चूल्हे में आग जले
जाड़े में रात रे !
आँखों में नींद पके
बटुली में भात रे !

सैंया मोरा राजा बने
मैं मैने की पाँख रे !
हँसती मैं जागूँ सोऊँ
रोए मोरी आँख रे !

मन मोरा पिसा जाय
मैं पिसू जाँत रे !
कोई तोड़े नशा मोरा
कोई तोड़े खाट रे !

सब कोई चाहे
बनूँ मन की मीत रे !
बर्तन सब ढ़ो-ढ़ो बाजे
किसी में न प्रीत रे !

काहू की जीत बनूँ
काहू की हार रे !
बिटिया मोरी मुझसे पूछे
माँ कैसी रीत रे !

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