बलजीत सिंह मुन्तज़िर की रचनाएँ

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र हो गए

ज़िन्दगानी के भी कैसे-कैसे मंज़र[1] हो गए ।
बे-सरोसामाँ[2] तो थे ही, अब तो बेघर हो गए ।

तुमसे मिलने पर बड़े आशुफ़्तासर[3] थे उन दिनों,
तुमसे बिछड़े तो हमारे दर्द बेहतर हो गए ।

एक क़तरे[4] भर की आँखों में थी उनकी हैसियत,
अश्क[5] जब पलकों से निकले तो समन्दर हो गए ।

कितनी बे-परवाह उड़ानों में थी पहले ज़िन्दगी,
जब ज़मीँ पाई परिन्दे दिल के बे-पर[6] हो गए ।

मौसम दयारे यार[7] का बदला भी तो कुछ इस तरहा,
जो ख़ुद मिसालें[8] थे बहारों की वो पतझर हो गए ।

आशनाई[9] के मुरव्वत[10] दौर में यूँ भी हुआ,
बे-मुरव्वत[11] लोग भी हमदर्द[12] अक्सर हो गए ।

बे-पनाह[13] तन्हाइयों की शाख़[14] से लिपटे हुए,
जो भी गुल उम्मीद के थे नामे दिलबर[15] हो गए ।

कितने तो अरमान दिल में सीfपयों से बन्द थे,
जब खुली राहें वफ़ाओं की तो गौहर[16] हो गए ।

थे बहुत ज़रख़ेज़[17] सपने, सब्ज़[18] थे एहसास भी
पर हक़ीक़त के क़हत[19] से सब ही बंजर हो गए ।।

समन्दर में सफ़र के वक़्त कोई नाव जब उलटी

समन्दर में सफ़र के वक़्त कोई नाव जब उलटी ।
तो उस दम लोग कहते हैं नहीं मौजों की कुछ ग़लती ।

तुफ़ानी हाल तो केवल कभी बरसों में बनते हैं,
शकिस्ता[1] कश्तियाँ तो ठहरे पानी में नहीं चलती ।

करे उस पल में कोई क्या उदू[2] जब ना-ख़ुदा[3] ठहरे,
मुसाफ़िर की तो हसरत[4] ख़ुद किनारे लग नहीं सकती ।

हज़ारों बार देखी हैं भँवर में डूबती नैया,
किसी पुरवाई के रुख बदले से ही चल-निकल पड़ती ।

लहर का प्यार भी तो ज्वार-भाटे में छलकता है,
इसी से शोख़[5] साहिल[6] की कभी बाँछें नहीं खिलतीं ।

बहुत गहरा है सागर निस्बतों[7] का, डूबकर उसमें
दिले-नाकाम को सीपी वफ़ाओं की नहीं मिलती ।

सुबहा उगता है सूरज आस का फिर डूब जाता है,
किरन आसूदगी[8] की ज़हने दरिया में नहीं घुलती ।

यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है

यूँ तिरछी नज़र से सहम देखता है ।
क्या जाने वो मुझमें अहम[1] देखता है ।

चुराता है उसका कोई चैन नित ही[2],
वो अपनी वफ़ा पे वहम देखता है ।

फ़कत मैं नहीं हूँ असीरे तजल्ली[3],
मेरे संग दीया भी अलम[4] देखता है ।

वो बीती किताबों मैं तितली या गुल की,
बजाय पुरानी नज़्म देखता है ।

क्यूँ हलके से लेता है मेरी इनायत[5],
क्यूँ होके मुझे खुशफ़हम देखता है ।

मुझे क्या पता था के मुझ सुर्खरू[6] मैं,
वो इक चाँदनी दम-ब-दम देखता है ।

नहीं उसको कुछ भी मलाल[7] अब किसी से,
वो अपनी खताएँ[8] पैहम[9] देखता है ।

कभी अपने दिल की गिरह[10] खोलता है,
कभी मुझमें वो पेचोखम[11] देखता है ।

दर्द पहले सा अब नहीं होता

दर्द पहले सा अब नहीं होता ।
मनमुअफिक तो सब नहीं होता ।

तुझसे मिलना हयात में था लिखा,
यूँ ही कुछ बेसबब नहीं होता ।

गर न होती ये आबजू बाहम,
इतना में तश्नालब नहीं होता ।

चन्द ज़रदारों का हुआ वो तो,
हम गरीबों का रब नहीं होता ।

उनके जलवे थे जानाफ्रीन इतने,
क्यूँ कोई जान्बलब नहीं होता ।

मिलती तुझसे न आदते मैकशी,
क़िस्सा यह शामो शब नहीं होता ।

तुम न करते अता इसे खुशियाँ,
तो ये शहरे तरब नहीं होता ।

धुले परदे कोमल से वो हाथ खींचे

धुले परदे कोमल से वो हाथ खींचे ।
तभी जाके सुबहा खुलेंगे दरीचे[1] ।

यूँ मुरझाए बिरवे लगे लहलहाने,
दबे पग वो आए जो मन के बगीचे ।

किसी फूल की मैंने हसरत[2] को रक्खा,
संजो कर क़िताबों के पन्नों के नीचे ।

वफ़ाओं की टहनी पे खिल आए ग़ुंचे[3],
तो एहसास हमने मुरादों[4] से सींचे ।

ज़बाँ पर कई रंग-ओ-बू के फ़साने[5],
मगर वो के शरमा के होंठों को भींचे ।

है पुरनूर[6] चेहरे में क्या ताज़गी, के
सुबहा फूल उस पर यूँ शबनम[7] उलीचे[8] ।

है गुलरुत[9] की शब[10] का तसव्वुर[11] के fजसमें,
न मैं सोने पाऊँ न वो आँख मींचे ।

ये कंगन, ये काजल, ये बिन्दिया औ’ पायल
सभी कुछ तो है नाज़नीँ[12] तेरे पीछे ।

उम्मीदों के fजस फ़र्श[13] पर हम खड़े थे,
दरक[14] से गए हैं अब उसके ग़लीचे[15] ।।

तू मुझसे आशना है तो कुछ आशकार कर

तू मुझसे आशना[1] है तो कुछ आशकार[2] कर ।
मेरा न हो सके तो ख़ुद से ही प्यार कर ।

ये ज़िन्दगी नहीं फिर दो बार मिल सकेगी,
जो दिल में ख़्वाहिशें हैं सब पर निसार[3] कर ।

तुझको किया ख़ुदा ने तामीर[4] इस तरह,
कलियों में जिस्म ढाला मोती निखार कर ।

ग़ुरबत[5] की घाटियाँ तो मुझको उलाँघनी हैं,
तू भी तो ज़र-ओ-सीम[6] के इस पुल को पार कर ।

मेरी उदासियाँ तो कुछ बे-सबब नहीं,
मुझमें तू जी रहा है बस एतबार[7] कर ।

बहने न पाएँ यक-ब-यक[8] बेवक़्त आँख से,
तू अपने आँसुओं को कुछ होfशयार कर ।

तेरी रूहानी महक से पहचान जाऊँगा,
मुझसे किसी तो रोज़ मिल चेहरा उतारकर ।

बे-रहम तू नहीं है मेरा ही वक़्त बद है,
सैयाद[9] बे-धड़क तू मेरा शिकार कर ।

दरिया की तरहा बहके सागर में जज़्ब[10] हो जा,
क़तरे[11]-सी ज़िन्दगी को मत आबशार[12] कर ।

बिगड़े हुए थे सारे लम्हात-ए-ज़िन्दगी,
वो चल दिया हमारे कुछ पल सँवार कर ।

शाम होते ही तेरा इन्तज़ार रहता है

शाम होते ही तेरा इन्तज़ार रहता है ।
यार ! तू कौनसे दरिया के पार रहता है ।

कोई पूछे तो ढली साँझ के दीये से कभी,
fकसलिए उसपे सरे शब[1] निखार रहता है ।

उनके साये में रहे प्यार को हमने यूँ जीया,
ज्यों गुलाबों की पनाहों में ख़ार[2] रहता है ।

वही समझेगा उम्मीदों का वफ़ा से रिश्ता,
जिसके दिल में सदा परवरदिगार[3] रहता है ।

उम्र ठहरे न दिलासों की इसलिए चुप हैं,
ख़ूब नज़दीक वरना ग़मगुसार[4] रहता है ।

धूप ढलते ही कई अक़्स[5] उभर आते हैं,
किसका यादों पे भला इख़्तियार[6] रहता है ।

लम्हे-ओ-वस्ल[7] में जज़्बात[8] निहाँ[9] कैसे रहें,
दो निगाहों से सभी आशकार[10] रहता है ।

कौन रोकेगा उन आँखों से छलकते ग़म को,
उसके दिल में तो कोई आबशार[11] रहता है ।

प्यास की सरज़मीं[12]-सी हो गई हयात[13] उसकी,
अब तो ख़्वाबों में भी बस रेगज़ार[14] रहता है ।

यूँ दिलशाद[15] फ़लक[16] पर हैं बहुत से तारे
एक सैयार[17] मगर बेकरार[18] रहता है ।।

तीर वो जो कमान छोड़ गया

तीर वो जो कमान छोड़ गया ।
क़हर भर के गुमान[1] छोड़ गया ।

एक दीदार[2] दिल के दरिया में,
उम्र भर का उफ़ान छोड़ गया ।

हादसा तो गुज़र गया लेकिन,
तल्ख़[3] अपने निशान छोड़ गया ।

चन्द दूरी पे थे किनारे से,
वो मगर दरमियान[4] छोड़ गया ।

वस्ल[5] को था गुरेज़[6] इतना के,
हिज्र[7] की वो मियान छोड़ गया ।

उसका साया रहे इसी से वो,
याद के सायबान[8] छोड़ गया ।

शोख़[9] तारें भी हैं परेशाँ से,
चाँद क्यों आसमान छोड़ गया ।

रखके मूँछों का बाल ज़ामिन[10] पर,
मर्द अपनी ज़बान छोड़ गया ।

बाद मरने के दुःख की ग़ज़लों का,
एक शाइर दीवान छोड़ गया ।

‘मुंतज़िर’[11] होके ढूँढ़ते हो जिसे
वो तो कब का जहान[12] छोड़ गया ।।

इक तबस्सुम के लिए बारहा सोचा उसने

इक तबस्सुम[1] के लिए बारहा[2] सोचा उसने ।
फिर दिया भी तो महज़ फासला तन्हा उसने ।

लबे सागर[3] के किनारों पे तिशनगी[4] का दीया,
काश ! देखा हो मचलते हुए बहता उसने ।

कभी सीखा था घटाओं की रवानी[5] सुन कर,
अपने दिल का भी मुझे हाल सुनाना उसने ।

अपनी आँखों में समेटे हुए बदली की फ़ज़ा[6],
प्यासी धरती-सा मुझे एक पल देखा उसने ।

ज़र-ओ-ज़ेवर[7] की ही मानिन्द मेरे प्यार को भी,
इक दिलासे की तरह हिज्र[8] में पहना उसने ।

मेरी ग़ैरत को ही मग़रूरी[9] समझ कर शायद,
दिल में ठाना था मुझे ‘मुंतज़िर’[10] रखना उसने ।।

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