मनु भारद्वाज की रचनाएँ

दिल चीख पड़ा दिल में मेरे आग लगा दी

दिल चीख पड़ा दिल में मेरे आग लगा दी
ये किसने मेरे दर्द को आवाज़ लगा दी

आँखों से नींद उड़ गई, दिल से सुकूँ गया
तुमने तो जिंदगी में मेरी आग लगा दी

साक़ी की निगाहों का ता’असुर था न रुका
हालाके अहले-होश ने भी मुझको सदा दी

दीवाने से जो -” पूछा बता जिंदगी है क्या ?”
उसने शमा जलाई और हंसके बुझा दी

होकर करीब कितने रहे दूर-दूर आप
फुरक़त की मुझे आपने बेवजह सजा दी

आँखों ने कह दिया है ‘मनु’ तेरे दिल का हाल
जो बात छुपानी थी वही बात बता दी

वफ़ा का सिलसिला मैंने हमेशा ही निभाया है

वफ़ा का सिलसिला मैंने हमेशा ही निभाया है
जिसे समझा था मैं अपना, हकीक़त में पराया है

जफ़ाओं का गिला कैसा, अदावत की शिकायत क्या
तेरा ग़म जब मिला मैंने कलेजे से लगाया है

जहाँ देखो, वहीं बस खौफ है और खौफ की बातें
मै जिससे डर रहा हूँ वो तो बस मेरा ही साया है

वो शायद शहर में इंसानियत को ढूंढता होगा
जो अपनी हसरतों का गाँव तन्हा छोड़ आया है

इसे किस्मत ही कहते हैं कि दस्तक भी न दे पाया
‘मनु’ तेरा, तेरे दर तक पहुँचकर लौट आया है

तड़पा के रख दिया है दिले-बेक़रार ने

तड़पा के रख दिया है दिले-बेक़रार ने
मुझको तो मार डाला तेरे इंतज़ार ने

शाख़ों पे फूल खिल न सके ख़ार बन गए
क्यूँ देर कर दी आने में फस्ले-बहार ने

मुझको तो इससे पहले कोई जानता न था
मशहूर कर दिया है मुझे तेरे प्यार ने

मालूम नहीं कब मेरी दुनिया लुटी, मुझे
हाँ इतना याद है कि मुझे लूटा यार ने

वो हाल मेरा पूछने आये थे मेरे घर
अफसाना कह दिया मेरे उजड़े दयार ने

वो किसपे ऐतबार करे ऐ ‘मनु’ बता
जिसको तबाह कर दिया हो ऐतबार ने

हम कहीं पहले मिले हों क्या कभी ऐसा हुआ

हम कहीं पहले मिले हों क्या कभी ऐसा हुआ
आपका चेहरा मुझे लगता है कुछ देखा हुआ

इसमें शायद दखल है किस्मत का मेरी दोस्तों
जिंदगी की राह में जब भी हुआ धोका हुआ

मैंने तो इन्सां बनाया ये ख़ुदा ही बन गया
सोचता होगा ख़ुदा भी अर्श पर बैठा हुआ

लड़खड़ाने पर हमारे लग गई पाबन्दियाँ
ज़िन्दगी के साथ कुछ इस तरह समझौता हुआ

है ज़माना-ए-तरक्क़ी या तरक्क़ी का ज़वाल
आदमी लगता है जैसे नींद में चलता हुआ

खुशबुएँ ही खुशबुएँ बिखरा गया है हर तरफ
कौन गुज़रा है यहाँ से ऐ ‘मनु’ हँसता हुआ

गुमनामियों के शहर में घर ढूँढ रहा हूँ

गुमनामियों के शहर में घर ढूँढ रहा हूँ
मुमकिन तो नहीं लगता है, पर ढूँढ रहा हूँ

आँखों से नींद, दिल से सुकूँ छिन गया मेरे
मै तेरी इनायत की नज़र ढूँढ रहा हूँ

तुमको ख़ुदा से माँग लिया हाथ उठाकर
अब अपनी दुआओं में असर ढूँढ रहा हूँ

फिरता हूँ चाक-चाक गरेबाँ लिए हुए
ऐ हुस्न तुझको शामो-सहर ढूँढ रहा हूँ

सजदे को तेरे, मेरी जबीं बेक़रार है
दहलीज़ तेरी और तेरा दर ढूँढ रहा हूँ

हर लम्हा मेरे साथ वो रहता है ऐ ‘मनु’
दैरो-हरम में उसको मगर ढूँढ रहा हूँ

 

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