मंजु लता श्रीवास्तव की रचनाएँ

पतझर पर कोंपल

पतझर पर कोंपल
संदेश लिख रहे
माघ-अधर जीवन
उपदेश लिख रहे

डाल-डाल तरुवों पर
सरगम के मधुर बोल
आशा के पंथ नये
मौसम ने दिये खोल
समय फिर पटल पर
‘हैं शेष’ लिख रहे

पीत हुए पत्रों से
गबीत चुके कई माह
समय संग जाग रहा
खुशियों का फिर उछाह
नये स्वप्न अभिनव
परिवेश लिख रहे

युग-युग परिवर्तन है
पंथ अलग,अलग गैल
नवविचार, नवदर्शन
नयी क्रान्ति

सूरज का मुखड़ा उदास है

सूरज का मुखड़ा उदास है
निशा काँपती दिन निराश है

अरुणाई पीहर जा बैठी
धूप समंदर बीच समाई
मीनारों पर चढ़ा अंधेरा
धँसी धरा भीतर परछाई
हुआ दिवस संध्या के जैसा
सहमा-सहमा सा प्रकाश है

सर्द हवाएँ निज गुमान में
गुरबत को आँखें दिखलातीं
पात-पात, खिड़की, वातायण
से वह सरसर आतीं-जातीं
कुहरे ने चादर तानी है
बिन कम्बल राही हताश है

बचपन रार करे मौसम से
भागा-दौड़ी करे जवानी
बूढ़ी साँसे काँप-काँप कर
चलती लँगड़ी चाल पुरानी
गीली लकड़ी फूँके पसली
पैर और छाती पास-पास है

रही फैल
डाल-डाल सुखद फिर
प्रवेश लिख

बंधु! गांव की ओर न जाना

बंधु! गांव की ओर न जाना
वर्षों से जो बसा स्वप्न था
वह अब लगता है बेगाना

‌देहरी का आमंत्रण झूठा
रिश्तो में लालच है पैठा
आँगन का बोझिल सूनापन
मुँह लटकाए गुमसुम बैठा
चहल-पहल से भरे बरोठों
का मन में बस बचा ठिकाना

जहाँ नहीं अब नैन बिछाकर
कोई स्वागत करने वाला
माथा चूम पीठ सहलाकर
नहीं बाँह में भरने वाला
पलकों पर उमड़े बादल का
व्यर्थ वहाँ मतलब समझाना

लहराती पीपल छाया को
जहाँ मिला है देश निकाला
निर-अपराध नीम तरुवर को
जिसने मृत्युदंड दे डाला
ऐसे निर्मोही अपनों के
बीच पहुंँच मन नहीं दुखाना

रहे

मैं कुटज हूँ

मैं कुटज हूंँ
हो सका कब मैं पराजित
मैं सदा दुर्जय रहा

कर्म को ही भाग्य माना
कर्म से ही हूँ कुटज मैं
है विषम प्रतिकूल मौसम
पर सरजता हूँ सहज मैं
पीर का अभ्यस्त होकर
मैं सदा निर्भय रहा

हैं जड़ें इस्पात जैसी
पत्थरों को मोम करतीं
फोड़कर पाताल जल को
खींच लातीं तन सरसतीं
जिन्दगी को ध्येय माना
दृढ़ मेरा निश्चय रहा

प्राण में संजीवनी है
हृदय में उल्लास मेरे
वीत रागी मन सुदृढ़ है
कभी भी इत-उत न हेरे
हूँ जितेंद्रिय, स्वयंसिद्धम
सदा ज्योतिर्मय रहा

पाँव हैं पाताल में फिर
भी मैं नभ को चूमता हूंँ
गोद में पर्वत के मैं
अलमस्त होकर झूमता हूंँ
है हवा मुझको लुभाती
नेह ही आसय रहा

शस्य श्यामल पात‌ मेरे
पुष्प हिमगिरि श्वेत सपने
ब्रह्ममय आकाश अंतर
समा बैठा मंत्र जपने
पादपों से तन लिये मैं
हृदय से शिवमय रहा

 

 

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