ठाकुर की रचनाएँ

जौँ लौँ कोऊ पारखी सोँ होन नहिँ पाई भेँट

जौँ लौँ कोऊ पारखी सोँ होन नहिँ पाई भेँट

तब ही लौँ तनक गरीब सोँ सरीरा हैँ ।
पारखी सोँ भेँट होत मोल बढ़ै लाखन को

गुनन के आगर सुबुद्धि गँभीरा हैँ ।
ठाकुर कहत नहिँ निन्दो गुनवारन को

देखिबो को दीन ये सपूत सूरबीरा हैँ ।
ईश्वर के आनस तेँ होत ऎसे मानस

जे मानस सहूरवारे धूर भरे हीरा हैँ ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

बैर प्रीति करिबे की मन में न राखै सँक

बैर प्रीति करिबे की मन में न राखै सक॥

राजा राव देखि कै न छाती धक धाकरी।
आपनी उमँग की निबाहिबे की चाह जिन्हें॥

एक सों दिखात तिन्हें बाघ और बाकरी।
ठाकुर कहत मैं बिचार कै बिचार देखौ॥

यहै मरदानन की टेक बात आकरी।
गही जौन गही जौन छोरी तौन छोर दई॥

करी तौन करी बात नाकरी सो नाकरी॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

हिलि मिलि लीजिये प्रवीनन ते आठो याम

हिलि मिलि लीजिये प्रवीनन ते आठो याम

कीजिये अराम जासोँ जिय को अराम है ।
दीजिये दरस जाको देखिबे की हौँस होय

कीजिये न काम जासे नाम बदनाम है ।
ठाकुर कहत यह मन मे बिचारि देखौ

जस अपजस को करैया सब राम है ।
रूप सो रतन पाय चातुरी सो धन पाय

नाहक गँवाइबो गँवारन को काम है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

सेवक सिपाही सदा उन रजपूतन के

सेवक सिपाही सदा उन रजपूतन के

दान युद्ध वीरता मेँ नेकु जे न मुरके ।
जस के करैया हैँ मही के महिपालन के

हिय के विशुद्ध हैँ सनेही साँचे उर के ।
ठाकुर कहत हम बैरी बेवकूफन के

जालिम दमाद हैँ अदेनिया ससुर के ।
चोजन के चोजी महा मौजिन के महाराज

हम कविराज हैँ पै चाकर चतुर के ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

चारहू ओर उदै मुखचँद की चाँदनी चारु निहार ले री 

चारहू ओर उदै मुखचँद की चाँदनी चारु निहार ले री ।
बलि जो पै अधीन भयो पिय प्यारो तो एतो बिचार बिचारि ले री ।
कवि ठाकुर चूकि गयो जो गोपाल तो तैँ बिगरी को सुधार ले री ।
अब रैहै न रैहै यही समयो बहती नदी पाँव पखारि ले री ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ जो कहै तो कहा कोऊ मानत है

यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ जो कहै तो कहा कोऊ मानत है ।
सब ऊपरी धीर धरायो चहै तन रोग नहीँ पहिचानत है ।
कहि ठाकुर जाहि लगी कसिकै सु तौ वै कसकैँ उर आनत है ।
बिन आपने पाँव बिबाँई भये कोऊ पीर पराई न जानत है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

अब का समुझावती को समुझै बदनामी के बीज तो बो चुकी री

अब का समुझावती को समुझै बदनामी के बीज तो बो चुकी री ।
तब तौ इतनौ न बिचार कयो इहिँ जाल परे कहु को चुकी री ।
कहि ठाकुर या रस रीति रँगे करि प्रीति पतिब्रत खो चुकी री ।
सखि नेकी बदी जो बदी हुती भाल पै होनी हुती सु तो हो चुकी री

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

वा निरमोहिनि रूप की रासि न ऊपर के मन आनति ह्वै है

वा निरमोहिनि रूप की रासि न ऊपर के मन आनति ह्वै है ।
बारहि बार बिलोकि घरी घरी सूरति तो पहिचानति ह्वै है ।
ठाकुर या मन की परतीति है जा पै सनेह न मानति ह्वै है ।
आवत हैँ नित मेरे लिये ईतनो तो विशेषहि जानति ह्वै है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

रूप अनूप दई बिधि तोहि तो मान किये न सयानि कहावै 

रूप अनूप दई बिधि तोहि तो मान किये न सयानि कहावै ।
और सुनो यह रूप जवाहिर भाग बड़े विरलो कोई पावै ।
ठाकुर सूम के जात न कोऊ उदार सुने सब ही उठि धावै ।
दीजिये ताहि दिखाय दया करि जो चलि दूर ते देखन आवै ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैं

धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैँ ।
धनि हैँ दृग जेऊ तुम्हैँ दरसैँ परसैँ कर तेऊ बड़े धनि हैँ ।
धनि हैँ जेहि ठाकुर ग्राम बसो जँह डोली लली सो गली धनि हैँ ।
धनि हैँ धनि हैँ धनि तेरो हितू जेहि की तू धनी सो धनी धनि हैँ ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

दस बार, बीस बार, बरजि दई है जाहि 

दस बार, बीस बार, बरजि दई है जाहि,
एते पै न मानै जो तौ, जरन बरन देव।

कैसो कहा कीजै, कछू आपनो करो न होय,
जाके जैसे दिन, ताहि तैसेई भरन देव॥

‘ठाकुर कहत, मन आपनो मगन राखौ,
प्रेम निहसंक, रस रंग बिहरन देव।

बिधि के बनाए जीव जेते हैं, जहां के तहां,
खेलत फिरत, तिन्हैं खेलन फिरन देव॥

मेवा घनी बई काबुल में 

मेवा घनी बई काबुल में, बिंदराबन आनि करील लगाए
राधिका सी सुरबाम बिहाइ कै, कूबरी संग सनेह रचाए।

मेवा तजी दुरजोधन की, बिदुराइन के घर छोकल खाए।
‘ठाकुर ठाकुर की का कहौं, सदा ठाकुर बावरे होतहिं आए॥

हम एक कुराह चलीं तौ चलीं

हम एक कुराह चलीं तौ चलीं, हटकौ इन्हैं ए ना कुराह चलैं।
इहि तौ बलि आपुनौ सूझती हैं, प्रन पालिए सोई, जो पालैं पलै॥
कवि ‘ठाकुर प्रीति करी है गुपाल सों, टेर कहौं, सुनौ ऊंचे गलै।
हमैं नीकी लगी सो करी हमनै, तुम्हैं नीकी लगौ न लगौ तो भलै॥

कानन दूसरो नाम सुनै नहीं

कानन दूसरो नाम सुनै नहीं, एक ही रंग रंग्यो यह डोरो।
धोखेहु दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख काढ़ि हलाहल बोरो॥
‘ठाकुर’ चित्त की वृत्ति यही, हम कैसेहूँ टेक तजैं नहिं भोरो।
बावरी वे अँखियाँ जरि जाहिं, जो साँवरो छाँड़ि निहारत गोरो॥

वह कंज सो कोमल

वह कंज सो कोमल, अंग गुपाल को, सोऊ सबै पुनि जानति हौ।
बलि नेक रुखाई धरे कुम्हलात, इतौऊ नहीं पहिचानति हौ॥
कवि ‘ठाकुर या कर जोरि कह्यो, इतने पै मनै नहिं मानति हौ।
दृग बान ये भौंह कमान कहौ, अब कान लौं कौन पै तानति हौ॥

रोज न आइये जो मन मोहन

रोज न आइये जो मन मोहन, तौ यह नेक मतौ सुन लीजिये।
प्रान हमारे तुम्हारे अधीन, तुम्हैं बिन देखे सु कैसे कै जीजिये॥
‘ठाकुर लालन प्यारे सुनौ, बिनती इतनी पै अहो चित दीजिये।
दूसरे, तीसरे, पांचयें, आठयें तो भला आइबो कीजिये॥

सुरझी नहिं केतो उपाइ कियौ

सुरझी नहिं केतो उपाइ कियौ, उरझी हुती घूंघट खोलन पै।
अधरान पै नेक खगी ही हुती, अटकी हुती माधुरी बोलन पै॥
कवि ‘ठाकुर लोचन नासिका पै, मंडराइ रही हुती डोलन पै।
ठहरै नहिं डीठि, फिरै ठठकी, इन गोरे कपोलन गोलन पै॥

तन को तरसाइबो कौने बद्यौ 

तन को तरसाइबो कौने बद्यौ, मन तौ मिलिगो पै मिलै जल जैसो।
उनसैं अब कौन दुराव रह्यो, जिनके उर मध्य करो सुख ऐसो॥
‘ठाकुर या निरधार सुनौ, तुम्हैं कौन सुभाव परयो है अनैसो।
प्रानपियारी सुनौ चित दै, हिरदै बसि घूंघट घालिबो कैसो॥

लगी अंतर मैं, करै बाहिर को

लगी अंतर मैं, करै बाहिर को, बिन जाहिर, कोऊ ना मानतु है।
दुख औ सुख, हानि औ लाभ सबै, घर की कोऊ बाहर भानतु है॥
कवि ‘ठाकुर आपनी चातुरी सों, सबही सब भांति बखानतु है।
पर बीर, मिले बिछुरे की बिथा, मिलिकै बिछुरै सोई जानतु है॥

ठारहे घनश्याम उतै

ठारहे घनश्याम उतै, इत मैं पुनि आनि अटा चझिांकी।
जानति हौ तुमं ब्रज रीति, न प्रीति रहै कबं पल ढांकी॥
‘ठाकुर कैसें भूलत नाहिनै, ऐसी अरी वा बिलोकनि बांकी।
भावत ना छिन भौन को बैठिबो, घूंघट कौन को लाज कहां की॥

बरुनीन मैं नैन झुकैं उझकैं

बरुनीन मैं नैन झुकैं उझकैं, मनौ खंजन मीन के जाले परे।
दिन औधि के कैसे गनौं सजनी, अंगुरीनि के पोरन छाले परे॥
कवि ‘ठाकुर ऐसी कहा कहिये, निज प्रीति किये के कसाले परे।
जिन लालन चाह करी इतनी, तिन्हैं देखिबे के अब लाले परे॥

जिन लालन चाह करी इतनी

जिन लालन चाह करी इतनी, तिन्हैं देखिबे के अब लाले परे॥
अब का समुझावती को समुझै, बदनामी के बीजन ब्वै चुकी री।
इतनों बिचार करो तो सखी, यह लाज की साज तो ध्वै चुकी री॥
कवि ‘ठाकुर काम न या सबको, करि प्रीत पतीब्रत ख्वै चुकी री।
नेकी बदी जो लिखी हुती भाल में, होनी हुती सु तो ह्वै चुकी री॥

केसर सुरंग हू के रंग में रंगौगी आजु

केसर सुरंग हू के रंग में रंगौगी आजु,
और गुरु लोगन की लाज कों पहेलिवौ ।
गाइवौ-बजाइवौ जू, नाँचिवौ-नँचाइवौ जू,
रस वस ह्वैके हम सब विधि झेलिवौ ॥
’ठाकुर’ कहत बाल, होनी तौ करौंगी सब,
एक अनहोनी कहो कौन विधि ठेलिवौ ।
कर कुच पेलिवौ, गरे में भुजि मेलिवौ जू,
ऐसी होरी खेलिवौ जू, हम तौ न खेलिवौ ॥

ठाढ़ी रहो, डगो न भगो

ठाढ़ी रहो, डगो न भगो, अब देखो जो है कछु खेलत ख्यालहिं ।

गावन दै री, बजावन दै सखी, आवन दै इतैं नंद के लालहिं ॥

’ठाकुर’ हौं रँगिहौं रँग सों अंग, ओड़ि हौं बीर ! अबीर गुलालहिं ।

धूंधर में, धधकी में, धमार में, धसिहौं अरु धरि लैहौं गोपालहिं ॥

प्रात झुकाझुकी भेष छपाय कै

जौँ लौँ कोऊ पारखी सोँ होन नहिँ पाई भेँट

जौँ लौँ कोऊ पारखी सोँ होन नहिँ पाई भेँट

तब ही लौँ तनक गरीब सोँ सरीरा हैँ ।
पारखी सोँ भेँट होत मोल बढ़ै लाखन को

गुनन के आगर सुबुद्धि गँभीरा हैँ ।
ठाकुर कहत नहिँ निन्दो गुनवारन को

देखिबो को दीन ये सपूत सूरबीरा हैँ ।
ईश्वर के आनस तेँ होत ऎसे मानस

जे मानस सहूरवारे धूर भरे हीरा हैँ ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

बैर प्रीति करिबे की मन में न राखै सँक

बैर प्रीति करिबे की मन में न राखै सक॥

राजा राव देखि कै न छाती धक धाकरी।
आपनी उमँग की निबाहिबे की चाह जिन्हें॥

एक सों दिखात तिन्हें बाघ और बाकरी।
ठाकुर कहत मैं बिचार कै बिचार देखौ॥

यहै मरदानन की टेक बात आकरी।
गही जौन गही जौन छोरी तौन छोर दई॥

करी तौन करी बात नाकरी सो नाकरी॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

हिलि मिलि लीजिये प्रवीनन ते आठो याम

हिलि मिलि लीजिये प्रवीनन ते आठो याम

कीजिये अराम जासोँ जिय को अराम है ।
दीजिये दरस जाको देखिबे की हौँस होय

कीजिये न काम जासे नाम बदनाम है ।
ठाकुर कहत यह मन मे बिचारि देखौ

जस अपजस को करैया सब राम है ।
रूप सो रतन पाय चातुरी सो धन पाय

नाहक गँवाइबो गँवारन को काम है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

सेवक सिपाही सदा उन रजपूतन के

सेवक सिपाही सदा उन रजपूतन के

दान युद्ध वीरता मेँ नेकु जे न मुरके ।
जस के करैया हैँ मही के महिपालन के

हिय के विशुद्ध हैँ सनेही साँचे उर के ।
ठाकुर कहत हम बैरी बेवकूफन के

जालिम दमाद हैँ अदेनिया ससुर के ।
चोजन के चोजी महा मौजिन के महाराज

हम कविराज हैँ पै चाकर चतुर के ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

चारहू ओर उदै मुखचँद की चाँदनी चारु निहार ले री 

चारहू ओर उदै मुखचँद की चाँदनी चारु निहार ले री ।
बलि जो पै अधीन भयो पिय प्यारो तो एतो बिचार बिचारि ले री ।
कवि ठाकुर चूकि गयो जो गोपाल तो तैँ बिगरी को सुधार ले री ।
अब रैहै न रैहै यही समयो बहती नदी पाँव पखारि ले री ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ जो कहै तो कहा कोऊ मानत है

यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ जो कहै तो कहा कोऊ मानत है ।
सब ऊपरी धीर धरायो चहै तन रोग नहीँ पहिचानत है ।
कहि ठाकुर जाहि लगी कसिकै सु तौ वै कसकैँ उर आनत है ।
बिन आपने पाँव बिबाँई भये कोऊ पीर पराई न जानत है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

अब का समुझावती को समुझै बदनामी के बीज तो बो चुकी री

अब का समुझावती को समुझै बदनामी के बीज तो बो चुकी री ।
तब तौ इतनौ न बिचार कयो इहिँ जाल परे कहु को चुकी री ।
कहि ठाकुर या रस रीति रँगे करि प्रीति पतिब्रत खो चुकी री ।
सखि नेकी बदी जो बदी हुती भाल पै होनी हुती सु तो हो चुकी री

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

वा निरमोहिनि रूप की रासि न ऊपर के मन आनति ह्वै है

वा निरमोहिनि रूप की रासि न ऊपर के मन आनति ह्वै है ।
बारहि बार बिलोकि घरी घरी सूरति तो पहिचानति ह्वै है ।
ठाकुर या मन की परतीति है जा पै सनेह न मानति ह्वै है ।
आवत हैँ नित मेरे लिये ईतनो तो विशेषहि जानति ह्वै है ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

रूप अनूप दई बिधि तोहि तो मान किये न सयानि कहावै 

रूप अनूप दई बिधि तोहि तो मान किये न सयानि कहावै ।
और सुनो यह रूप जवाहिर भाग बड़े विरलो कोई पावै ।
ठाकुर सूम के जात न कोऊ उदार सुने सब ही उठि धावै ।
दीजिये ताहि दिखाय दया करि जो चलि दूर ते देखन आवै ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैं

धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैँ ।
धनि हैँ दृग जेऊ तुम्हैँ दरसैँ परसैँ कर तेऊ बड़े धनि हैँ ।
धनि हैँ जेहि ठाकुर ग्राम बसो जँह डोली लली सो गली धनि हैँ ।
धनि हैँ धनि हैँ धनि तेरो हितू जेहि की तू धनी सो धनी धनि हैँ ॥

ठाकुर का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।

दस बार, बीस बार, बरजि दई है जाहि 

दस बार, बीस बार, बरजि दई है जाहि,
एते पै न मानै जो तौ, जरन बरन देव।

कैसो कहा कीजै, कछू आपनो करो न होय,
जाके जैसे दिन, ताहि तैसेई भरन देव॥

‘ठाकुर कहत, मन आपनो मगन राखौ,
प्रेम निहसंक, रस रंग बिहरन देव।

बिधि के बनाए जीव जेते हैं, जहां के तहां,
खेलत फिरत, तिन्हैं खेलन फिरन देव॥

मेवा घनी बई काबुल में 

मेवा घनी बई काबुल में, बिंदराबन आनि करील लगाए
राधिका सी सुरबाम बिहाइ कै, कूबरी संग सनेह रचाए।

मेवा तजी दुरजोधन की, बिदुराइन के घर छोकल खाए।
‘ठाकुर ठाकुर की का कहौं, सदा ठाकुर बावरे होतहिं आए॥

हम एक कुराह चलीं तौ चलीं

हम एक कुराह चलीं तौ चलीं, हटकौ इन्हैं ए ना कुराह चलैं।
इहि तौ बलि आपुनौ सूझती हैं, प्रन पालिए सोई, जो पालैं पलै॥
कवि ‘ठाकुर प्रीति करी है गुपाल सों, टेर कहौं, सुनौ ऊंचे गलै।
हमैं नीकी लगी सो करी हमनै, तुम्हैं नीकी लगौ न लगौ तो भलै॥

कानन दूसरो नाम सुनै नहीं

कानन दूसरो नाम सुनै नहीं, एक ही रंग रंग्यो यह डोरो।
धोखेहु दूसरो नाम कढ़ै, रसना मुख काढ़ि हलाहल बोरो॥
‘ठाकुर’ चित्त की वृत्ति यही, हम कैसेहूँ टेक तजैं नहिं भोरो।
बावरी वे अँखियाँ जरि जाहिं, जो साँवरो छाँड़ि निहारत गोरो॥

वह कंज सो कोमल

वह कंज सो कोमल, अंग गुपाल को, सोऊ सबै पुनि जानति हौ।
बलि नेक रुखाई धरे कुम्हलात, इतौऊ नहीं पहिचानति हौ॥
कवि ‘ठाकुर या कर जोरि कह्यो, इतने पै मनै नहिं मानति हौ।
दृग बान ये भौंह कमान कहौ, अब कान लौं कौन पै तानति हौ॥

रोज न आइये जो मन मोहन

रोज न आइये जो मन मोहन, तौ यह नेक मतौ सुन लीजिये।
प्रान हमारे तुम्हारे अधीन, तुम्हैं बिन देखे सु कैसे कै जीजिये॥
‘ठाकुर लालन प्यारे सुनौ, बिनती इतनी पै अहो चित दीजिये।
दूसरे, तीसरे, पांचयें, आठयें तो भला आइबो कीजिये॥

सुरझी नहिं केतो उपाइ कियौ

सुरझी नहिं केतो उपाइ कियौ, उरझी हुती घूंघट खोलन पै।
अधरान पै नेक खगी ही हुती, अटकी हुती माधुरी बोलन पै॥
कवि ‘ठाकुर लोचन नासिका पै, मंडराइ रही हुती डोलन पै।
ठहरै नहिं डीठि, फिरै ठठकी, इन गोरे कपोलन गोलन पै॥

तन को तरसाइबो कौने बद्यौ 

तन को तरसाइबो कौने बद्यौ, मन तौ मिलिगो पै मिलै जल जैसो।
उनसैं अब कौन दुराव रह्यो, जिनके उर मध्य करो सुख ऐसो॥
‘ठाकुर या निरधार सुनौ, तुम्हैं कौन सुभाव परयो है अनैसो।
प्रानपियारी सुनौ चित दै, हिरदै बसि घूंघट घालिबो कैसो॥

लगी अंतर मैं, करै बाहिर को

लगी अंतर मैं, करै बाहिर को, बिन जाहिर, कोऊ ना मानतु है।
दुख औ सुख, हानि औ लाभ सबै, घर की कोऊ बाहर भानतु है॥
कवि ‘ठाकुर आपनी चातुरी सों, सबही सब भांति बखानतु है।
पर बीर, मिले बिछुरे की बिथा, मिलिकै बिछुरै सोई जानतु है॥

ठारहे घनश्याम उतै

ठारहे घनश्याम उतै, इत मैं पुनि आनि अटा चझिांकी।
जानति हौ तुमं ब्रज रीति, न प्रीति रहै कबं पल ढांकी॥
‘ठाकुर कैसें भूलत नाहिनै, ऐसी अरी वा बिलोकनि बांकी।
भावत ना छिन भौन को बैठिबो, घूंघट कौन को लाज कहां की॥

बरुनीन मैं नैन झुकैं उझकैं

बरुनीन मैं नैन झुकैं उझकैं, मनौ खंजन मीन के जाले परे।
दिन औधि के कैसे गनौं सजनी, अंगुरीनि के पोरन छाले परे॥
कवि ‘ठाकुर ऐसी कहा कहिये, निज प्रीति किये के कसाले परे।
जिन लालन चाह करी इतनी, तिन्हैं देखिबे के अब लाले परे॥

जिन लालन चाह करी इतनी

जिन लालन चाह करी इतनी, तिन्हैं देखिबे के अब लाले परे॥
अब का समुझावती को समुझै, बदनामी के बीजन ब्वै चुकी री।
इतनों बिचार करो तो सखी, यह लाज की साज तो ध्वै चुकी री॥
कवि ‘ठाकुर काम न या सबको, करि प्रीत पतीब्रत ख्वै चुकी री।
नेकी बदी जो लिखी हुती भाल में, होनी हुती सु तो ह्वै चुकी री॥

केसर सुरंग हू के रंग में रंगौगी आजु

केसर सुरंग हू के रंग में रंगौगी आजु,
और गुरु लोगन की लाज कों पहेलिवौ ।
गाइवौ-बजाइवौ जू, नाँचिवौ-नँचाइवौ जू,
रस वस ह्वैके हम सब विधि झेलिवौ ॥
’ठाकुर’ कहत बाल, होनी तौ करौंगी सब,
एक अनहोनी कहो कौन विधि ठेलिवौ ।
कर कुच पेलिवौ, गरे में भुजि मेलिवौ जू,
ऐसी होरी खेलिवौ जू, हम तौ न खेलिवौ ॥

ठाढ़ी रहो, डगो न भगो

ठाढ़ी रहो, डगो न भगो, अब देखो जो है कछु खेलत ख्यालहिं ।

गावन दै री, बजावन दै सखी, आवन दै इतैं नंद के लालहिं ॥

’ठाकुर’ हौं रँगिहौं रँग सों अंग, ओड़ि हौं बीर ! अबीर गुलालहिं ।

धूंधर में, धधकी में, धमार में, धसिहौं अरु धरि लैहौं गोपालहिं ॥

प्रात झुकाझुकी भेष छपाय कै

प्रात झुकाझुकी भेष छपाय कै, लै गगरी जल कों डगरी ती ।

जानी गई न कितेकऊ वार तें, आन जुरे, जहाँ होरी धरी ती ॥

’ठाकुर’ दौरि परे मोहिं देखत, भाग बची सु कछु सुघरी ती ।

बीर ! जो दौरि किंवार न देउँ री, तौ हुरिहारन हाथ परी ती ॥

 

 

 

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