मदन वात्स्यायन की रचनाएँ

उषा-स्तवन-2

जिस के स्वागत में नभ ने बरसा दी हैं जोन्हियाँ सभी,
और बड़ ने छाँह बिछा डाली है,
वह तू उषा, मेरी आँखों पर तेरा स्वागत है ।

पत्तों की श्यामता के द्वीप डुबोते हुए हुस्न हिना के
गन्ध ज्वार-सी
हरित-श्वेत जो उदय हुई है,
वह तू उषा, मेरी आँखों पर तेरा स्वागत है ।

एक वस्त्र चम्पई रेशमी, उँगली में नग-भर पहने
स्नानालय की धरे सिटकनी —
वह तू उषा, मेरी आँखों पर तेरा स्वागत है ।
क्षण-भर को दिख गई दूसरे घर में जा छिपने के पहले
अपने पति से भी शरमा कर,
वह तू उषा, मेरी आँखों पर तेरा स्वागत है ।

उषा-स्तवन-3

मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
वह अप्सरा है ; उस का कभी ब्याह नहीं हुआ,
उस के प्राण घर-द्वार की बलिष्ठ वल्गा से निर्बन्ध हैं ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।

सुबह के प्रकाश में वह अलबेली अरुणाभिसारिका
ख़ाली पैरों चुपके आ कर मेरी खिड़की में झाँकने लगी ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।

शत-शत सोतों में बह रहा था तकिए से उतर कर मेरी
पत्नी के केशों का अन्धकार,
उस ने सीखचों में हाथ डाल कर उन केशों को ही पकड़ लिया !
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।

जब मेरी पत्नी की नींद उचटने लगी तो हरिणी-सी भाग भी खड़ी हुई ।
पुकार कर कहती गई, कल फिर आऊँगी । मैं ठहर पड़ा ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।

उषा-स्तवन-4

प्रकाश और छाया की सन्धि पर
श्याम-शुभ्र क्षीर-सरोवर के तीर पर मैंने उषा-देवता
को देखा था !
श्वेताभ-नील सौगन्धिक पर वह खड़ी थी,
धवल-सुनहली शेफालिका के पहने गहने ।
सफ़ेद-हरे अंगूरी वस्त्र ने
पतले कुहासे-सा उसे आधा ही ढँक रखा था ।
वह हँसी
मानो गुलाबी बादलों को भेग कर वास

उषा-स्तवन-5

अरे रे, किरणों की कोसी ने अपने कगारे ढहा दिए हैं,
दूर तक सर्वत्र वेग से टूटता पानी उमड़ता-घुमड़ता चारों
ओर फैल रहा है ।
अन्त तक स्थिर बलता वह एक अकेला शुक्रतारा दीप
दो अंगुल, चार अंगुल, दस अंगुल, रोशनी में धीरे-धीरे
डूब जाता है ।

न्ती चाँदनी
चमक उठी हो ;
और सरोवर में कूद गई —
अपनी डूबती बाईं उँग

उषा-स्तवन-6

स्वस्ति, स्वस्ति तेरा आना !
ओ रोशनी की बेटी, आसमान की हरिणी, किरणों
के केश वाली ।
सपनों के आँचल वाली ! देवताओं की ईर्ष्या, मनुष्यों की आशा,
राक्षसों की विपत्ति ! अमीरों की अनदेखी, ग़रीबों की मसीहा !
विद्युत्-वर्णा ! वीणावादिनी ! शक्तिदा ! सुप्रभा !
स्वस्ति, स्वस्ति तेरा आना !

लियों में फिर आने का इशारा लिए ।

नख-शिख

आकाशगंगा में न बहते द्वीप होत हैं,
न उषा से पहली किरण में कोई रंग
प्रिये दोनो ओर तेरे काले बालों के
बीच में तेरी माँग है ।

रूप सागर के तीर पर मेरी कल्पना ने सुना प्रकृतिश्री
कह रही थी—
रूपवानों मैं नारी हूँ
नारी के अंगों में नाक
नाकों में सुश्री प्र की नासिका

चाँद में है
ठण्डी रोशनी
पुतलियों में तेरी
अन्धकार चमाचम
उसके पत्ते सारे ज़िन्दगी लाल किसलय रहते हैं
जिनकी कोरों में खिलती हैं बारहों मास बेलियाँ—
प्याली अलका के नाजुक वसन्त के
या तेरी हँसी के ।

बेली की कौड़ियों जैसे तेरे नन्हें नन्हें हाथ
जो मेरी अंजलि में बसते थे
माँ के डैनों तले
चूजों जैसे ।

बेगहनों के तेरे गोरे अंग है और
बे-बेलबूटों की तेरी श्वेत साड़ी
चारों ओर उजले बादल हैं
और ग्लावा चमक रही है

 

ऋतु संहार

मेरे हाथ के अबीर से यह अभी तक लाल है
और बेली की कौड़ियों की मेरी माला से
अभी तक सुगन्धित
तकियों के बीच में पड़ा यह लम्बा बाल
प्रिये, तेरे वियोग में मुझे डँस रहा है ।

वही शिद्दत, वही दुपहर, वही कछमछ, वही शोले—
और तब वही ठण्डी बयार ।
प्रियतमे बस तू नहीं है
और वह बात नहीं है ।

न तहजीब से, न शर्म से, न नज़ाकत से बँदे
उठे जो कोने से तो भरभराते भर गए बादर,
बरस पड़े—
गोया कि तेरे वास्ते ओ प्रिये, हमारा प्यार हों ।

तूने जो वह हरसिंगार की माला टाँग दी थी,
उस का एक एक सूखा कण उड़ गया
कि हमारे सोने के घर की दीवार पर काँटी से
आज भी लटका है
मकड़ी की डोर सा पतला उसका तागा ।

शरद और फागुन-चैत के बीच
उफ, कैसी यह सन्-सी लग रही सर्दी
तेरे ओंठों से जैसे कि निकला था,
‘कल जाऊँगी ।’

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