Poetry

महेश चंद्र द्विवेदी की रचनाएँ

अन्यों से विशेष

मैं अन्यों से विशेष हूं?
मैं जानता हूं कि जिस दिन
मैं इस संसार में जन्मा था,
वह न तो कोई दिवस-विशेष
और न कोई पल-विशेष था;

मेरे जैसे सहस्रों ने उसी दिन
उसी पल जन्म लिया था,
मेरे जैसे उनके लिये भी
ढोलक बजी थी, बताशे बंटे थे;
उनके बाबा-दादी के झुर्रियों भरे
चेहरे पर भी मुस्कान आई थी,
फिर भी न जाने क्यूं लगता है
कि मेरा जन्म अन्यों से विशेष था?

मैं जानता हूं कि उस दिन
सूरज पूरब में ही निकलेगा,
ब्राह्मवेला में मंथर-वायु,
शीतलता के साथ ही आयेगी;
आकाशीय लालिमा प्रतिदिन
की भांति पूरब में छायेगी,
छत की मुंडेर पर
चिरौटा चहकेगा, गौरैया चहचहाएगी;
पृथ्वी किंचित नहीं दहलेगी
जब मेरी विदाई की वेला आयेगी ।

फिर भी न जाने क्यूं लगता है
कि वह पल कोई विशेष होगा?
उस दोपहर भी ग्रीष्म की धूप चमकेगी
अथवा हेमंत की ठंडी बयार बहेगी,
पसीने से होंगे श्लथ लथपथ
अथवा ठंड से सिकुड़ते होंगे सब;
जब मेरे ठंडे शांत बदन को
बर्फ़ की सिल्ली पर लिटाया जायेगा,
और फिर लकड़ी के ढेर में
घृत डालकर धू धू जलाया जायेगा;

पर लगता है कि मैं उस भीड़ में
खड़ा देख रहा होऊंगा यह सब,
मना रहा होऊंगा अपना ही शोक,
क्यूंकि मैं अन्यों से विशेष हूं ।

एक नास्तिक का स्वत्व

पता नहीं भूत में कहीं था
अथवा कहीं भी नहीं था
मैं
और मेरा अस्तित्व,
और पता नहीं क्यों,
किसलिए,
और किसके लिए
उत्पन्न हुआ है मेरा स्वत्व?

पर मैं इतना जानता हूँ
कि संक्षिप्त अवधि
एवं
सीमित समय के लिए ही सही
मैं मैं हूँ,
और मेरे साथ है मेरा अहम्,
जिसको न कोई झुठला सकता है
न कह सकता है वहम ।

मैं यह भी जानता हूँ
कि
ब्रह्माण्ड के अनंत विस्तार में
स्थित एक बिन्दु
एवं
समय की अनादि खोह में
अप्रतिम उत्सर्जन के एक क्षण
की उत्पत्ति हूँ मैं ।

धनात्मक विद्युत का आवेश
ज्यों मदमस्त हो
ऋणात्मक विद्युत के
आवेश से मिलता है
और
आनंदातिरेक में तड़ित टंकार करता है
ऐसे ही किसी चरम-आनंद के मिलन
की कृति हूँ मैं ।

आस्तिकों का कहना है
कि ब्रह्म निर्लिप्त है
निस्पृह है,
परन्तु फिर भी सर्वदृष्टा एवं सर्वनियन्तः है
समस्त जगत का उत्पादक एवं संचालक है

जड़ एवं चेतन की उत्पत्ति
उसी की इच्छा पर निर्भर है

मैं कैसे मान लूँ
यह कुतर्क,
एक स्पष्ट विरोधाभास ?

क्यों स्वीकार करूँ
कोई ब्रह्म साकार अथवा निराकार
एक काल्पनिक सत्ता को व्यर्थ में क्यों दूँ
अहंकार का अधिकार ?

किशोर मन

तप्त
रेत के बीच पड़ा,
मरुथल मे तपता गागर है

लवणयुक्त
जल से प्लावित,
चिर-अतॄप्त तॄषामय सागर है

आतुर आकाश

क्षितिज मे आतुर आकाश को धरा से है मिलते देखा,
बाँहों मे भरने के प्रयास पर जो बन जाता है मरीचिका;
आकाश विशाल है, उसका अनुभव और विस्तार है महान,
क्षितिज है मृगतृष्णा, फिर भी वह इस सत्य से अनजान ।

यह मन क्या है ?

क्यों गहराता है इसमें कभी,
एक सुरंग का सा अन्धकार?
क्यों बंद हो जाते हैं, जैसे
प्रकाश के समस्त द्वार?

जहाँ एक भटकी किरण भी
घुसने में सहम-सहम जाती है,
सूर्य की धूप और
चाँद की चांदनी में भी
केवल अनंत शून्य की
कालिमा नज़र आती है

और जितने भी खोलें हम, गुंथते जाते हैं तिमिर तार,
क्यों गहराता है इसमें कभी एक सुरंग का सा अन्धकार?

क्यों कभी छा जाती है,
इसमें श्मशान सी शांति,
जिसमे चिडियां चहचहाने से
पत्ते खड़खड़ाने से भय खाते हैं
रात्रि में डाल पर बैठे उलूक भी
सहसा सहम कर चुप हो जाते हैं
कर्णकटु कोलाहल में भी सूनापन रहता है अभेद्य अनंत ।

क्यों कभी छा जाती है इसमें श्मशान सी शांति?
क्यों कभी होने लगता है
इसमें शंकर का तांडव नृत्य?
बजने लगते हैं ढोल और नगाड़े
जलने लगतीं है बहुरंगी शलाकाएँ
उछलते कूदते हैं पिशाच व डाकिनी
लेकर नरमुंड और कटी फटी भुजाएं
ज्यों शंकर के गर्जन से कम्पित हो विश्व का अस्तित्व ।

क्यों कभी होने लगता है इसमें शंकर का तांडव नृत्य?
क्यों बजतीं हैं कभी
नीरवता में मंदिर की घंटियाँ इसमें?
क्यों महकते हैं पुष्प, धूप और चंन्दन
क्यों गूंजते पुजारी के श्लोक और वंदन?
क्यों लगता है
कृष्ण ने वंशी को होंठो पर साधा,
और निहार रहीं हों
उन्हें तिरछे नयनो से राधा?
पुष्पित होने लगती हैं मंजरी, बहने लगते हैं झरने ।
क्यों बजतीं हैं कभी मंदिर की घंटिया इसमें?

मानव मन महासागर
सम है अनन्त और अथाह
जिसमें आइसबर्ग सम
दृष्टव्य है केवल चेतन
हमारे अनुभवों, आशाओं, कुंठाओं
का भंडार है अवचेतन
वही भरता है चेतन मन में
अशांति और अंधकार
बजाता है मंद-मंद घंटियाँ या करता है तांडव साकार.
और फिर जिज्ञासा करता है स्वयं ही
कि “यह मन क्या है?”

विश्व हिन्दी सम्मेलन

उस वर्ष लंदन में
विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित था ।
कुछ लेखन से, कुछ तिकड़म से
मैं भी आमंत्रित था।

समापन के दिन तक रोज़, कुछ तुक के,
कुछ बेतुके भाषण सुनकर मैं थक चुका था ।
वक्ताओं का भाषणबाज़ी का राष्ट्रीय शौक,
लन्दन पहुँचकर द्विगुणित हो चुका था ।

समाप्ति पर लम्बी जम्भाई लेता हुआ मैं
बाहर निकला, चाह थी एकान्त की,
अतः चल दिया टेम्स नदी की ओर
जहाँ घटाटोप बादलों से घिरी शाम थी ।

लन्दन ब्रिज से उतरकर टेम्स के किनारे बने
पैदल पथ पर एक खाली बेन्च पर बैठ गया ।
निर्जनता के सम्मोहन ने मन मोह लिया,
लहरों का कलकल स्वर ह्रदय में पैठ गया ।

तभी बाईं ओर बेंच पर अकस्मात
किसी अजनबी की उपस्थिति का भान हुआ ।
अचानक वहाँ एक बूढ़े अँग्रेज़ को देखकर
मन में भय उपजा, शान्ति का अवसान हुआ ।

‘हलो! कैसा रहा वर्ल्ड हिन्डी कांफ़्रेन्स ?”
मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह पूछ बैठा ।

मैं अचकचाया, पर सहज होकर बोला, “ठीक ही था,
मुख्यतः हिन्दी की दुर्दशा पर मातम था ।”

बूढ़ा ठहाका लगाकर हँसा, फिर बोला,
“मैं जानटा था और कुछ हो ही नहीं सकटा”,
असीम जिज्ञासा से भरकर मैने पूछा,
“परन्तु सर! आप कैसे जानते थे?”

बूढ़ा गूढ़ मुस्कराहट के साथ बोला,
“तुम हिन्डुस्टानी लोग!
हिस्ट्री को न तो ठीक से पढ़ता है
और न उससे कुछ सीखता है ।

तुम समझटा है कि
आज़ाडी पाकर तुम गोरों से अज़ाड हो गया है?
हमने दो सौ साल पहले अपनी पालिसी से
हिन्डुस्तान में ऐसे काले अन्ग्रेज़ पैदा कर दिए थे
जो हिन्डुस्तान की किसी भाषा पर न तो गर्व करें,
और न उसे राष्ट्रभाषा का सम्मान दें ।

अब भी हम ऐसे हिंडुस्टानी अन्ग्रेज़ पैदा कर रहे हैं
जिनका हिन्डुस्टान की हर व्यवस्था पर राज रहेगा ।
हिंडुस्तान पहले गोरे अन्ग्रेज़ों का ग़ुलाम था,
अब काले अन्ग्रेज़ों का रहेगा ।”

आत्मसम्मान पर आई चोट से तिलमिलाते हुए
मैने रुखाई से उस बूढ़े से पूछा, “बट हू आर यू?”
वह पुनः ठहाका लगाकर बोला,”लॉर्ड मैकाले को
बिन जाने ही टुम हिन्डी को प्रटिश्थित करने आया है ?”

यह कहकर वह बूढ़ा
मेरे पलक झपकाते ही अन्तर्धान हो गया,
परन्तु लॊर्ड मैकाले के भूत का अट्टहास
देर तक टेम्स की लहरों के साथ तैरता रहा ।

एक अदना स्टेशन

मैं चिरक्लांत, अनिद्राविक्षिप्त,
अदना-सा एक रेलवे स्टेशन हूं ।
लोकल, मेल और माल
सभी गाड़ियां यहां आतीं हैं,
कुछ रुकतीं हैं, कुछ धड़धड़ाती चली जातीं हैं ।
पर मुझे झकझोरने में कोई नहीं चूकती है ।
मैं शांति को तरसता हूं, निद्रा का प्यासा हूं ।
निर्मम हो मुझे निशिदिन जगातीं हैं रेलगाड़ियां ।

मैं एक अदना सा स्टेशन हूं, स्थिर हूं,
ये अत्यंत वेगवान हैं;
मैं चिरस्वरविहीन हूं, ये तीक्ष्णस्वरवान हैं ।
मैं प्रतीक्षा का प्रतीक,
ये मंज़िल तक पहुंचातीं हैं;
मेरे अस्तित्व से अनभिग्य मेरे वक्ष पर गुज़र जातीं हैं ।
दूरदृष्टि है इनकी, निकट को नहीं देख पातीं हैं,
बिन अपराधबोध मुझे पल पल सतातीं हैं रेलगाड़ियां ।
मूक होते हुए भी कोलाहलपूर्ण,
निर्जीव होते हुए भी कम्पायमान,
नेत्रहीन होते हुए भी प्रकाशमान,
अचर होते हुए भी गतिमान,
क्षुद्र स्टेशन के प्रति निर्लिप्त,
निर्विकार,
ना मुझसे कोई मोह, ना कोई प्यार,
निस्प्रह हो मुझको सपनों से उठातीं हैं रेलगाड़ियां.
पर किसी तुच्छ की ओर देखता
कौन सा महान है?
किसी बड़े को होता कब क्षुद्र की पीड़ा का भान है?
क्या धरती पर चलता आदमी चींटी को बचाता है?
हर भयावह तूफ़ान बस कमज़ोर वृक्ष ही गिराता है.

एक गज को बचाने भगवान स्वयं दौड़कर आये,
क्षुद्र जीवों के समूल नाश को रोकने कभी धाये?
याद रखो अगर तुम एक
अबल, अदना से स्टेशन बने रहे,
तुम्हें प्रतिदिन प्रतिपल शक्तिशाली रेलगाड़ियां जगायेंगी;
नारियां जब तक अपढ़, असहाय, अबला रहेंगी,
घरों से दुत्कारी, तंदूरों में जलाई जांयेंगी.
राष्ट्र जो जाति पांति में बंटे हैं, निर्बल और निर्धन हैं,
वे सदैव चंगेज़, नादिरशाह और गज़नवी से लुटते रहेंगे.
‘वसुंधरा वीरभोग्या है’- शक्ति की पूजक है,
यहां शक्तिशाली ही पुजे हैं, शक्तिमान ही पुजेंगे.

 

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