Poetry

महाराज सिंह परिहार की रचनाएँ

अधूरी आज़ादी…

आज़ादी है अभी अधूरी
पाए न जनता रोटी पूरी
तंत्र लोक से दूर हुआ है
अवमूल्यन भरपूर हुआ है

आज देश टुकड़ों में बँटता जीना हुआ हराम
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम

सपनों की लाशें लावारिस
बेवस की हो नहीं गुजारिश
माली ने गुलशन मसला है
गाँधी का भारत कुचला है

है मसजिद में मौन रहीमा और मंदिर में राम
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम

रक्तों का व्यापार हो रहा
सदियों का आधार खो रहा
मज़हब ज़हर उगलते सारे
लगते हैं नफ़रत के नारे

ओ सुभाष के यौवन जागो, हो न बुरा परिणाम
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम

वन्दे मातरम् के जन-गण हम
इस माटी के कण-कण में हम
अमर जवान न सो पाएगा
देश धर्म पर मिट जाएगा

छीन सके न भोर का सूरज औ’ सिन्दूरी शाम
अभी देश को लड़ना होगा एक और संग्राम

मेरा भारत सिसक रहा है

मौन निमंत्रण की बातें मत आज करो
अंधकार में मेरा भारत सिसक रहा है

सदियों से जो सतपथ का अनुगामी था
सत्य अहिंसा प्रेम सरलता का स्वामी था
आज हुआ क्यों शोर देश के चप्पे-चप्पे
वनवासी का धैर्य आज क्यों दहक रहा है

होता सपनों का खून यहाँ लज्जा लुटती चौराहे पर
द्रोणाचार्य की कुटिल सीख से खड़ा एकलव्य दोराहे पर
महलों की जलती आँखों से कुटियाएँ जल राख हुईं
और सुरा के साथ देश का यौवन चहक रहा है

यहाँ सूर्य की किरणें बंद हैं अलमारी में
यहाँ नित्य मिटतीं हैं कलियाँ बीमारी में
जहाँ वृक्ष भी तन पर अगणित घाव लिए हों
उसी धरा में शूल मस्त हो महक रहा है

नेह निमंत्रण की बातें स्वीकार मुझे
मस्ती-राग-फाग की भी अंगीकार मुझे
पर कैसे झुठला दूँ मैं गीता की वाणी को
कुरुक्षेत्र में आज पार्थ भी धधक रहा है

 

मेरे भारत का पार्थ

कौन हमारे नंदनवन में बीज ज़हर के बोता है
अफ़सोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है

आज चंद्र की शीतलता आक्राँत हुई है।
किरणें रवि की भी अब शांत हुई हैं
मौन हवाएँ भी मृत्यु को आमंत्रण देती
पाषाणी दीवारे भी अब नहीं नियंत्रण करती

शब्दकार भी आज अर्थ में खोता है
अफ़सोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है

हम भूल गए सांगा के अस्सी घावों को
भुला दिया हमने अपने पौरुष भावों को
दिनकर की हुंकार विलुप्त हुई अम्बर में
सीता लज्जित आज खड़ी है स्वयंवर में

राम-कृष्ण की कर्मभूमि में क्रन्दन होता है
अफ़सोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है

बौनी हो गई परम्पराएँ आज धरा की
लुप्त हो गईं मर्यादाएँ आज धरा की
मौन हो गई जहाँ प्रेम की भी शहनाई
बेवशता को देख वेदना भी मुस्काई

रोटी को मोहताज वही जिसने खेतों को जोता है
अफ़सोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है

अब सत्ता के द्वारे दस्तक नहीं बजेगी
क़दम-क़दम पर अब क्रांति की तेग चलेगी
निर्धन के आँसू अगर अंगार बन गए
महलों की खुशियाँ भी उसके साथ जलेंगी

देख दशा त्रिपुरारी का नृत्य तांडव होता है
अफ़सोस मेरे भारत का पार्थ अभी तक सोता है

 

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