त्रिपुरारि कुमार शर्मा की रचनाएँ

आज़ादी

जुबां तुम काट लो या फिर लगा दो होंठ पर ताले
मिरी आवाज़ पर कोई भी पहरा हो नहीं सकता
मुझे तुम बन्द कर दो तीरग़ी में या सलाख़ों में
परिन्दा सोच का लेकिन ये ठहरा हो नहीं सकता

अगर तुम फूँक कर सूरज बुझा दोगे तो सुन लो फिर
जला कर ये ज़ेह्न अपना उजाला छाँट लूँगा मैं
सियाही ख़त्म होएगी क़लम जब टूट जाएगी
तो अपने ख़ून में उँगली डुबा कर सच लिखूँगा मैं

सवाल

फ़लक पर दूर तक छाई हुई है नूर की चादर
ज़मीं पर सुब्ह उतरी है कि जैसे मिट गए सब ग़म
सुना है जश्न आज़ादी का हम सबको मनाना है
मगर एक बात तुमसे पूछता हूँ ऐ मिरे हमदम

जहाँ पे जिस्म हो आज़ाद लेकिन रूह क़ैदी हो
तो क्या ऐसी रिहाई को रिहाई कह सकोगी तुम
जहाँ पे बात हो आज़ाद लेकिन सोच क़ैदी हो
तो क्या ऐसी ख़ुदाई को ख़ुदाई कह सकोगी तुम

चलो माना कि रोशन हैं सभी राहें तरक़्क़ी की
मगर तारीक गलियों में अभी कुछ लोग जीते हैं
ये ऐसे लोग हैं जिनसे हमारी भूख मिटती है
हमारे वास्ते ये लोग यानी ज़ह्र पीते हैं

अगर ये ना रहें तो ज़िन्दगी की नीव हिल जाए
इन्हीं के दम से दुनिया के हर एक घर में उजाला है
कभी फ़ुर्सत मिले तो देखना तारीक गलियों में
कि बस इनके घरों की रोशनी का मुँह काला है

ये मुमकिन है मिरी बातें तुम्हें नाशाद कर देंगी
मगर इनके लिए आख़िर यहाँ पर कौन सोचेगा
अगर आला तुम्हीं हो और अव्वल भी तुम्हीं हो तो
कहो ना तुम कि तुम से आज बेहतर कौन सोचेगा

ये मत समझो कि शायर हूँ तो मेरा काम है रोना
मुझे भी ख़ूब भाता है सितारों से भरा दामन
मिरी आँखों मे आकर तितलियाँ आराम करती हैं
सुकूँ मिलता है जब देखूँ नज़ारों से भरा दामन

नई सड़कें सजी गलियाँ शहर के बीच फ्लाईओवर
ज़मीं से उठ रही बिल्डिंग हवा में तैरती खिड़की
ये मंज़र ख़ूबसूरत है बहुत ही ख़ूबसूरत है
हवा की सब्ज़ आँखों में धनक सी बोलती लड़की

फ़िज़ाओं में अजब हलचल मचाता अब्र का टुकड़ा
मुझे डर है ये सूरज टूट कर नीचे न आ जाए
बहार आई अगर अब के तो बाग़ों के परिन्दों पर
ग़लत क्या है कि ख़ुशबू का नशा सौ बार छा जाए

कहीं जुगनू किसी पेड़ों के बाज़ू में चमक उट्ठे
महकती चाँदनी शाख़ों को छू ले तो बुरा क्या है
अगर इस रात की आगोश में दिल भी बहक जाए
कली कोई कहीं वादी में चटके तो बुरा क्या है

ये सब बातें मुझे भी शाद करती हैं मगर हमदम
मैं जब भी देखता हूँ बाँझ खेतों को तो रोता हूँ
उदासी से भरी आँखों से कैसे मोड़ लूँ आँखें
झुलस जाते हैं ज़िन्दा फूल तो दामन भिगोता हूँ

तुम्हीं बोलो कि ऐसे में आज़ादी क्या मनाऊँ मैं
अगर ये रस्म है तो फिर मुआफ़ी माँगता हूँ मैं
अगर फ़रमान है तो फिर कभी मुझसे न होगा ये
किसे कहते हैं आज़ादी यक़ीनन जानता हूँ मैं

ख़ुदकशी

उस आख़िरी लम्हे का मुंतज़िर हूँ मैं
जिस घड़ी सूख-सी जायेगी
सफ़ेद साँस की आख़िरी बूँद भी
और रूह किसी परिंदे की मानिंद
जा बैठेगी दूसरे दरख़्त पर
एक टूटे हुए शाख़ की तरह
कुछ दिनों में गल जायेगा जिस्म
या किसी ग़रीब के घर
चुल्हे में चमकती चिंगारी बनकर
तैयार करेगा एक ऐसी रोटी
जिसका एक टुकड़ा खाकर
बूढ़ा बाप खेत जायेगा चाँद गुमते ही
बदन पर कड़ी धूप मलने को
कहते हैं – ‘धूप से विटामिन डी मिलती है’।

रोटी का दूसरा टुकड़ा
माँ ख़ुद नहीं टोंग कर
अपने बेटे के पेट की शोभा बढ़ायेगी
क्योंकि उसे स्कूल जाना है
क्योंकि उसे स्कूल का मध्यान भोजन पसंद नहीं
क्योंकि उसे खिचड़ी के साथ मेंढ़क,
गिरगिट या कंकड़ खाना अच्छा नहीं लगता।

एक उम्र से चुपचाप लड़की
टुकूर-टुकूर देखती है रोटी का टुकड़ा
और ये सोच कर नहीं छूती है उसे
क्योंकि वह एक लड़की है
क्योंकि उसका भाई स्कूल से लौटते ही खाना मांगेगा
क्योंकि उसके बाप को,
खेत से लौट कर खाने की आदत है
क्योंकि वह सोचती है –
उसके दिल की तरह भट्ठी फिर सुलगेगी।

रात, बिस्तर में जाने से पहले
दरार पड़े होंठों की प्यास,
पेट की भूख पर हावी हो जाती है
उतर-सी आती हैं दबे पाँव
सैकड़ों सुइयाँ नसों के भीतर
जिसकी चुभन,
न सिर्फ़ लड़की की माँ
बल्कि बाप को भी महसूस होती है
सिर्फ़ अपने दर्द की तस्सली के लिए
दोनों कहते हैं – ‘दुल्हन ही दहेज है’।

कुछ महीनों तक
यूँ ही चलता है सिलसिला
एक रोज़ अंदर के पन्नों में
चिल्लाती है अख़बार की सुर्ख़ी
‘कुएँ में कूदकर लड़की ने की ख़ुदकुशी’
अख़बार का एक कोना
दिखाई देता है लहू में तर
फटे हुए कपड़े, नुची हुई चमड़ी
दबी ज़बान कहती है – ‘रेप हुआ था’।

पुलिस नहीं आयेगी दोबारा
इतना तो यक़ीन था सबको
क्योंकि पैसों ने पाँव रोक रखे हैं
क्योंकि लड़की ग़रीब की बेटी है
क्योंकि इससे टीआरपी में कोई फ़र्क़ नहीं आयेगा
मुमकिन है – हादसा फिर हो, होगा
कहते हैं – ‘इतिहास ख़ुद को दोहराता है’।

बचपन

नंगी सड़क के किनारे
भूख से झुलसा हुआ बचपन
प्यास की पनाह में
प्लास्टिक चुनता है जब
कोई देखता तक नहीं
मगर वहीं कहीं
पीठ पर परिवार का बोझ उठाये
रोटी को तरसती जवानी
हथेली खोल देती है
तो अनगिनत आँखें
छाती के उभार से टकरा कर
हँसी के होठ को छूती है
क्या यही भविष्य है भारत का ?
क्या यही फैसला है कुदरत का ?
कि उतार कर जिस्म का छिलका
नमक के नाद में रख दो
और रूह जब कच्ची-सी लगे
तो भून कर उसे
खा लो – चाय या कॉफी के साथ
महसूस हो अधूरा-सा
जब ज़िन्दगी पीते समय
या उजाला गले से ना उतरे
तो चाँद को ‘फ्राई’ कर लो
और चबाओ चने की तरह
ये हक़ किसने दिया ?
यूँ ही पिसने दिया ?
खुशी को चक्कियों के बीच
नसीब का नाम देकर
ताकि बढ़ता ही रहे
अंधेरों का अधिकार क्षेत्र
और देश की जगह
एक ऐसी मशीन हो
जिसे मर्ज़ी के अनुसार
स्टार्ट और बन्द किया जा सके
तड़प रहा है धूप का टूकड़ा
बहुत बेबस हैं बेजुबान कमरे
खिड़की का ख़ौफ बरसता है
बचपन ज़िन्दगी को तरसता है
नंगी सड़क के किनारे
भूख से झुलसा हुआ बचपन।

हिन्दुस्तान की हालत 

एक चीख सुनाई देती है
हिन्दुस्तान के हाथों में मेरी सोच का गला है
गले से साँस लटकती है ‘पेंडुलम’ की तरह
आवाज़ की चमक बढ़ सी गई है
लहू के साथ-साथ बहती है गरीबी
इस तरह गिरा हूँ चाँद से नीचे
केले के छिलके पर जैसे पाँव आ जाये
देखा है जब कभी आसमान की तरफ
गीली-सी धूप छन कर पलकों पे रह गई
जिस्म छिल गया सूखा-सा अंधेरा
और आँखों से रूह छलक आई
हवाओं ने ओढ़ ली आतंक की चादर
अपनी ही गोद में बैठी है दिशाएँ
पाला है आज तक जिस मटमैली मिट्टी ने
क्षितिज के उपर बिखरी पड़ी है
सारे सन्नाटे वाचाल हो गये हैं
कट गये शायद जवान इच्छाओं के
आहटें कह्ती हैं आज़ाद हूँ
चुभते हैं बार-बार नाखून बन्दिशों के
पेड़ भी अब तो खाने लगे हैं फल
और नदी अपना पीने लगी है जल
कमजोर हो गई है यादाश्त समय की
लम्हों का गुच्छा पक-सा गया है
कुछ परतें हटाता हूँ जब उम्र से अपनी
तो भीग जाती है उम्मीद की बूँदें
कभी तो सुबह छ्पेगी रात की स्याही से
जैसे दिन की सतह पर शाम उगती है

औरत

समय और समाज के बीच
एक औरत की तरह, औरत
स्याही की धूप में जलती हुई-सी
अब भी बाहर है क़लम की क़ैद से
समय की चादर बुन रही है फिर
गले से गुज़रता है साँसों का क़ाफ़िला
सितारे दफ़्न हो गये कदमों की कब्र में
आँखों से आह की बूँद नहीं आई
बिखर से गये हैं सोच के टुकड़े
क्षितिज के गालों पर हल्की-सी मुस्कान
बीमार होता है जब कोई अक्षर
सूखने लगती है पलों की पंखुड़ियाँ
बाढ़-सी आती है उम्र की नदी में
अंधेरा उठता है चाँद को छूने
चुपचाप देखती है मटमैली मिट्टी
कभी तमाशा, कभी तमाशाई बन कर
जब बदली गई ‘बेडशीट’ की तरह
और छपती रही काग़ज़ों के लब पर
सोचता रहा सदियों तक कमरा
टूटा हुआ कोई साज़ हो जैसे
चुटकी भर उजाला बादलों ने फेंका
खुलता गया सारा जोड़ जिस्म का
रूह सीने से झाँकने लगी
गीली हो चली धूप भी मानो
और जीवन को मिल गया मानी
सन्नाटों के सारे होठ जग उठे
शर्म से सिमट गई चाँदनी सारी
बोल पड़ा सूरज अचानक से
समय और समाज के बीच
एक औरत की तरह, औरत

बेबस ज़िंदगी

.ज़मीन और जिस्म के बीच सुगबुगाता आदमी
जैसे फूट रही हो बाँस की कोपलें
छू ली मैंने बहती हुई रात
कितनी सर्द, कितनी बेदर्द
करने लगी मज़ाक अपने आप से गरीबी
कितनी रातों से नहीं सोती है नींद मेरी
भीग गये अब तो आँसू भी रोते-रोते
एक सदी का सा एहसास देता है पल
घाव-सा कुछ है सितारों के बदन पर
आँखं छिल जायेंगी देखोगे अगर चाँद
काट दिये किसने पर हवाओं के
बिल्ली के पंजों में आ गया बादल
आज फिर मुसलाधार बरसा है लहू
पानी का रंग लाल है सारे नालों में
एकत्र करता हूँ बोतल में काली धूप
मुट्ठी से फिसल जाती है ज़िन्दगी मेरी
देख रहा है उदास काँच का टूकड़ा
आज भी टेढ़ी है उस कुतिया की दुम
मचलती जाती है नदी मेरी बाहों में
कितना मटमैला है शाम का क्षितिज
टूट गया कोई हरा पत्ता डायरी से
वर्षों से खाली पड़ा है एक कमरा
चूम लेती है मुझे तस्वीर बाबूजी की
याद का कोहरा घना है बहुत
वह जो मिला था पॉकेटमार था शायद
चॉकलेट नहीं है अब जेब में मेरी
हर एक पल बढ़ती रही भूख बच्चों की
उबलता रहा सम्बन्ध का सागर
खो गई जाने कहाँ दूध-सी मुस्कान
पिछले साल माँ ने मेरी स्वेटर पर
उकेरा था एक नदी और एक चिड़िया
नदी में डूब कर मर गई वह चिड़िया
और बन्द हो गया आदमी का सुगबुगाना

क्षितिज के उस पार

देखता हूँ ‘क्षितिज के उस पार’ जा कर
कहीं सफ़ेद अँधेरा
कहीं स्याह उजाला
खो दिया है दर्द ने एहसास अपना
करीबी इतनी कि
देख तक नहीं सकते
कोयला सुलग रहा है
अंगीठी जल रही है बदन में
भुने हुए अक्षर
काग़ज़ पर गिरते हैं जब
तो ‘छन्’ से आवाज़ आती है
गले में अटक जाता है
साँस का टुकड़ा
मेरी पलकें नोचता है कोई
फिर देखती है नंगी आँखें
‘एक छिली हुई रूह’
बिल्कुल चाँद की तरह
सोचता हूँ सन्नाटा बुझा दूँ
बहने लगती है उंगलियाँ
बिखरने लगता है वजूद
सोच पिघलती है धुआं बनकर
सहसा सूख जाती है नींद की ज़मीन
रात की दीवार में दरार हो जैसे
फ्रेम खाली है अब तक
मुस्कराहट बाँझ हो गई
कुछ हर्फ़-सा नहीं मिलता
बहुत उदास हैं टूटे हुए नुक्ते
समय के माथे पर ज़ख्म-सा क्या है ?
जमने लगी है चोट की परत
चीखते हैं मुरझाये हुए मौसम
अभी बाकी है सम्बन्ध कोई
अब तो दिन रात यही करता हूँ
क्षितिज से जब भी लहू रिसता है
देखता हूँ ‘क्षितिज के उस पार’ जा कर।

जीवन का अर्थ 

‘जीवन’
जिसका अर्थ
मैं जानता नहीं
मुझे जीना चाहता है।

‘मृत्यु’
जिसका अर्थ
मैंने बाबूजी से पूछा था
जाने कहाँ चले गये
बिना उत्तर दिये
शायद खेतों की ओर
नहीं, स्कूल गये होंगे
आज सात साल, तीन महीना
और बीसवाँ दिन भी बीत गया
लौट कर नहीं आये
क्या मृत्यु इसी को कहते हैं ?
हाँ, उत्तर अगर हाँ है
तो मैं जीना चाहूँगा इसे।

क्योंकि –
माँ ने आकाश से रस्सी बाँध दी है
आ गया बसंत
बसंत आ गया
सामने हवाओं का झूला है
गाँव में सज रहा मेला है
पीली बर्फ जम गई खेतों पर
हरी आग लग गई जंगल में
दृश्यों में सिमट गई दृष्टि
समय थक गया
नब्ज़ें रूक गई रफ़्तार की
लेकिन मैं बढ़ता रहा
आँधियाँ विश्राम करने लगीं
किनारे पर पहुचने से पहले
नाव ऊंघने लगी
धरती ने ठीक से पाँव छुए भी नहीं
और चलने लगी धरती।

परिवर्तन,
कुछ तो परिवर्तन हुआ
माँ ने भीगी हथेलियों से
स्पर्श किया गालों को, जगा दिया
फिर दिखाया मुझे मेरा ‘लक्ष्य’
कल रात स्वप्न में
तोड़ कर मुट्ठी भर आकाश
और कुछ अधखिले सितारे
जेब में रख गये बाबूजी
वो आकाश वो सितारे
अब भी हैं मेरी जेब में
अब भी है याद ‘लक्ष्य’
झरना चढ़ने लगा पहाड़ पर।

परिवर्तन,
कुछ तो परिवर्तन हुआ
जीवन सोचता है जिसे
क्या वही मैं हूँ
जीवन चाहता है जिसे
क्या वही मैं हूँ
जीवन माँगता है जिसे
क्या वही मैं हूँ
मैं भी सोचने लगा हूँ जीवन को
मैं भी चाहने लगा हूँ जीवन को
मैं भी माँगने लगा हूँ जीवन को।

‘जीवन’
जिसका अर्थ
मैं जानता नहीं
मुझे जीना चाहता है।

सम्बंध 

झुलस रहा है मेरे जिस्म का कोना-कोना
रूह को आग लग गई जैसे
कुछ दिनों से दिन-रात मेरी आंखों में
कोई तकलीफ बह रह रही है धीरे-धीरे
सारे सम्बन्ध पक रहे हैं अभी
मुझको इतनी-सी फ़िक्र रहती है
अलग न हो जाए हर्फ़ से कोई नुक्ता
ख़त लिफाफे में गर रहे तो अच्छा है …

अलविदा

प्यार से चूम कर मेरा माथा
‘अलविदा’ माँ ने कह दिया मुझको
तोड़ कर सारे अश्क पलकों से
अपनी आंखों में उसने दफ़न किया
नज़र भी तोड़नी पड़ी हमको
जैसे पत्ते हवा से टूटते हैं
इतनी तेज़ आई उस रोज़ आंधी
कुछ साँस उखड़ गए दरख़्तों की तरह
वक़्त की रफ़्तार बढ़ गई शायद
या फिर मेरे क़दम कमजोर से हुए
मैंने कई बार ‘counting’ भी की
हर एक हिस्सा जिस्म का मौजूद नहीं था
फ़लक के बदन पर सितारे भी यूँ दिखे
जैसे पितामह भीष्म सोयें हो तीर पर
जैसे हज़ारों ज़ख़्म एक साथ जल उठे
एक बड़ा-सा ज़ख़्म जो सूख चुका था
जम गई मानो चाँद की पपड़ी
मैंने धीरे से उसको सहलाया
ख़ून ही ख़ून था चारों तरफ़

किस क़दर गुज़री रात मत पूछो
कैसे बताऊँ दिन कैसे बसर हुआ
‘माँ तुम्हारी याद आती है’

विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन

बहुत उदास है विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन
कोई वादा मुकर गया है फिर
क़रीबे-मर्ग सा लगता है इंतज़ार मेरा
उम्मीद की आँखों में अब काजल कहाँ
एक आरज़ू जो पलकों से ‘पिन-अप’ कर दी थी
झुलस गई है कई रंगों में तक़सीम होकर
मेरे सामने लटका हुआ आकाश का टुकड़ा
हवा की सुखी हुई सतह पर तैर रहा है
मेरे चारसू फैली हुई दरख़्त की शाखें
मेरी सिम्त बढ़ रही हैं जकड़ लेने को
सुनहरी साँस भी सहमी-सी खड़ी है
सदियों से मुंतज़िर है ये जिस्म अकेला
बेचैन है रूह की सतरंगी परतें
तमन्ना टूट न जाये कहीं डर है मुझे
जान अटकी है लबों पर, आओ न…

गे (Gay)

छुपा कर ख़ुद को रात की नज़रों से मैं
अपनी छत पर चला जाता हूँ
फिर बुलाता हूँ चाँद को इशारों से
उसकी आहट से माहौल महक उठता है
वह आते ही गालों पे बोसा करता है
और मैं नाज़ुक-सी पलकें चूमता हूँ
फिर जोर से जकड़ता है अपनी बाँहों में
और सुलाता है अपने सीने पर
कभी वह मुझको ओढ़ लेता है
कभी मैंने भी बनाया है बिछौना उसका
सारी रात हम सोते हैं न जागते हैं
धुंधले ख्वाबों के पीछे भागते हैं
हमारे दरमियान क्या रिश्ता है पता ही नहीं
मगर आपस में प्यार बहुत करते हैं
इंतज़ार बस रहता है शाम कब होगी
सहर होते ही तकलीफ उसे भी होती है

हमारे रिश्ते का कोई नाम नहीं शक्ल नहीं
लोग कहते हैं ‘गे’ हैं दोनों…

बंज़र चाँद 

मेरी उम्र तीन साल तक
हॉस्टल की दीवारों से बातें करती रही
छतों को चूमते थे आंसू
सिसकी आज भी दफन है बगीचे में
अंधेरों ने कई बार दबोचा है मुझे
बहुत नुकीले थे शिक्षकों के शब्द
अक्सर जिस्म ज़ख्मी हुआ
अक्सर रूह घायल हुई
बचपन चुप्पी को सहलाता रहा
और चुप्पी मुझे समझाती…

एक उम्मीद थी बस
जो बदन में साँस लेती रही
बादलों से जब चाँद निकलता था
जैसे लिफाफा कोई ख़त उगलता था
आसमान से आती थी गावं की खुशबू
मेरी दोनों स्थिर आँखें
बड़े गौर से छूती थी
चाँद में उभरता हुआ ‘माँ’ का चेहरा

अब दिल्ली में रहता हूँ
चाँद तो दिख जाता है
मगर ‘माँ’ नहीं दिखती
लगता है- कम हो गई मेरी सोच की “frequency”
या फिर ‘चाँद बंज़र’ हो गया।

कुछ भी नहीं लिखा

बहुत दिनों से कुछ भी नहीं लिखा मैंने
तुम्हारी याद की बाहों में सोया रहता हूँ
बुझी-बुझी-सी लगती है आस की आँखें
बेदर्द-सा दिखता है ये बदला मौसम
तमाम तमन्नाओं के चेहरे चुप हैं
बिखर गई है एक आह होठ से गिर कर
मेरे कमरे के कोने में अब भी रोज़ाना
साँस लेती है तेरी एक अधुरी करवट
स्याह रात के जंगल में प्यास नंगी है
मेरी छिली हुई छाती पे गर नज़र फेरो
तुम्हारे नर्म-से तलवों का लम्स ज़िन्दा है
आज भी ज़ीस्त से कहती है अज़ल बेचारी
अपनी रूह की रफ़्तार ज़रा कम कर दो
मेरी उम्मीद का ‘शौहर’ उदास है कब से
मुझे डर है कि कहीं खुदकशी न कर बैठे
किसी अश्क के दरिया में हसरतों का हुज़ूम
तुम अगर मानो तो अपनी गुज़ारिश कह दूँ
पाँव रखते हुए पलकों पे नींद से गुज़रो
बाल से तोड़ कर एक ख्वाब मुझे महका दो
सूने आँगन में सज जायेंगी बज़्में कितनी
दिल की दहलीज पर उग आयेंगी नज़्में कितनी
क़लम की बात सुनो लफ़्ज़ सही कहते हैं
तुम्हारी याद की बाहों में सोया रहता हूँ
बहुत दिनों से कुछ भी नहीं लिखा मैंने

सिगरेट और सूरज

धूप जब आँखों में चुभती है
पलकों पर रौशनी की राख लिए
अपनी ही तपिश से झुलसा हुआ सूरज
सर झुकाए
मेरी सिगरेट की डिबिया से पनाह मांगता है

सिगरेट सोचती है
अगर सूरज की सिफारिश करुँ
तो खतरा है एक
कहीं सुलग न उठूँ मैं
कहीं ख़त्म न हो जाए वजूद मेरा

अचानक बहुत तेज़
शाम बरसने लगती है
और भीगता सूरज
अपनी माँद में लौट जाता है

लकीरें

बहुत नाराज़ हैं नाज़ुक-सी ये रंगीन लकीरें
न तो आग़ाज़ है इनका नही अंज़ाम है कोई
ये यतीम भी नहीं हैं और न नाम है कोई
कितनी खुशरंग, खुबसूरत, खुशबूदार-सी हैं
जिन हाथों ने इनको प्यार से पैदा किया है
वो अंगुलियाँ इस बात से अंजान होंगी
हज़ारों शक्ल-सी इनमें उभरती-डूबती हैं
कुछ माज़ी, कुछ हाल, कुछ मुस्तक़बिल
जैसे बहता रहता है वक़्त का दरिया
किसी अफ़साने के दरीचे की मानिंद
उस टूटते-बिखरते हुए लम्हे की जानिब
जिसे मालूम है दर्द-ओ-अलम अपना
कहाँ जाए वो लेकर सारा ग़म अपना
उसकी आह का दुनिया में कोई तर्जुमा नहीं
ज़रा ग़ौर से देखो तो सारी चीखती हैं
बहुत नाराज़ हैं नाज़ुक-सी ये रंगीन लकीरें

सुएसाइड नोट

बदन बेताब है सूखे हुए पत्तों की तरह
तेरी लौ जो मिल जाए तो जल ही उठे
सूखने लगे हैं उंगलियों के लब
हाथों के चेहरे उदास रहते हैं
सर पटक रही हैं बाहें बार-बार
मिलो तो होठ पर गर्म-सा बोसा रख दूँ
लम्हे तड़प रहे हैं माज़ी की गोद में
बिस्तर भी रुखड़ा-सा नज़र आता है
तेरी बाहें नसीब होंगी जब
मैं डूब कर सुएसाइड कर लूँगा

दुआ

घर से निकला तो माँ ने मुझसे कहा-
जाओ, जाते हो मगर
बात इतनी ज़हन से चिपका लो
जब कभी तुम फलक से गुज़रो तो
संभल के चलना और कुछ भी मत छूना
चाँद-तारों की वादी आएगी
लगा जो पाँव का ठोकर तो टूट जायेंगे
बड़े नुकीले हैं ये चुभ भी सकते हैं
और जब धूप जाग जाए तभी सफर करना
कि धूप में ही बसर करते हैं ठंडे साये
अब कहाँ छाँव है मिलने वाली
खुदा करे की महफूज़ रहो हर ग़म से
मेरी दुआएं तेरे साथ है बेटा…

आरूषि

जब सुबह हुई एक रोज़ टेलीविजन में
स्क्रीन से रिसने लगा लहू
ख़बर गर्म थी लेकिन जिस्म ठंडा था
आरुषि का क़त्ल हो गया
मिट्टी फिर मिट्टी हुई पर रूह कहाँ है?

तुम किसी रात उसकी गर्दन पर
साँस के बीज बो गए थे कभी
काश! इक बार जो आकर इसे देखा होता
कि कितना बड़ा हुआ ये दरख़्त
न कोई फूल न फल ही आया था अभी
सिर्फ़ पत्ते ही आंखों में रहा करते थे
और फैली थी जड़ें पूरे सीने में

कितनी बेरहमी से कल रात किसी ने उसकी
रेत डाला है सारी साँसों को
आरुषि का क़त्ल हो गया
भटकती रूह ने मेरी नज़्म में पनाह ली है!

पानी के घाव 

बहुत उदास है पानी भी आज मेरी तरह
उम्र-ए-बारह में उसका बाप मर गया जैसे
किस तरह ठहरा हुआ है नदी की बाहों में
जैसे छाती पे पति रख कर, विधवा रोए
न कोई आहट, न हलचल, न शोर ही कोई
आँख मूँदी हुई-सी, होंठ भी सूखे-सूखे
अपने हाथों से अपने चेहरे को छुपाए हुए
कभी हैरान-सा और कभी लजाए हुए
कैसे बैठा है चुपचाप सिमट कर ख़ुद में
जैसे ज़िराफ की गोदी में छोटा-सा बच्चा
सिसक रहा है तब से, जब से आया हूँ
उसके माथे पे परेशानी के छींटे हैं कई
टपक रही है सूरज की साँस क़तरों में
कुछ देर में निकलेगा जब चाँद गुफ़ा से
और आसमां के बदन पर ‘कोढ’ उभरेगा
और पानी में बनेंगे फिर धब्बे कितने
मैं बैठा सोच रहा हूँ गुमसुम
घाव कैसे भरेंगे पानी के ?

बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में

तुम्हारा भारत-
एक डंडे की नोक पर फड़फड़ाता हुआ तीन रंगों का चिथड़ा है
जो किसी दिन अपने ही पहिए के नीचे आकर
तोड़ देगा अपना दम
तुम्हारे दम भरने से पहले।
मेरा भारत-
चेतना की वह जागृत अवस्था है
जिसे किसी भी चीज़ (शरीर) की परवाह नहीं
जो अनंत है, असीम है
और बह रही है निरंतर।

तुम्हारा भारत-
सफ़ेद काग़ज़ के टुकड़े पर
महज कुछ लकीरों का समन्वय है
जो एक दूसरे के ऊपर से गुज़रती हुईं
आपस में ही उलझ कर मर जाएँगी एक दिन।
मेरा भारत-
एक स्वर विहीन स्वर है
एक आकार विहीन आकार है
जो सिमटा हुआ है ख़ुद में
और फैला हुआ है सारे अस्तित्व पर।

तुम्हारा भारत-
सरहदों में सिमटा हुआ ज़मीन का एक टुकड़ा है
जिसे तुम ‘माँ’ शब्द की आड़ में छुपाते रहे
और करते रहे बलात्कार हर एक लम्हा
लाँघकर निर्लज्जता की सारी सीमाओं को।
मेरा भारत-
शर्म के साए में पलती हुई एक युवती है
जो सुहागरात में उठा देती है अपना घुँघट
प्रेमी की आगोश में बुनती है एक समंदर
एक नए जीवन को जन्म देने के लिए।

तुम्हारा भारत-
राजनेताओं और तथा-कथित धर्म के ठेकेदारों
दोनों की मिली-जुली साज़िश है
जो टूटकर बिखर जाएगी किसी दिन
अपने ही तिलिस्म के बोझ से दब कर।
मेरा भारत-
कई मोतियों के बीच से गुज़रता हुआ
माला की शक्ल में वह धागा है
जो मोतियों के बग़ैर भी अपना वजूद रखता है।
बहुत फ़र्क है तुम्हारे और मेरे भारत में!

भगत सिंह के लिए 

भगत सिंह!
कुछ सिरफिरे-से लोग तुमको याद करते हैं
जिनकी सोच की शिराओं में तुम लहू बनकर बहते हो
जिनकी साँसों की सफ़ेद सतह पर
वक़्त-बेवक़्त तुम्हारे ‘ख़याल की बिजली’ कौंध जाती है
मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ भगत!
जो तुम्हारी जन्मतिथि पर,
‘इंक़लाब-इंक़लाब’ चिल्लाते हैं और आँखों में
सफ़ेद और गेरुआ रंगों की साज़िश का ज़हर रखते हैं
जिसकी हर बूँद में
अफ़ीम की एक पूरी दुनिया होती है
जिसके नशे में गुम है आज सारा भारत
बड़े तूफ़ान की आशंका लगती है!
मैं उनकी बात कर रहा हूँ भगत!
जो समझते हैं कि तुम्हारी ज़रूरत आज भी उतनी ही है
जितनी उस वक़्त थी
(मुझे लगता है कि हर शख़्स में एक भगत सिंह होता है)
तुम्हारे और मेरे वक़्त में बहुत फ़र्क आया है ‘भगत’
तुम ज़मीन में बंदूक बोते थे
बारूद की फसल तो हम भी काटते हैं
मगर हमारे उद्देश्य बदल गए हैं
तुम्हारा उद्देश्य दूसरों से ख़ुद को बचाना था
हमारा उद्देश्य दूसरों को ख़ुद से मिटाना है!
काश! कि यह बात हम सब समझ पाते
और अपने भीतर के भगत सिंह को जगाते!

आज जबकि

आज जबकि ज़िंदगी बिखरी हुई है
आज जबकि धड़कनें उखड़ी हुई हैं
आज जबकि रोशनी सिमटी हुई है
आज जबकि चाँदनी सहमी हुई है
आज जबकि आँख में जाले पड़े हैं
आज जबकि जीभ में छाले पड़े हैं
आज जबकि साँस में शीशे चुभे हैं
आज जबकि होंठ भी सूजे हुए हैं
आज जबकि एक भी दूजे हुए हैं
आज जबकि रूह भी हैरान-सी है
आज जबकि तू भी परेशान-सी है
आज जबकि देह में तकलीफ-सी है
कुछ समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हैं
देश के हालात कुछ ‘अनबन’ हुए हैं
दोस्तों की शक्ल में दुश्मन हुए हैं
हर किसी को चाहिए कि अपने भीतर
नींद में धुँधले हुए ख़्वाबों से उठकर
एक ज़रा-सा अपने दिल के अंदर झाँके
और अपने ‘भगत’ को आवाज़ दे ले!

कानून की देवी

‘कानून अंधा होता है’
पुराना हो चुका है यह जुमला
अब तो कानून की देवी ख़ुद
सफ़ेदपोश लोगों के शयन कक्ष में
बिस्तर के सिलवटों की गवाह बनती है।
(बदन से ‘लेडी डायना’ की बू आती है)

देश के हालात

तुम देश के हालात से वाकिफ तो होगे
हर तरफ एक शोर-सा बरपा हुआ है
कुछ लोग अपनी टोपियों में आँख भर कर
चाहते हैं कि नज़ारा ही बदल जाए अभी
कुछ कान में भर कर घंटियों की सदा
सोचते हैं कोई आ के बचाएगा उन्हें
कुछ हाथ में ले कर बस एक किताब
बोलते हैं कि ‘सवा लाख’ के बराबर हूँ
कुछ शक्ल अपनी सलीब की सूरत बना कर
कहते हैं कि उनके जैसा यहाँ कोई नहीं
हर तरफ एक शोर-सा बरपा हुआ है
तुम देश के हालात से वाकिफ तो होगे

तुम्हारी याद भी अब इस तरह से आती है

तुम्हारी याद भी अब इस तरह से आती है
जैसे शहर की गलियों में भटक जाए कोई
जैसे खो जाती थीं मेरी उंगलियाँ अक्सर
तुम्हारे बदन के बाग़ों में ‘वॉक’ करते हुए
जैसे रह जाए कोई नाव इस किनारे पर
और हो जाए कोई पार तैर कर दरिया
जैसे ठहरी हुई हवा के आस पास कहीं
कोई रूह मचल जाए बदन पाने को
जैसे होंठ पर पड़ जाए नीला धब्बा
जैसे चाँद में छुप जाए काली सूरत
गीली सोच में पड़ जाए सीलन जैसे
जैसे साँस चटक जाए पत्थर की तरह
जैसे आवाज़ में चूभ जाए काँटा कोई
जैसे चीखने लगें नाम के ‘अक्षर’
जैसे चुपचाप सड़क पर कभी चलते हुए
कहीं दिख जाए कोई चेहरा जाना-जाना-सा
जब उदास भी रहने लगे ख़िड़की अक्सर
और कमरा महीनों से जब न बात करे
मुँह फेर ले सोते हुए बिस्तर भी जब
आँख में आता हुआ ख़्वाब भी जब डर जाए
न अंधेरा, न उजाला, न कोई मौसम हो
ज़िंदगी भी न रहे और न मौत-मातम हो
ऐसे हालात में ‘तुम’ बोलो क्या करे कोई

तबीयत

ठीक नहीं है तबीयत मेरी इन दिनों
यह कहा है डॉक्टर ने मुझे
खाना कम खाओ
अधिक ग़म खाओ
सुबह, सूरज की एक बूँद
आधा गिलास पानी के साथ
और रात को सोते समय
चम्मच भर चाँदनी, बिना पानी के
अगर हो सके तो
एक मुट्ठी छाँव की
थोड़ी-सी मिट्टी गाँव की
मिला के करना मालिश
सूख गये हैं कुछ पेड़ आम के
चिड़ियों का चहकना नीलाम हुआ क्या?
बिक गई क्या बच्चों की मुस्कुराहट भी?
एक नया अनाथालय जन्मा फिर
फिर जवान हो गया वृद्धाआश्रम
किसी का पेट भरा हो या भूखा
कोई प्लेटफॉर्म पर सोये या पार्क में
उसे क्या मतलब?
कोई गरीब है, परेशान है
कहीं माथे पर सिन्दूर नहीं
किसी के घर में तन्दूर नहीं
वह क्यों पूछने जाए?
क्या है तुम्हारा दुख?
वह जिसे जानता नहीं
अंधेरा खेलता है साथ उसके
एक खेल है पतंग-सा
जब चूमता है कोई आकाश को
वह दाँतों से काटता है साँस को
सर पटकती है सूखी इच्छाएँ
ओस से बुझती है प्यास अनुभव की
धीमी आँच पर आँखें पिघलती है
करवटें लेता है स्वप्न-सा कुछ
देखता हूँ तब भी, अब भी देखता हूँ
अब भी लाल है लहू
बदन में दफ़्न है सिहरन
पानी अब भी गीला है
गगन ही रास्ता था तब
तलवे घायल हैं, तारा चुभा शायद
चाँद था कि जली रोटी थी माँ के हाथ में
मेरे होठों पर था खून का धब्बा
फेर लिया गीला तौलिया यूँ ही
टेबल पर पड़ी है बाबूजी की चिट्ठी
अगर समय होता अवश्य पढ़ता
क्यों सोचने लगा हूँ ऐसी बातों को
ऐसी बातें क्यों मुझे सोचती है
कोई मरता है तो मरे
कोई रोता है तो रोए
मुझे क्या?
मैं तो डॉक्टर की सलाह मानूँगा
बीतते हुए पलों से जीवन छानूँगा
ठीक नहीं है तबीयत मेरी इन दिनों
यह कहा है डॉक्टर ने मुझे।

गुवाहाटी के गले से चीख निकली है 

गुवाहाटी के गले से चीख निकली है
चीख, जिसमें दर्द है, घुटन भी है
चीख, जिसमें रेंगती चुभन भी है
चीख, जिसमें सर्द-सी जलन भी है
चीख, जिसमें लड़की का बदन भी है

उस चीख के सन्नाटे में महसूस करता हूँ
कि मोहल्ले की सभी लड़कियाँ असुरक्षित हैं
बोझ से झुक रहा है मेरा माथा
माथे से काले धुएँ का एक ‘सोता’ फूट पड़ा है

मैं शर्मिंदा हूँ अपने कानों पर
मुझे झूठे लगते हैं उस मुँह से निकले हुए शब्द
जो कहते हैं कि हमने
कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक और कबीर को जन्म दिया है

मुझे इस धरती पर यक़ीन नहीं आता
(कि जिसपर मेरे पाँव अब भी जमे हैं)
जो सोना उगलने की बात करती है
मैं भतीजे को कभी ये क़िस्सा नहीं सुनाऊँगा
कि सिकंदर भारत से क्यों लौट गया था

मेरी पुतलियों पर ‘गर्भ में मरी बच्ची’ का चेहरा उभरता है
पीली पड़ती जाती है सिसकती हुई एक काली कोख
मैं अपनी साँस छिड़क रहा हूँ अंधी आग में
और कुछ गीदड़ मेरी बरौनियों पर नाच रहे हैं

मैंने अपनी बहन से कहा है
हो सके तो मेरे सामने मत आना कुछ रोज़
छोटा भाई, घर के सारे आईने फेंक रहा है
माँ ने मेरे बालों में तेल डालने से इंकार कर दिया है
मैं नहीं सोच पाता हूँ
कि बाबूजी होते तो क्या कहते/करते इस वक़्त!

अनाथ-सी आवाज़

मैं जब भी तुमसे बात करना चाहता हूँ
देर तक देखता रहता हूँ ख़लाओं में कहीं
एक अनाथ-सी आवाज़ आह भरती है
अपनी आँख में तब बात बोया करता हूँ
मेरे ख़याल के खेतों में ओस गिरती है
सफ़ेद बर्फ़-सी जम जाती है पुतली पर
लहूलुहान नज़र आती है ज़ुबान मेरी
मगर पुकार में कोई शिकन नहीं मिलती
बस उम्मीद की छाती पर छाले उगते हैं
अभी तो फ़ासलों के फ़र्श पर लेटा हुआ हूँ
साँस लेती हुई हर सोच सिहर उठती है
मेरे दिमाग़ में कुछ दर्द-सा दम भरता है
बदन में बहता हुआ लाल लहू ज़िंदा है
जाने क्या सोचकर किस बात से शर्मिंदा है
मेरी पलकों ने तुम्हें जब भी चूमना चाहा
मैंने फ़ासलों की हर फसल जलाई है
जैसे होली से पहले जलाए रात कोई
जैसे होंठ में दफ़नाई जाए बात कोई
जैसे प्यास में पोशीदा हो बरसात कोई
जैसे ख़्वाब के खेतों में मुलाक़ात कोई
जैसे नीलाम-सी हो जाए नीली ज़ात कोई
जैसे जीत में जम्हाई ले-ले मात कोई
सिवाय इसके मुझे कुछ भी नहीं कहना है
तुम्हारी आँख के आँचल के तले रहना है

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रक्खूँगा

तुम धमनियों में धीमा लहू बन जाना
मैं टूटी धड़कनों को सीने में चिपकाऊँगा

तुम आँख के आँगन में छुपा लेना मुझे
मैं अपनी उम्र सारी खेलकर गुज़ारूँगा

पीली धूप से जब तुम पकाओगी मौसम
लम्हा तोड़कर मैं लम्बा छाता बुन लूँगा

सूखी बारिश से जब टूटेगा प्यासा पानी
तुम्हारे होंठ के बारे में फिर से सोचूँगा

गीली रेत में जिस तरह बूँद बसती है
तुम्हारे जिस्म में अपना वजूद खोजूँगा

तुम साँस के सिक्के उछालती रहना
मैं गले का गुल्लक सम्भाले रखूँगा

दिल्ली के दिल में दरार 

जबसे दिल्ली के दिल में दरार देखी है
मेरे गले के गुलदान में रखी हुई
साँस की सफ़ेद कलियाँ सूखने लगी हैं
गुलाब की पंखुड़ियों से लहू की बू आ रही है
किसी ‘पथार’ की तरह टूटने लगी है आवाज़
पपनियों के पोरों पर स्याह बर्फ़ जम गई है
नसों में उड़ते घोड़ों के पंख पिघल गए हैं
रह-रहकर सिहर उठता है उदासी का सिरा
वक़्त की मटमैली और बंज़र धड़कनों में
मैं एक बार फिर बात के बीज बोने लगता हूँ।

देह की दीवार पर शर्म के धब्बे धधक रहे हैं
खौलता हुआ ज़ेहन आज फिर शर्मिंदा है
अपनी ही तरह के नैन-नक़्श वाले लोगों पर
(उन्हें ‘अपना’ कहते हुए मेरे होंठ झुलस गए हैं)
आख़िर क्यों जब खिलता है ख़्वाब का कोई फूल
तो जुनून की जाँघों में अंधी जलन होती है
आख़िर क्यों ‘रोलर’ चलाकर रौंदा जाता है
किसी मासूम की छलकती हुई छाती को
आख़िर क्यों चाँद की चमकदार झिल्लियाँ
बीमार और पीली पुतलियों में ‘कार्बेट’ से पकाई जाती हैं।

बवंडर बनकर उठते हैं जब सवाल
आसमान में तैरने लगती हैं मछलियाँ
हवा हथेलियों पर बिखेर जाती है सिहरन
एक जानवर आदमी को देखकर मुस्काता है
झाग बनाने से इंकार कर देता है समंदर
आग की आहटें बचती हैं बासी अँधेरों के बीच
कोई कान पर काँपता हुआ सन्नाटा उड़ेलता है
बाँग देने लगते हैं दुनिया के तमाम मुर्गे
एक चूहा कुतर जाता है सुबह की नींद
उजली कोख की काली क़िस्मत बाँझ होना चाहती है।

बहन की आँखों में चुप्पियों का जाला है
और माथे पर शक की कई शिकनें हैं
महीनों हो गए हैं साथ खाना खाए हुए
बहुत दिनों से घर नहीं लौटा है भाई
(वह जानता है कि तूफ़ान जल्द आएगा,
अगर दिमाग़ से कूड़ा नहीं निकल जाता)
माँ की रूह घुट गई यह कहते हुए—
समस्या की जड़ों तक कोई भी नहीं जाता
इतना तो मुझे मालूम है कि
बाबूजी दवा से ज़्यादा, सर्जरी में यक़ीन रखते थे।

वाल ऑफ़ डेमोक्रेसी

जब इंडिया गेट के माथे पर मोमबत्तियाँ जलती हैं
तो उसकी सुगंध में सनक उठता है ‘जंतर-मंतर’
‘सज़ा’ के झुलसे हुए उदास होंठों पर
एक चीख़ चिपक जाती है काले जादू की तरह
लोग कहते हैं ‘समय’ को सिगरेट की आदत है
मैं तलाशने लगता हूँ अपनी बेआवाज़ पुकार
जो गुम गई है एक लड़की की मरी हुई आँखों में
लड़की, जो अब ज़िंदा है महज शब्दों के बीच…।

भेड़िए अब भीड़ का हिस्सा बन चुके हैं
यह रंगों की साज़िश के सिवा भी बहुत कुछ है
जो अंत में उभरता है सिर्फ़ स्याह बनकर
मदद करने से पहले घंटों सोचने वाले लोग
घंटों खड़ा होने से नहीं हिचकिचाते हैं
एक चिड़ियाघरनुमा भवन के सामने
जहाँ मैंने गीदड़ों के अलावा किसी को नहीं देखा
(क्योंकि अपनी आँखों पर आरोप नहीं उड़ेल सकता)
मैं ख़ुद को पागल घोषित करने पर मज़बूर हूँ।

दिमाग़ की नसों में तैरती हैं दादीमाँ की बातें
दादीमाँ कहती थी—
‘सितारे बन जाते हैं लोग मरने के बाद’
कुछ सोचकर अपने बदन पर मलने लगता हूँ
एक काँपती हुई गुहार की राख
(जो सितारों की राख की तरह रंगहीन है)
सम्वेदनाएँ हाथी की पूँछ पर जा बैठी हैं
और हाथी के सिर से जूएँ निकाल रहा है एक बंदर
एक लोमड़ी कहती है—
‘हमारे पुर्वजों ने खट्टे अंगूर की प्रजातियाँ नष्ट कर दी है।’

भारत के चेहरे पर अब भी हैं चकत्तों के दाग़
भले दिल्ली अपनी छाती का कोढ छुपा ले
बयानबाजी का ‘ब्लू पीरियड’ अभी गुज़रा नहीं है
‘वाल ऑफ़ डेमोक्रेसी’ पर कोई लिख गया है—
‘कुत्ते की दुम में पटाखों की लड़ी बाँधना मना है’
मुझे शक होता है उँगलियों की भाषा पर
हैरान हूँ साँस के उमड़ते हुए सैलाब को देखकर
उम्मीदों को शर्म की नदी में डूब मरना चाहिए
यह जानते हुए कि एक ‘डेड प्लेनेट’ है चाँद
लोग अब भी आसमान की ओर ताक रहे हैं।

Share