भरत प्रसाद की रचनाएँ

मेरी मातृभूमि 

ओ मेरी विशाल और
महान मातृभूमि
मैं आज
तुम्हारी ममतामयी धूल और मिट्टी को
साष्टांग प्रणाम करता हूँ।

सदा हरी-भरी तुम्हारी गोद
प्रसन्न फूलों से पूर्ण
तुम्हारे पानी, फल और अन्न
हमें बहुत शक्ति देते हैं।

माँ तुम तो
प्रेम, शान्ति और करुणा की
जननी हो,
तुमने पाठ पढ़ाया है कि
अपने सम्पूर्ण हृदय से
सच्चा प्रेम करो।
बुद्ध, महावीर, मोहनदास
और नरेन्द्रनाथ
माँ, तुम्हारे महान पुत्र हैं–
जिन्होंने आदर्श मार्ग प्रकाशित किया।

हम सभी सच्चे हृदय से
तुम्हारी मिट्टी और धूल को
साष्टांग प्रणाम करते हैं!

प्रकृति की ओर

प्रातः बेला
टटके सूरज को जी भर देखे
कितने दिन बीत गए।
नहीं देख पाया
पेड़ों के पीछे उसे
छिप-छिपकर उगते हुए।
नहीं सुन पाया
भोर आने से पहले
कई चिड़ियों का एक साथ कलरव।
नहीं पी पाया
दुपहरी की बेला
आम के बगीचे में झुर-झुर बहती
शीतल बयार।

उजास होते ही
गेहूँ काटने के लिए
किसानों, औरतों, बच्चों और बेटियों का जत्था
मेरे गाँव से होकर
आज भी जाता होगा।
देर रात तक
आज भी
खलिहान में
पकी हुई फ़सलों का बोझ
खनकता होगा।
हमारे सीवान की गोधूलि बेला
घर लौटते हुए
बछड़ों की हर्ष-ध्वनि से
आज भी गूँजती होगी।

फिर कब देखूँगा?
गनगनाती दुपहरिया में
सघन पत्तियों के बीच छिपा हुआ
चिड़ियों का जोड़ा।
फिर कब सुनूँगा?
कहीं दूर
किसी किसान के मुँह से
रात के सन्नाटे में छिड़ा हुआ
कबीर का निर्गुन-भजन।
फिर कब छूऊँगा?
अपनी फसलों की जड़ें
उसके तने, हरी-हरी पत्तियाँ
उसकी झुकी हुई बालियाँ।

अपने घर के पिछवाड़े
डूबते समय
डालियों, पत्तियों में झिलमिलाता हुआ सूरज
बहुत याद आता है। अपने चटक तारों के साथ
रात में जी-भरकर फैला हुआ
मेरे गाँव के बगीचे में
झरते हुए पीले-पीले पत्ते
कब देखूँगा?
उसकी डालियों, शाखाओं पर
आत्मा को तृप्त कर देने वाली
नई-नई कोंपलें कब देखूँगा?

बाबा नागार्जुन

बदलती शताब्दी के,
ठीक-ठीक पहले ही
ढेरों सी जनता की
एक कलम टूट गई।

बंद हुई एक राह
सूख गया एक स्रोत
एक तना उखड़ गया
हम सबसे पहले जो
सत्ता और जनता के
बीच खड़ा रहता था।

पक्की निगाहों से
परख ली राजनीति
देख लिया सता की
शक्तिमान साजिश को,
सधे चोर संसद के
बहुत अच्छे भाषण में
कुर्सी की बदबू थी;
वादे थे बड़े-बड़े
खाली और खतरनाक
हरे-हरे घावों से
भरी हुई जनता पर
मजहब का नमक डाल
जनसेवा करते थे।

कई तरफ़ फैल गए
ऐसे ही चोरों को
जनता के पहरू ने
कविता की लाठी से
रंगे हाथ पकड़ लिया।

ढाँचों का जीवन है–
गाँवों के भारत में
ईश्वर है धनी वर्ग
भूखी जनसंख्या का
औरत को मुक्ति है;
आँचल की सीमा में
खेतिहर की सर्विस में
पैसे का पता नहीं
पढ़े-लिखे भैया का
वाह-वाह क्या कहना।

रिश्वत की रातों में
रंगदार हालचाल
इसी तरह सज्जन से
छिपे हुए कातिल जो
मरी हुई जनता का
कत्लेआम करते थे–
बाबा नागार्जुन ने
खुले-आम खड़ा किया।

वर्तमान उगता था
बाबा की खेती में
साँसों में मिला हुआ
मेहनत का संस्कार
आँखों के आगे के
दलितों को ख़ुशहाली
भीतर की पृथ्वी पर
पीड़ा का सागर था;
एक और एक और
नीचे तक गए हुए
पतले से हाथों में
कालजयी ताकत थी।

बूढ़ी शताब्दी को कंधे पर बैठाकर
दिशाहीन मोड़ों पर
बुद्धि से बचा-बचा
रचना के साहस से
पैदल ही ले जाकर
चौतरफ़ा रातों में
गाँवों की राह पकड़
अगली शताब्दी से
पहले पहुँचाना था।

कश्मीर के बच्चे

आया अन्धा दौर भयावह,
हृदय काँपता भीतर रह-रह,

इतने वर्षों से उत्तर की
शान्त और सुन्दर घाटी में,
तोपों, गोलों, बन्दूकों का
ख़ूनी शासन गूँज रहा है !

किसने कौमी आग लगाई ?
जिसमें जलते लोग
न जाने कितने सालों से
बेचारे भय के मारे,
बेटों का आतंक देखकर
सहमे-सहमे, दहशत खाए,
अपने ही जीने से डरते !

उठी हुई संगीनें प्रतिदिन
क़ातिल जैसा-
बर्बर तेवर लेकर,
पूरी घाटी में बेख़ौफ़ घूमती
महामौत का चेहरा ओढ़े
क़दम-क़दम पर हिंसक हिकर !

उजड़े से घायल प्रदेश के
गाँव-गाँव में,
नगर-नगर में
हर घर में
अपहरण, लूट, हत्या की साजिश
बार-बार
निर्दोष जनों को खेती
मरते आम लोग बेमौत,
समूचा घर उजाड़ती
एक-एक को चुनकर
पूरी बेरहमी से काट डालती !

बचे हुए भागते हुए लोग
भागते कहाँ-कहाँ
घर-बार छोड़कर
गाँव छोड़कर
अपनी जड़ से उजड़कर !

नहीं ठिकाना जीवन का
आतंकवाद की धरती पर
उनके ऊपर, नंगे सिर पर
काल बनी तलवार लटकती !

कई साल के बाद, इन दिनों
पागल, अन्धा युद्ध रुका है ।
किन्तु अचानक एक गाँव में
घोर रात का आसमान
जो घिरा हुआ है घाटी पर
बेटों की कट्टर गोली से
घनघना उठा
हिल उठीं शान्ति कि दीवारें !

फिर, उसी रात में
मरकर जीते एक सताए घर पर
टूटे मानवता के दुश्मन
पीछे ले बंदूकें दर्ज़न-भर
ये उग्रवाद के सारे बच्चों को
जो पौधे थे छोटे-छोटे
कल बनते फल के पेड़ हरे
फ़ौरन गोली से उड़ा दिया !

कैसे कह दूँ

क्या हमारी शरीर में ऊँची जगह पाकर
हमारा मस्तिष्क सार्थक हो उठा ?
क्या हमारी आँखें सम्पूर्ण हो गईं,
हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनकर ?

क्या हमने अन्धकार के पक्ष में बोलने से
बचा लिया ख़ुद को ?

क्या सीने पर हाथ रखकर कह सकता हूँ मैं
कि अपने हृदय के कार्य में कभी कोई बाधा नहीं डाली ?
आत्मा की गहराइयों से उठे हुए विचारों की
क्या मैं हत्या नहीं कर देता ?

दरअसल अपनी गहन भावनाओं का सम्मान करने वाला
मैं उचित पात्र ही नहीं हूँ ।
वे इस कायर ढॉचे में क्यों उमड़ती हैं ?

छटपटाकर मरती हुई अन्तर्दृष्टि से प्रार्थना है—
कि वे इस जेलखाने को तोड़कर कहीं और भाग जाएँ ।

अपनी अन्तर्ध्वनि का तयपूर्वक मैंने कितनी बार गला घोंटा है,
कौन जाने ?

पूरी शरीर को ता-उम्र कछुआ बने रहने का रोग लग चुका है,
हाथ-पैर, आँख-कान-मुँह आज तक अपना औचित्य सिद्ध ही नहीं कर पाए
करना था कुछ और तो कर डालते हैं कुछ और
दृश्य-अदृश्य न जाने कितने भय और आतंक से सहमकर
पेट में सिकुड़े रहते हैं हर पल ।

मेरा अतिरिक्त शातिर दिमाग़ शतरंज को भी मात देता है,
भीतरी के अथाह खोखलेपन के बारे में क्या कहना ?

कैसे कह दूँ कि मैं अपने जहरीले दाँतों से,
प्रतिदिन हत्याएँ नहीं किया करता ?

(अक्टूबर-2010)

पृथ्वी के खोने से पहले

लाचार, अवाक् सा, साँसें रोके
सुदूर अतीत को झाँकता रहता हूँ अपलक
एक से बढ़कर एक पृथ्वी के अनमोल दिन,
अरे, खोते जा रहे हैं मुझसे ।

आँखें उठाकर देखिए,
इतिहास करवट बदलता है — एक दिन
छोट-छोटे दिन मिलकर ही
बड़ी-बड़ी सभ्यताओं को जन्म देते हैं

किसी दिन ही घटित होती हैं अमर घटनाएँ
भूलिए मत,
बुद्ध में बुद्धत्व छह साल में नहीं
सिर्फ छह दिन के भीतर प्रकट हुआ था
वर्षों से बुझे हुए मस्तक में
किस दिन चमकता हुआ विस्फोट भर जाय
कुछ कह नहीं सकते ।

नाउम्मीदी के घुप्प अंधकार में भी
एक न एक दिन
उम्मीद की सुबह खिलती है,
हज़ार बार पराजय में टूटे हुए क़दम भी
एक दिन, जीत का स्वाद चख़ते हैं
घृणा की चौतरफ़ा मार से किसी का मरा हुआ सिर
अचानक किस दिन
बेइंतहा सम्मान पाकर जी उठे
कौन बता सकता है?

पिछला कोई भी दिन, नहीं है आज का दिन
वह कल भी नहीं आएगा,
आज का दिन, सिर्फ़ आज के दिन है—
अनगिनत शताब्दियों के लिए ।

15 अगस्त की जगह, रख दीजिए 14 अगस्त
अर्थ का अनर्थ हो जाएगा,
नहीं हो सकता 5 दिसम्बर, 6 दिसम्बर की जगह
सिर्फ़ एक दिन का फ़ासला
मनुष्य का चेहरा बदल देता है,
पलट देता है इतिहास को देखने का नजरिया

हमारे जीवन में हज़ारों दिन आए
और हज़ारों दिन गए
मगर धिक्कार ! कि हम जीने की तरह
एक दिन भी नहीं जीए ।
पृथ्वी को खोने से पहले
जी भर कर जी लेना चाहता हूँ

एक-एक दिन का महत्व,
सुन लेना चाहता हूँ
जड़-चेतन में अनंत काल से धड़कती
पृथ्वी का हृदय
पी लेना चाहता हूँ
सृष्टि के सारे अलक्षित मर्म
पा लेना चाहता हूँ
हर के वृक्ष के प्रति माटी की ममता का रहस्य

इसके बग़ैर जीना तो क्या
इसके बग़ैर मरना तो क्या ।

(जुलाई-2011)

मेरी माटी ! तुझे पाऊँ

तुम्हारे इतने पास रहकर
और पास आने की अकथ बेचैनी के बावजूद
कितना दूर रह जाता हूँ तुमसे ?
बचपन से आज तक तुम्हारे सिवा
किससे इतना नाता रहा ?

परन्तु कैसे झूठ बोलूँ कि
मैं सिर्फ तुम्हारे लिए जीता हूँ ।
तुम्हें इतना ज़्यादा जानने-पहचानने के बावजूद
अभी कहाँ समझ पाया हूँ ?

तुम्हें चाहने को लेकर भी अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं होता,
तुम हमारी माँ जैसी माँओं की माँ हो, मिट्टी !
परन्तु तुम्हें उतनी ज़्यादा माँ कहाँ मान पाया हूँ ?

अन्न के गर्व से फ़सलों के झुक जाने का रहस्य तुम्हीं तो हो,
गमकते हुए फूलों में प्रतिदिन हज़ारों रंग कौन भरता है ?
करोड़ों सालों से कौन दे रहा है,
धरती को अनमोल हरियाली की सौगात ?

पेड़-पौधे तुम्हारे लाख-लाख कृतज्ञ हैं,
अपने वजूद के लिए,
हे प्राणदायिनी ! तुमने इतनी ममता कहाँ से पाई है ?

तुम्हारे भीतर छिपा है जड़-चेतना के उत्थान-पतन का इतिहास
तुम्हारे मौन में क़ैद है मानव-सृष्टि की महागाथा
तुम हो, तो पृथ्वी लाख कठिनाइयों के बावजूद,
लाखों वर्षों से अपने कोने-कोने में ज़िन्दा है ।

बदरंग, बेस्वाद, बेजुबान
माटी ! देखने में तुम कितनी मामूली
पर जीवन के लिए कितनी अनिवार्य
तुम्हें देखकर बार-बार भ्रम होता है
कि छोटा होना क्या वाकई छोटा होना है ?
नीचे रहने का अर्थ क्या सचमुच नीचे रहना है ?

तुम्हारा न हो पाने की विकट पीड़ा में
बेहतर छटपटाता रहता है हृदय
तुम्हारे बग़ैर निरर्थक होते जाने की तड़प
मैं किससे कहूँ ?

जीवन बीतते जाने का मुझे उतना ग़म नहीं
जितना कि अपनी स्वार्थपरता वश
तुम्हें हर पल खोते जाने का है ।
कूड़ा-करकट से भरा हुआ शरीर
एक न एक दिन तुम्हीं में विलीन हो जाएगा—
पता है मुझे

किन्तु तुम्हारे आगे कभी
निःशेष कृतज्ञता के साथ नतमस्तक नहीं हो पाया
रात-दिन यही शिकायत रहती है ख़ुद से ।

(अक्टूबर-2010)

गंगा का बनारस

‘जन-जन में श्रद्धा से
गंगा मैया कही जाने वाली नदी का चेहरा
आज पहचानने लायक नहीं रह गया है ।’

पछाड़ खा-खाकर
रात-दिन,
ख़ून के आँसू रोती
अँचरा पसार कर प्राण की भीख माँगती
ज़हर का घूँट पी-पीकर
मौत के एक-एक दिन गिनती ;
गूँगी पराजय की मूर्ति बन गई है गंगा
अरे ! तुम्हारे छूते ही गंगा का पानी
काला क्यों हो जाता है ?
तुम्हारे पास जाते ही
गंगा काँपने क्यों लगती है ?
तुम्हारे नहाते-नहाते
गंगा के विषाक्त हो जाने का रहस्य
अब समझ में आया,
तुमने कैसा प्रेम किया ?
कि भीतर-भीतर सड़ गई है गंगा
तुमने कैसी पूजा की ?
कि जन्म-जन्मांतर के लिए दासी बन गई,
तुमने कैसी श्रद्धा की ?
कि मर रही है नदी
कितना भयानक साबित हुआ, तुम्हारा उसे माँ कहना ?
कितना उल्टा पड़ गया, गंगा का माँ होना ?
सिद्ध हो चुका है तुम पर, नदियों की हत्या का इतिहास
यह नदी है या कोई और ?
जो मात खा-खाकर भी
धैर्य खोने का कभी नाम ही नहीं लेती,
पी जाती है हलाहल अपमान,
सह जाती है, अपने पानी का ‘पानी उतर जाना’
छिपा जाती है तरंगों में, हाहाकारी विलाप
आख़िर यह है कौन ?
जो मर-मिटकर भी
करोड़ों शरीर में प्राण सींचती है;
सदियों से गंगा बनारस के लिए जीती है,

काश, गंगा के लिए बनारस चार दिन भी जी लेता
बनारस बसा हुआ है, गंगा की आत्मा में
मिट्टी में धँसे हुए बरगद के मानिंद
मगर देखो तो
बनारस के लिए गंगा की हैसियत
अहक-अहक कर जीती हुई
बीमार बुढ़िया से भी बदतर है
समूचे शहर का दुख-दर्द धो डालने के लिए
गंगा के पास आँसू ही आँसू हैं,
मगर बनारस की आँखों में
गंगा के लिए आँसुओं का अकाल ही अकाल
रो सको तो जी भर कर रो लेना,
शायद तुम्हारे माथे पर लगा हुआ
गंगा की हत्या का ऐतिहासिक कलंक
थोड़ा-बहुत धुल जाय ।

चाह रहा हूँ

सौ-सौ चेहरे मेरे मुँह पर
सौ-सौ क़ातिल मेरी आँखें,
साँस-साँस में मेरे भीतर,
सौ-सौ विष का ज्वार उमड़ता ।
ख़ुद से ख़ुद की ढोल पीटता
ख़ुद से ख़ुद की पीठ ठोंकता,
ख़ुद ही अपनी ठकुरसुहाती
चित भी मेरी, पट भी मेरी ।

रोएँ जितने ख़ूनी काँटे
मन में प्रतिदिन पनप रहे हैं,
विषधर बुद्धि कुण्डली मारे
पसर रही है खाली सिर में
चाह रहा हूँ, ख़ुद को काटूँ
ख़ुद को मोड़ूँ, ख़ुद को तोड़ूँ,
ख़ुद ही ख़ुद में आग लगा दूँ
ख़ुद को ख़ुद से दूर भगा दूँ ।

चाह रहा हूँ ख़ुद को मारूँ
ख़ुद को पीटूँ, ख़ुद को जीतूँ,
नोंच-नाच लूँ अपना चेहरा,
ख़ुद से खुली बगावत कर दूँ ।।

 

पसीने की एक-एक बूँद

मेरी आँखों में वह प्यास कहाँ ?
जो बूढ़ी नदी की तरह बहती हुई,
तुम्हारी आँखों का दुख छक कर पी जाए ;
इन पुतलियों में मचलती हुई वह बेचैनी कहाँ ?
जो तुम्हारे चेहरे की सख़्त लकीरों को देखते ही
दुनिया में कोहराम मचा दे ;
अरे, धिक्कार है,
मुझमें तो इतनी भी वेदना शेष नहीं
कि औरत होने के बावजूद
तुम्हारे चट्टानी चेहरे की मानवता को श्रद्धांजलि दे सके ।
जबकि देखता हूँ
जगह-बेजगह मुड़-तुड़ गया तुम्हारा शरीर
अपनी भयावह दुर्बलता के बावजूद
मर्दानों जैसी हिम्मत रखता है,
तुम्हारे मुख-मण्डल पर सदियों का सन्ताप विलाप करता है,
अन्दर ही अन्दर
ऐंठकर सूख गई अँतड़ियाँ
क्या तुम्हारी लाचारी का इतिहास बताने के लिए
काफ़ी नहीं ?
आधे से भी आधा पेट खाकर
ख़ून-पसीना एक करने का मुहावरा
आख़िर किसके जीवन पर लागू होता है ?
तुम्हारे जीवन को उजड़ा हुआ बंजर प्रदेश
शरीर को जलता हुआ मकान
और आत्मा को, अन्धकार में भटक-भटक कर
मर जाने वाला घायल पंक्षी
कौन बनाता है ?
किससे पूछूँ ?
तुम इस समय के लिए हो ज़रूर,
मगर अफ़सोस !
यह समय तुम्हारा नहीं है —
इस व्यापारी दौर में ज़िन्दा रहने का
यदि कोई मतलब है, तो सिर्फ़ इतना ही कि
अपने दोनों हाथ, दोनों पैर और उन्मुक्त मस्तक ही नहीं,
इन्कार कर देने वाली आत्मा को भी

चुपचाप गिरवी रख दो ।
अपने दिल पर हाथ रखकर कहो कि
चौबीस घण्टे में कुछ पल के लिए ही सही
सिर्फ़ अपने लिए जीती हो, अपने लिए मरती हो,
झूठ-मूठ का ही सही
अपने स्त्री होने पर गर्व करती हो,
और अगाध विश्वास के साथ
दावा कर सकती हो कि
तुम्हारे बगैर मानवता की एक आँख अन्धी है ।
जी तो करता है
तुम्हें तुम्हारी जगह से हटा दूँ
बहुत पहले से लिखा-लिखाया
तुम्हारा पता-ठिकाना मिटा दूँ
हमेशा के लिए नष्ट कर दूँ — तुम्हारी पुरानी पहचान,
अब पता चला कि यह ‘स्त्री’ शब्द
आँसुओं में डूबी हुई गुलामी का दूसरा नाम क्यों है ?
उखाड़ फेंको वे सारे सम्बोधन,
जो तुम्हें तुम्हारे औरतपन से बाहर नहीं निकलने देते,
धूसर चमड़ी पर बहती हुई
पसीने की एक-एक बूँद की क़ीमत वसूलना
तुम्हें कब आएगा ?
जबकि सारी दुनिया को पता है कि
‘सर्वजनहिताय’ अपना पसीना नहीं, ख़ून बहाने वाला इनसान
पृथ्वी का सबसे क़ीमती इनसान होता है ।

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