तारादेवी पांडेय की रचनाएँ

जो कह न सकूँ मैं तुमसे

जो कह न सकूँ मैं तुमसे, उसको चित्रित कर दोगे?
ओ चित्रकार क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?
चिर वियोगिनी है आती, पथ पर मोती बरसाती।
तारों के दीप जलाती, कुछ रोती कुछ-कुछ गाती॥
उसके भीगे गालों को, तुम भी क्या देख सकोगे?
ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?

निर्जनता होवे मग में, बाला हो अस्थिर चंचल।
हो तेज़ हृदय की धड़कन, हिलता हो जिससे अंचल॥
करुणा की उस चितवन को, पद पर अंकित कर दोगे?
ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?

तारों की ज्योति मलिन हो, प्राचाी नभ उज्ज्वल तर हो।
ऊषा सिन्दूर लगाती हो प्रात मधुर सुखकर हो॥
इस शान्त दृश्य को पावन, कैसे बन्दी कर लोगे?
ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?

भोले-भाले से आँसू, तारों की होड़ लगाते।
अपनी उस उज्ज्वलता का, भी दर्शन करवा जाते॥
उसके रहस्यमय जीवन का, भेद मुझे कह दोगे?

फिर बहुत दूर पर धँधली-सी, छाया एक दिखाना।
वे प्रिय आते ही होंगे, ऐसा कुछ भाव बनाना॥
उन बड़ी-बड़ी आँखों से, आँसू भी ढलका दोगे?
ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?

बस अन्तिम दृश्य बनाना, दोनों का मिलन दिखाना।
उनकी मीठी सिसकी से, तुम कभी सिसक मत जाना॥
क्या सचमुच ऐसा सुन्दर, वह चित्र पूर्ण कर दोगे?
ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?

बिछ जाती जब नील गगन में

बिछ जाती जब नील गगन में, मेघों की चादर काली।
छिप जाती तब क्षण-भर ही में, तारों की झिलमिल जाली॥
लाली फैला जाती नभ में, दिनकर की किरणें भोली।
मानों बिखर पड़ी अंचल में, पूजा की अन्तिम रोली॥
आँसू की बूँदे गिरती जब, ले अपना संचित अनुराग।
अंकित कर जातीं कपोल पर, अपनी अन्तिम दवि के दाग॥
महायात्रा का प्रदीप भी, पल भर ही में बुझ जाता।
क्षीण ज्योति में कोई चुपके, अंतिम सुषमा कह जाता॥

याचना

खड़ी भिखारिन कब से द्वार!
माँग रही है सुखमय प्यार;
टूटा-फूटा मन का खप्पर,
हाथों में लेकर आयी।

दे दो मुझको वह अमूल्य-धन
बड़ी आस लेकर आयी,
आज बहा दो मधुमय धार;
लेने आयी केवल प्यार।

जिसे देखकर हँसे चन्द्रमा-
ऐसा प्यार न मैं लूँगी,
घटता-बढ़ता देख उसे प्रभु,
कैसे जीवन रख लूँगी।

तारों-सा झिलमिल संसार;
मुझे चाहिए ऐसा प्यार।
कहीं पहेली-सा रहस्यमय-
बना न देना जीवन-सार;

पूर्ण स्वच्छ हो और निष्कपट,
देव! हमारा भोला प्यार;
बिना प्रेम के जीवन भार,
दे दो, दे दो अपना प्यार।

तारे

नील गगन के शुचि प्रांगण में, झिलमिल क्यों करते नादान?
सुनते हो क्या थर-थर मन से, तुम मेरा संकल्प आह्वान॥
काँपा करते हो या भय से, अपने मन में, हे सुकुमार!
करलें कहीं न नभ पर किंचित्, ये आँसू अपना अधिकार॥
इधर-उधर बिखरा करते हैं, प्रिय भोले-भाले अनजान।
माँ वसुन्धरा की गोदी में, हो जाते हैं अन्तर्धान॥
तजो वृथा भय की आशंका, करो नहीं स्वच्छन्द विहार।
नहीं पहुँच पावेंगे नभ तक, मेरे ये आँसू दो-चार॥

सुनो

निर्भय रहने दो, मत छेड़ो इस वीणा के तार।
किसे सुनाओगे तुम इसकी सूनी-सी झंकार॥
उन तारों पर गाया करती हँ मैं नीरव गान।
नहीं जानती कब होगा इन गीतों का अवसान॥

बचपन की झलक

इन झिलमिल तारों की,
जो प्रथम झलक है दिखती।
बस उसी समय में केवल,
शैशव की गाथा लिखती॥
जब भव्य ज्योति शिशु शशि की,
कलियों का चुम्बन करती।
उनकी उस मुस्काहट में,
शिशुओं की हँसी चमकती॥
प्रिय इन्द्र-धनुष की तो हाँ,
मैं मधुर-मधुर छवि लखती।
अपने खोये बचपन का,
क्षण-भर दर्शन हूँ करती॥
ये छोटी-छोटी चिड़ियाँ,
उड़-उड़कर गाना गातीं।
मैं उसमें भी अपनी ही,
शैशव की तान मिलाती॥
फिर तुहिन-विन्दु शिशु कुल की,
कोमल सिसकी सुन पाती।
मुझको अपने बचपन की,
वह मीठी याद दिलाती॥
उस बाल्यकाल की स्मृतियाँ,
सुधि सी है छाई जाती।
मैं बहुत खोजने पर भी,
बस एक झलक ही पाती॥

झिलमिल दीप जला तारों के

झिलमिल दीप जला तारों के, नभ में कर दी दीवाली;
उसी ज्योति में चली ढूँढ़ने, भर के आँसू की थाली।
छाया थी मधुवन की सुन्दर, हरी दूब की हरियाली;
मुग्ध दृष्टि से निरख रहा था, मतवाला हो वनमाली।

खोज रही थी वन उपवन में, हटा-हटाकर अँधियाली;
पूछ रही थी, नीरव मन से, अरे बता दो उजियाली।
हृदय टटोला, देखा क्या, हा! वीणा थी पर तार नहीं;
मँडराया था राग, किन्तु अब, पहली-सी झनकार नहीं।

छिन्न हृदय-तंत्री को लेकर, मैं सूने पथ पर आयी;
देखा संस्मृति चितवन से तब, उदासीनता है छायी।
सूने पथ में बिचर रही हूँ, ढँढ़ रही अतीत की धूल;
उस अतीत की सुमधुर स्मृति में, काँटे भी लगते हैं फूल।

उनके’ ही चरणों में रहकर

‘उनके’ ही चरणों में रहकर उनकी ही कहलाऊँगी।
‘उनके’ प्रति जो प्रेम-भाव है उसको मैं दरसाऊँगी॥
‘उनके’ पूजन की भी विधि मैं अपने आप बनाऊँगी।
अपनी कल हृतंत्री के मैं तारों को झनकाऊँगी॥

अपने ही मन-मानस से मैं प्रेम-सलिल भर लाऊँगी।
गंगा-जमुना नीर बिना ही अर्ध्य अमोल सजाऊँगी॥
हृदय-कुंज के सुन्दर सुरभति भाव कुसुम चुन लाऊँगी।
बड़े प्रेम से ‘उन्हें’ चढ़ाकर अपना प्रेम निभाऊँगी॥

द्रव्य-भेंट के बदले तो मैं स्वयं भेंट चढ़ जाऊँगी।
इसी तरह की पूजा करके ‘उनका’ मान बढ़ाऊँगी।
अपने निर्मल मानस का मैं ‘उनको’ हंस बनाऊँगी।
भाँति-भाँति के कौतुक करके ‘उनका’ चित्त चुराऊँगी॥

उनके ही दरवाजे़ अब मैं भीख माँगने जाऊँगी।
सम्मुख जाकर उच्च स्वर से प्रेम-पुकार लगाऊँगी॥
प्रेम-अश्रु-मुक्ताओं का मैं सुन्दर हार बनाऊँगी।
भक्ति-भाव से, सरल स्नेह से ‘उनको’ ही पहनाऊँगी॥

आज अचानक

आज अचानक मुझे आ गयी, अपनी प्रिय माता की याद।
निकल पड़े मेरी आँखों से, अविरल आँसू उसके बाद॥
मानो कोई यह कहता हो, अब न मिलेगी प्यारी माता।
इसीलिए तो आज मुझे अब, और नहीं है कुछ भी भाता॥

वह होती इस समय यहाँ, तो करती मेरा बहुत दुलार।
मैं थी उसकी सुता लाड़िली, हाय लुट गया मेरा प्यार॥
मैया! जब से होश सँभाला, देख नहीं मैं पायी तुझको।
मन में उठता प्रश्न यही है, छोड़ दिया क्यों तूने मुझको॥

सुनती हूँ जब शब्द किसी के, मुख से मैं मेरी प्रिय माता।
प्यारी माता कहने को हा! मेरा भी है जी ललचाता॥
क्या अपराध किया था मैंने, त्याग दिया जो तूने मुझको।
सोच तनिक तो अपने मेन में; यही उचित क्या था माँ, तुझको॥

त्याग किया जब मेरा तूने, तनिक न आया था क्या ख्याल।
हाय, सोच क्यों लिया न मन में, होवेगा क्या इसका हाल॥
यद्यपि पितृ-पदों का मुझको, मिला यथोचित शुद्ध सनेह।
बिना मातृ ममता के वह भी, उतना नहीं मोद का गेह॥

मन में सोचो, मुझे छोड़कर, हाथ तुम्हारे क्या आया।
जननी होकर, जनकर मुझको, क्यों नाहक ही तलफाया॥
माता होती तो क्या होता, यह अभिलाषा रहती है।
मन कहता है, वृथा हाय! क्यों, इस प्रकार दुख सहती है॥

हा! हा! कितने प्यारे बच्चे, मातृ-स्नेह से वंचित होंगे।
होंगे जो अज्ञात उन्हें तो, दुख ही सारे संचित होंगे॥
जिनको होगा ज्ञान ज़रा भी, पाते क्लेश दुखी वे होंगे।
करते होंगे याद निरंतर, समझ-समझकर रोते होंगे॥

यद्यपि ‘मा’ के सुख से वंचित, और न माता का है ध्यान।
तो भी यही लालसा मन में वारूँ उस पर तन मन प्रान॥
नहीं तुम्हें मैंने देखा है, देखा चित्र तुम्हारा है।
इसी लिए तो आज बह रही, सतत स्नेह की धारा है॥

मन में उमड़े स्रोत प्रेम का, कभी न मुख से प्रकट कहे।
प्रेम उसी को कहते हैं जो, बसे दूर या निकट रहे॥
जो कुछ अनुचित बातें कह दीं, उन्हें ध्यान में मत लाना।
कभी-कभी हे अंव! स्वप्न में, अपने दर्शन दे जारा॥

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