मनोहर विजय की रचनाएँ

सुनी सुनाई हुई दास्तान बाक़ी है

सुनी सुनाई हुई दास्तान बाक़ी है
नए नगर में पुराना मक़ान बाक़ी है

ये बात सुनके किसी को यकीं नही आता
कि मेरे शहर में अमनो-अमान बाक़ी है

अभी नुमायाँ हैं आसार जिऩ्दगानी के
अभी बदन में हरारत है जान बाक़ी है

इसी मलाल में हैं मुझको लूटने वाले
कि मेरे सर पे अभी आसमान बाक़ी हैं

अभी कमी है ‘विजय’ उसकी मेहरबानी में
अभी कोई न कोई इम्तिहान बाक़ी है

जब फ़क़ीरों पे ध्यान देगा वो

जब फ़क़ीरों पे ध्यान देगा वो
रोटी कपड़ा मक़ान देगा वो

प्यार का इम्तिहान देगा वो
मिस्ल-ए-परवाना जान देगा वो

छेड़ कर मेरे इश्क़ का चर्चा
शहर को दास्तान देगा वो

दिल की बातें ब्यान करने को
गूंगों को भी ज़ुबान देगा वो

ज़ालिमों होश में ज़रा आओ
बेज़ुबाँ को ज़ुबान देगा वो

शौक़-ए-परवाज़ लाज़िमी है ‘विजय’
फिर तुझे भी उड़ान देगा वो

मयक़शों को मस्लेहत से काम लेना चाहिए

मयक़शों को मस्लेहत से काम लेना चाहिए
होश में रहकर ही फ़िर से ज़ाम लेना चाहिए

देख़ कर शक्ल-ए-हसीं दिल कहता है मेरा ये अब
अपने सर पर इश्क़ का इल्ज़ाम लेना चाहिए

छोड़ कर सब नफ़रतें दिल से भुलाकर रंज़िशें
आप को अब हाथ मेरा थाम लेना चाहिए

बढ़ चली है तश्नगी अब किस कदर ऐ दोस्तो
उनकी आँखों से छलकता जाम लेना चाहिए

इस मुहब्बत को बनाकर ज़िन्दगी की ढाल बस
दुश्मनों से दोस्तों का काम लेना चाहिए

जिसने इस दिल को सिख़ाया है धड़कना ऐ ‘विजय’
हर घड़ी उस मेहरबाँ का नाम लेना चाहिए

दोस्तों से बात कहना भी नही आता हमें

दोस्तों से बात कहना भी नही आता हमें
ग़म भुलाने का तरीक़ा भी नही आता हमें

दर्द का अहसास भी उनको दिलाएँ किस तरह
चोट खाकर तो तड़पना भी नही आता हमें

जान खो बैठें न इक दिन करके हम नादानियाँ
दुश्मनों से तो निपटना भी नही आता हमें

हम बता देते हैं वह जो पूछते हैं प्यार से
क्या करें कोई बहाना भी नही आता हमें

खे़ल क्या-क्या ख़ेलते हैं लोग झोंकों की तरह
सूरत-ए-मौसम बदलना भी नही आता हमें

किस तरह दुनिया यकीं कर ले हमारी बात का
झूठ को तो सच बनाना भी नही आता हमें

बात उनसे क्या करेंगें हम मुहब्बत की ‘विजय’
उनसे आँख़ें तो

नीयत-ए-बागवाँ समझते हैं

नीयत-ए-बागवाँ समझते हैं
क्यूँ जला गुलिस्ताँ समझते हैं

वक़्त की हर ज़ुबाँ समझते हैं
हम सभी शोख़ियाँ समझते हैं

फूल-सा चेहरा ज़ुल्फ़ है ख़ुशबू
हम उसे गुलिस्तॉं समझते हैं

चोट खाकर ही दिल पर अकसर लोग
दर्द की दास्ताँ समझते हैं

और कुछ भी नही फ़क़त हम तो
प्यार को इम्तिहाँ समझते हैं

वो ख़ुशी के नशे में डूबे हैं
दर्द मेरा कहाँ समझते हैं

बूटा-बूटा उदास है कब से
अहल-ए-गुलशन कहाँ समझते है

खेलते हैं ‘विजय’ ग़मों से जो
हादिसों की ज़ुबॉं समझते हैं

मिलाना भी नही आता हमें

 

नाम दिल पर इक लिखा-सा रह गया

नाम दिल पर इक लिख़ा-सा रह गया
ज़ख़म कोई बस हरा-सा रह गया

दोस्तों में तज़करा-सा रह गया
दर्द मेरा अनसुना-सा रह गया

वो चुराकर ले गये ताबीर भी
ख़्वाब आँख़ों में सजा-सा रह गया

कौन था वो बेबसी के हाथ में
कौन मुझमें ख़ौलता-सा रह गया

इक सदा को अनसुना करते रहे
कौन हम में बोलता-सा रह गया

किस कदर डर था हवाओं का उसे
रात भर दीपक बुझा-सा रह गया

पार करने को समन्दर इश्क़ के
हाथ में कच्चा घड़ा-सा रह गया

बेबसी में मैं सरे-साहिल ‘विजय’
रक़्स-ए-मौजाँ देख़ता-सा रह गया

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