रघुवीर सहाय की रचनाएँ

पहले बदलो

उसने पहले मेरा हाल पूछा
फिर एकाएक विषय बदलकर कहा
आजकल का समाज देखते हुए
मैं चाहता हूँ कि तुम बदलो

फिर कहा कि अभी तक तुम अयोग्य
साबित हुए हो

इसलिए बदलो,
फिर कहा पहले तुम अपने को बदलकर दिखाओ
तब मैं तुमसे बात करूँगा।

1980

लोकतन्त्र का संकट

पुरुष जो सोच नहीं पा रहे
किन्तु अपने पदों पर आसीन हैं और चुप हैं
तानाशाह क्या तुम्हें इनकी भी ज़रूरत होगी
जैसे तुम्हें उनकी है जो कुछ न कुछ ऊटपटाँग विरोध करते रहते हैं

सब व्यवस्थाएँ अपने को और अधिक संकट के लिए
तैयार करती रहती हैं
और लोगों को बताती रहती हैं
कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है
तब जो लोग सचमुच जानते हैं कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है
वे उन लोगों के शोर में छिप जाते हैं
जो इस व्यवस्था को और अधिक बिगाड़ते रहना चाहते हैं
क्योंकि
उसी में उनका हित है

लोकतन्त्र का विकास राज्यहीन समाज की ओर होता है
इसलिए लोकतन्त्र को लोकतन्त्र में शासक बिगाड़कर राजतन्त्र बनाते हैं।

समझौता

एक भयानक चुप्पी छाई है समाज पर
शोर बहुत है पर सच्चाई से कतरा कर गुज़र रहा है

एक भयानक एका बाँधे है समाज को
कुछ न बदलने के समझौते का है एका

एक भयानक बेफ़िक्री है
पाठक अत्याचारों के क़िस्से पढ़ते हैं अख़बारों में
मगर आक्रमण के शिकार को पत्र नहीं लिखते हैं
सम्पादक के द्वारा

सभी संगठित दल विपक्ष के
अविश्वास प्रस्ताव के लिए जुट लेते हैं
एक भयानक समझौता है राजनीति में
हर नेता को एक नया चेहरा देना है ।

मौक़ा

नेता ने कहा कि सब भ्रष्ट हो गया है सो ठीक कहा
हिम्मत की
पर हिम्मत नहीं थी लोग यह पहले ही जान चुके थे
अब यह केवल स्वीकार था कि मैं पिछड़ गया हूँ
समाज को समझने में
नेता कुछ नहीं बता रहा
जो जनता अभी नहीं देख रही
और यह तो बिल्कुल नहीं कह रहा कि यह जो पतन है
वह किस अर्थनीति का नतीजा है
वह केवल उसी अर्थनीति में विरोध की बात करता है
जिसका मतलब है अभी जो शासक है वैसा ही बनेगा
सिर्फ भ्रष्ट नहीं होगा, ऐसा कहता है
इस बार नेता का पतन राजनीति के द्वारा रोका नहीं जा सकता
जब तक कि राजनीति बदली नहीं जाती
एक बड़ी विपदा के छोटे-छोटे घेरों में कौन अच्छा कौन बुरा
उसकी किसी पहचान का आखिर क्या मतलब ?
तब नेता का यह कथन कि देखो यह वर्तमान
लोगों को उकसा रहा है कि वे अतीत भूल जाएँ
और भविष्य के लिए आशंका ग्रस्त हों
यदि शासक अपने कामों से पराजय को प्राप्त हो
तो वह जनता की जीत नहीं है : वह एक और पतन के लिए
एक और भ्रष्टाचार में लूट के लिए
किसी और नेता को मौक़ा देने की बात है
लोग जानते हैं सब मगर जान लेना सब
राजनीति छोड़ ही देना है पतन के सहारे
क्योंकि जनता ने सब जाना, केवल विकल्प नहीं जाना
कोई विकल्प नहीं हो सकता उस समाज में जहाँ
लोग सब जानते हैं केवल उसी का अस्वीकार होता है
कोई तो बताए वह जो अभी लोगों को पता नहीं
लोगों को याद कोई यह दिलाए कि जो बीता
वह उनका किया था क्योंकि वे कुछ नहीं करते थे ।

अरे, अब ऐसी कविता लिखो

अरे, अब ऐसी कविता लिखो
कि जिसमें छन्द घूमकर आय
घुमड़ता जाय देह में दर्द
कहीं पर एक बार ठहराय

कि जिसमें एक प्रतिज्ञा करूँ
वही दो बार शब्द बन जाय
बताऊँ बार-बार वह अर्थ
न भाषा अपने को दोहराय

अरे, अब ऐसी कविता लिखो
कि कोई मूड़ नहीं मटकाय
न कोई पुलक-पुलक रह जाय
न कोई बेमतलब अकुलाय

छन्द से जोड़ो अपना आप
कि कवि की व्यथा हृदय सह जाय
थाम कर हंसना-रोना आज
उदासी होनी की कह जाय

पराजय के बाद 

तुमको लोग भूले जा रहे हैं
क्योंकि तुम जाने जाते रहे हो अपने अत्याचारों के कारण
और आज तुम हाथ खींचे हुए हो
कि तुम्हारे अत्याचारों को लोग भूल जाएँ
पर लोग तुम्हीं को भूले जा रहे हैं
करो कुछ जिससे कि वह शक्ति दुष्टता की
लोग फिर देखें और लोग भयंकर मुग्ध हों
एक राष्ट्र के पतन का लक्षण है कि
वे जो जीवन भर परोपजीवी रहे
सत्ता के तन्त्र में
आज उससे बाहर होकर यह भ्रम फैला सकते हैं कि
वे किसी दिन यह समाज बदल देंगे
और अभी सिर्फ़ मौक़ा देखते हुए बैठे हैं

9 जून, 1981

स्वाधीन व्यक्ति

इस अन्धेरे में कभी-कभी
दीख जाती है किसी की कविता
चौंध में दिखता है एक और कोई कवि

हम तीन कम-से-कम हैं, साथ हैं ।

आज हम
बात कम काम ज़्यादा चाहते हैं
इसी क्षण
मारना या मरना चाहते हैंऔर एक बहुत बड़ी आकाँक्षा से डरना चाहते हैं
ज़िलाधीशों से नहीं

कुछ भी लिखने से पहले हंसता और निराश
होता हूँ मैं
कि जो मैं लिखूँगा वैसा नहीं दिखूँगा
दिखूँगा या तो
रिरियाता हुआ
या गरजता हुआ
किसी को पुचकारता
किसी को बरजता हुआ
अपने में अलग सिरजता हुआ कुछ अनाथ
मूल्यों को
नहीं मैं दिखूँगा।

खण्डन लोग चाहते हैं या कि मण्डन
या फिर केवल अनुवाद लिसलिसाता भक्ति से
स्वाधीन इस देश में चौंकते हैं लोग
एक स्वाधीन व्यक्ति से

बहुत दिन हुए तब मैंने कहा था लिखूँगा नहीं
किसी के आदेश से
आज भी कहता हूँ
किन्तु आज पहले से कुछ और अधिक बार
बिना कहे रहता हूँ
क्योंकि आज भाषा ही मेरी एक मुश्किल नहीं रही

एक मेरी मुश्किल है जनता
जिससे मुझे नफ़रत है सच्ची और निस्सँग
जिस पर कि मेरा क्रोध बार-बार न्योछावर होता है

हो सकता है कि कोई मेरी कविता आख़िरी कविता हो जाए
मैं मुक्त हो जाऊँ
ढोंग के ढोल जो डुण्ड बजाते हैं उस हाहाकार में
यह मेरा अट्टहास ज़्यादा देर तक गूँजे खो जाने के पहले
मेरे सो जाने के पहले ।
उलझन समाज की वैसी ही बनी रहे

हो सकता है कि लोग लोग मार तमाम लोग
जिनसे मुझे नफ़रत है मिल जाएँ, अहँकारी
शासन को बदलने के बदले अपने को
बदलने लगें और मेरी कविता की नक़लें
अकविता जाएँ । बनिया बनिया रहे
बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे
पर जब कविता लिखे तो आधुनिक
हो जाए । खीसें बा दे जब कहो तब गा दे ।

हो सकता है कि उन कवियों में मेरा सम्मान न हो
जिनके व्याख्यानों से सम्राज्ञी सहमत हैं
घूर पर फुदकते हुए सम्पादक गदगद हैं
हो सकता है कि कल जब कि अन्धेरे में दिखे
मेरा कवि बन्धु मुझे
वह न मुझे पहचाने, मैं न उसे पहचानूँ ।

हो सकता है कि यही मेरा योगदान हो कि
भाषा का मेरा फल जो चाहे मेरी हथेली से ख़ुशी से चुग ले ।

अन्याय तो भी खाता रहे मेरे प्यारे देश की देह ।

(13 जून 1966)

आनेवाला खतरा

इस लज्जित और पराजित युग में
कहीं से ले आओ वह दिमाग़
जो खुशामद आदतन नहीं करता

कहीं से ले आओ निर्धनता
जो अपने बदले में कुछ नहीं माँगती
और उसे एक बार आँख से आँख मिलाने दो

जल्दी कर डालो कि पहलने-फूलनेवाले हैं लोग
औरतें पिएँगी आदमी खाएँगे -– रमेश
एक दिन इसी तरह आएगा -– रमेश
कि किसी की कोई राय न रह जाएगी -– रमेश
क्रोध होगा पर विरोध न होगा
अर्जियों के सिवाय -– रमेश
ख़तरा होगा ख़तरे की घण्टी होगी
और उसे बादशाह बजाएगा -– रमेश

(1974)

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