मनोज छाबड़ा की रचनाएँ

मुझे विश्वास है

मुझे विश्वास है
जिन लड़कियों ने मुझसे प्यार नहीं किया
उन्हें
अब थोड़ी-सी नाराज़गी ज़रूर होगी स्वयं से

घटता जाता होगा प्रेम अपने पतियों से उनका
अक्सर सोचती होंगी अकेले में
मेरे और मेरे मित्रों के बारे में

जब भी बढ़ती महंगाई की चिंता से बचना चाहती होंगी
मेरे साथ-साथ
मेरे उन दोस्तों को भी याद करने लगती होंगी
जिन्हें
उन्होंने प्यार नहीं किया पिता-भाई से डरकर

लगता होगा कभी उन्हें
जो एक बार तेवर दिखा दिए होते
तो शायद
आज वे वहाँ न होतीं

हालाँकि
जानता हूँ मैं यह भी
कि
तब वे मुझसे प्यार न करती
वे उन्हीं पुरुषों के बारे सोचती
बहुत प्रेम से
जिनसे अब पति के रूप में
नफ़रत करती हैं

उसके चेहरे पर

उसके चेहरे पर
मुस्कराहट का महासागर था
उसकी
नमकीन हँसी में
शंखों से लदी नावें थीं
वहाँ मछुआरे नहीं थे
इसलिए
वह स्वतंत्र मीन

मैं लिखता हूँ कविताएँ

मैं लिखता हूँ कविताएँ
अपने पुत्र के लिए
उसके मित्रों के लिए
अपनी बेटी के लिए लिखते समय
मैं उसके लिए भी लिख देना चाहता हूँ
जिससे एक दिन वह प्रेम करेगी

प्रेम करने वालों के लिए लिखूँगा मैं कविताएँ
माँ के लिए
पिता के लिए
भाई के लिए ज़रूर लिखूँगा मैं
उसे एक दिन
हो जाना है पिता मेरे लिए

उनके लिए नहीं लिखूँगा मैं
जिनके पास
प्रेम की पराजय के ढेरों किस्से हैं

-सी
फिसल-फिसल जाती थी
मेरे जीवन से

मैं एक बार फिर आऊँगा

मैं एक बार फिर आऊँगा
और
पतझड़ों को समेटने का प्रयास करूँगा
सूखे फूलों को चटखाऊँगा एक बार फिर
गर्म दुपहरी में
विश्व पर तानूँगा छाता
थोड़ा धान उगाऊँगा
थोड़ी गेहूं

बच्चों के लिए खरीदूँगा
पुस्तकें और सफ़ेद कागज़
दूँगा उन्हें
जल-रंग ब्रुश

मैं नहीं तो
कम-से-कम वे ही
रंगों से भर दें
मटमैली और उदास दुनिया को

हिसार

हिसार!
बिना दरवाज़ों का एक शहर
एकदम खुला
सुबह
मुर्गे की आवाज़ से नहीं
किसी-किसी घर में
चिड़ियों की आवाज़ से होती है

सबसे पहले इस शहर में
बिहार जागता है
सच है
सारे मुल्क में सबसे पहले बिहार जागता है
सबसे पहले
बर्तनों में चावल उबलता है
शहर जगता है जब लेबर चौक में
बिहार दृढ़ता से डटा होता है
सैकड़ों कोस दूर
मुंबई तक ये समाचार पहुँचता होगा ज़रूर
जहाँ
मैथिली-भोजपुरी ज़ुबान पर
बैठाया जा चुका है कर्फ्यू

बिहार का हिसार से
रिश्ता है कुछ वैसा ही
जैसा
मेहनत का प्रगति से
यदा-कदा
कुछ चिड़चिड़े लोग
मुंबई बना देना चाहते हैं हिसार को
परन्तु
अगली सुबह
वही लोग
ढूँढते हैं लेबर चौक में
ट्राँजिस्टर साईकिल से बाँधे
घूमते-फिरते बिहार को

हर शाम
जब गूज़री-महल के खंडहरों से उड़कर
उत्तर की ओर जाते हैं
चमगादड़
बिहार सारा
मनीआर्डर की पाँत में खड़ा होता है

हिसार की ख़ुशहाली
पूरे राष्ट्र की ख़ुशहाली के जैसे
पहुँचती है दूर बिहार में
और
रात देर तक
ताड़ी को याद कर
नाचता है बिहार
हिसार की अधबनी इमारतों में

कभी तो ऐसा ज़रूर हुआ होगा

कभी तो ऐसा ज़रूर हुआ होगा
कि
पतंग उड़कर आकाश हो गई होगी
कि
मछली तैरते-तैरते समुद्र हो गई होगी

कभी तो ऐसा हुआ होगा
कि
पत्थर का बुत बनाया गया हो
और बात करने लगा हो
कि बादलों ने अपने हाथों से
मरुस्थल में कोई नदी बनाई हो

कभी तो ऐसा ज़रूर होगा
कि
भूख
लहलहाते खेत बन जाएगी

झूठ के शो रूम के सामने

झूठ के शो-रूम के सामने
सच की भी एक छोटी-सी रेहड़ी लगती है

सच पर हमेशा
बैठा दिया जाता है पहरा
और
झूठ के पास चतुर सेल्समैन
जो हर ग्राहक को
ज़रूरतानुसार बेचता है झूठ

लाखों सेल्समेन से लदे टेलिविज़न से
जब हम सुनते हैं
प्रायोजित ख़बरें
और देखते हैं कामातुर साँसों को
ढेरों प्रेमियों से घिरी प्रेमिका को
तब
सच की टूटी रेहड़ी के पहिए पर
झूठ का अल्सेशियन कुत्ता
पेशाब कर जाता है

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