मनोज मोक्षेन्द्र की रचनाएँ

उम्मीद का आम्रतरु

उम्मीद का आम्रतरु

हर किसी की मन-मृत्तिका
इतनी उपजाऊ है कि
लहलहाई जा सकती है इस पर
उम्मीद तरुओं की फसल

उम्मीद को पाल-पोसकर
झकड़दार-फलदार बनाने में
भोथरा जाती है उम्र की धार,
बंद मुट्ठी की रेत हो जाती है
इस पर चढ़कर
फलों को तोड़ने की क्षमता

बहुत प्राय:
अनपके ही रह गए फलों को
मार जाता है विनाश का पाला,
स्वत: ही सूखकर
निष्पात-निष्फल हो जाती है यह,
इच्छाओं के मानसून
बरसते रह जाते हैं
जबकि पतझड़ इसे
घसीटकर ले जाता है–
विषाद के मरुस्थल में
इसकी चिता सजाने

उम्मीद पालने की कुव्वत
कभी शून्य नहीं होती,
इसके अनचखे फलों को
खाने की भूख लरजती ही रहेगी,
कौन मानेगा मेरा कहा कि
बाज आ जाओ–
इसकी छाया में जीने से

कोई ख़ास ख़बर नहीं है

कोई ख़ास खबर नहीं है

सृष्टि-विसर्जन की भविष्यवाणियाँ
सेक्सी गानों के बीच
ब्रेक के रूप में की जा रही हैं,
बच्चे टी.वी. की टैलेंट हंट सीरियलों में
नाचती-गाती लड़कियों के साथ
कमर मटका रहे हैं
और क्रेजी किशोर-किशोरियां
छतों पर
क्रिकेट में जीत पर
पटाखे छोड़ रहे हैं
जबकि विश्वविद्यालय के भाषा संकाय में
इतरभाषियों का क़त्ल
ठीक राष्ट्रगान के बाद किया जा रहा है

कोई ख़ास खबर नहीं है
जिन भाषाविदों ने मासूम लड़की की
इतरभाषा बोलने के जुर्म में
इस्मत-अस्मत लूट निचाट में
क्रूर ठण्ड की दया पर छोड़ दिया था,
वे मानव-संसाधन विकास मंत्रालय के
शिष्टमंडल की ओर से
विश्व हिन्दी सम्मलेन में
शिरकत कर रहे हैं

बातें कुछ ख़ास नहीं हैं:
सहज आतंकी आदतों में
विस्फोट में हलाख हुओं की ज़िम्मेदारी
बच्चे खुशी-खुशी लेना चाह रहे हैं
और गाँव के मदरसों में बच्चे
कागज़ की नाव से
आर डी एक्स के ज़खीरे
वाया साउथ ईस्ट एशिया
महानगरों में सप्लाई कर रहे हैं

मैं उन लीडरों की
दरियादिली की दाद देता हूँ
जो इन होनहार बच्चों की
हौसला-आफजाई में,
गणतंत्र दिवस पर
सम्मानित करने की वकालत कर रहे हैं

बेशक! इन बच्चों को
खौफनाक विस्फोटक सौंपकर
अभी चन्द्रमा और मंगल पर भेजा जाना है
और यही कौमी माहौल
बाकी गैलेक्सियों में भी फैलाया जाना है

इस साधारणीकृत दौर में
कहने को कुछ ख़ास नहीं है
हाँ! वैज्ञानिक प्रयोगों के तहत
पृथ्वी विनाश की रोमांचक प्रक्रिया में है
जिसे प्रागैतिहास में वापस भेजे जाने के लिए
दिवंगत तानाशाहों के प्रेतों के पुनर्जन्म में
विज्ञान को सफलता मिलने वाली है,
जबकि गुमटियों पर
गरमा-गरम चाय-पकौड़ों की सेल
कुछ ज़्यादा ही बढ़ती जा रही है.

(रचनाकाल: १३-११-२००८ )

यह माँ के आने का संकेत है

जब भोर
सूर्य में से फूटती है,
मलय समीर के विनम्र हाथ
पत्तियों को खनखनाते हैं,
किरण-बालाएं हौले-हौले
घटा-वीथियों से
मटक-मटक चलकर
खिड़कियों के झरोखों से झांक कर
मुस्कराती है,
हवा मालती-चमेली-बेला की लताओं से
देह खुजलाती आँगन में
धुप की चटाई पर बैठ
गुनगुनाती है
तो यह माँ के आने का संकेत है…

जब हवा
श्लोक बुदबुदाते हुए
शिवाले की घंटनाद
अपने कन्धों पर लादे
सिरहाने आ-बैठती है,
गली में सब्जी बेचते ठेलेवाले से
कोई माई करेले या भिंडी मोलती हुई
सादी की छोर से बंधे पैसे खोल
कुंजड़े को गिन-गिन देती है
तो यह माँ के आने का संकेत है…

जब छौंके की गंधिल ध्वनि
रसोई से चल कर डाइनिंग टेबल पर
ता-ता थैया करती है,
जब स्कूल के रिक्शे से
बच्चा ‘माॅम! बाय’ उच्चारता है,
जब तुलसी की क्यारियाँ सींचती
कोई माई खाँसती है
तो यह माँ के आने का संकेत है…

मंदिर में लड़की

ख़ास है, बहुत ख़ास है
मंदिर में लड़की का होना

ज़्यादातर ऐसे समय
जबकि ग्राहक साधिकार
मंदिर में प्रवेश कर
घंटा-घड़ियाल बजाकर
मन्त्र, श्लोक, चालीसा
बुदबुदाकर, गुनगुनाकर
दीनानाथ से
वरदान, आशीर्वाद
और उसकी दया
बेमोल मोल करने आते हैं

इतना ज़रूरी है
लड़की का हर वक़्त
यत्र-तत्र मंडराना
भगवान के ग्राहकों को
लुभाना, फुसलाना, भरमाना,
पुजारियों के इर्द-गिर्द भनभनाना,
उचाट से उन्हें जगाना
और भागवत उपासना में
उनका जी लगाना

इतना शुभ है
लड़की का दान-पात्र के सामने
बार-बार आकर
चंचल अंग-प्रत्यंग फड़फड़ाकर
ठाकुरजी के आगे
करबद्ध खड़ा होना
और अपने चुम्बकत्त्व से
अपने पीछे
जवांदिल भक्तों को खींच लाना
और उन्हें उकसाना
कि वे अपनी मनोकामनाएँ
दान-पुण्य कर पूरी करें

आरती-वंदन करते
भक्तजन आकुलित-अचंभित से
हाथ जोड़े
आँख खोल-खोल बंद करते
आधा-अधूरा दर्शन-लाभ उठाते
कभी-कभार
अन्यत्र व्यस्त लड़की की अनुपस्थिति में
जीवन निस्सार पाते
और पुन: उसके प्रकटत्व पर
फूले न समाते
आद्योपांत रसाबोर होते

अपरिहार्य फैशन के दौर में
अदल-बदल स्टाइलिश पहनावे में
लड़की का बार-बार आना
और गरमागरम चर्चा का केंद्र बनना
फ़िल्मी तारिकाओं से
अपनी तुलना कराना
स्मार्ट हाव-भाव में
बिलापरहेज़ हरेक से बतियाना
कंधे उचका-उचका खिलखिलाकर
दिल की घंटियाँ खनखनाना
मंदिर के कान खड़े करना
और वाकई!
भगवान का कृपापात्र बनना

मास के परहेजी दिनों में भी
लड़की के हाथों प्रसाद खाना
बहुत ज़रूरी है
बरक़त और आमद के लिए
मंदिर के माहौल को
मनसायन बनाए रखना
और भक्त तथा भगवान के बीच
तालमेल बैठाना ।

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