त्रिलोक महावर की रचनाएँ

बस्ता

बस्ता बहुत भारी था
ढोते-ढोते
एक महीने में
बेटी का वज़न घट गया
इंग्लिश स्कूल के
स्टैंडर्ड फर्स्ट में
पढ़ते-पढ़ते
दो बार लगाई गई मेरी पेशियाँ

मास्टर जी
परेशान
मेरी बेटी
क्यों नहीं करती फॉलो

आख़िरकार
तय कर ही लिया
मैंने बस्ते का बोझ
कुछ कम करना

बेटी की ख़ातिर
अब वह के०जी० टू में है

पहले से
ज़्यादा हँस लेती है
होम-वर्क में
आतंकित नहीं होती
पहले की तरह

सिर्फ़ एक क्लास के लिए
मैं नहीं छीन सकता
उसका बचपन

कभी-कभी मैं सोचता हूँ
स्‍कूल-बस्ता, होम-वर्क
तनाव को जन्म दे रहे हैं
बच्चे
तनाव में पल रहे हैं ।

माँ

कमर झुक गई
माँ बूढ़ी हो गई
प्यार वैसा ही है

याद है
कैसे रोया बचपन में सुबक-सुबक कर
माँ ने पोंछे आँसू
खुरदरी हथेलियों से

कहानी सुनाते-सुनाते
चुपड़ा ढेर सारा प्यार गालों पर
सुबह-सुबह रोटी पर रखा ताजा मक्खन
रात में सुनाईं
सोने के लिए लोरियाँ

इस उम्र में भी
थकी नहीं
माँ तो माँ है

आमने-सामने 

मुर्गे ख़ुद नहीं लड़ते
लड़ाए जाते हैं

मंड़ई में मुर्गे की टाँग में
बाँध दी जाती है छुरी
मैदान में आमने-सामने होते हैं मुर्गे
आदमी होते हैं मुर्गे के पीछे

ख़ौफ़नाक खेल शुरू होता है
मुर्गे भिड़ जाते हैं
एक-दूसरे से
दोनों ओर से आदमी
चीख़ते-चिल्लाते हैं जी भरके
लहूलुहान मुर्गे अगल-बगल
कुछ नहीं देखते

मुर्गे प्रशिक्षित हैं
जान लेने के लिए
एक मुर्गा जीतता है
दूसरा दम तोड़ता है
भीड़ हो-हल्ला़ मचाती है

जीतनेवाला आदमी
हारे हुए मुर्गे को लाद
चल पड़ता है
मैदान अभी खाली नहीं हुआ
तमाशबीनों से

फिर मुर्गे तैयार हैं
लड़ाए जाने के लिए

दाखिला

झील के किनारे
बने स्कूल में
एक बार फिर
दाख़िला ले लिया है मैंने

जूट के बस्ते में
एक नोट बुक, और कुछ नोट्स लिए
चल रहा हूँ कोलतार की सड़क पर
किसी ने नहीं थाम रखी है उँगली
न ही कोई लड़की पीछे से आकर
मारती है धक्का
न ही शर्माकर उठाती है
गिरा दुपट्टा
लेवेण्डर और ’पासपोर्ट’ की ख़ुशबू का
अहसास ही नहीं होता है

औचक ही आकर नहीं झगड़ती है
प्रिंसिपल की मोटी लड़की
चिकौटियों के दिन लद गए
किसी भी टीचर ने डाँट नहीं पिलाई
कोई हो हल्‍ला भी नहीं है क्लास में ।

क्यों देखा था तुमने

लड़की
क्यों देखा था तुमने
आर-पार उतरने वाली निगाहों से

नर्स की तरह क्यों फेरा था
दुखते सिर पर हाथ
निश्छल मुस्कान से
क्यों की थी कोशिश
मैं न रहूँ उदास

शाम को क्षितिज की जगह
तुम्हारी ओर हों
मेरी आँखें
क्यों रोकती रही
कविता लिखने से
अपने गालों से स्पर्श करा
इन हाथों को
क्यों सौंपा कोई कविता-सँग्रह
जिसे पढ़ते-पढ़ते
इतनी दूर निकल आया मैं

यहाँ कंक्रीट के जंगल नहीं हैं
न ही कैक्टस की विविधता
गुलमोहर और गुलाब से परे
यहाँ हरी-हरी दूब है
जिस पर चमक रही हैं
ओस की बूँदें

यहाँ बनाना चाहता हूँ
छोटा-सा घर
और तुम कहती हो
लौट जाओ ।

पेंजई-1

पीठ फेरते ही
वे दाग देंगे
दस-बीस गोलियाँ
और एक खंजर
उतार देंगे आर-पार
ऐसी उम्मीद तो कतई न थी

बातें सब तय हो चुकी थीं
ढाई इंच की मुस्कान के साथ
कहा था उन्‍होंने ‘बाय’-
कल फिर मिलने का वादा था
पर कल के लिए
कुछ भी बाक़ी नहीं छोड़ा था उन्होंने

यक़ीनन भरे होंगे
किसी दोस्त ने कान
कान का भरा जाना उतना
ख़तरनाक नहीं है
जितना कान का कच्चा होना

एक अर्से बाद जब होगा उन्हें अहसास
कि वे ग़लती पर थे
तब तक पेंजई[1] के फूलों में
उभरे स्केल्टन हो चुके होंगे
हम।

पेंजई-2

युगोस्ला‍विया
पर तड़के बरसाए गए
बम और बगीचे की
मिट्टी भूरी से
लाल हो गई

बसंत आने पर
बगीचे में खिले
पेंजई[1] के फूलों को
देखते हुए लगा
टीटो के बच्चों के
स्‍केल्टगन हैं
एक-दो-तीन न जाने कितने
तितलियों-से वे
सवाल करते हैं
तितलियाँ पकड़ते-पकड़ते

वे
फूल कैसे हो गए ?

ग्यारह साल की लड़की

प्यासी धरती पर
गिरती पसीने की बूँदें
पूछती हैं साँवली लड़की से
नदी का अता-पता

हैरान लड़की लिखना चाहती है
रिपोर्ट गुमशुदा नदी की
जो बहती थी
पिछले साल तक

लड़की परेशान है
पानी के बग़ैर
सनेगा कैसे मकई का आटा
देगची में कैसे पकेगी दाल
चावल पड़े हैं
बग़ैर धुले हुए
दादी ने अभी तक नहीं लिया है
चरणामृत
माँ ने दिया नहीं अभी तक
अर्घ्य सूर्य को
और तुलसी के बिरवे को पानी
श्यामा गाय प्यासी है
तीन दिन से नहीं लिपि है झोंपड़ी

सोचते-सोचते
अभी से सयानी हो गई
ग्यारह साल की लड़की ।

मुक़द्दम की पड़ोसन

उसने
पंद्रह दिन पहले
कोशिश की थी
वी०आई०पी० काफ़िले के सामने आकर
जान देने की
गाँव के मुकद्दम ने
बचा लिया था फुर्ती से उसे

वैसे तो पैंसठ की होगी
आँखों पर
पुराना चश्मा
झुर्रियों भरा शरीर
कोथली में थोड़ी-सी सुपारी और तम्बाकू
चुनौटी में थोड़ा-सा चूना रखना
उसका शगल था

वह मुकद्दम की पड़ोसन थी
कभी मुकद्दम व उसका पति
गहरे मित्र हुआ करते थे
साठ बीघा ज़मीन
और चार जवान शादी-शुदा लड़कों की
मिल्कियत थी उसके पास

एक दिन झमाझम बारिश में
उफ़न पड़ी बेतवा में
जब बह गए बुढऊ
तो लड़कों ने भी किनारा कर लिया
ज़मीन बॉंट ली आपस में
और छोड़ दिया उसे
असहाय
मुकद्दम की पहल पर उसे मिलने लगे
डेढ़ सौ रूपल्ली हर महीने

पिछले महीने से
मुकद्दम ने भी खड़े कर दिए हैं हाथ
ज़िन्दा लड़के और ज़मीन के रहते
कैसे मिल सकती है इमदाद

आज सुबह
ठंड से अकड़ी पाई गई वह
अपनी झोपड़ी में

उसकी पोटली में
न चावल, न दाल, न आटा
सिर्फ़ एक राशन-कार्ड मिला है तुड़ा-मुड़ा ।

इतना ही नमक (कविता)

चार[1] के फलों
की खट्-मिठास से
मुँह बिचकाती
नोनी
फोड़ रही है नन्हीं-नन्हीं गुठलियाँ

पत्थर के
बीच
कभी पिस जाती हैं
चिरोंजी गुठली के साथ
तो कभी पत्थर से टकराकर
पत्थर
उगल देते हैं चिंगारी

बमुश्किल
निकले हैं साबुत दाने
नोनी
जानना चाहती है
इतनी मेहनत से
एक पायली[2] चिरोंजी
के बदले
अब भी क्यों मिलेगा
इतना ही नमक

बाल-कविताएँ

चंदा मामा गोरे-गोरे

दूध भरे दूधिया कटोरे
चंदा मामा, गोरे-गोरे!
तुम्हें घेर रखते हैं
रातों में तारे,
कभी-कभी रात छोड़
दिन में भी आ रे।
खेल-कूद संग मेरे सो, रे
चंदा मामा गोरे-गोरे!

बोलो तुम आओगे
क्या मोटरकार में
आ जाना, आ जाना
अबके रविवार में
देखे, मत मारना टपोरे
चंदा मामा गोरे-गोरे!

देखो तो आकर के
कैसे हम रहते,
सुननाा वो सब हमसे
बाबा जो कहते।
ले आना तारों के छोरे
चंदा मामा गोरे-गोरे!

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