त्रिभवन कौल की रचनाएँ

बेचारा आम आदमी

गाँधी जी के तीन बंदर
तीनो मेरे अन्दर
कुलबुलाते हैं
बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो
पर देखता हूँ, सुनता हूँ, कहता हूँI क्यों?
क्यूंकि मैं एक आम आदमी हूँ
स्वतंत्र होते हुए भी मैं पराधीन हूँ
एक दुस्वप्न सा जीवन जीने को मजबूर हूँ
हर रोज, नयी भोर के संग नयी आस का घूँट पीता हूँ
कल अच्छा नहीं था, आज अच्छा होना चाहिए
यह सोच कर ही तो जीता हूँ I

मंहगाई की मार, घोटालों की धमक
गिरते मूल्यों के बीच नोटों की चमक
रोष भरपूर है पर दोष किसे दूँ
आम आदमी हूँ, मन की किसे कहूँ
महाभारत सी बन गयी है मेरी जिंदगी
एक चक्रव्यूह में फँस कर रह गयी है मेरी जिंदगी I

दुर्योधन, दुशासन, शकुनि सरीखे
मोंकों की तलाश में हमेशा रहते हैं
धृतराष्ट्र और भीष्म जैसों के मुँह पर
हमेशा की तरह ताले पड़े रहते हैं I

आज भी अभिमन्यु जैसे नौजवान
चक्रव्ह्यु न भेदने का बोझ ढ़ो रहें हैं
रोज कहीं न कहीं द्रोपदिओं के चीर हरण हो रहे हैं
तब एक द्रोपदी के पीछे मचा था महाभारत
आज आंखे खोले ही सब के सब महारथी सो रहे हैंI

आज के इस भारत में
महाभारत के पात्र सब उपस्थित हैं
पर कृष्ण नदारद हैं
हजारों अर्जुनों के हाथ गांडीव तो है
पर उन्हें एक नयी गीता की अपेक्षा है
इसी आस में आम आदमी
जीता है बस जीता है.
गाँधी जी के तीन बंदरों की तरह II

मन

मन
कभी चंचल, कभी स्थिर
कल्पनाजनित भ्रमजाल उत्पन करता
आशा,निराशा,अपेक्षाओं और व्याकुलताओं का
मायाजाल बुनता हुआ, कभी
सत्य को मिथ्या और मिथ्या को सत्य में
परिवर्तित करता
यह मन
युद्धरत है निरंतर
विजय पाने को
दुष्टता और बुराई पर
मन
दौड़ लगाता है
अच्छाई और भलाई की
सीमा रेखा छूने को
एक कछुए की तरह
खरगोश रुपी दुश्विचारों को मात दे कर
मन
पथ डूंड लेता है अंतर्मन में झाँक कर
सब पाप कर्मो का बहिष्कार कर
अन्तःत विजयी होता है एक दृढ निश्चयी
मनI

यह कमाल की जिंदगी

यह जिंदगी भी कमाल की जिंदगी है!
खुद ही अपने जीवन से त्रस्त है
हर दूसरी जिंदगी , जो
काम, क्रोध, लोभ, मोह से ग्रस्त है
कहीं व्यभिचार तो कहीं दुराचार
कहीं भ्रष्टाचार तो कहीं अनाचार
किसी न किसी’ चार’ का यहाँ बोलबाला है
जिंदगी सब कुछ सहती है
न जाने क्यूँ उसके मुँह पर ताला है I

यह जिंदगी भी कमाल की जिंदगी है!
ज़्यादातर किस्मत की मोहताज रहती है
मंजिल पाने की ललक न हो
तो भटकाने की ताक़ में रहती है
राह सीधी मिले तो किस्मत का नाम होता है
न मिले तो बेचारा सिक्का बदनाम होता हैI

यह जिंदगी भी कमाल की जिंदगी है!
मेहनत मजदूरी का ज्यादा मोल नहीं यहाँ
सच का मुखौटा पहन, झूठ का राज यहाँ
चीर हरण होते हैं सरे आम सडकों पर
चंद चांदी के सिक्के, और, बिके सैंकड़ों ईमान यहाँ I

विड़ंबना यह कि समय से पहले, जिंदगी
मौत को दावत नहीं दे सकती
जो देख रही है ,घटते हुए
‘ चलता है’ के नाम पर
सुख से सो भी नहीं सकती I

चलो इस कमाल कि जिंदगी को
बेमिसाल बना दें
दुल्हन के समान सजा कर
इसको संवार दें.
‘अपना भला ज़रूरी है’
यह सोंच बदल दें
नासूर बन गए ज़ख्मो पर
मरहम जो लगा दें
सच का आदर करें
‘इज्ज़त’ को मान दें
नफरत की आग जब भड़के तो
एक प्यार कि जोत जला दें I

फिर मौत भी जिंदगी को
हंसकर यूँ गले लगाएगी
आत्मा भी पुन:जन्म पाने को
ललकित हो जाएगी I

हर जिंदगी तब बनेगी
कमाल से बेमिसाल
हर जिंदगी की होगी फिर
दास्ताँ बेमिसालI

एक महानगर

पेड़ों के झुण्ड, खम्बों की कतारें
सीमेंटेड सड़क,बेशुमार कारें
ठिठुरते बदन, थिरकते होंठ
जोर का ठहाका,भूख की दौड़

झूमते मदहोश, अधनंगे बदन
सीने से चिपकाए, खोखले स्तन
स्टार कल्चर, ज़िंदगी को आंके
कूड़े के ढेर, चंद निराश आँखें

गगनचुम्भी इमारतें, रंगीन मुलाकातें
झोपड़ पट्टी की खुली खुली रांतें
आकाश -धरती के मिलन में बाधक
जीव और जंतु के मिलेगें ग्राहक

क्लब, सिनेमा, काफी हाउस
सब को रिझाये मिकी माउस
त्रस्त व्यस्त जनता, मौत का डेरा
बेकारी, हड़ताल, दंगों का घेरा

राजनीतिक दांव पेच, धोखा मक्कारी
वादों में उलझी जनता बेचारी
उग्र अलगाव, आतंकवाद
अनगिनित घटनाएं,रखे कौन याद?

आभासी दुनिया, मोबाइल के झोल
भेड़िये के शरीर पर मेमने का खोल
सच्चाई से अधिक झूठों के तराने
राज करें जनता पर छोटे बड़े घराने

यह एक महानगर है, यहाँ शाइस्ता* कोई नहीं
इंसान सभी, इंसानियत सी अनुकूलता कोई नहीं
फिर भी यह एक महानगर है बहुत बड़ा शहर
आती है दुनिया देखने, चारों ओर से चारों पहर

व्यथा, अन्धकार की

रात्रि का अन्धकार
मूक, बधिर, उपेक्षित
जीवन के आधारभूत मूल्यों को टटोलता
इंसानो के अंतर्मन को समझने के कोशिश करता
आँखे फाड़े, गहन वेदना के साथ
सन्नाटे को साथ लिए
करता है फ़रियाद, विधाता से,
“कि रात्रि के आँचल में क्यूँ रखा उसका वास?
क्यूँ खामोशी उसकी प्रकृति को आयी रास?
क्यूँ अमानवीय कर्मो का घटित होना
नहीं होता उसको भास?
क्यूँ रात्रि उसकी सहभागी बन
झेलती है इतना त्रास?
फलते-फूलते षड्यंत्रों का वह
चश्मदीद गवाह
अपने ही घर में
आस्तीन के सांपों को पालता
वीभत्स, निंदनीय,घृणित क्रियाओं का
सी सी टी वी के समान
अपने अंतरात्मा पर चित्रित करता
थक गया हूँ, हे भाग्यविधाता
कब समाप्त होगा यह संताप
कब मुक्ति मिलेगी इस त्रासदी से
अन्धकार को रात्रि से, रात्रि को अन्धकार से”
शायद कभी नहीं
नियति निश्चित है
अन्धकार और रात्रि
सहगामी हैं,पूरक हैं, हमसफ़र हैं
चिरकाल तक, सम्पूर्ण प्रलय तकI

स्वयंनाशी

शिव तांडव का रूप नया यह
प्राकृतिक आपदा का स्वरूप नया यह
तबाही का मंज़र, कुदरती कहर है
मानवी भूलों का प्रतिशोध नया यह

मोसमी बारिश भला ऐसी रोद्र कहाँ थी?
बाढ़ भूस्खलन जैसी त्रासदी कहाँ थी?
मृतकों की संख्या हताहतों से जब अधिक हो
केदारनाथ, गौरीकुंड की ऐसी दास्ताँ कहाँ थी?

खंजर सीने में खुद भोंक चुके हैं
जंगलों को कंक्रीट बना चुके हैं
भू-ताप वृद्धि के कारण भी हम हैं
इस ताप में अब झुलस चुके हैं

व्यापारिक कारण जब प्रधान हो जाएँ
अतिक्रमणों का सामान हो जाये
पर्यावरण की जब करते हम हत्या
इसके श्राप से कैसे बच पायें?

ईश्वर को अब दोष क्या देना
जो बोया है वही काटना
संभलो संभालो अब भी समय है
दशक उपरांत यह तो तय है,

बलिवेदी पर तब देश यह होगा
माँ प्रकर्ति का आरोप यह होगा
जिसको जनम दिया था मैंने
उसका ही संहार किया है
अब मुझसे क्या आशा रखते
खुद तुमने अपना नाश किया है
खुद तुमने अपना नाश किया हैI

प्यार

प्यार न वासना है न तृष्णा है
न है किसी चाहत का नाम
प्यार एक कशिश है
भावनाओं का महल है
जिसमे
एहसास की इटें हों
विश्वास की नीव हो
संवेदना का गारा हो
गरिमा का जाला हो
तब प्यार की बेल
आकाश को छूती
पनपती है
यही सृजन है
और
सृजन
सृष्टि का जन्मदाता हैI

नया युग, नयी औरत 

क्रोध भरी नज़रों से न देखो मुझे
दोष का भागीदार न बनाओ मुझे
तुमने प्यार को समझा, सौदा या क़रार
भावनाहीन व्यक्ति को कभी हुआ है प्यार

तुम शरीर के कायल, मैं प्रेम की मस्तानी
तुम दुष्शासन के प्रतीक, मैं कृष्ण की दीवानी
तुम्हे है पसंद अँधेरा, मुझे चाहिए प्रकाश
कभी तो मेरी कसौटी पर खरे उतरते, काश!

औरत कभी बाजारू नहीं, न वस्तु, ना ही बिकाऊ
मर्दों की इजाद यह सब, जब आये ना वह काबू
माँ, बेटी, पत्नी फिर माँ, जीवन आधार; ज्ञान होना चाहिए
शक्ति के हैं स्वरूप यह सब, ज्ञात होना चाहिए.

प्यार सबमे में निहित है, अलग अलग अंदाज़ है
यह हैं तो है जीवन और संसार का यह साज़ है
औरत को कभी भी कम तुम नहीं आँकना
भविष्य है, रहेगा हमी से, अतीत में न झाँकनाI

नया युग, नयी औरत 

क्रोध भरी नज़रों से न देखो मुझे
दोष का भागीदार न बनाओ मुझे
तुमने प्यार को समझा, सौदा या क़रार
भावनाहीन व्यक्ति को कभी हुआ है प्यार

तुम शरीर के कायल, मैं प्रेम की मस्तानी
तुम दुष्शासन के प्रतीक, मैं कृष्ण की दीवानी
तुम्हे है पसंद अँधेरा, मुझे चाहिए प्रकाश
कभी तो मेरी कसौटी पर खरे उतरते, काश!

औरत कभी बाजारू नहीं, न वस्तु, ना ही बिकाऊ
मर्दों की इजाद यह सब, जब आये ना वह काबू
माँ, बेटी, पत्नी फिर माँ, जीवन आधार; ज्ञान होना चाहिए
शक्ति के हैं स्वरूप यह सब, ज्ञात होना चाहिए.

प्यार सबमे में निहित है, अलग अलग अंदाज़ है
यह हैं तो है जीवन और संसार का यह साज़ है
औरत को कभी भी कम तुम नहीं आँकना
भविष्य है, रहेगा हमी से, अतीत में न झाँकनाI

कबाड़ीवाला 

कबाड़ीवाला का आगमन
मुझे सोचने पर मजबूर करता है
बेकार की कुछ वस्तुओं को जब
घर के बाहर का रास्ता दिखाया जाता है
और एक प्रश्नचिन्ह छोड़ जाता है
मंथन करने को
काम, क्रोध, लोभ और मोह
मेरे दिलो- दिमांग रुपी घर में बसा कबाड़
बाहर क्यों नहीं निकाल सकता
कब मैं खुद कबाड़ीवाला बन गया
मझे पता ही न चला

म्येन कशीर

मेरा कश्मीर, मेरा कश्मीर
था जो कभी स्वर्ग की तस्वीर
मेरा कश्मीर, मेरा कश्मीर
चेहरा
शांत और सौम्य
होंठ
मुस्कुराते
ऑंखें
अपलक
सैलानियों का आवागमन
निहारे
स्वागत करने को तत्पर
निशात, शालीमार
बाँहें पसारे
अपने में समेटने को तैयार
नगीन जैसी झीलें
डल के शिकारे
चिनार, बादाम, सेब के पेड़
केसर के बाग़
कड़म का साग
“हाको- हाक”
“येखो- यख’‘ की आवाज़
उस मस्ती के आलम में
संतूर का साज़
तैरते खेत
स्थिर हौऊसबोट

बहती जेहलम पर
नावों की दौड़
सफ़ेद बर्फ की परत दर परत
गगनचुम्भी चोटियों पर
कुदरती हरियाली पर
बेमिसाल गरत
शंकरचार्या, पर्वत, गणपतयार, खीरभवानी
और बेमिसाल ऋषियों की अमर वाणी
चरारे- शरीफ
खान: खा:
बरबस निकलता था
वाह बस वाह

यह था ताज
मेरे भारत का ताज
आज भी है
पर नहीं भी है
जो कभी था अब नहीं है
कहाँ गया मेरा कश्मीर?
म्येन कशीर- म्येन कशीर?
कहाँ गए
वह बर्फीले हरे चेहरों को नापते
सेलानियों की खोजती आँखें
निमंत्रण देते वह होंठ
गले लगाने को आतुर
फैली हुई बाँहें
क्या रहा शेष, अब?
हाय! क्या रहा शेष?
बेजान घाटी का
एक ऐसा शरीर
जिसके दिमाग, दिल, गुर्दे का
कर दिया हो
प्रत्यारोपण
किसी अज्ञात सर्जन द्वारा
लहूलुहान चेहरा
कटे फटे होंठ
वीरान आँखें
अधकटी बाँहें
रक्त से लथ पथ
बेबस
कोमा में गए
उस इंसान की तरह
जो जागता है फिर सोता है
या फिर स्थिर आँखों से निहारता है
ऑपरेशन टेबल पर हमारा पलायन
सत्य से
कश्मीरियत के तत्व से
हाय मेरा कश्मीर!
म्येन कशीर
कोई तो दे मुझे
म्येन कशीर मेरा कश्मीर!

खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में
गुरुओं के द्वार पर, गीता कुरान में
मंदिर की घंटियों में, मस्जिद अज़ान में
जा जा के जिसे ढूंडा जीज़स के मकान में
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

मिला न तू मुझे पंडित की दुकान में
ऊंचे पर्वतों स्थित तीर्थ स्थान में
फूलों से भी पूछा भौरों की जुबान में
बाज़ार में मिला न, ना ही शमशान में
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

झुलसाता रहा मैं ज़िस्म को रेगिस्तान में
शायद मिले तू कहीं किसी नखलिस्तान में
तम्मना थी मेरी बस, तुझसे जा मिलूँ
रात दिन एक किये अंधी तूफ़ान मैं
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

झोपड़ियाँ छान मारी, छान मारे बंगले
दर दर भटकता रहा, साधुओं का संग ले
ना मिला मुझे कहीं, ज़मीन आसमान में
जंगल में ना पाया, ना मूर्ति चटान में
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

पता लगा मुझे तेरा, जब होश मैं खोने लगा
पास था मेरे हमेशा, ज्ञान यह होने लगा
इंसान का ही रूप धर, इंसानियत में बसा है तू
तू करम, प्यार, सेवा में, आभास यह होने लगा
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण में

करना क्षमा तू जो भी है, पहचान सका न मैं तुझे
मांगता हूँ बस यही कि एक जन्म और दे
खोजता रहा जिसे मैं सारे संसार में
रहा हमेशा मेरे संग आचार में विचार में
खोजता रहा जिसे मैं, वेदों पुराण मेंI

गाँधी का भारत 

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो इन्सान आता है
इंसानियत से गहरा नाता है
औरों का खून बहा कर भी
इंसान ही तो कहलाता है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो नेता आता है
जनता को उल्लू बनाता है
पांच बरस तक राज करे
फिर हाथ जोड़ मिमयाता है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो धर्मी आता है
धरम धरम चिल्लाता है
शांतिपरस्त जनता को
उकसा कर उन्हें लडाता है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो सिपाही आता है
क़ानून का रक्षक कहलाता है
मोका मिलते ही पर वह
तुरंत भक्षक बन जाता है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो धरती रोती है
अपने ज़ख्मो को धोती है
दागा बदन इन्सां ने इतना
हरियाली मौत को रोती है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो माँ-बाप आते हैं
लड़के की खैर मनाते हैं
लड़की से नफरत इतनी है
भ्रूण हत्या करवाते है

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैन

वह देखो रिश्वतखोर आते हैं
स्विस बैंक में भारी खाते हैं
देश भक्ति का प्रचार करें
देश को घुन बन खाते हैं

गाँधी तेरे भारत में, सब नेता चुराएँ नैन
तेरी नीतियाँ ताक पर, भोगे सुख औ चैनI

कश्मीर- मेरे बचपन की तस्वीर

आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे
मल्लाहों का नाव खेना, रस्सियों के सहारे
कर और मुठ लेना बर्बूज़ के पास जाके
डुबकी लगाना, मंदिर के किनारे
आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे

जाके अमीराकदल नावों की दौड़ देखना
ऊँगली पकड़ नानी की, पर्वत पर पूजा करना
शंकराचार्य की पहाड़ी पर दौड़ के फिर चढ़ना
तारक हलवाई के यंहा न्दुरमुन्ज खाना
बहूर कदल जाके मछलियों को लाना
आती है याद हमको कश्मीर की वह बहारें
आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे

डूंगों में बैठ, हम सब का तुलमुल को जाना
पूजा अर्चना कर देवी राग्यना को मानना
धमाल मचाना और लूचियाँ भी खाना
सिनेमा की तरह देखता हूँ बीते हुए फ़साने
आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे

पानी की सोटी और दूध की रोटी
कहवे के साथ तख्ठची मोटी
हाक- बत का था जवाब नहीं
खान्दर के जैसा कोई साल नहीं
दूर चले गए जो नज़दीक थे हमारे
आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे

जील डल के सीने पर फिसलते शिकारे
निशात, शालीमार की वह जन्नती सैर
रिश पीर की दरघाह पर, मांगे सब खैर
ज़ाफ़रानी खुशबु, दिलकश आबशारे
भूले न भुलाये वह स्वर्ग के नज़ारे
आँखों में तेरते हैं बचपन के वह नज़ारे

कहाँ तक बयां करे, समझ नहीं आता
जो रह जाते स्वर्ग में ईश्वर, तेरा क्या जाता?
शायद नियति यही की दुनिया में फ़ैल जांए
सारी दुनिया में फैल कर अपना डंका बजाये
श्राप है या है दुआ इस में, मैं नहीं जानता
सुलझेगा एक दिन मसला कश्मीर का
कश्मीरियत से ही यह मैं हूँ मानताI

मेरी गौरैया

मेरी गौरैया बच कर रहियो
यहाँ दरिन्दे आम हैं
ना उनके बेटी ना उनकी बहना
उनका संगी’ काम है

पहन मखोटे तरह तरह के
सब को यह भरमाये हैं
मानवी रिश्तों का मोल नहीं
राक्षसों के यहाँ से आयें हैं

मानसिकता है गिरी हुई
चेतना शुन्य लोग यहाँ
बचके रहना ओ री गौरैया
नोचने को तत्पर यहाँ

इन गिद्दों से बच कर रहना
आकाश में मंडराते हैं
देखी जहाँ अकेली गौरैया
झपटा मार ले जाते हैं

छतरी के नीचे कब तक रखूँ मैं
आखिर बाहर निकलना है
लड़ना मरना सीख ले गौरैया
अब तो यही तेरा गहना है

एक गौरैया निर्भय भी थी
जागृत कर, विलीन हो गई
मशाल बन तुम, जलते रहना
जो अपना अस्तित्व बचाना है

दोहे

इक चाँद बहुत दूर है, इक है हमरे पास
इक बदली में है घिरा, इक है बहुत उदास

इक सावन है वेदना, इक है हर्ष विकास
विरह अगन कोई जली, कोई प्रियतम पास

इक सौंदर्य दिखावटी, इक का भीतर वास
इक क्षणभंगुर होत है, अरु इक फले कपास

इक बंदा बहु ख़ास है, इक का जीवन आम
इक है बस शाने ख़ुदा, इक ले हरि का नाम

धरती के दो रूप हैं, इक माँ इक संसार
इक प्यारी ममतामयी,इक पोषण आधार

मीरा का समर्पण इक, इक राधा का प्यार
क्यों ना हों संपूर्ण जब, कृष्ण भये आधार

मोरी चुनरिया

मैली घनी मोरी चुनरिया
कित जावूं धोवन चुनरिया
जा पनघट पे जा जा बैठी
मैला जल, मैली गगरिया (१)

ज्ञान की प्यासी दर दर भटकी
सत्संगों में जा जा अटकी
मिलन वासे कोउ न करावे
बस होरी खेलें फोड़े मटकी (२)

पनघट का जल दूषित भयो रे
फिसलन से डर लगयो रे
डूबन लागूं कौन उबारे
आस्था मोरी छिन्न भिन्न भयो रे (३)

भटकाव मन का है बेकार
आड़म्बर से भरा संसार
खुद के भीतर जो झांकी मैं
मिलन वासे, हुआ विचार (४)

चुनरिया मोरी मस्त भयो री
वा के रंग मेँ अब रंगयो री
मैं राधा ना मीरा बन पायी
उनके सरीखा सुख पायो री (५)

आवाह्न

कल का भविष्य तुम्हारा बच्चो, अंतहीन आकाश में
छू सको तो छू लो सीमा, अपने जीवन के प्रकाश में
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

यह देश तुम्हारा, धरा तुम्हारी, संसार तुम्हारा हो जायेगा
प्यार के बीज का रोपण कर दो, नाम तुम्हारा हो जायेगा
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

बन कर दिखलाना है तुमको, भारत के ऐसे लाल
भूलें हम न भूलें दुनिया, बीतें सदियाँ सालों साल
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

इस देश के शत्रु बहुतेरे, अंदर के और बाहर के
खदेड् दो सजग रहो, तुम बालक वीर भूमि के
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

कला विज्ञानं वाणिज्य के, बनो तुम कर्णधार
नवयुग का निर्माण करो भारत के सपने साकार
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

गर्वित हो मात-पिता, गौरविंत हो गाँव-प्रदेश
दिखलाओ करके ऐसा, नत मस्तक हो भारत देश
बढ़े चलो बढ़े चलो, कदम मिला बढ़े चलो

कश्मीरी युवाओं के नाम-एक पैगाम

उस माँ से आज़ादी माँग रहे,
जिस माँ ने तुमको जन्म दिया
उस माँ से आज़ादी चाह रहे,
जिस माँ का तुमने दूध पिया
आज़ादी का शब्द नाद
अरे आज़ादी का सूचक है
पकिस्तान में माँग के देखो,
बर्बादी का द्योतक है

पत्थर हाथ में लेकर तुम,
साबित करना क्या चाहते हो
संविधान हमारा साक्षी है,
अहिंसा से सब पा जाते हो
आका तुम्हारे तुमको,
शतरंज की बिसात बनाते हैं
जैसा चाहें तुमको वह,
वैसा ही तुम्हे चलाते हैं

पूछो उनसे उनके बच्चे,
क्या वह संग तुम्हारे रहते हैं
दूर देश में पढ़ते लिखते,
उनके अपने बच्चे प्यारे हैं
समझदार युवा तुम सब हो,
कुछ तो इसपर गौर करो
मुजाहिरों पर जुल्म हो रहे,
इस पर भी तुम ध्यान धरो

पंडितों को तो बाहर किया,
अब क्या तुम्हारी बारी है?
कश्मीरियों को ख़त्म करो,
पाकी करतूत जारी है
है कश्मीरियत का वास्ता,
चाल पाक की समझो तुम
अलगाववाद के हामी लीडर,
हैं “पासे उनके” समझो तुम

भारत के तिरंगे नीचे,
तुम अपनी उड़ान भरो
हर क्षेत्र में बन दक्ष,
कश्मीर की पहचान बनो
कश्मीर का दर्द लिए
मैं पंडित, विस्थापन में जीता हूँ
पाक की बातों में ना आना,
तुम्हारी बेवतनी से डरता हूँ

जय हिन्द के नारों से
दुश्मन के मंसूबे ख़ाक करो
भारत माँ के सपूत तुम,
इरादे उनके राख करो
जय हिन्द, जय भारत, जय हिंदुस्तान
हो तुम्हरी यही आन बान और शानI

डर

रात के अँधेरे से मुझे डर नहीं लगता
उजाले की भीड़ में खुद को तन्हा पाता हूँ
मदद की गुहार लगा रहा वह शख़्स भी तन्हा
इंसां को मौत से माँगते पनाह देखता हूँ।

खुद को ख़ुदा समझ बैठा, इंसान वह भी
खुदी से खुद को कर जुदा बैठा, इंसान वह भी
फिर क्यों सोचे कोई कि “मैं तन्हा क्यों हूँ?”
“मैं भी तो इंसान हूँ पर जुदा क्यों हूँ?”

रिश्ते सारे सिमिट गए तकनीकी औज़ारों में
बात अब होती नहीं गलियों में, बाज़ारों में
हरे भरे जंगल पतझड़ की ज़द में आ गए
प्यार रह गया अब यादों की गलियारों में।

करिश्मा कर! राख से उठ हम उड़ने लगें
प्यार की भाषा फिर से हम समझने लगें
आधुनिकता ने हमको हमसे दूर कर दिया
काश!एक बार वह बचपन फिर से आने लगे।

 

आती है ललाई चेहरे पर 

आती है ललाई चेहरे पर
जब देख मुझे मुस्काती हो
दिल में होल सा उठता है
जब हंस कर तुम लज्जाती हो

ऑंखें तुम्हारी कजरारी सी
ज़ुल्फ़ों में छिप छिप जाती है
बादल हो या न हो, समां में
बिजली चमक सी जाती है

पलकों को गिरा दो शर्मा कर
घनघोर अँधेरा हो जाए
ज़ुल्फ़ों को उठा दो मुखड़े से
बरबस उजाला हो जाए

लाल गुलाबी होंठ तुम्हारे
कमलनाल से हाथ
उर्वशी और मेनका ने देखो
खायी है तुमसे मात

किस कुम्हार की पूजा हो तुम?
क्यूँकर उसने तुम्हे बनाया?
पूजा के पुष्प किसको चढ़ाऊँ
‘उसको’ या जिसकी यह काया

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