मनोहर अभय की रचनाएँ

भूख

न सही मेरी कविता में
ज्वालाओं की लपट
दहकते तंदूर में पकी
रोटियों की भभक तो है
—जो बढ़ा देती है भूख
दुपहरी में पत्थर तोड़ने वालों की।

मैं चाहता हूँ
भूख लगे
उसे बुझाने के लिए
छलछला उठे पसीना
गमछे से लिपटे माथे पर
ढावे पर आकर बैठे कोई
आधी बाँह के पुराने कुर्ते से
पोंछ कर हाथ
छक कर खाए
प्याज के टुकड़े के साथ
गरमागरम तंदूरी रोटी.

मैं सचमुच चाहता हूँ
भूख लगे
खुरदरे हाथों की तपिस से
पिघल कर पानी-पानी
—हो जाएँ चट्टानें
फूट पड़ें
सैकड़ों दबे हुए निर्झर
रेत फाँकती नदियाँ
भर जाएँ रजत धार से
—लबालब
बलुई मिट्टी में
रोपी गईं
खरबूजे की बेलें लहलहा उठें
घाट पर बैठी किशोरियाँ
धोँएँ मेंहदी रचे हाथ
गरमी की तपन से बेचैन बच्चे
डुबकियाँ लगाएँ
बीच धार में
छोटी-छोटी मछलियों को
वैष्णवी माताएँ खिलाएँ
आटे की

संजीवनीबूटी

लगता है घर के हर कौने में तुम हो
दीवार से चिपकी
दरवाजे की चौखट थामे
या खिड़की पर कुहनी टिकाए
सड़क पर आती-जाती भीड़ में
किसी पहचाने चेहरे को तलाशतीं।

तुम्हारे जाने के बाद भी
ऐसा क्यों लगता है माँ!
कि आधी रात से ही
शुरू कर देती हो रसोई में खटर-पटर
साफ करने लगती हो घड़े, बाल्टी, कलसे
नल के इंतजार में।

महसूस करता हूँ माँ!
तुम्हारी गर्म हथेलिओं का स्पर्श
जब दूखने लगता है माथा
उभर आता है दिलासा देता
तुम्हारा मुखमण्डल
अँधेरे को तीतर-बितर करते
सवेरे के सूरज की तरह।

मथानी में दही बिलोती
सुनाई पड़ती है तुम्हारी गुनगुनाहट
किसी अनसुने गीत-सी
कानों में झनझनाहट-सी भरती
रामचरित की चौपाई
गीता की सीख
या कोई ऋचा।

सच कहूँ माँ!
तुम मेरे लिए गीता का श्लोक थीं
ऋग्वेद की ऋचा
रामचरित की चौपाई
या मूर्छित सुमित्रानंदन को
जीवन देने वाली
संजीवनी बूटी।

गोलियाँ।

पोस्टरबॉय

सारी नागफनियाँ
नौंच कर फेंक दी हैं
समूल;
कुचल कर रख दिए हैं
जहर उगलते साँप।

हलधरो!
चलाओ हल
उगाओ नई फसलें
निशंक होकर;
काले सागर के
आसपास बने श्रमिक शिविरों में
बंधक बनाने वाले
अब शताब्दियों तक
सिर नहीं उठा पाएँगे।

अपने ही बोझ से
धँसक गई है
बर्लिन की दीवार
सिल्करोड पर बिछा दी है
काँटेदार कंक्रीट
खच्चरों की पीठ पर
मसाले लाद कर
आने-जाने वाले सौदागर
नहीं चल पाएँगे
मील दो मील।

खूनी चौक पर
हो रहा है उद्घोष
कटी जुबान वाले युवाओं की
भारी भीड़ ने
छीन लीं हैं
किराये के सिपाहियों की संगीनें
कोई बुलडोजर इसे
कुचल नहीं पाएगा।

दो जून रोटी के क्षुधार्तिओ!
तोड़ दो उन भंडारों के सिंहद्वार
हजारों अनाज की बोरियाँ जहाँ
पड़ी हैं बंदरबाँट के लिए.

वस्तु से विचार पैदा करने वाली
किताब का परिशोधित संस्करण
बाजार में आगया है
सारस्वत साधना के साधको!
खुल कर लिखो
सार्वजनीन खुशियों वाले गीत
तुम किसी के
पोस्टरबॉय नहीं हो।

 

 

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