त्रिलोक सिंह ठकुरेला की रचनाएँ

ऐसा वर दो 

भगवन् हमको ऐसा वर दो।
जग के सारे सद्गुण भर दो॥

हम फूलों जैसे मुस्कायें,
सब पर प्रेम ­ सुगंध लुटायें,
हम पर­हित कर खुशी मनायें,
ऐसे भाव हृदय में भर दो।
भगवन् हमको ऐसा वर दो॥

दीपक बनें, लड़े हम तम से,
ज्योर्तिमय हो यह जग हम से,
कभी न हम घबरायें गम से,
तन मन सबल हमारे कर दो।
भगवन्, हमको ऐसा वर दो॥

सत्य मार्ग पर बढ़ते जायें,
सबको हीं सन्मार्ग दिखायें,
सब मिलकर जीवन ­फल पायें,
ऐसे ज्ञान, बुद्धि से भर दो।
भगवन, हमको ऐसा वर दो॥

जागरण

उठो सुबह सूरज से पहले,
नित्य कर्म से निवृत हो लो।
नित्य नहाओ ठण्डे जल से,
पढ़ने बैठो, पुस्तक खोलो॥

करो नाश्ता,कपड़े बदलो,
सही समय जाओ स्कूल।
करो पढ़ाई खूब लगा मन,
इसमें करो न बिल्कुल भूल॥

खेलो खेल शाम को प्रति दिन
तन और मन होंगे बलवान।
ठीक समय से खाना खाओ,
फिर से पढ़ो, बढ़ाओ ज्ञान॥

द्वार प्रगति के खुल जायेंगे,
करो हौंसला,लगन लगाओ।
लक्ष्य पास में ही पाओगे
बढ़ते जाओ, बढ़ते जाओ॥

नया सवेरा लाना तुम

टिक टिक करती घड़ियाँ कहतीं
मूल्य समय का पहचानो।
पल पल का उपयोग करो तुम
यह संदेश मेरा मानो ॥

जो चलते हैं सदा, निरन्तर
बाजी जीत वही पाते।
और आलसी रहते पीछे
मन मसोस कर पछताते॥

कुछ भी नहीं असम्भव जग में,
यदि मन में विश्वास अटल।
शीश झुकायेंगे पर्वत भी,
चरण धोयेगा सागर­जल॥

बहुत सो लिये अब तो जागो,
नया सवेरा लाना तुम।
फिर से समय नहीं आता है,
कभी भूल मत जाना तुम॥

मीठी बातें

मीठे ­ मीठे बोल सुनाती,
फिरती डाली ­ डाली।
सब का ही मन मोहित करती
प्यारी कोयल काली ॥

बाग­ बाग में, पेड़­ पेड़ पर,
मधुर सुरो में गाती।
रुप नहीं, गुण प्यारे सबको
सबको यह समझाती॥

मीठी ­ मीठी बातें कहकर
सब कितना सुख पाते।
मीठी ­मीठी बातें सुनकर
सब अपने हो जाते॥

कहती कोयल प्यारे बच्चो!
तुम भी मीठा बोलो।
प्यार भरी बातों से तुम भी
सब के प्यारे हो लो॥

सीख 

वर्षा आई, बंदर भीगा,
लगा काँपने थर थर थर।
बयां घोंसले से यूं बोली ­
भैया क्यों न बनाते घर॥

गुस्से में भर बंदर कूदा,
पास घोंसले के आया।
तार तार कर दिया घोंसला
बड़े जोर से चिल्लाया॥

बेघर की हो भीगी चिड़िया,
दे बन्दर को सीख भली।
मूरख को भी क्या समझाना,
यही सोच लाचार चली॥

सीख उसे दो जो समझे भी,
जिसे जरूरत हो भरपूर।
नादानों से दूरी अच्छी,
सदा कहावत है मशहूर॥

अंतरिक्ष की सैर

नभ के तारे कई देखकर
एक दिन बबलू बोला।
अंतरिक्ष की सैर करें माँ
ले आ उड़न खटोला॥

कितने प्यारे लगते हैं
ये आसमान के तारे।
कौतूहल पैदा करते हैं
मन में रोज हमारे॥

झिलमिल झिलमिल करते रहते
हर दिन हमें इशारे।
रोज भेज देते हैं हम तक
किरणों के हरकारे॥

कोई ग्रह तो होगा ऐसा
जिस पर होगी बस्ती।
माँ,बच्चों के साथ वहाँ
मैं खूब करुँगा मस्ती॥

वहाँ नये बच्चों से मिलकर
कितना सुख पाऊँगा।
नये खेल सिखूँगा मैं,
कुछ उनको सिखलाऊँगा॥

तितली 

रंग बिरंगी चंचल तितली
सबके मन को हरती ।
फूल फूल पर उड़ती रहती
जीवन में रंग भरती॥

जाने किस मस्ती में डूबी
फिरती है इठलाती।
आखिर किसे खोजती रहती
हरदम दौड़ लगाती॥

पीछे पीछे दौड़ लगाता
हर बच्चा मतवाला ।
तितली है या जादूगरनी
सब पर जादू डाला॥

काश, पंख होते अपने
तितली सी मस्ती करते।
हम भी औरों के जीवन में
खुशियों के रंग भरते॥

रेल 

सबको मंजिल तक ले जाती,
सबको घर पहुँचाती।
रेल दूर रहने वालों को
आपस में मिलवाती॥

सिगनल हरा देख चल देती,
लाल देख रुक जाती।
सीटी बजा बुलाती सबको
सरपट दौड़ लगाती ॥

जब अपनी ही धुन में चलती
कितनी प्यारी लगती।
रेल देख कर सबके मन में
नयी लगन सी जगती ॥

रेल सभी से कहती जैसे ­
रुको न, दौड़ लगाओ।
कठिन नहीं है कोई मंजिल,
मेहनत से सब पाओ॥

चिड़ियाघर

चिड़ियाघर देखने शहर में
नन्हा सोनू ­ आया।
उसे पिता ने बड़े प्यार से,
केला एक दिलाया॥

रंग ­बिरंगी चिड़िया देखी,
देखा मोटू हाथी।
हिरण देख कर सोचा मन में,
खेलूँ बन कर साथी॥

षेर और चीता जब देखा,
तब थोड़ा घबराया।
मोर और बत्तखों ने उसके
मन को खूब लुभाया॥

पर सानू जब लगा देखने,
बन्दर खड़ा अकेला।
दाँत दिखाता आया बन्दर,
छीन ले गया केला॥

पेड़ 

पेड़ बहुत ही हितकारी हैं,
आओ, पेड़ लगायें।
स्वच्छ वायु, फल, फूल, दवाऐं
हम बदले में पायें॥

पर्यावरण संतुलित रखते,
मेघ बुलाकर लाते।
छाया देकर तेज धूप से
सबको पेड़ बचाते॥

कई तरह की और जरूरत
करते रहते पूरी।
सुगम बनातें सबका जीवन
होते पेड़ जरूरी॥

पेडों के इन उपकारों को
हम भी नहीं भुलायें।
आओ, रक्षा करें वनों की
आओं, पेड़ लगायें॥

गुब्बारे 

मम्मी, वह देखो गुब्बारे!
आया गुब्बारे वाला।
गुड़िया लेगी, मैं भी लूँगा,
मचल रहा मन मतवाला॥

रंग रंग के, प्यारे प्यारे,
कुछ पतले से, कुछ मोटे।
लिए हुए आकार बहुत से,
कुछ लम्बे हैं, कुछ छोटे॥

मम्मी, मैं ले लूँ पीला या
फिर नीला लेकर खेलूँ।
गुड़िया को दो चार दिला दो,
मन करता मैं सब ले लूँ॥

कुछ पर बिन्दु, कुछ पर रेखा।
किसी किसी पर हैं तारे।
मम्मी, तुम कितनी प्यारी हो,
दिलवा दो न गुब्बारे॥

वर दो, लड़ने जाऊँगा 

हल्दी घाटी किधर पिताजी,
मैं भी लड़ने जाऊँगा।
घोड़ा, भाला मुझे दिला दो,
मैं राणा बन जाऊँगा ॥

बैरी के छक्के छूटेंगे,
जब भाला चमकाऊँगा।
भाग जायेंगे शत्रु डर कर
समर भूमि जब जाऊँगा॥

इतने पर भी डटे रहे वह
तो फिर रण होगा भारी।
कट कर शीश अनेक गिरेंगे
देखेगी दुनियाँ सारी॥

चाहे शीश कटे मेरा भी,
तनिक नहीं घबराऊँगा।
पिता, आपका वीर ­पुत्र हूँ,

हम नन्हे­नन्हे बच्चे 

हम नन्हे-नन्हे बच्चे
भारत की नव आशाएँ।
हम विकास ­पथ पर लिखेंगे­
नित नव परिभाषाएँ॥

पहुंचेंगे हम तारों तक,
सागर-मंथन कर डालें।
हम सब मिलकर प्रकृति­गर्भ से,
अगणित रत्न निकालें॥

आदर्शों को अपनाकर
दें नये अर्थ जीवन को।
प्रेम और खुशियों से भर दें
हम जग के जन जन को॥

दिग्दिगन्त तक कीर्ति पताका
अपनी फहरायेंगे।
मिलकर अखिल विश्व में
ध्वज भारत का लहरायेंगे॥

पापा, मुझे पतंग दिला दो 

पापा, मुझे पतंग दिला दो,
भैया रोज उड़ाते हैं।
मुझे नहीं छूने देते हैं,
दिखला जीभ, चिढ़ाते हैं॥

एक नहीं लेने वाली मैं,
मुझको कई दिलाना जी।
छोटी सी चकरी दिलवाना,
मांझा बड़ा दिलाना जी॥

नारंगी और नीली, पीली
हरी, बैंगनी,भूरी,काली।
कई रंग,आकार कई हों,
भारत के नक्षे वाली ॥

कट जायेंगी कई पतंगे,
जब मेरी लहरायेगी।
चंदा मामा तक जा करके
भारत­-ध्वज फहरायेगी॥

पढ़ना अच्छा रहता है

गाँव गाँव और नगर नगर।
गली गली और डगर डगर॥
चलो, सभी मिलकर जायें।
मिलकर सबको समझायें॥
अनपढ़ रहना ठीक नहीं।
अनपढ़ की कब पूछ कहीं॥
जो अनपढ़ रह जाता है।
जीवन भर पछताता है॥
लड़का हो या लड़की हो।
चलो, सिखायें सब ही को॥
हर कोई यह कहता है।
पढ़ना अच्छा रहता है॥
बिना-पढ़ा पछताता है।
पढ़ा-लिखा सुख पाता है॥
मिलकर विद्यालय जायें।
पढ़ लिख कर सब सुख पायें॥

सपने 

जब सोती हूँ मम्मी के संग,
मुझे रोज आते हैं सपने।
करती बात चाँद तारों से,
परीलोक ले जाते सपने॥

इन्द्रधनुष पर सरपट दौड़ूँ
बादल को बांहो में भर के।
उड़न खटोला में उड़ घूँमूँ,
सखियों के संग बातें करके॥

परी मुस्कराकर कहती हैं –
नयी नयी हर रोज कहानी।
सिंहासन पर पास बिठाती,
मुझको परीलोक की रानी॥

किन्तु जाग जाती हूँ झटपट
सुन मम्मी – स्वर कानों अपने।
कितने मनमोहक लगते हैं
जगने पर भी प्यारे सपने॥

दीवाली

आयी दीवाली मनभावन
भाँति भाँति घर वार सजे।
जगमग जगमग हुई रोशनी
कितने बंदनवार सजे॥

दादा लाए कई मिठाई,
खील, बताशे भी लाए।
फुलझड़ियाँ, बम, चक्र, पटाखे
अम्मां ने ही मंगवाए॥

गुड़िया ने छोड़ी फुलझड़ियाँ,
शेष पटाखे भैया ने।
धूम धड़ाका हुआ जोर का,
डाँट लगाई मैया ने॥

सबने मिल की लक्ष्मी पूजा,
काली रजनी उजियाली।
कितनी रौनक कितनी मस्ती
फिर फिर आये दीवाली॥

साईकिल

अम्मा, साईकिल दिलवा दो
पापा नहीं दिलाते हैं।
छोटा है तू, गिर जायेगा,
यह कह कर बहकाते हैं॥

रोज चलाते सौरभ भैया,
चोट् कही लग पाती है।
अम्मा, मैं नादान नहीं हूँ,
मुझे साइ्रकिल आती है॥

पापा की बिल्कुल मत सुनना,
बस मम्मी से बात करो।
घर आये साईकिल मेरी,
तुम ऐसे हालात करो॥

दादाजी से पैसे ले लो,
या उनसे ही मंगवाना।
देखो अम्मां, ना मत कहना,
मुझे नहीं खाना खाना॥

उपवन के फूल

हम उपवन के फूल मनोहर
सब के मन को भाते।
सब के जीवन में आशा की
किरणें नई जगाते

हिलमिल-हिलमिल महकाते हैं
मिलकर क्यारी-क्यारी।
सदा दूसरों के सुख दें,
यह चाहत रही हमारी

कांटो से घिरने पर भी,
सीखा हमने मुस्काना।
सारे भेद मिटाकर सीखा
सब पर नेह लुटाना॥

तुम भी जीवन जियो फूल सा,
सब को गले लगाओ।
प्रेम-गंध से इस दुनियाँ का
हर कोना महकाओ॥

प्यारी नानी 

कितनी प्यारी बूढ़ी नानी
हमें कहानी कहती हैं।
जाते हम छुट्टी के दिन में
दूर गाँव वह रहती हैं॥

उनके आँगन लगे हुए हैं
तुलसी और अमरूद, अनार।
और पास में शिव का मंदिर
पूजा करतीं घंटे चार॥

हमको देती दूध, मिठाई
पूड़ी खीर बनाती हैं।
कभी शाम को नानी हमको
खेत दिखाकर लाती हैं॥

कभी कभी हमकों समझातीं
जब हम करते नादानी।
पैसे देकर चीज दिलातीं
कितनी प्यारी हैं नानी॥

पानी

पानी से हर बूँद बनी है,
पानी का ही सागर ।
नभ में बादल दौड़ लगाते,
भर पानी की गागर॥

पानी से ही बहते झरने,
नदियाँ नाले बहते।
ताल-तलैया, झील, सरोवर
पानी से शुभ रहते॥

पानी से ही फसलें उगतीं,
हर वन उपवन फलता।
पानी से ही इस वसुधा पर
सबका जीवन चलता॥

आओ, बचत करें पानी की
पानी उत्तम धन है।
पानी से ही यह जग सुन्दर
पानी से जीवन है॥

देश हमारा 

सुखद, मनोरम, सबका प्यारा।
हरा, भरा यह देश हमारा॥

नई सुबह ले सूरज आता,
धरती पर सोना बरसाता,
खग-कुल गीत खुशी के गाता,
बहती सुख की अविरल धारा।
हरा, भरा यह देश हमारा॥

बहती है पुरवाई प्यारी,
खिल जाती फूलों की क्यारी,
तितली बनती राजदुलारी,
भ्रमर सिखाते भाई चारा।
हरा, भरा यह देश हमारा॥

हिम के शिखर चमकते रहते,
नदियाँ बहती, झरने बहते,
“चलते रहो” सभी से कहते,
सबकी ही आँखो का तारा।
हरा, भरा यह देश हमारा॥

इसकी प्यारी छटा अपरिमित,
नये नये सपने सजते नित,
सब मिलकर चाहे सबका हित,
यह खुशियों का आँगन सारा।
हरा, भरा यह देश हमारा॥

गाड़ी

डैडी, तुम भी गाड़ी ले लो
सभी घूमने जायेंगे।
जब हौरन बोलेगा पीं पीं
राहगीर हट जायेंगे ॥

देखेंगे हिमगिरि के झरने,
चाट पकोड़ी खायेंगे।
पर डैडी बस यह मत कहना ­
जल्दी वापस आयेंगे॥

देवदार के पेड़ों के संग
फोटो कई खिचायेंगे।
जब लौटेंगे वापस घर को
चीज कई हम लायेंगे ॥

मम्मी, तुम क्या सोच रही हो,
पहनो बासंती साड़ी।
चलो संग डैडी के तुम भी,
आओ ले आयें गाड़ी॥

मैया, मैं भी कृष्ण बनूँगा

मैया, मैं भी कृष्ण बनूँगा
बंशी, मुझे दिलाना माँ।
अच्छा लगता गाय चराना,
मुझको गोकुल जाना, माँ॥

ग्वालों के संग में खेलूँगा,
यमुना बीच नहाऊँगा।
नाथूंगा मैं विषधर काले,
गेंद छुड़ाकर लाऊँगा॥

चोरी चुपके माखन खाकर
शक्तिवान बन जाऊँगा।
मारूँगा मैं असुर कई,
फिर सुरपुर कंस पठाऊँगा॥

राधा के संग भी खेलूँगा,
पर बंशी न दिखाऊँगा।
नाचूँगा मैं दे दे ताली,
सबको खूब रिझाऊँगा॥

बादल

सागर से गागर भर लाते
बादल काले काले।
लाते साथ हवा के घोड़े
दम खम, फुर्ती वाले॥

कभी खेत में, कभी बाग में,
कभी गाँव में जाते।
कहीं निकलते सहमे सहमे,
कहीं दहाड़ लगाते॥

कहीं छिड़कते नन्हीं बूँदें,
कहीं छमा-छम पानी।
कहीं कहीं सूखा रह जाता
जब करते नादानी

जहाँ कहीं भी जाते बादल
मोर पपीहा गाते।
सब के जीवन में खुशियों के
इन्द्रधनुष बिखराते॥

बड़े प्यार से कहती धरती­
“आओ, बादल, आओ।
तुम अपनी जल की गागर से
सबकी प्यास बुझाओ॥“

प्रेम सुधा बरसायें

गुन गुन गुन गुन करता भौंरा
उपवन उपवन जाता।
कली-कली पर, फूल फूल पर
गीत मिलन के गाता॥

रंग, रुप, गुण धर्म अलग हैं
साम्य नहीं दिख पाता।
फिर भी भौंरा फूलों के संग
कितना नेह लुटाता॥

मस्ती में डूबा सा भौंरा
जैसे सबसे कहता।
मिलकर रहना इस दुनिया में
कितना सुखमय रहता॥

आओ, सीखे भौंरे से हम
मन के भेद मिटायें।
सुखमय बने सभी का जीवन
प्रेम-सुधा बरसायें॥

नया वर्ष 

नए वर्ष की नई सुबह ने
रंग बिखराए नए-नए ।
सब में नए-नए सूरज ने
स्वप्न जगाए नए-नए ।।

नई उमंगे, नई तरंगे
नई ताल, संगीत नया ।
सब में जगीं नई आशाएँ,
नई बहारें, गीत नय ।।

नई चाह है, नई राह है
नई सोच, हर बात नई।
नया जागरण, नई दिशाएँ,
नई लगन, सौगात नई ।।

सब में नई नेह धाराएँ
लेकर आया वर्ष नया ।
नया लगा हर एक नज़ारा,
सब में छाया हर्ष नया ।।

चंदा मामा

मेरे प्यारे चंदा मामा!
जब रातों में आते हो।
झिलमिल तारों के संग मिलकर
मंद मंद मुस्काते हो॥

सदा खेलते आँख मिचौनी,
हर दिन रूप बदलते हो।
और कभी गायब हो जाते,
हमको कैसा छलते हो॥

तुमसे अपना रिश्ता कैसा
सब उलझन में रहते हैं।
दादा-दादी,मम्मी-पापा
सब ही मामा कहते हैं।

तुम्हें देखता हूँ रजनी भर,
भला कहाँ सो पाता हूँ।
शीतलता के परम-पुंज!
मैं सपनों में खो जाता हूँ॥

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