Poetry

महेश सन्तुष्टकी रचनाएँ

भाषा

मैंने
भोंकने वाले
जानवरों की भाषा में
एक ही लय देखी है।

और देखा है
चिन्तकों को
मूक भाषा में
बातें करते।

मैंने
घरों में
केवल आदमी को ही नहीं
भाषा को भी
निर्वस्त्र होते देखा है!

प्रश्न दर प्रश्न

अरे !
धूप में
नंगे पांव क्यों घूम रहे हो?

साहब!
पाँच वर्ष पूर्व
बड़े भाई के
जो तंग जूते मिले थे
वह दो वर्ष पूर्व
मैंने
अपने छोटे भाई को दे दिए।

साहब !
आप अपने तंग जूते
किसको देते हो?

आलपिनों का शहर

आज फिर कोई
मेरे सीने में
एक तीखी
आलपिन चुभो गया।

दर्द का
एक टुकड़ा
पाण्डुलिपि की तरह
मेरे सीने से जोड़ गया।

आजकल
आदमी भी
आलपिन से बदतर हो गया।

आलपिन हमेशा
छेद कर
दो पन्नों को जोड़ती है।
किन्तु आदमी
आदमी से जुड़ने के बाद
एक घिनौना छेद करता है।

और
एक-एक छेद से
मेरा सीना
छलनी नहीं बल्कि
आलपिनों का शहर हो गया!

परीक्षण

एक शोधकर्ता ने
आत्महत्या के लिए
आसमान में
एक पत्थर उछाला
और सही निशाने की तरह
अपना सिर
उसके नीचे दे दिया।

भीड़

आदमी ने
अकेलेपन में
आत्महत्या से बड़ा
कोई अपराध नहीं किया

और
भीड़ ने
विश्व युद्ध से भी ज्यादा
लोगों को कुचला है।

मुखौटा

एक
नंगा आदमी
संसद में जाता है

और
बड़ी बारीकी से
आदमी का मुखौटा ओढ़कर
बाहर आता है।

महंगाई और प्रेम

एक आदमी के
तीन जवान
लड़कियां हैं,

जिनमें से
एक- सब्जी वाले से
दूसरी- दूध वाले से
तीसरी- मकान मालिक से
प्यार करती है

और
एक परिवार का खर्च
आसानी से चलता है

आज की महंगाई से
उसका
कोई ताल्लुक नहीं है।

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