महेश चंद्र ‘नक्श’की रचनाएँ

फ़ाएदा क्या तुम्हें सुनाने का

फ़ाएदा क्या तुम्हें सुनाने का
मौत उनवाँ है इस फ़साने का

हम भी अपने नहीं रहे ऐ दिल
किस से शिकवा करें ज़माने का

ज़िन्दगी चौंक चौंक उट्ठी है
ज़िक्र सुन कर शराब-ख़ाने का

किस की आँखों में आए हैं आँसू
रूख़ बदलने लगा ज़माने का

बर्क़ नज़रों में कूँद उठती है
नाम सुनते ही आश्याने का

‘नक्श’ कश्ती के ना-ख़ुदा वो है
लुत्फ़ है आज डूब जाने का

फ़रेब-ए-राह से ग़ाफ़िल नहीं है

फ़रेब-ए-राह से ग़ाफ़िल नहीं है
जुनूँ गम-कर्दा-ए-मंज़िल नहीं है

मेरी ना-कामियों पर हँसने वाले
तेरे पहलू में शायद दिल नहीं है

ख़ुदा को ना-ख़ुदा कहने लगा हूँ
सफ़ीना तालिब-ए-साहिल नहीं है

तेरी बज़्म-ए-तबर में आ गया हूँ
मगर दिल को सुकूँ हासिल नहीं है

अरे उस की निगाह-ए-बे-ख़बर भी
मेरे अंजाम से ग़ाफ़िल नहीं है

मेरे ज़ौक-ए-सफ़र का पूछना क्या
निगाहों में मेरी मंज़िल नहीं है

ब-फै़ज़-ए-इश्क़ करब-ए-मर्ग से ‘नक्श’
गुजर जाना कोई मुश्किल नहीं है

हुआ है अहल-ए-साहिल पर असर क्या

हुआ है अहल-ए-साहिल पर असर क्या
तुझे ऐ डूबने वाले ख़बर क्या

वही है चश्म-ए-नर्गिस का तहय्युर
नहीं गुलशन में कोई दीदा-वर क्या

सफ़ीना क्यँू तह-ए-गर्दाब आया
तलातुम-ख़ेज़ मौजों को ख़बर क्या

निगाह ए लुत्फ़ का गगनून है दिल
मगर ये पुर्सिश-ए-बार-ए-दिगर क्या

न जाना जिस ने राज़-ए-मर्ग-ओ-हस्ती
वो क्या समझे के है तेरी नज़र क्या

बहुत दुश्वार थी राह-ए-मोहब्बत
हमारा साथ देते हम-सफ़र क्या

सितारों की भी उम्रें हो गई ख़त्म
न होगा क़िस्सा-ए-ग़म मुख़्तसर क्या

सहर अपनी न अपनी शाम ऐ ‘नक्श’
किसी मजबूर के शाम ओ सहर क्या

जिस को निस्बत हो तुम्हारे नाम से

जिस को निस्बत हो तुम्हारे नाम से
क्यूँ डरे वो गर्दिश-ए-अय्याम से

फिर कोई आवाज़ आई कान में
फिर ख़नक उट्ठे फ़ज़ा में जाम से

उन निगाहों को न जाने क्या हुआ
जिन में रक़्साँ थे नए पैग़ाम से

फिर किसी की बज़्म का आया ख़याल
फिर धुआँ उट्ठा दिल-ए-ना-काम से

कौन समझे हम पे क्या गुज़री है ‘नक्श’
दिल लरज़ उठता है ज़िक्र-ए-शाम से

नूर ओ निकहत की ये बरसात कहाँ थी पहले

नूर ओ निकहत की ये बरसात कहाँ थी पहले
ज़िन्दगी इतनी हसीं रात कहाँ थी पहले

अब तो पलकों पे सितारे से लरज़ उठते हैं
ग़म-ए-महबूब की ये बात कहाँ थी पहले

तेरी यादों से फ़रोज़ाँ हैं फ़ज़ाएँ जिन की
ऐसी रातों से मुलाक़ात कहाँ थी पहले

उन की बद-मस्त निगाओं का करम है ऐ दिल
ज़िंदगी बज़्म-ए-ख़राबात कहाँ थी पहले

कैफ़ ये दर्द-ए-मोहब्बत ने किया है पैदा
ये दिल-आवेज़ी-ए-नग़मात कहाँ थी पहले

आज यूँ दिल के तड़पने का भरम टूटा है
हसरत-ए-लुत्फ़-ओ-इनायात कहाँ थी पहले

‘नक्श’ उन शोख़-निगाहों का फ़ुसूँ है वरना
दिल में ये शोरिश-ए-जज़्बात कहाँ थी पहले

फिर उठी आज वो निगाह-ए-नाज़

फिर उठी आज वो निगाह-ए-नाज़
इक नए दौर का हुआ आग़ाज

हर हक़ीक़त है आईना फिर भी
ज़र्रा ज़र्रा है इक जहान-ए-राज़

लब-ए-शाएर पे गीत रक़्साँ हैं
रूह-ए-फ़ितरत है गोश बर-आवाज़

मेरी ख़ामोशियूँ के आलम में
गूँज उठती है आप की आवाज़

कोई आलम नहीं क़याम-पज़ीर
लम्हा लम्हा है माइल-ए-परवाज़

‘नक्श’ हम अहल-ए-दिल ने देखे हैं
मंज़िल-ए-इश्क़ के नशेब ओ फ़राज़

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