मनोज मानव की रचनाएँ

अपने गुरु नीरव-नीरव हैं

अपने गुरु नीरव-नीरव हैं, करते निज कर्म बखान नहीं।
अनमोल करें उपदेश हमें, बस कर्म करो अभिमान नहीं।

हम पास गये जब भी गुरु के हमको उनसे नव ज्ञान मिला,
वह थाह लिये कितनी, इसका हमसे लगता अनुमान नहीं।

उर में अपने जब प्रश्न उठे करते उर से उसका हल हैं,
हम सोच रखें उर में कब क्या इससे गुरु जी अनजान नहीं।

पल भर यदि हो उपलब्ध किसी कवि को पढ़ते हम ध्यान लगा,
यह मन्त्र मिला गुरु से हमको इससे बढ़ के कुछ ज्ञान नहीं।

गुरु पादस्थान वही जग में मिलता हमको सब ज्ञान जहाँ,
नतमस्तक हो हम ध्यान करें गुरु गौरव का प्रतिमान नहीं।

कुछ लोग मिले जग में हमको जिनके अभिमान भरा उर में,
जब ज्ञान मिला सँग छोड़ गये गुरु का करते फिर मान नहीं।

जब ज्ञान मिला पहचान बनी पर मानव धूर्त उन्हें कहता,
पहचान बनाकर जो अपने गुरु का करते गुणगान नहीं।

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आधार छन्द-दुर्मिल सवैया (24 वर्णिक)
सुगम मापनी-ललगा 8
पारम्परिक सूत्र-स 8

छोड़ दे तू दम्भी बातें

छोड़ दे तू दम्भी बातें, दृढ़ होंगे रिश्ते-नाते,
जंग आपसी छिड़े तो, हार जाना चाहिए.
जरा-सी बढ़ा के प्रीति, मन दूजो के ले जीत,
सदा अपनों में बैठ, बतलाना चाहिए.

हुए एक के हैं चार, टूट गए परिवार,
चार के ही चार देखे, नित परेशान हैं,
झूलते थे मिल झूले, जलते थे साँझे चूल्हे,
जिनका बच्चों को लाभ, समझाना चाहिए.

घर-घर की कहानी, नशे में लुटी जवानी,
खतरे में घिरी हुई, आन-बान-शान हैं,
बचा घर एक-आध, नित्य बढ़े अपराध,
झूम रहे युवकों को, लठियाना चाहिए.

फैल रहा अविश्वास, बैरी हुई बहू सास,
टी वी सीरियल आज, हुए बेलगाम हैं,
रिश्तों में बढ़ी हैं खाई, रोज हो रही लड़ाई,
गाँव-गाँव गली-गली, एक थाना चाहिए.

बढ़ी है या घटी शान, छोटे हुए परिधान,
फटे हुए कपड़ों का, फैशन भी आम है,
लाज अनमोल जान, अपने को पहचान,
बहू-बेटियों को कुछ, शरमाना चाहिए.

जहाँ देखिए इंसान, बना हुआ है शैतान,
लाल-लाल रक्त से जो, रँगें हुए हाथ हैं,
दिया दान भगवान, रच मानव महान,
सच सिद्ध कर यह, दिखलाना चाहिए.
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आधार छन्द-मनहर घनाक्षरी (31 वर्णिक मापनीमुक्त)
विधान-16, 15 वर्णों पर यति अनिवार्य, 8, 8, 8, 7 पर यति उत्तम, अंत में गा।

अभिमान किया जिसने

अभिमान किया जिसने दुनियाँ उसका करती गुणगान नहीं।
वह जीवन-जीवन क्या जिसकी जग में अपनी पहचान नहीं।

तब लाज नहीं हमको लगती जब शौच खुले हम हैं करते,
यह भारत साफ रहे अपना इसका रखते हम ध्यान नहीं।

बिटिया अपनी कहती सड़कों पर दूभर आज हुआ चलना,
लड़के कुछ देख कसे फबती करते हम मूल निदान नहीं।

जिसकी लगती जब घात तभी वह लूट रहा जन के धन को,
इस हेतु सहर्ष शहीद यहाँ निज प्राण किये बलिदान नहीं।

यह ज्ञान मिला अनमोल हमें कुछ दान करो हँसते-हँसते,
निज रक्त करें हम दान सदा इससे बढ़ के कुछ दान नहीं।

वह मानव-मानव क्या जिसके हिय प्रीति बसे न बसे ममता,
दुख देख नहीं तड़पा जन जो उसका जग में कुछ मान नहीं।

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आधार छन्द-दुर्मिळ सवैया (24 वर्णिक)
सुगम मापनी-ललगा 8
पारम्परिक सूत्र-स 8

कहने लगे अब वीर सैनिक

कहने लगे अब वीर सैनिक देश की सरकार से।
हम नित्य पत्थर क्यों सहें मत रोकिये अब वार से।

हम हाथ में हथियार लेकर खा रहे नित गालियाँ,
मरना भला लगता हमें अब नित्य की इस हार से।

जब खा रही झटके बड़े तब हाथ में पतवार ले,
तुम डूबती इस नाव को कर पार दो मझधार से।

अब हाथ पत्थर ले जिसे लगने लगा वह शेर है,
वह फेंक पत्थर आज जीवित देश के उपकार से।

बढ़ने लगा नित रोग है इस देश में अब द्रोह का,
यह रोग हो बस ठीक केवल मौत के उपचार से।

नित हाल देख जवान का यह बात मानव पूछता,
अब शेर वंचित क्यों रहें इस देश में अधिकार से।

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आधार छन्द-मुनिशेखर (20 वर्णिक)
सुगम मा

खो चुकी है हँसी, देख रोती हमें

खो चुकी है हँसी, देख रोती हमें,
भारती माँ मिली, शान खोती हमें।

देश में है चली आज कैसी हवा,
सैनिकों की नहीं फिक्र होती हमें।

देश में लूट की, भूख की बात जो,
नित्य काँटे हिया में चुभोती हमें।

जान जाये नहीं देश में भूख से,
चाहिए आज हीरे न मोती हमें।

रो रही मातु गंगा हमें दीखती,
क्यों नहीं दीखती पाप धोती हमें।

लाज खोने लगीं बेटियाँ देश में,
बात ये आँसुओं से भिगोती हमें।

देश की भक्ति की भावना एक जो,
आज भी एकता में पिरोती हमें।

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आधार छन्द-स्रग्विणी (12 वर्णिक)
सुगम मापनी-गालगा गालगा-गालगा गालगा
पारम्परिक सूत्र-र र-र र

पनी-ललगालगा ललगालगा-ललगालगा ललगालगा
पारम्परिक सूत्र-स ज-ज भ र स ल ग

 

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