मणिभूषण सिंह की रचनाएँ

कैसे कवि हो?

धरा छोड़ उड़ते हो!
कैसे कवि हो?
अपनी उपत्यक्ता पर क्षण भर भी
ठहर नहीं पाते हो!
क्या लाते हो?

क्यों गहन घाटियों में
रह-रह कर उतर-उतर जाते हो!
क्या पाते हो?
क्यों वैनतेय सम
अम्बर पथ पर
अभ्रखण्ड गिनते हो!
क्या चिनते हो?

प्रेक्षाकारी तो न हो,
किन्तु प्रेक्षण-बल तो तुमको है!
उस बल के होते हुए
मात्र कल्पक होकर
अपने यथार्थ में रंग भरा करते हो!
क्या करते हो?

सत्याभिधान हो!
फिर क्यों तुम सत्यानृत को गहते हो?
क्या कहते हो?
कल्पनाजन्य-मिथ्यात्व-मूढ़ हो
अपर-लोक रहते हो!
क्यों बहते हो?
किसलिए नहीं तुम भू पर ही रहते हो?
केवल व्योमदहृ सहते हो!
अहरह दह में जा दहते हो!!
सब सहते हो!!!

धरा छोड़ उड़ते हो!
कैसे कवि हो?
अपनी उपत्यक्ता पर क्षण भर भी
ठहर नहीं पाते हो!
क्या लाते हो?

 

अँधेरी रात की बरसात

रात भर पड़ती रही थी बूँद,
नभ में रात भर तारे नहीं थे।
रात भर स्मृति-सी
चमकती बिजलियों की
आग से तपती घटाएँ;
किसी गहरी वेदना में
यूँ गरजती थीं…
कि जैसे खोजती हों…
रजत विजड़ित स्वप्न का सुख,
या प्रणयिनी के नयन का हास,
या बीते दिनों का हर्षमय उल्लास,
जब आकाश तिमिरांकित नहीं था!

धवल निर्मल चाँदनी थी,
व्योम का आँगन सितारों से सजा था।
सब तरफ बस स्निग्ध, शीतल,
शांतिमय वातावरण में
नेह का मधुरस भरा था,
और जैसे दिव्य श्वासोच्छ्वास-सी
मंथर हवाएँ डोलती थीं।

विकल मन पर
उमड़ बहते
ख़्वाब के सैलाब को
उस वक़्त तक
बाँधा नहीं था।
कल्पना उन्मादिनी के
विकच व्याकुल भाव के संभार को
मति-मेखला से
तब तलक साधा नहीं था।

रात भर होती रही बरसात,
बाहर और अंदर धुल चुका था!
चित्र स्मृतियों के मनोरम
त्वरित-गति अविराम से
मन के पटल पर
बह रहे थे!!
खुल रही थीं
ग्रंथियाँ सविशेष,
रह-रह कर स्वयं के क्रोड़ में;
विद्युत विभा वैभव लुटातीं!!!

दीप्तिमय प्रज्ञान
अंतः का बहिः तक
और सुख का भान
दुख के घनपटल पर।

तूलिका मन की
विचारों से रँगी,
कुछ शून्य का आस्वाद लेकर
मौन-सुमुखर,
शांत-उच्छल…
दिग्गयंदों के उदग्राघात को
विस्तीर्ण हृत्तल पर
सहज अंकित किये,
कँपती रही थी रात भर तक,
कूँचियों से अंकुशों के स्पर्श
पूरी देह पर,
हर रंग बरसाते रहे थे।
और पूरी रात बारिश हँस रही थी।

तूलिका मन की,
बहिः के तड़ित से थी पूछती
कुछ प्रश्न जैसे,
व्योम के पर्दे हिलाकर
बादलों के पार से
वह कौन रोया था
कि जिसकी गर्जनामय चीख सुनकर
रात्रि की निस्तब्धता के बीच
बूँदों के विषम संगीत में
कल रात भर छाती हिली थी?

छिटकती उन बिजलियों में
दृष्टि किसकी
पार नभ से
धरित्री पर पड़ रही थी?

कौन था वह
जो जगा था रात भर
बरसात का संगीत सुनता,
बादलों के राग से
उर की सुपुष्कल
रागिनी का मेल रखता?

कौन था वह
जो अगम का सुगम से
संवाद सुनकर जग रहा था
रात भर कल?

रात भर बरसात का स्वर
कान में पड़ता रहा था,
इस तरह;
जैसे कि अंतर्तूलिका को
मिल रहे हों
प्रश्न के हल।
किन्तु मन की तूलिका ने
जलकणों की वृष्टि से
युगपत समागत उत्तरों को
प्रश्न के विभ्रम विकर से
कर समेकित
सृष्टिगत शून्यत्व का
साधन किया था,
रात भर तक।
रात भर पड़ती रही थी बूँद,
नभ में रात भर तारे नहीं थे।

वांछित

थोड़ा विराम चाहिए मुझे।
विश्रामधाम चाहिए मुझे।
मैं चाह रहा गृहपोतक-वर।
कविता-कुमुद्वती-केलि-सुतर।
वितमस्क-विवर वितरिक्त-वितर।
पाने को प्रज्ञावृद्धि प्रवर।
भोगोपराम चाहिए मुझे।
उपलम्भग्राम चाहिए मुझे।
कमलिनी-कूल चाहिए मुझे।
सद्धर्म-मूल चाहिए मुझे।
मुझको सविता का पथ दे दो।
जग-दरस हेतु रवि-रथ दे दो।
दारुण-भट अप्रतिरथ दे दो।
अम्बर-निरभ्र अवितथ दे दो।
वर्तनामूल चाहिए मुझे।
परिखा-दुकूल चाहिए मुझे।

सोज़ेचश्म

हर कोई हर जगह ढूँढ़ रहा होता है:
अपने अक्स की तासीर!
कोई झील हूँ मैं।
चाहो तो झाँक कर देख लो…
अपनी परछाई!

वक़्त-बेवक्त
प्यासी होती है झील भी,
झील की प्यास…
कितनी गहरी!
कितनी बेताब!

ये सोज़ेचश्म जब बढ़ता है,
बेइंतहा बढ़ता है।
तिश्नगी और-और गहरी होती है।
उसे चाहिए होता है:
पुरनूर चाँद!

झील अपने सीने में समेट लेना चाहती है,
चाँद की ठंढी आग!
किरणों की उजास भरी लपटें।
तसव्वुरात की परछाईयाँ!

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